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Tuesday, July 29, 2014

गले के साथ दिल भी मिले तब आयेगा ईद की सेवाईंयो का असली मज़ा।

आज़ादी के बाद सात दशक पूरे होने का जा रहे हैं मगर इन सालों में लगता नही है कि हम दिलों को जोड पाये हैं।बंटवारे का दर्द कम कर पायें है।विभाजन की खाई पाट पाये हैं।अगर ऐसा कुछ हुआ होता तो कम से कम वो सब तो नही होता जो आज हो रहा है।चाहे हम इसके लिये राजनीति को ज़िम्मेदार ठहराये या तुष्टिकरण को।मगर उन सबसे पहले ज़िम्मेदार हम खुद है जो आज एक दूसरे के खून के प्यासे हो रहे है।सुना है गले मिलने से दिल मिलते है।सालो से सैकडो हजारो से गले भी मिल चुका हूं मैं और आज भी मिलूंगा।मैं ही नही सारा देश एक दूसरे से गले मिलेगा,वो लोग भी जो आस्तिनो में खंजर रखते है और वे भी जिन्हे सिर्फ़ गले मिलते समय तस्वीर खिंचवाने का,छपवाने से मतलब होता है।चाहे दिल मिले न मिले,गले मिलते है लोग।पता नही कब उनके गले मिलने मे असर होगा और कब गले के साथ साथ दिल भी मिलेंगें।नाउम्मीद तो नही हूं क्योंकि मै तो बचपने से ही मुस्लिम बहुल मुहल्ले में रहता था और आधी ज़िंदगी वंही काट आया।आज भी जाऊंगा तो सब दिल से गले मिलेंगे,दिल छुपा कर नही।मैं पूरे मुहल्ले के लिये आज भी वही हूं जो 20 साल पहले था।उनकी सेवाईंयो में वही मिठास है और प्यार भी असली।पता नही गली मुहल्लों का शुद्ध प्यार राजनीति के बाज़ार में अपना वजूद बना पायेगा।मेरे लिये सत्तार उर्फ़ रज्जू आज भी राजेन्द्र ही है।सालो से उसे राजेन्द्र कहता आ रहा हूं,न कभी उसने विरोध किया और न ही कभी घर पर राजेन्द्र कह कर आवाज़ लगाने पर अम्मा ने कुछ कहा।अम्मा हमेशा हंस कर कहती कि राजेन्द नही है बेटा।मुझे बेटा के अलावा कभी कुछ नही कहा।इस्लाम,हक़ीम,सलीम,मुजीब,कल्लू,मटल्लू,सल्लू सब वैसे के वैसे ही हैं,बस उम्र के सिवाय कुछ नही बदला।आज भी लगता है कि जैसे सब कुछ कल की बात हो पर समय बहुत दूर ले आया है।जिस तेजी से नफ़रत बांटी जा रही है,जिस तेजी से विभाजन की खाई को और गहरा किया जा रहा है,जिस तेजी से बंटवारे के ज़ख्मो को कुरेदा जा रहा है,जिस तेजी से जात-पात के नाखूनों को तेज किया जा रहा है,उससे तो लगता है कि आने वाले दिनों में गले मिलने की बात तो सपना ही हो जायेगी।पर उन लोगों से हम लोगों की संख्या ज्यादा है फ़िर भी हम प्यार को बांट नही रहे है।गले मिलते तो है मगर उससे मिले प्यार को फ़ैला नही रहे है,शायद इसलिये अमन चैन के इस टापू पर प्यार सिकुडता और नफ़रत फ़ैलती नज़र आती है।मगर अब बहुत हो चुका है समय आ गया है हम सबको आगे आना ही होगा,नफ़रत की सियासत पर लगाम लगाना ही होगा,तब होगा ईद का असली मज़ा,सेवाईंयो की शुद्ध मिठास और गले के साथ साथ दिल के भी मिल जाने का एहसास।ईद मुबारक़ हो सभी को,उनको भी जो गले तो मिलते है मगर महज दिखावे के लिये।

Wednesday, August 21, 2013

तरस आता है डालर के दाम बढने से हैरान परेशान लोगों की सोच पर

तरस आता है मुझे डालर के दाम बढने से हैरान परेशान लोगों की सोच पर.अरे भाई अपने देश का प्रधानमंत्री कोई ट्रक ड्राईवर नही है भाई,अर्थशास्त्री है,अर्थशास्त्री.कुछ सोच समझ के बढने दे रहे है डालर के रेट.ये अमेरिका अपने आप को समृद्ध समझता है.और वो ब्रिटेन,उासने तो हम पर सालो राज किया है.बदला भी तो लेना है सालों से.आखिर प्रधानमंतत्री बनने का मतलब सिर्फ महंगाई,भ्रष्टाचार पर रोक लगाना ही थोडे ही होता है,इंटरनल पालिटिक्स से ज्यादा इंपार्टेण्ट है इंटरनेशनल पालिटिक्स.समझे की नही.वही रोज़ रोज़ की खिच खिच सब्ज़ी महंगी,हो गई दाल महंगी हो गई,प्याज़ के दाम आसमान छू रहे है,सोना महंगा हो गया है.डालर महंगा हो गया.सब पता है भाई.कोई मामूली बाबू,बडे बाबू है क्या?जो हिसाब किताब रखेंगे.प्रधानमंत्री है प्रधानमंत्री हिसाब किताब रखते नही,चुकता करते हैं.और आज तक़ किसी ने भी ब्रिटेन और अमेरिका से हिसाब चुकता करने के बारे में सोचा तक नही.सब उनसे संबंध मधुर बनाने मेँ लगे थे.लेकिन हमारे ताज़ा प्रधानमंत्री,वाह वो तो अमेरिका से बदला लेने को बेकरार थे.वे तो पाकिस्तान की बात बात पर मदद करने वाले,और हमारे लोगों को अपने एअरपोर्ट पर नंगा कर बेईज़्ज़त करने वाले अमेरिका की बेईज़्ज़ती करने का मौका तलाश रहे थे.सोचो जब हम अकड कर पांच दस रूपया टीप का छोड देते है,तो मन ही मन गाली देते हुये सलामी ठोकने वाले वेटर के चेहरे पर और हमारे चेहरे पर कैसे भाव आते हैं.वो दीन हीन गरीबों वाली कातर मुस्कान और हम राजा महाराजा वाली गर्विली मुस्कुराहट लिये होते है.बस ठीक वैसी ही वेटरों वाली कातर मुस्कान अमेरिका के मुंह पर देखेंगे हमारे प्रधानमंत्री जब एक डालर के बदले सौ का नोट देकर शान से कहेंगे कीप द चेंज़.होने तो दीजिये नब्बे-पन्च्यान्बे रुपये का एक डालर फिर देखना ठसन अपने प्रधानमंत्री जी की.अरे सब को शार्ट कट की लगी हुई,लांग टर्म प्रोग्राम सुना है या नही.वैसे एक गाना याद आ रहा है,उसमे आज थोडे सुधार की जरुरत है,फिल्म रोटी कपडा और मकान के गाने के बीच की लाईने थी"पहले मुट्ठी भर पैसे लेकर थैले मे डालर लाते थे,अब थैले में रुपये जाते है और मुट्ठी में डालर आते हैं.दुहाई है दुहाई है दुहाई.

Monday, August 12, 2013

किश्तवाड पर सियासत गलत और गोधरा पर सही!वाह रे धर्मनिरपेक्षता!

कुछ नेतागण और हमारे मीडिया वाले भाई बंधू ये सवाल उठा रहे है कि किश्तवाड पर सियासत क्यों?ठीक बात है ऎसे मामलों में सियासत होनी भी नही चाहिये.पर मेरा ये सवाल है कि सियासत का सवाल सिर्फ किश्तवाड के लिये ही क्यों?गोधरा और गुजरात के लिये क्यों नही?वंहा अगर सियसत जायज है तो फिर किश्तवाड में क्यों नही? और अगर किश्तवाड में गलत है तो फिर गोधरा और गुजरात में सही क्यों?सवाल तो ढेर सारे है मगर ऎसे समय ऎसे वैसे सवाल भी गलत ही है.

Sunday, August 11, 2013

जिसने भी बनाया,बहुत सोच समझ कर बनाया है टीवी का रिमोट

पहले पहल रिमोट को देखा तोम बडा अजीब सा लगा था.सालो साल उसकी उपयोगिता पर सवाल खडे होते रहे.उसका ज्यादा से ज्यादा उपयोग तब दूरदर्शन के लोकप्रिय कार्यक्रमो के बीच आने वाले परिवार नियोजन के विग्यापन"इनकी खुशी का राज,डिलक्स निरोध"को बदलने के लिये होता रहा.तब सोचता था कौन मूर्ख है जो टीवी बनाने के बाद एकाध बार चैनल बदलने के लिये रिमोट का आविष्कार करने मे खोपडी खपाये रहा.पर आज पता चल रहा है रिमोट के आविष्कारक भैया तो दूरदर्शन से भी दूरदर्शी निकले.उन्हे पता था कि आने वाले समय में डिलक्स निरोध जैसे सुसंकृ्त विग्यापन की मां बहन एक करने वाले एक से बढ कर एक फ्लेवर्ड कण्डोम के विग्यापन आ जायेंगे.गनिमत है साले लाईव शो,या रियेल्टी शो की तर्ज़ पर लाईव विग्यापन नही दिखा रहे है.वे तो फिर भी रोजी रोटी के लिये सब बेच रहे है,इमान तक.मगर उससे भी ज्यादा नंगई पर तो न्यूज़ चैनल उतर आये है.रोटी के लिये तरस रही एक बडी आबादी के इस देश में वे लोग टोपी पर बहस करते है,रोटी पर नही!तो ऎसे में रिमोट ही तो है जो अधिकांश टीवी सेट को फूटने से बचा रहा है.और आज जब मेरे ग्यान चक्षु खुले तो समझ में आया कि रिमोट बनाने वाला मूर्ख नही परम विद्वान था जिसे हमारे यंहा के न्यूज़ चैनलो की मूर्खता का पहले से ही अंदाज़ा हो गया था.खटाक चैनल बदल लो भाई अगर मेरा चैनल पसंद नही है तो.हअहाहाहाहाहा

Friday, August 9, 2013

विभाजन के ज़ख्म को लगता है हमारे देश की सरकारो नें अलप्संख्यको की सहायता के नाम पर हरा भरा ही रखा

समय कितना बदला है.कभी आज ही के दिन सुबह उठते नहा कर घर से निकलते थे तो सीधे रात को ही घर लौटते थे.आज पूरी छूट होती थी दिन भर दोस्तो के घर जाने की,गले मिलने की और उनके घर खाना खाने की भी.पर भूले नही भुलाई भूलती बूंदू.असली नाम पता नही.बचपन से हम सब उन्हे इसी नाम से जानते थे,पुकारते थे.छोटे ही थे उनकी शादी हो गई थी.वे आज दुनिया में नही है पर ईद के दिन सुबह सबसे पहले वे सेवाईंयो से भरा डिब्बा लेकर हमारे घर आती थी और आई से कहती थी "आप भले मत खाना आई,पर भैया लोगो को जरूर देना".हमारी आई सालो उनके पडोस में रही पर जाने क्यों उनके घर का कुछ खा नही पाती थी.हां चाय जरुर पी लेती थी.बुंदू के घर की सेवाईंया खाकर निकले के बाद तो गले मिलते मिलते ही थक जाते थे.पूरा मुहल्ला मुस्लिम बहुल था.मौदहापारा.बचपन गुज़रा वंहा,जवानी भी.पर अब लगता है सब बदलता सा जा रहा है.वे लोग तो आज भी नही बदले.आज भी उस मुहल्ले के लिये मै वही छोटा सा खुराफाती बच्चा हूं.अनीस,इस्लाम,हक़ीम,भोंदू जो आज कल हाजी अब्दुल अजीम है,अकबर भैया मंत्री बनने के बाद भी कभी मंत्री नही लगे,भैया ही रहे,सबसे खास दोस्त रज्जू उर्फ सत्तार जिसे मैने तब से आज तक राजेंद्र कहकर ही पुकारा.कभी सत्तार नही कहा.उसके घर पर आवाज़ देने पर अम्मा भी जवाब देते थी मुझे राजेन्द्र नही है बेटा.कभी मुझे बेटा के सिवाय कुछ नही कहा.अनीस की अम्मी आज इस दुनिया में नही है.वे भी मुझे बेटा ही कहती थी.शहर के जाने माने वकील स्व अफज़ाल अहमद रिज़वी,इंका नेता इक़बाल अहमद रिज़वी मामा थे और हमेशा रहेंगे.मामियों ने जी भर कर प्याय उंडेला.मेहमूद जिसके बिना तो हम लोग सालो से नवरात्र में डोंगरगढ के प्रसिद्ध बम्लेश्वरी मैया के मंदिर तक नही जाते.याकूब मोकाती हमारे घर का सदस्य ही है.कालेज में मिला शकील.आज तक दोस्त है और उसके घर जाने पर अम्मी कभी हम दोनो को अलग अलग थाली में खाना नही देती थी,एक ही थाली में खाते थे हम.वे आज नही है पर मेरे लिये वे भी आई से कम नही थे.ईद को गले मिलते मिलते थक जाता था.पूरा मौदहापारा गले मिलता था.कालेज के चुनाव में मैने जिन्हे कभी देखा तक नही था,सबके कालेज चले आये थे.किसी ने कह दिया था कि अनिल को फार्म भरने नही दिया जायेगा.सबके सब वंहा पहुंचे थे.उस समय प्यार था.गले मिलो तो सुकून मिलता था और आज भी मिलता है पर बहुत से लोग गले भी मिलते है तो अफज़ल खान और शिवाजी की तरह.विभाजन के ज़ख्म को लगता है हमारे देश की सरकारो नें अलप्संख्यको की सहायता के नाम पर हरा भरा ही रखा और बाकि कसर पाकिस्तान की नापाक हरकते पूरा करती रही.आतंकवाद,कश्मीर की घुसपैठ उन ज़ख्मो को नासूर में बदलती रही और सरकारे भी ईलाज के नाम पर उसे सहलाने की बजाय कुरेदती रही.दंगो ने भी उन्हे ताज़ा बनाये रखने में कोई कसर नही छोडी.अल्पसंख्यक -बहुसंख्यक की परिभाषा से दोनो के बीच अविश्वास की खाई खोदती रही जो दिन ब दिन गहरी होती जा रही है.खैर मुझे तो कोई फर्क़ नही पडा और मेरे जैसे बहुत से लोगो को नही पडा,पर जब भी मैं पाकिस्तान या आतंकवाद के खिलाफ लिखता हूं तो पता नही क्यों मुझे भी शक़ की निगाहो से देखा जाने लगा है.इसमे कोई शक़ नही मैं हिंदू हूं.हूं तो हूं.हां पर ईद में मै दोस्तो के घर जाना नही भूलता और ना गले मिलते समय इधर उधर देखता हूं.गले मिलता हूं दिल से.कोई शक़ नही,कोई अविश्वास नही,सिर्फ प्यार.शायद मकसद होना भी चाहिये भाईचारा.

Wednesday, August 7, 2013

नया कारोबार शुरु करने जा रहा हूं जिसकी सफलता के लिये आप सबकी शुभकामनायें जरुरी है

साल भर की मेहनत का फल आज मिलना तय हो गया है.हालांकि हमारा प्रोजेक्ट लगभग 6 माह देरी से पूरा हो रहा है पर देर आयद,दुरुस्त आयद.आज दोपहर क्रशर का उद्घाटन होने जा रहा है.इस प्रोजेक्ट मे देर होने के बहुत से कारण हो सकते है पर इसके शुरु होने में छोटे भाई सुनील,सुशील,लक्ष्मण जैसा ही लक्ष्मण,पार्टनर मनोज,अशोक,महेन्द्र विवेक,बाद्शाह,फज़लू,अबू तलेब,रमेश,बेनी प्रसाद गुप्ता,राव चौकीदार कान्हा समेत ड्राईवर नंदू का बहुत बडा हाथ है.सभी को बहुप्रतिक्षित प्रोजेक्ट के पूरा होने की बधाई और नये सफर की शुरुआत के लिये शुभकामनायें.पहले सोचा था मै भी क्रशर का एक हिस्सा रहुंगा पर साधना न्यूज़ से जुड जाने के कारण अब वंहा जाना नही हो पायेगा.फिर भी नये कारोबार की सफलता के लिये आप सब की शुभकामना बेहद जरूरी है.ईश्वर नौकरी की तरह इस कारोबार में भी मुझे टिकाऊ बनाये.हाहाहाहाहाहा.दोपहर 2.45 को बटन दबाकर क्रशर की गडगडगिड्गड सुनूंगा.कान उस सुमधुर संगीत को सुनने के लिये एक साल से तरस गये हैं.

Monday, August 5, 2013

फ्रेण्डशीप डे के बहाने,बाढपीडितों के नाम पर नशे का नंगा नाच,क्या इसे ही इवेण्ट कहते हैं?

पता नही ये इवेण्ट फिवेण्ट क्या बला है पर रायपुर जैसे मंझोले शहरों में लडकियां शराब पीती पकडाये,तो हैरानी होती है.और गुस्सा तब और बढ जाता जब वो इवेण्ट बाढ पीडितो के लिये किया जा रहा हो.जी हां इसानियत को शर्मसार कर देन वाली ये घटना हुई है यंहा कल रात.शहर के एक होटल में कल पुलिस ने दबिश दी और लडकियों को शराब पीते हुये पकडा.पार्टी से होने वाली कमाई उत्तराखण्ड भेजने का उल्लेख निमंत्रण पत्र में है.क्या बाढ पीडितो की चिंता ऎसे की जाती है?कमाई के इस नये काले धंधे पर जितनी जल्दी हो रोक लगनी चाहिये.इससे पहले भी एक एक ऎसे ही इवेण्ट में लडकियां शराब पीती हुई होटल से बाहर निकल आई थी और हुल्लड करने लगी थी.तब भी पुलिस को दखल देना पडा था.इस तरह की पार्टियां हमारी संस्कृति पर तो हमला है ही हमारी बहन बेटियों के लिये भी बडा खतरा बन कर उभरी है.फ्रेण्डशीप डे के नाम पर उत्तराखण्ड के बाढ पीडितो के बहाने हमारी युवा पीढी को नशे की खाई में धकेलने वाली इस संस्कृति पर रोकथाम होना जरुरी है.इस घटना ने ना केवल सोचने पर मज़बूर किया है बल्कि शर्मसार भी किया है.