गरीब छोटे घर किंतु बडे दिल वाला होता है।इतने बड़े दिल वाला कि आप उसे एक नही कई थप्पड़ मारिये वो गाल हटायेगा ही नही।हटायेगा क्या हटाने लायक रहता ही नही, और फ़िर उसे मालूम है कि गाल हटायेगा तो उससे ज्यादा ज़ोर से कंही और लात पड़ेगी।इसिलिये उसने तय कर लिया है सरकार को जो करना है करे उसे तो सरकार को माफ़ करते जाना है बस।वो सुबह शाम चिल्लाता है क्षमा गरीबन को चाहिये,सरकार को उत्पात!
अब देखिये ना पेट्रोल चार रूपये महंगा हो गया वो कुछ बोला क्या?क्या कहा,गरीब को पेट्रोल से क्या लेना?बात तो सही है,लेकिन पेट्रोल के दाम बढने से महंगाई बढते हैं ऐसा उन्होने सुना था।अब कहोगे कि सुनी सुनाई बात पे क्या भरोसा करना। अगर चार रूपये किमत बढने से महंगाई बढती तो टीवी वाले भैया लोग बताते नही क्या?वो तो सारे देश मे हंगामा कर देते गरीब कैसे जीयेगा?इसी बहाने थाली का बैग़न भी टी वी पर आ जाता?गरीबो के खाने मे ऐसा लगता है दाल तो है ही नही।सत्तर रूपये किलो दाम हो गये मगर कोई कुछ कह रहा है क्या?और फ़िर जब मीडिया नही कह रहा है तो कैसे मान ले महंगाई बढेगी?
अरे भैया पेट्रोल के दाम बढने पर राज्यसभा मे तक़ हंगामा हो गया।ट्रांस्पोर्टर मीटिंग कर रहे है।उन्के दाम बढेंगे तो सभी चीज़ों के दाम भी बढेंगे,तो फ़िर महंगाई कैसे नही बढेंगे?रहोगे न गरीब के गरीब?अरे टी वी नही देखा?किसी ने बताया क्या महंगाई बढेगी?नही ना। फ़िर काहे बकवास कर रहे हो।भैया उन लोगो को तो कल से लेकर आज तक़ समलैंगिको से फ़ुरसत नही मिल रही है।उन लोगो को गरीबों के बारे मे सोचने का वक़्त ही नही मिला होगा न्।फ़िर कितने गरीब टीवी देखते है?वे तो सुबह से घर-बार छोड़ कर रोजी-रोटी कमाने निकल जाता है।उसके पास ड्राईंग रूम डिस्कशन के लिये टेम ही कंहा होता।
पेट्रोल और ड़ीज़ल के दाम बढने की खबर तो ऐसे मर गई जैसे गरीब के घर मे बूढा बिना दवा के या बच्चा कुपोषण से मर जाता है।अडोसी-पडोसी को तक़ खबर नही होती और प्रभावित अपने रिश्तेदार को जैसे तैसे फ़ूंक-फ़ाक कर दूसरे दिन से ही रोज़ी-रोटी के जुगाड़ मे लग जाता है।उसके लिये समाज और धर्म के दूसरे कोई नियम लागू नही होते सिवाय रोज़ी-रोटी कमाने के।और उसका गरीब समाज भी उसे सामाजिक मान्यतायें तोड़ने पर भी क्षमा कर देता है क्योंकि क्षमा तो अब सिर्फ़ गरीब का आभूषण रह गया है।और फ़िर वो क्षमा नही करेगा तो कर भी क्या सकता है?वो तो समलैंगिको जितना भी खुशकिस्मत नही है जिसके लिये सारे देश मे हंगामा हो शोर हो।
एक बात है गरीब ने ज़िंदा रहने के लिये प्रकृति के अनुरूप ढलने के नियम को मज़बूरी मे ही सही पूरी-पूरी तरह स्वीकार कर लिया है और उसमे एक नियम है क्षमा का।क्षमा! चाहे कोई भी गलती करे,क्षमा गरीब ही करेगा।सरकार के मामले मे तो ये स्कूल कालेज के इम्तिहानो मे पूछे जाने वाले कमीने पहले सवाल की तरह अनिवार्य हो गया है।कुपोषण से लड़ने का दावा करती है सरकार,इन्फ़ैन्ट मोर्टेलिटी रेट नीचे लाने की बात करती है सरकार।क्या कभी सरकार ने बाज़ार जाकर दाल-आटे का भाव देखा है।कभी सुना करते थे एक मुहावरा दाल-आटे का भाव पता चलना।तब लगता था क्या दाल आटे की बार करते है लोग।पर अब पता चल रहा है कि दाल सत्तर रुपये किलो हो गई है।क्या गरीब रोज़ दाल खा सकता है?सरकार को तो चाहिये गरीबों को अपनी रानी या राजकुमार के फ़ोटो सहित दालो के पोस्टर बांट दे,जिन्हे देख कर सुखी रोटी और भात खायें और दाल का स्वाद और पौष्टिकता का भरपूर आनंद लें। और नही भी लेंगे तो क्या कर लेंगे सरकार को भी पता चल गया है गरीबो ने सुबह शाम यही भजन गाना शुरू कर दिया है,क्षमा गरीबन को चाहिये,सरकार को……….………।
Friday, July 3, 2009
Tuesday, June 30, 2009
क्या सिर्फ़ समलैंगिको को अधिकार दिलाने के लिये बहस हो सकती है,सड़क पर दबकर मरने वालो का टी आर पी ज्यादा नही है शायद?
पेश है एक माईक्रो पोस्ट।मौसम पर नही कानून पर।दफ़ा 377 पर सारे देश मे बहस छिड़ गई है।देश के ठेकेदार स्टूडियो मे बैठ कर इसको देश के लिये ज़रूरी या गैर ज़रूरी करार देने की कवायद मे जुट गये हैं।समलैंगिक शब्द की टी आर पी बहुत है दरअसल,शायद इसिलिये इसके खतम करने पर पूरा ज़ोर दिया जा रहा है चाहे बाल्को या यौन शोषण के अपराध पर नियंत्रण करने के लिये बनाई गई धारा उनकी गर्मागरम बहस मे धारो-धार बह जाये।पता नही क्यों समलैंगिको को उनका अधिकार दिलाने के लिये पिल पड़े है सब?पता इस कानून मे क्या है?अरे बहस करना है तो इण्डियन मोटर व्हीकल एक्ट के प्रावधानो पर बहस करते।अंग्रेज़ो के बनाये इस कानून मे आज भी गाड़ी चलाने वाले के हित छिपे हुये है जबकि अब गाड़ी चलाने वाले अंग्रेज़ नही है और न ही दबने वाले भारतीय है।दबने वाले और दबाने वाले दोनो भारतीय है,हां उसमे एक फ़र्क आ गया है दबने वाला गरीब और दबाने वाला अमीर है।इस कानून के तहत सज़ा सिर्फ़ बदकिस्मत लोगो को ही मिलती है या अपने सेठों के बदले जुर्म स्वीकार करने वाले ड्राईवरों को।जो दबाता है वो जमानत पर रिहा होकर फ़िर सड़क पर निकल पड़ता है अगले शिकार की तलाश मे और जो दबता है वो या तो फ़िनीश या फ़िर ज़िंदगी भर अपाहिज्।क्या इस पर बहस नही हो सकती इस देश मे?हत्या और हत्या के प्रयास से किस प्रकार कम होता है लापरवाही से गाड़ी चलाकर किसी को कुचल देना?क्या कुचलए जाने वाले गरीबो के लिये बह्स करने या उनके लिये सोचने की किसी को फ़ुरसत नही है।
Monday, June 29, 2009
तुम तो नेताओं को भी मात दे रहे हो
कोरा आश्वासन देने,गरीबों पर अत्याचार करने और धोखेबाज़ी मे नेताओं को कौन टक्कर दे सकता है?इस सवाल का जवाब बड़ा कठिन लगता है।तीनो ही गुणों पर तो सिर्फ़ और सिर्फ़ नेताओं का एकाधिकार नज़र आता है और उस एकाधिकार को न केवल तोड़ना बल्कि उन गुणों मे श्रेष्ठता भी साबित करने वाले को ढूंढते नज़रें थक़ जाती है।सच पूछो तो इस मामले मे कोई उनकी बराबरी तक़ नही कर सकता।फ़िर कौन हो सकता है उन्हे मात देने वाला?सोचो?सोचो,सोचो?नही सोच पाये ना?तो सुनो उन्हे मात दे रहा है,बादल।
बहुत ध्यान से देखें त्तो बादल नेताओं का बडा भाई ही लगता है।जब नज़र आता है, नेताओं की तरह जनता, खासकर गरीब जनता की आस ही बढाता है।वह भी जब आता है नेताओं की तरह चिल्ला-चिल्ला कर सब कुछ ठीक कर देने का दावा करता नज़र आता है।नेताओ की तरह उसे लाऊडस्पीकर और भीड़ की ज़रुरत नही पड़ती,वो तो भारी गड़गड़ाहट के साथ मानो आकाशवाणी कर देता है कि वो आ गया है और उनकी मांगे वो पूरी कर देगा।ऐसा नही है वो हमेशा ही धोखा देता है या कोरे आश्वासन ही देता है।कभी-कभी चुनावी मौसम मे नेताओं द्वारा किये गये कार्यों की तरह उसके किये गये भी काम देखे जा सकते है।
ऐसा नही है कि वो नेताओं की तरह सिर्फ़ गरज़ता ही है,बरसता नही है।वो कभी-कभी बरसता भी है मगर उसके बरसने मे भी ऊंच-नीच या अमीर-गरीब का भेदभाव साफ़ नज़र आता है।उसका कोई भी काम नेताओं के कामो की तरह निश्पक्ष नज़र नही आता।वो भी अपने चाहने वालों को तो फ़ायदा पंहुचाता है और उस्का दुष्परिणाम गरीब ही भोगता है।वो जब बरसता है अमीर मौसम का मज़ा लेते है उअर गरीबों पर रोज़ी-रोटी का संकट कहर बरपा देता है।और जब नही बरसता तो भी अमीरो के लिये कम उत्पादन भारी मुनाफ़ाखोरी का कारण बन जाता है।और तो और वो तो भ्रष्टाचार के लिये नेताओं को हमेशा सुनहरा अवसर प्रदान करता रहता है।ज्यादा बरस कर बाढ और कम बरस कर सूखे के हालत राहत कामो के लिये ग्राऊंड बना देते है।फ़िर शूरू हो जाता है गरीबो की मदद के नाम पर अमीरो और नेताओं की तिज़ोरी भरने का काम।
कभी देखा है किसी गरीब को पहली बरसात मे स्काच का पैग हाथ मे लिये चिकन/मटन या गर्म भजिये का मज़ा लेते हुये?कभी देखा है किसी गरीब को छत पर भीगते हुये?हां याद आया गरीब तो हमेशा छ्त के नीचे टपकते हुये पानी को इकट्ठा करते हुये भीगता है।वो भी रेन डांस करता है मगर छत के नीचे के बरतनो को इधर से उधर सरकाने के लिये।ये साला बादल कभी भी झुग्गी-झोपड़ी और पाश कालोनी मे फ़र्क नही करता।बिल्कुल नेताओं की तरह सबको वोट लेकर जीत जाने के बाद एक जैसे ही देखता है।
बादल तो साला बेशर्मी मे भी नेताओं को मात देता नज़र आता है।नेता तो पांच साल मे एक बार आते है ये तो साला हर साल चला आता है बिना नागा। हर बार कुछ न कुछ गड़बड़ करता ही है।कभी बाढ तो कभी सूखा।कभी यंहा अकाल तो कभी वंहा अकाल्।बिहार,उड़िसा,असम और राजस्थान तो पहले इसके प्रिय राज्य थे मगर आजकल ये कंही भी किसी को भी निपटा देता है।राजस्थान को सुखा-सुखा कर तंग करने के बाद अब बाढ से परेशान करने लगा है।मतलब वो भी नेताओ की तरह कभी यंहा से तो कभी वंहा से जुगाड़ कर अपनी सत्ता कायम करने का फ़ार्मूला सीख गया है।
बादल इस बार भी किसानो के साथ मज़ाक कर रहा है।उसने पहले नेताओ के चुनावी घोषणापत्र की तरह मौसम विभाग से अपना घोषणापत्र जारी करवा कर किसानो की उम्मीद बढा दी थी और अब वो अपने घोषणापत्र को नेताओं की तरह आश्वासन की पुडिया बांधने के काम मे ला रहा है।किसानो का दम टूट रहा है और नेताओं के सब्र का बांध्।उन्हे भी ज़ल्दि है किसान मरे तो कर्ज़ा मुक्ति के नाम पर बंदरबांट कर सके।साला कमीनेपन मे भी अच्छे अच्छों को मात दे रहा है ये बरखा का भाई बादल्।इसके पीछे रायपुर से अमरावती आ गया।साला पहले यंहा बरस रहा था रायपुर मे नही और जब मै यंहा आया हूं तो यहा से भाग के वंहा बरस रहा है।है ना धोखेबाज़ो का बेताज बादशाह्।
बहुत ध्यान से देखें त्तो बादल नेताओं का बडा भाई ही लगता है।जब नज़र आता है, नेताओं की तरह जनता, खासकर गरीब जनता की आस ही बढाता है।वह भी जब आता है नेताओं की तरह चिल्ला-चिल्ला कर सब कुछ ठीक कर देने का दावा करता नज़र आता है।नेताओ की तरह उसे लाऊडस्पीकर और भीड़ की ज़रुरत नही पड़ती,वो तो भारी गड़गड़ाहट के साथ मानो आकाशवाणी कर देता है कि वो आ गया है और उनकी मांगे वो पूरी कर देगा।ऐसा नही है वो हमेशा ही धोखा देता है या कोरे आश्वासन ही देता है।कभी-कभी चुनावी मौसम मे नेताओं द्वारा किये गये कार्यों की तरह उसके किये गये भी काम देखे जा सकते है।
ऐसा नही है कि वो नेताओं की तरह सिर्फ़ गरज़ता ही है,बरसता नही है।वो कभी-कभी बरसता भी है मगर उसके बरसने मे भी ऊंच-नीच या अमीर-गरीब का भेदभाव साफ़ नज़र आता है।उसका कोई भी काम नेताओं के कामो की तरह निश्पक्ष नज़र नही आता।वो भी अपने चाहने वालों को तो फ़ायदा पंहुचाता है और उस्का दुष्परिणाम गरीब ही भोगता है।वो जब बरसता है अमीर मौसम का मज़ा लेते है उअर गरीबों पर रोज़ी-रोटी का संकट कहर बरपा देता है।और जब नही बरसता तो भी अमीरो के लिये कम उत्पादन भारी मुनाफ़ाखोरी का कारण बन जाता है।और तो और वो तो भ्रष्टाचार के लिये नेताओं को हमेशा सुनहरा अवसर प्रदान करता रहता है।ज्यादा बरस कर बाढ और कम बरस कर सूखे के हालत राहत कामो के लिये ग्राऊंड बना देते है।फ़िर शूरू हो जाता है गरीबो की मदद के नाम पर अमीरो और नेताओं की तिज़ोरी भरने का काम।
कभी देखा है किसी गरीब को पहली बरसात मे स्काच का पैग हाथ मे लिये चिकन/मटन या गर्म भजिये का मज़ा लेते हुये?कभी देखा है किसी गरीब को छत पर भीगते हुये?हां याद आया गरीब तो हमेशा छ्त के नीचे टपकते हुये पानी को इकट्ठा करते हुये भीगता है।वो भी रेन डांस करता है मगर छत के नीचे के बरतनो को इधर से उधर सरकाने के लिये।ये साला बादल कभी भी झुग्गी-झोपड़ी और पाश कालोनी मे फ़र्क नही करता।बिल्कुल नेताओं की तरह सबको वोट लेकर जीत जाने के बाद एक जैसे ही देखता है।
बादल तो साला बेशर्मी मे भी नेताओं को मात देता नज़र आता है।नेता तो पांच साल मे एक बार आते है ये तो साला हर साल चला आता है बिना नागा। हर बार कुछ न कुछ गड़बड़ करता ही है।कभी बाढ तो कभी सूखा।कभी यंहा अकाल तो कभी वंहा अकाल्।बिहार,उड़िसा,असम और राजस्थान तो पहले इसके प्रिय राज्य थे मगर आजकल ये कंही भी किसी को भी निपटा देता है।राजस्थान को सुखा-सुखा कर तंग करने के बाद अब बाढ से परेशान करने लगा है।मतलब वो भी नेताओ की तरह कभी यंहा से तो कभी वंहा से जुगाड़ कर अपनी सत्ता कायम करने का फ़ार्मूला सीख गया है।
बादल इस बार भी किसानो के साथ मज़ाक कर रहा है।उसने पहले नेताओ के चुनावी घोषणापत्र की तरह मौसम विभाग से अपना घोषणापत्र जारी करवा कर किसानो की उम्मीद बढा दी थी और अब वो अपने घोषणापत्र को नेताओं की तरह आश्वासन की पुडिया बांधने के काम मे ला रहा है।किसानो का दम टूट रहा है और नेताओं के सब्र का बांध्।उन्हे भी ज़ल्दि है किसान मरे तो कर्ज़ा मुक्ति के नाम पर बंदरबांट कर सके।साला कमीनेपन मे भी अच्छे अच्छों को मात दे रहा है ये बरखा का भाई बादल्।इसके पीछे रायपुर से अमरावती आ गया।साला पहले यंहा बरस रहा था रायपुर मे नही और जब मै यंहा आया हूं तो यहा से भाग के वंहा बरस रहा है।है ना धोखेबाज़ो का बेताज बादशाह्।
Sunday, June 28, 2009
वो तो ऐसे भाग रही थी जैसे मै गुलशन, शक्ति या शाईनी हूं!
बहुत दिन हुये थे उसे देखे हुये।वो भी इन दिनो नज़र नही आ रही थी।पता चला कि वो मेरे मामा के गांव की तरफ़ आई हुई है।बस मैं भी निकल लिया उसे देखने के लिये।मगर ये क्या?वो तो ऐसे भागी जैसे मै सूरत से शक्ति,शाईनी या गुलशन भाई जैसा नज़र आ रहा हूं
कल रात ही मामा से बात हुई।उन्होने बताया कि वो इधर आ गई है।बस फ़ट से उधर जाने का प्रोग्राम बना लिया।भांजा गर्मी की छुट्टियां मनाने के लिये आया हुआ था।उसकी स्कूल भी शुरू हो गई थी।वो वापस जाने को तैयार नही था और उसकी मां यानी छोटी बहन बार-बार फ़ोन करके उसे भिजवाने के लिये कह रही थी।मैने उससे कहा भई तेरे बच्चे को किडनैप नही किये हैं।कल शाम को फ़ोन पर वो भी बोली आ जाओ वो यंहा आ गई है।और मैने उसे देखने जाना फ़ाईनल कर दिया।फ़िर मुझे खयाल आया कि गाड़ी की स्टेपनी तीसरा मोर्चा हो गई है।पिछली बार उसके सपोर्ट मे कुछ दूर तक़ जैसे-तैसे गाड़ी चला ले गया था।गाड़ी तो चल गई थी मगर सपोर्ट देने के बदले स्टेपनी निपट गई थी।
बिना स्टेपनी के लांग ड्राईव का मज़ा किरकिरा ना हो जाये इसलिये बिना रिस्क लिये मैने स्टेपनी डलवाने की सोची तो हमारे मैकेनिक साब ने कह दिया एक नही दो टायर लेने पड़ेंगें,दोनो को आगे या पीछे डाल कर निकले हुये टायरो मे से एक को स्टेपनी बना देंगे। और दूसरा?वो स्पेयर मे पड़ा रहेगा।रेट पूछा तो 5600 रु का एक टायर्।मैने कहा कि कोई पुराने टायर का जुगाड़ कर दे।इस पर उसने सभी टायर बदलने की सलाह दे दी।उसने कहा कि चारो टायर अच्छे है मै इनको अच्छे रेट मे बेच दूंगा आप पिरेली कं के टायर डाल लो।6800 रू का एक टायर।मै बोला खसक गया है क्या।वो बोला साब गाड़ी चलाने का मज़ा भी तो लोगे।फ़िर टायर तो देखिये क्या खूबसूरत दिखते हैं।पहली बार मुझे पता चला कि टायर भी सुन्दर दिखते हैं।फ़िर उसने बताया कि पीरेली कंपनी का कैलेण्डर दुनिया की सबसे सुन्दर माडलो को लेकर बनाया जाता है।सबसे सुन्दर,सबसे महंगा औए सबसे सैक्सी।मैने कहा सारी तारीफ़ कैलेण्डर की और टायर?साब वो भी कैलेण्डर जैसे ही है।
आखिर उसे देखने जाना था इसलिये सारे टायर बदल डाले।कोई रिस्क लिये बिना सुबह-सुबह निकल जाने का प्रोग्राम बना लिया।सुबह फ़ोन करके पूछा तो छोटी बहन ने बताया कि वो इधर ही है और झूम-झूम कर इतरा रही है।मैने अपने शहर के आसमान की ओर आस भरी निगाहों से देखा और सोचा दो दिनो से आसमान पर पसरे हुये है शायद आज बरस पड़े,इसी उम्मीद से मैने सुबह के प्रोग्राम को दोपहर तक़ टाला और जब देखा कि बादल तो कांग्रेस के गरीबी हटाओ नारे की तरह नज़र आ रहे है ,सो साढे बारह बज़े मैने निकल जाने मे ही भलाई समझी।सोचा कंही न कंही तो मुलाकात होगी ही।
छत्तीसगढ की सीमा समाप्त होने से पहले-पहले सड़क के किनारो के गड्ढो और आजू-बाजू के खेतों मे जमा पानी मुंह चिढाने लगा। और महाराष्ट्र म घुसते ही जमा पानी कुछ और बढा नज़र आया और उसका मुंह चिढाना भी बढता चला गया।पनी से भरे खेत और सड़को के किनारों के गड्ढे उसके आने-जाने की चुगली कर रहे थे।तीन बज़े मैने नागपुर फ़ोन किया तो पता चला कि बरखा रानी का रात को शुरू हुआ रेन डांस अभी तक़ जारी है।शायद वो नया रिकार्ड़ बनाना चाह रही है।मैने सोचा चलो यंहा न सही वंहा तो मुलाकात होगी ही।बारीश की बूंदो की टप-टप के साथ-साथ वाईपर्स की सर्र-सर्र का मज़ा लेने का खयाल अब किसानो की उम्मीद की तरह दम तोड़ने लगा था।
नागपुर पहुंचते-पहुंचते आसमान साफ़ होने लगा और थोड़ी ही देर मे किसी गरीब की तार-तार साड़ी से झांकती खुबसूरती की तरह आसमान पर छटते बादलो के बीच से धूप झांकने लगी।सुबह से गायब सूरज महाराज किसी कामचोर बड़े बाबू की तरह शाम को दफ़्तर बंद होते समय हाज़िरी लगाने की गरज़ से ड्यूटी पर हाज़िर नज़र आया।शहर मे घुसा तो आसमान साफ़ हो गया था।सोचा रात तक़ ही सही वो वापस आ जाये।पर देर रात तक़ वो नही आई।खैर हम भी हार मानने वालों मे से नही हैं।कल अमरावती निकल जाऊंगा उसे ढूंढते-ढूंढते।अगे वंहा म मिली तो अकोला और फ़िर और आगे।साली कंही न कंही तो मिलेगी।देखते हैं कब तक़ भागती है वो।मैने भी तय कर लिया है अगर वो मुझे गुल्लू यानी गुलशन,शक्ति या शाईनी समझ कर भाग रही है तो भागे।मै भी गब्बर बन कर उसका करारा नाच देखे बिना मानूंगा नही।
कल रात ही मामा से बात हुई।उन्होने बताया कि वो इधर आ गई है।बस फ़ट से उधर जाने का प्रोग्राम बना लिया।भांजा गर्मी की छुट्टियां मनाने के लिये आया हुआ था।उसकी स्कूल भी शुरू हो गई थी।वो वापस जाने को तैयार नही था और उसकी मां यानी छोटी बहन बार-बार फ़ोन करके उसे भिजवाने के लिये कह रही थी।मैने उससे कहा भई तेरे बच्चे को किडनैप नही किये हैं।कल शाम को फ़ोन पर वो भी बोली आ जाओ वो यंहा आ गई है।और मैने उसे देखने जाना फ़ाईनल कर दिया।फ़िर मुझे खयाल आया कि गाड़ी की स्टेपनी तीसरा मोर्चा हो गई है।पिछली बार उसके सपोर्ट मे कुछ दूर तक़ जैसे-तैसे गाड़ी चला ले गया था।गाड़ी तो चल गई थी मगर सपोर्ट देने के बदले स्टेपनी निपट गई थी।
बिना स्टेपनी के लांग ड्राईव का मज़ा किरकिरा ना हो जाये इसलिये बिना रिस्क लिये मैने स्टेपनी डलवाने की सोची तो हमारे मैकेनिक साब ने कह दिया एक नही दो टायर लेने पड़ेंगें,दोनो को आगे या पीछे डाल कर निकले हुये टायरो मे से एक को स्टेपनी बना देंगे। और दूसरा?वो स्पेयर मे पड़ा रहेगा।रेट पूछा तो 5600 रु का एक टायर्।मैने कहा कि कोई पुराने टायर का जुगाड़ कर दे।इस पर उसने सभी टायर बदलने की सलाह दे दी।उसने कहा कि चारो टायर अच्छे है मै इनको अच्छे रेट मे बेच दूंगा आप पिरेली कं के टायर डाल लो।6800 रू का एक टायर।मै बोला खसक गया है क्या।वो बोला साब गाड़ी चलाने का मज़ा भी तो लोगे।फ़िर टायर तो देखिये क्या खूबसूरत दिखते हैं।पहली बार मुझे पता चला कि टायर भी सुन्दर दिखते हैं।फ़िर उसने बताया कि पीरेली कंपनी का कैलेण्डर दुनिया की सबसे सुन्दर माडलो को लेकर बनाया जाता है।सबसे सुन्दर,सबसे महंगा औए सबसे सैक्सी।मैने कहा सारी तारीफ़ कैलेण्डर की और टायर?साब वो भी कैलेण्डर जैसे ही है।
आखिर उसे देखने जाना था इसलिये सारे टायर बदल डाले।कोई रिस्क लिये बिना सुबह-सुबह निकल जाने का प्रोग्राम बना लिया।सुबह फ़ोन करके पूछा तो छोटी बहन ने बताया कि वो इधर ही है और झूम-झूम कर इतरा रही है।मैने अपने शहर के आसमान की ओर आस भरी निगाहों से देखा और सोचा दो दिनो से आसमान पर पसरे हुये है शायद आज बरस पड़े,इसी उम्मीद से मैने सुबह के प्रोग्राम को दोपहर तक़ टाला और जब देखा कि बादल तो कांग्रेस के गरीबी हटाओ नारे की तरह नज़र आ रहे है ,सो साढे बारह बज़े मैने निकल जाने मे ही भलाई समझी।सोचा कंही न कंही तो मुलाकात होगी ही।
छत्तीसगढ की सीमा समाप्त होने से पहले-पहले सड़क के किनारो के गड्ढो और आजू-बाजू के खेतों मे जमा पानी मुंह चिढाने लगा। और महाराष्ट्र म घुसते ही जमा पानी कुछ और बढा नज़र आया और उसका मुंह चिढाना भी बढता चला गया।पनी से भरे खेत और सड़को के किनारों के गड्ढे उसके आने-जाने की चुगली कर रहे थे।तीन बज़े मैने नागपुर फ़ोन किया तो पता चला कि बरखा रानी का रात को शुरू हुआ रेन डांस अभी तक़ जारी है।शायद वो नया रिकार्ड़ बनाना चाह रही है।मैने सोचा चलो यंहा न सही वंहा तो मुलाकात होगी ही।बारीश की बूंदो की टप-टप के साथ-साथ वाईपर्स की सर्र-सर्र का मज़ा लेने का खयाल अब किसानो की उम्मीद की तरह दम तोड़ने लगा था।
नागपुर पहुंचते-पहुंचते आसमान साफ़ होने लगा और थोड़ी ही देर मे किसी गरीब की तार-तार साड़ी से झांकती खुबसूरती की तरह आसमान पर छटते बादलो के बीच से धूप झांकने लगी।सुबह से गायब सूरज महाराज किसी कामचोर बड़े बाबू की तरह शाम को दफ़्तर बंद होते समय हाज़िरी लगाने की गरज़ से ड्यूटी पर हाज़िर नज़र आया।शहर मे घुसा तो आसमान साफ़ हो गया था।सोचा रात तक़ ही सही वो वापस आ जाये।पर देर रात तक़ वो नही आई।खैर हम भी हार मानने वालों मे से नही हैं।कल अमरावती निकल जाऊंगा उसे ढूंढते-ढूंढते।अगे वंहा म मिली तो अकोला और फ़िर और आगे।साली कंही न कंही तो मिलेगी।देखते हैं कब तक़ भागती है वो।मैने भी तय कर लिया है अगर वो मुझे गुल्लू यानी गुलशन,शक्ति या शाईनी समझ कर भाग रही है तो भागे।मै भी गब्बर बन कर उसका करारा नाच देखे बिना मानूंगा नही।
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Saturday, June 27, 2009
क्या आपने देखी हैं ब्यूटी पार्लर से डेंटिंग-पेंटिंग करा कर निकली रंगी-पुती देवियां?
क्या आपने देखी हैं ब्यूटी पार्लर से डेंटिंग-पेंटिंग करा कर निकली रंगी-पुती देवियां?नही?अरे क्यों मज़ाक कर रहे हो भैया।रोज़ तो देखते हो।क्या कहा कंहा?अब ये भी बताना पड़ेगा क्या?एक नही तीन-तीन है वो,और मज़े की बात तो ये है कि उनका एक भी मंदिर नही है फ़िर भी लाखो लोग रोज़ उनके दर्शन कर रहे हैं।कर क्या रहे हैं वे खुद ही आ जाती है टाईम पर बिना नागा दर्शन देने।क्या कहा ऐसी कौन सी देवियां है?अब यार इतनी भी श्याणपंती ठीक नही है।हां याद आ गया ना।बिल्कुल सही। वही टीवी वाली तीन-देवियां।क्या कहा मै कैसे उनको देवियां कह रहा हूं?अरे भैया मेरी क्या मजाल किसीको देवी कह सकूं।अरे भैया तीनो स्वंभू देवियाम हैं।खुद ही बताती है खुद को देवियां।देवी कैसे हो सकती है?अब ये तो वो ही जाने भैया,वैसे कभी-कभी अपुन को भी बुरा लगता है उनका खुद को देवी कहना।ये तो भला हो ठाकरे ब्रदर्स एण्ड कंपनी और तमाम धर्म सैनिकों,सेनापतियों,ठेकेदारों का जो अभी तक़ इस बात को सीरियसली नही ले रहे हैं।वर्ना इस देश मे तो लफ़्डा करने के लिये बहाना भर बस चाहिये।देवी स्लीवलैस टाप क्यों पहनती है?देवियां बाल क्यों कट्वाती हैं?देवियां पतलून क्यों पहनती हैं?देविया लिप्स्टिक क्यों पोतती है?और दुनिया भर के सवाल किये जा सकते हैंआपत्ति तो मुझे भी है मगर तीनो देविया रोज़ सुबह-रात ये भी तो बताती है कि आपको क्या करना चाहिये-क्या नही?क्या पहनना चाहिये-क्या नही?बिना स्वार्थ के लोगो को आने वाले खतरे से सचेत करती रहती है और सही रास्ता भी दिखलाती है और इतना सब करने के बदले मे अगर वे खुद को देवियां कह लेती है तो क्या कुछ बुरा करती है?अब कुछ लोग ये ज़रूर कह सकते है कि दुकानदारी करने वालों को अपने आप को देवी कहने की बजाय दुकानदार कहना चाहिय्रे।अब किस्को क्या कहना चाहिये-क्या नही ये तो वे ही जाने मगर आप को कहना है कहिये ज़रूर्।
Thursday, June 25, 2009
प्रिय बरखा तुम जंहा कंही भी हो ज़ल्द आ जाओ,तुम्हे कोई कुछ नही कहेगा,तुम्हारे जो जी मे आये करना!
बरखा अभी तक़ नही आई!सब चिंतित है।उसे तो कम से कम बीस दिन पहले आ जाना चाहिये था।पता नही कंहा भटक गई है।मन तमाम आशंकाओं से भर गया है।कंही कोई बरगला के भगा तो नही ले गया उसे।वो किसी बात से नाराज़ तो नही थी।ये सोच कर मन कांप रहा था।सोचा कल अख़बार मे एक बड़ा सा विज्ञापन दे ही दूं।प्रिय बरखा तुम जंहा कंही भी हो ज़ल्द आ जाओ,तुम्हे कोई कुछ नही कहेगा,तुम्हारे जो जी मे आये करना!
आमतौर पर बरखा इतनी देर नही करती।कुछ सिरफ़िरे लोगो की वार्मिंग की वारनिंग़ से कभी-कभी उसे थोड़ी देर ज़रूर हो जाती थी मगर इस बार तो मामला बेहद संगीन लग रहा है।ये लू नामका लफ़ंगा अभी तक़ चक्कर मार रहा है इसलिये उसके साथ भाग जाने का खतरा तो नही नज़र आता,मगर क्या कहा जा सकता है आजकल के बच्चों को।
बरखा के अब तक़ नही आने से सब परेशान है।गांव वाले नानाजी,दादाजी का तो बुरा हाल है।बुढापे मे ये दिन देखने मिलेंगें ऐसा सोचा भी न था कह कर अपने दिनो के किस्से सुनाते नही थक रहे हैं।आंखे बरखा के इंतज़ार मे अपने विदेश मे नौकरी कर बच्चों के इंतज़ार से ज्यादा पथरा गई है।उनके साथ-साथ काकाजी मामाजी,फ़ूफ़ा जी और नौकर कल्लू-मटल्लू,पील्लु-चुन्नू-मुन्नू सब उसका इंतज़ार कर रहे हैं।सब को इंतज़ार है कि वो ज़ल्द आयेगी और हर साल की तरह उनके लिये हरी-हरी चादर लेकर आयेगी।
शहर मे भी कभी उसे स्कूल छोड़ने जाने वाले रिक्शे वाले से लेकर थियेटर वाला,बाज़ार मे समोसे की दूकान वाले से लेकर गली के नुक्कड़ पर गुपचुप का ठेला लगाने वाले तक़ को बरखा का इंतज़ार है।सब हैरान है ऐसा क्या हो गया कि बरखा अभी तक़ नही आई।कंही किसी ने उसे कुछ कह तो नही दिया।मौसम विभाग वाले ज़रूर कभी कभार उसके बारे मे अंट-शंट बात किया करते थे मगर इस साल तो वो भी उसके फ़ेवर मे ही दिखे।फ़िर ऐसा क्या हो गया?क्यूं नही आई बरखा?सोच-सोच कर मन थर्रा जा रहा था।
कंही किसी से उस्का टांका तो नही भीड़ गया था?कंही पड़ोसी की नीयत तो खराब नही हो गई?कंही किसी ने किड़नैप तो नही कर लिया?सोच-सोच कर हालत पतली हुई जा रही थी।पंडित जी अलग डरा रहे थे कि बरखा आप के घर की लक्ष्मी है,अगर वो नही आई तो मुसीबत आ जायेगी।मुहल्ले के लफ़ंटूस भी उसके ना आने पर तरह-तरह की बाते करने लगे हैं।दो कौड़ी का सब्जी वाला भी बता रहा था कि आने वाले दिन मुश्किल और बढ जायेगी।
सब सोच समझ कर यही लगा कि अख़बार मे विज्ञापन दे ही देना चाहिये।बरखा अगर तुम्हारा किसी से लफ़ड़ा भी है तो उससे निपट लेंगे।तुम आ जाओ और फ़िर जिधर से चाहे गुज़रो कोई तुम्हे कुछ नही कहेगा।कोई तुम्हे मेंढक,बंदर,गधे या पेड़ से शादी करने की बात कह कर नही डरायेगा।तुम तो चाहे जिस छ्त पर बरसना और चाहे जिस गली से गुज़रना।तुम्हारी मरज़ी हो वंहा जाना और जंहा जाने की इच्छा ना हो मत जाना।तुम चाहो जिस पर अपना गुस्सा उतार सकती हो।मंगलू चौकीदार और कामवाली बाई के घर पर चाहो तो कहर बरपा देना मगर तुमसे निवेदन ही अब और इंतज़ार मत करवाना बस ज़ल्दी लौट आना।
आमतौर पर बरखा इतनी देर नही करती।कुछ सिरफ़िरे लोगो की वार्मिंग की वारनिंग़ से कभी-कभी उसे थोड़ी देर ज़रूर हो जाती थी मगर इस बार तो मामला बेहद संगीन लग रहा है।ये लू नामका लफ़ंगा अभी तक़ चक्कर मार रहा है इसलिये उसके साथ भाग जाने का खतरा तो नही नज़र आता,मगर क्या कहा जा सकता है आजकल के बच्चों को।
बरखा के अब तक़ नही आने से सब परेशान है।गांव वाले नानाजी,दादाजी का तो बुरा हाल है।बुढापे मे ये दिन देखने मिलेंगें ऐसा सोचा भी न था कह कर अपने दिनो के किस्से सुनाते नही थक रहे हैं।आंखे बरखा के इंतज़ार मे अपने विदेश मे नौकरी कर बच्चों के इंतज़ार से ज्यादा पथरा गई है।उनके साथ-साथ काकाजी मामाजी,फ़ूफ़ा जी और नौकर कल्लू-मटल्लू,पील्लु-चुन्नू-मुन्नू सब उसका इंतज़ार कर रहे हैं।सब को इंतज़ार है कि वो ज़ल्द आयेगी और हर साल की तरह उनके लिये हरी-हरी चादर लेकर आयेगी।
शहर मे भी कभी उसे स्कूल छोड़ने जाने वाले रिक्शे वाले से लेकर थियेटर वाला,बाज़ार मे समोसे की दूकान वाले से लेकर गली के नुक्कड़ पर गुपचुप का ठेला लगाने वाले तक़ को बरखा का इंतज़ार है।सब हैरान है ऐसा क्या हो गया कि बरखा अभी तक़ नही आई।कंही किसी ने उसे कुछ कह तो नही दिया।मौसम विभाग वाले ज़रूर कभी कभार उसके बारे मे अंट-शंट बात किया करते थे मगर इस साल तो वो भी उसके फ़ेवर मे ही दिखे।फ़िर ऐसा क्या हो गया?क्यूं नही आई बरखा?सोच-सोच कर मन थर्रा जा रहा था।
कंही किसी से उस्का टांका तो नही भीड़ गया था?कंही पड़ोसी की नीयत तो खराब नही हो गई?कंही किसी ने किड़नैप तो नही कर लिया?सोच-सोच कर हालत पतली हुई जा रही थी।पंडित जी अलग डरा रहे थे कि बरखा आप के घर की लक्ष्मी है,अगर वो नही आई तो मुसीबत आ जायेगी।मुहल्ले के लफ़ंटूस भी उसके ना आने पर तरह-तरह की बाते करने लगे हैं।दो कौड़ी का सब्जी वाला भी बता रहा था कि आने वाले दिन मुश्किल और बढ जायेगी।
सब सोच समझ कर यही लगा कि अख़बार मे विज्ञापन दे ही देना चाहिये।बरखा अगर तुम्हारा किसी से लफ़ड़ा भी है तो उससे निपट लेंगे।तुम आ जाओ और फ़िर जिधर से चाहे गुज़रो कोई तुम्हे कुछ नही कहेगा।कोई तुम्हे मेंढक,बंदर,गधे या पेड़ से शादी करने की बात कह कर नही डरायेगा।तुम तो चाहे जिस छ्त पर बरसना और चाहे जिस गली से गुज़रना।तुम्हारी मरज़ी हो वंहा जाना और जंहा जाने की इच्छा ना हो मत जाना।तुम चाहो जिस पर अपना गुस्सा उतार सकती हो।मंगलू चौकीदार और कामवाली बाई के घर पर चाहो तो कहर बरपा देना मगर तुमसे निवेदन ही अब और इंतज़ार मत करवाना बस ज़ल्दी लौट आना।
Tuesday, June 23, 2009
ये चड्डी बनियान वाले ना होते तो लगता है इलेक्ट्रानिक मीडिया नंगा हो जाता!
पेश है एक माईक्रो पोस्ट आदरणीय ज्ञान गुरजी को समर्पित।इलेक्ट्रानिक मीडिया पर जब नज़र डालो चड्डी बनियान के ही विज्ञापन नज़र आ जाते हैं।कभी लक्स कोज़ी,तो कभी अमूल माचो।कभी माईक्रोमैन,तो कभी स्वागत अण्डर वीयर बनियान्।यानी विज्ञापनो का मामला हो तो चड्डी बनियान गिरोह सबसे अव्वल नज़र आता है।कभी कभी तो ऐसा लगता है कि घोर मंदी के इस दौर मे चड्डी बनियान वाले न होते तो इलेक्ट्रानिक मीडिया नंगा ही हो जाता।लिखने को तो बहुत कुछ है इस विषय पर,पर अपनी ही चड्डी बनियान खींचना ठीक नही है।बाकी आप सब समझदार हैं।
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