ब्लाग जगत से किसने क्या पाया,क्या खोया ये तो वही जाने पर मुझे लगता है कि मैने खोया कुछ भी नही सिर्फ़ पाया ही पाया है।बहुत से ऐसे लोग मिले जो सगे रिश्तेदारों से अच्छे लगे।मैं उन्हे कभी खोना नही चाहूंगा और कुछ ऐसे लोग मिले जिनके मिलने की कल्पना भी मैंने नही की थी।खासकर सालों पहले कालेज के दिनो बिछुड़े साथी से मिलना।जी हां सच कह रहा हूं,लगभग 25 साल बाद ब्लाग ने मुझे कालेज के अपने एक जूनियर से मिला दिया।
पच्चीस साल!जी हां!पूरे पच्चीस साल बाद!इन पच्चीस सालों मे उससे कंही कोई बात नही,मुलाकात नहीं!सच कहूं तो उसकी शकल तक़ याद नही रही।ऐसे जूनियर से मिलना,खुशी से दीवाना कर गया मुझे। सिर्फ़ एक साल ही कालेज मे साथ रहा,वो भी कालेज के दिनों के विरोधी गुट में।हम लोग एम एस सी फ़ायनल मे थे और वो शायद फ़र्स्ट ईयर मे था।चुनाव के समय हम लोगों का झगड़ा हुआ और उसी झगड़े का रेफ़रेंस देते हुये उसने मेल कर मुझे अपनी याद दिलाने की कोशिश की।
उल्हास नाम है उसका।उल्हास उसे ऐसा ज़रूर लगा होगा कि इतने सालों तक़ कौन किसे याद रखता है!मगर कालेज के दिनो की बातें तो हमारा सबसे बड़ा खज़ाना होता है।और उस खज़ाने मे सिर्फ़ मीठी ही नही खट्टी यादों का भी ज़खीरा रहता है।जब वो इस बात को याद रख सकता है।अपने एक सीनीयर को सिर्फ़ नाम से सालों तक़ याद रख सकता है तो भला मैं कैसे भूल सकता था।
उल्हास!उल्हास कर्नावर!सच मे उल्हास ने मुझमे उल्हास भर दिया।उसके मेल ने मुझे पच्चीस साल पीछे कालेज के दिनों मे धकेल दिया।वो कालेज के दिन,वो मौज-मस्ती,सब कुछ तरोताज़ा हो गई।वैसे ही जैसे तुम्हे मेरे ब्लाग ने धकेला।
उल्हास अब बहरीन मे है।छत्तीसगढ या कहे भारत उसने 90 मे छोड़ा था।आज वो बहरीन मे ज़िम्मेदार पद पर है और सबसे खास बात ये कि वो वंहा की भारतियों के क्लब का जनरल सेक्रेटरी है।वो भी तीसरी बार चुना गया है।दो लाख सत्तर हज़ार भारतियों का प्रतिनिधित्व करने वाला क्लब 94 साल पुराना है।ये उपलब्धी साधारण नही है।बकौल उल्हास लोस्ट रायपुरियन मे नेतागिरी का कीड़ा अभी भी ज़िंदा है।बहुत सही शुक्ल बंधुओं की नगरी की हवा मे ही नेतागिरी का कीड़ा रहा है शायद।उल्हास से दोबारा कभी बात हो पायेगी,मुलाकात हो पायेगी ये तो पता नही लेकिन उससे सम्पर्क तो फ़िर से स्थापित हो ही गया है।पच्चीस साल बाद सम्पर्क स्थापित होना किसी चमत्कार से कम नही है और जब ये हुआ है तो मुलाकात भी ज़रूर होगी।और ऐसा संभव हो सका सिर्फ़ और सिर्फ़ ब्लाग के कारण्।वो घुमते-फ़िरते मेरे ब्लाग पर आया और उसने मुझे मेल कर अपनी याद दिलानी चाही।अब बताईये ऐसा सुखद एहसास तो सिर्फ़ ब्लाग के कारण ही संभव हो पाया है ना।वरना मैने तो कभी सोचा भी ना था कि कालेज से बिछड़ने के सालों बाद कोई फ़िर मिल जायेगा!खूब तरक्की करो उल्हास!रायपुर का नाम रौशन कर दिया है तुमने और तमाम रायपुरिया लोगों को तुम जैसे रायपुरियाओं पर नाज़ है।तुम लोस्ट रायपुरियन नही अभी रायपुरियन हो।तुम्हारे उज्जवल भविष्य की कामनाओं के साथ,ढेर सारी शुभाशिष।ऐसे ही प्यार बनाये रखना।
Monday, December 28, 2009
कभी सोचा भी ना था कि कालेज से बिछड़ने के सालों बाद कोई फ़िर मिल जायेगा!
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Saturday, December 26, 2009
थू है ऐसे सिस्टम पर और थू है ऐसी तरक्की पर!
कभी अमन और चैन का टापू कहलाने वाले छत्तीसगढ को शायद किसी की बुरी नज़र लग गई है।जभी तो राजधानी के थोक कपड़ा मार्केट के पास दिन दहाड़े हवाला कारोबारी अमर आहूजा की उसकी दुकान मे घुस कर गोली मार कर ह्त्या कर दी गई।उसके साथ उसके रिश्तेदार मनीष की भी हत्या कर दी हत्यारों ने और मज़े से दुकान से नीचे उतर कर फ़रार हो गये।इस दिल दहला देने वाले अपराध ने बहुत से सवाल खड़े कर दिये हैं।कहा जा रहा है तरक्की के इस दौर मे अपराध तो होंगे ही।अगर तरक्की का मतलब ऐसे अपराध है तो थू है ऐसे सिस्टम पर और थू है ऐसी तरक्की पर!
याद नही पड़ता कि राज्य बनने से पहले कभी ऐसे अपराधों से छत्तीसगढ का पाला पड़ा हो।राज्य बनने के बाद पहला पालिटिकल मर्डर देखा यंहा के लोगो ने।एनसीपी के नेता रामावतार जग्गी की भाड़े के ह्त्यारों ने जान लेली थी।इस मामले मे पूर्व मुख्यमंत्री और उनके परिवार के सदस्य का नाम भी सामने आया।उनके पुत्र को अदालत ने बरी कर दिया मगर उनके साथियों की सज़ा ये बताती है कि रामावतार की हत्या राजनैतिक उद्देश्य के लिये की गई थी।
राज्य बनने के बाद कांग्रेस सरकार मे अगर छत्तीसगढ ने राजनैतिक हत्या देखी तो पहले चुनाव के बाद सत्ता मे आई भाजपा के कार्यकाल मे व्यापारिक प्रतिद्वंदिता के चलते महेन्द्रा ट्रेव्ह्ल्स के सतवंत सिंह गिल उर्फ़ गप्पू का मर्डर भी यंहा के लोगो ने देखा।इस बार शूटर उत्तर प्रदेश से बुलवाये गये थे।कांट्रेक्ट किलिंग का कारोबार शायद यंहा की पुलिस की निष्क्रियता के कारण कुछ ज्यादा ही तेजी से पनप रहा है।
बैंक डकैती,लूट और फ़िरौती के लिये अपहरण अब कामन हो गया है।इतना कामन की अब लोग कर्ज़ से बचने या चुनाव जीतने के लिये अपहरण की स्टोरी बना देते है और पुलिस को खामोशी से सब मानना पड़ता है।यंहा पुलिस का समभाव देखने लायक है।कांग्रेस नेता ने अपहरण की झूठी कहानी सुनाकर सनसनी फ़ैलाई तो भी वो खामोश थी और अभी नगर निगम चुनाव मे भाजपा नेता के स्टंट पर भी व चुप ही रही।
हवाला कारोबारियों के मर्डर के बाद जो कुछ शहर मे हो सकता है वो हुआ और रियेक्शन के तौर पर और भी आगे होता रहेगा।बंद,बयानबाज़ी और राजनैतिक भट्टी पर सिंक रही रोटियों ने माहौल गरमा दिया है।कोई इसे शर्मनाक बता रहा है तो कोई मंत्री-संत्री से इस्तीफ़ा भी मांग रहा है।कोई पुलिस को निकम्मा बता रहा है तो कोई सरकार बदलने की बात कर रहा है।सब की अपनी अपनी ढपली है और सब अपना अपना राग आलाप रहे हैं।
सब को बदलाव चाहिये।मगर उस बदलाव की ओर किसी का ध्यान नही है जो बिना चाहे यंहा आ गया है।कांट्रेक्ट किलिंग या सुपारी जैसी बात यंहा की परंपरा नही थी।यंहा तो आधी रात को लोग बिना डर के घुमा करते थे।अपराध कंहा नही होते,यंहा भी होते थे लेकिन भाड़े पर ह्त्या यंहा की परंपरा नही थी।एक नेताजी का कहना है रायपुर अब मामुली शहर नही रहा,राजधानी हो गया है।तरक्की कर गया है।राजधानी होने के बाद यंहा अपराध भी बढना स्वाभाविक है।तो माफ़ करना अगर तरक्की के मायने यही है तो थू है ऐसी तरक्की पर।थू है ऐसे सड़ेले सिस्टम पर।हमे नही चाहिये ऐसी तरक्की,हमे तो चाहिये अपना पुराना छत्तीसगढ,जंहा पर था प्यार,चैन और अमन।
याद नही पड़ता कि राज्य बनने से पहले कभी ऐसे अपराधों से छत्तीसगढ का पाला पड़ा हो।राज्य बनने के बाद पहला पालिटिकल मर्डर देखा यंहा के लोगो ने।एनसीपी के नेता रामावतार जग्गी की भाड़े के ह्त्यारों ने जान लेली थी।इस मामले मे पूर्व मुख्यमंत्री और उनके परिवार के सदस्य का नाम भी सामने आया।उनके पुत्र को अदालत ने बरी कर दिया मगर उनके साथियों की सज़ा ये बताती है कि रामावतार की हत्या राजनैतिक उद्देश्य के लिये की गई थी।
राज्य बनने के बाद कांग्रेस सरकार मे अगर छत्तीसगढ ने राजनैतिक हत्या देखी तो पहले चुनाव के बाद सत्ता मे आई भाजपा के कार्यकाल मे व्यापारिक प्रतिद्वंदिता के चलते महेन्द्रा ट्रेव्ह्ल्स के सतवंत सिंह गिल उर्फ़ गप्पू का मर्डर भी यंहा के लोगो ने देखा।इस बार शूटर उत्तर प्रदेश से बुलवाये गये थे।कांट्रेक्ट किलिंग का कारोबार शायद यंहा की पुलिस की निष्क्रियता के कारण कुछ ज्यादा ही तेजी से पनप रहा है।
बैंक डकैती,लूट और फ़िरौती के लिये अपहरण अब कामन हो गया है।इतना कामन की अब लोग कर्ज़ से बचने या चुनाव जीतने के लिये अपहरण की स्टोरी बना देते है और पुलिस को खामोशी से सब मानना पड़ता है।यंहा पुलिस का समभाव देखने लायक है।कांग्रेस नेता ने अपहरण की झूठी कहानी सुनाकर सनसनी फ़ैलाई तो भी वो खामोश थी और अभी नगर निगम चुनाव मे भाजपा नेता के स्टंट पर भी व चुप ही रही।
हवाला कारोबारियों के मर्डर के बाद जो कुछ शहर मे हो सकता है वो हुआ और रियेक्शन के तौर पर और भी आगे होता रहेगा।बंद,बयानबाज़ी और राजनैतिक भट्टी पर सिंक रही रोटियों ने माहौल गरमा दिया है।कोई इसे शर्मनाक बता रहा है तो कोई मंत्री-संत्री से इस्तीफ़ा भी मांग रहा है।कोई पुलिस को निकम्मा बता रहा है तो कोई सरकार बदलने की बात कर रहा है।सब की अपनी अपनी ढपली है और सब अपना अपना राग आलाप रहे हैं।
सब को बदलाव चाहिये।मगर उस बदलाव की ओर किसी का ध्यान नही है जो बिना चाहे यंहा आ गया है।कांट्रेक्ट किलिंग या सुपारी जैसी बात यंहा की परंपरा नही थी।यंहा तो आधी रात को लोग बिना डर के घुमा करते थे।अपराध कंहा नही होते,यंहा भी होते थे लेकिन भाड़े पर ह्त्या यंहा की परंपरा नही थी।एक नेताजी का कहना है रायपुर अब मामुली शहर नही रहा,राजधानी हो गया है।तरक्की कर गया है।राजधानी होने के बाद यंहा अपराध भी बढना स्वाभाविक है।तो माफ़ करना अगर तरक्की के मायने यही है तो थू है ऐसी तरक्की पर।थू है ऐसे सड़ेले सिस्टम पर।हमे नही चाहिये ऐसी तरक्की,हमे तो चाहिये अपना पुराना छत्तीसगढ,जंहा पर था प्यार,चैन और अमन।
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Wednesday, December 23, 2009
अभिव्यक्ति?कैसी अभिव्यक्ति?किसकि अभिव्यक्ति?
ब्लाग का महत्व मुझे आज समझ मे आ रहा है।अभिव्यक्ति की असली आज़ादी सिर्फ़ यंही पर है।अभिव्यक्ति की आज़ादी का ठेका लेने वाले अख़बारो की हालत देख कर तो सिर्फ़ रोया ही जा सकता है। ऐसे मे ब्लाग ही एकमात्र माध्यम दिखता है, अभिव्यक्ती की स्वतंत्रता का परचम लहराते हुये।विज्ञापनो के बोझ तले दब कर मरती अभिव्यक्ती को देख कर मुझे अपने पत्रकार होने पर अफ़सोस भी हुआ और शर्म भी आई।ब्लाग जगत पर भी इतना निष्क्रिय मैं शुरूआत के दिनो मे भी नही था।इस उदासी को भांप लिया था शायद भारत प्रवास पर आये दीपक मशाल लखनऊ के महफ़ूज़ भाई,गिरीश बिल्लौरे और फ़ुरसतिया अनूप शुक्ल ने।सभी ने ब्लाग से गायब रहने का कारण पूछा और फ़िर से लगातार लिखने के लिये कहा भी।अनूप शुक्ल से लम्बी चरचा हुई और उन्होने तत्काल कलम उठाने यानी पोस्ट लिखने का आदेश भी सुना डाला।मुझे भी लगा अनूप सही कह रहे हैं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ब्लाग जगत से ज्यादा कंही नही है।
सो मैने उनके आग्रह पर लिखना शुरु किया तो सबसे पहले बात सामने आई अभिव्यक्ती की स्वतंत्रता की।छत्तीसगढ मे इन दिनो नगरीय निकाय के चुनावो की धूम है।चुनावो में हर प्रत्याशी चाहता है कि उसकी बात अख़बारों के जरिये जनता के सामने आ जाये। और अख़बारो का शायद काम भी यही है आम आदमी की आवाज़ को पूरी ताक़त से उठाना।पर छत्तीसगढ मे इन दिनो या कह लिजिये कुछ समय से एक नया ही ट्रेंड चल रहा है पैकेज के नाम पर।
पैकेज याने याने रेट तय किजिये फ़िर जो चाहे छपवा लिजिये।दो बार विज्ञापन तो साथ मे दो बार भी खबर भी।तीन बार विज्ञापन तो तीन बार खबर और कोम्बो पैक यानी की सिर्फ़ आपकी आवाज़ उठाने के साथ-साथ विरोधी की आवाज़ नही सुनने या जनता को नही सुनाने का ठेका।सबके अलग अलग रेट्।लोकसभा और विधानसभा चुनावो के बाद पैकेज का जादू जब नगर निगम और नगर पालिका चुनाव मे भी सर पर चढ कर बोलने लगा तो मुझे लगा कि ऐसे मे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करने का अधिकार अख़बारों को नही रहा।
इस बारे मे संस्कृति ब्लाग वाले डा महेश सिन्हा के बड़े भाई सांध्य दैनिक अग्रदूत के मालिक आदरणीय विष्णु भैया ने जब अपने अख़बार मे खुलकर लिखा तो पहले गुस्सा आया फ़िर लगा कि कोई तो है जो पूरी ईमानदारी से इस बात को स्वीकार कर रहा है।फ़िर मुझे लगा कि विज्ञापनों के बोझतले दब कर मर रही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे मे मुझे भी सबको बताना चाहिये।अब बताईये भला ये अगर आपके पास पैसा नही है तो आपको कुछ भी बोलने का हक़ कैसे हो सकता है?आखिर अख़बार मुफ़्त मे तो नही छपते ना?पांच रूपये की लागत वाले अख़बार को एक रूपये,डेढ या दो रूपये मे बेचने मे होने वाले घाटे को पुरा करने के लिये पैकेज सिस्टम तो लागू करना ही पडेगा ना?अब इस सिस्टम मे गरीब की आवाज़ दब कर दम तोड़ दे तो क्या किया जा सकता है?वैसे भी इस देश मे गरीब को कुछ भी कहने का ह्क़ है ही कंहा?
यानी अब जिसके पास अख़बारों का पैकेज खरीदने के लिये रूपयों की थैली हो उसकी आवाज़ ही जनता की आवाज़ समझी जायेगी?जिसके पास रूपये न हो उसे जनता की आवाज़ उठाने का हक़ नही है?रूपयों से आप अपनी बात कहने के साथ दूसरों की आवाज़ का गला भी घोंट सकते है,अख़बार इसमे आपका साथ देगा,आखिर पैकेज का सवाल है।सत्तारूढ दल के पार्षद प्रत्याशी के भाई और भाजपा के महामंत्री का चुनाव के बीच का अपहरण हो गया?चुनाव मे खुल कर दारू की नदियां बहती रही?वोट खरीदने का नंगा नाच हो रहा है छत्तीसगढ मे मगर अख़बार खामोश है,आखिर पैकेज का सवाल है बाबा?ऐसा लगता है कि अख़बार वालो को तो इससे अच्छा डायरेक्ट भीख़ मांगना ही शुरू कर देना चाहिये?ये पैकेज का सिस्टम उसका सुधरा हुआ रूप ही लगता है।हो सकता है गुस्से मे कुछ् ज्यादा लिख गया हूं।जिस किसी सज्जन को बुरा लगे उनसे एडवांस मे माफ़ी मांग रहा हूं।ये पोस्ट समर्पित है फ़ुरसतिया अनूप शुक्ल,महफ़ूज़ अली,दीपक मशाल,गिरीश बिलौरे और ब्लाग जगत के तमाम साथियों को जिनके स्नेह के कारण मै अभिव्यकति की स्वतंत्रता के इस सशक्त माध्यम मे फ़िर से लौट रहा हूं।
सो मैने उनके आग्रह पर लिखना शुरु किया तो सबसे पहले बात सामने आई अभिव्यक्ती की स्वतंत्रता की।छत्तीसगढ मे इन दिनो नगरीय निकाय के चुनावो की धूम है।चुनावो में हर प्रत्याशी चाहता है कि उसकी बात अख़बारों के जरिये जनता के सामने आ जाये। और अख़बारो का शायद काम भी यही है आम आदमी की आवाज़ को पूरी ताक़त से उठाना।पर छत्तीसगढ मे इन दिनो या कह लिजिये कुछ समय से एक नया ही ट्रेंड चल रहा है पैकेज के नाम पर।
पैकेज याने याने रेट तय किजिये फ़िर जो चाहे छपवा लिजिये।दो बार विज्ञापन तो साथ मे दो बार भी खबर भी।तीन बार विज्ञापन तो तीन बार खबर और कोम्बो पैक यानी की सिर्फ़ आपकी आवाज़ उठाने के साथ-साथ विरोधी की आवाज़ नही सुनने या जनता को नही सुनाने का ठेका।सबके अलग अलग रेट्।लोकसभा और विधानसभा चुनावो के बाद पैकेज का जादू जब नगर निगम और नगर पालिका चुनाव मे भी सर पर चढ कर बोलने लगा तो मुझे लगा कि ऐसे मे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करने का अधिकार अख़बारों को नही रहा।
इस बारे मे संस्कृति ब्लाग वाले डा महेश सिन्हा के बड़े भाई सांध्य दैनिक अग्रदूत के मालिक आदरणीय विष्णु भैया ने जब अपने अख़बार मे खुलकर लिखा तो पहले गुस्सा आया फ़िर लगा कि कोई तो है जो पूरी ईमानदारी से इस बात को स्वीकार कर रहा है।फ़िर मुझे लगा कि विज्ञापनों के बोझतले दब कर मर रही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे मे मुझे भी सबको बताना चाहिये।अब बताईये भला ये अगर आपके पास पैसा नही है तो आपको कुछ भी बोलने का हक़ कैसे हो सकता है?आखिर अख़बार मुफ़्त मे तो नही छपते ना?पांच रूपये की लागत वाले अख़बार को एक रूपये,डेढ या दो रूपये मे बेचने मे होने वाले घाटे को पुरा करने के लिये पैकेज सिस्टम तो लागू करना ही पडेगा ना?अब इस सिस्टम मे गरीब की आवाज़ दब कर दम तोड़ दे तो क्या किया जा सकता है?वैसे भी इस देश मे गरीब को कुछ भी कहने का ह्क़ है ही कंहा?
यानी अब जिसके पास अख़बारों का पैकेज खरीदने के लिये रूपयों की थैली हो उसकी आवाज़ ही जनता की आवाज़ समझी जायेगी?जिसके पास रूपये न हो उसे जनता की आवाज़ उठाने का हक़ नही है?रूपयों से आप अपनी बात कहने के साथ दूसरों की आवाज़ का गला भी घोंट सकते है,अख़बार इसमे आपका साथ देगा,आखिर पैकेज का सवाल है।सत्तारूढ दल के पार्षद प्रत्याशी के भाई और भाजपा के महामंत्री का चुनाव के बीच का अपहरण हो गया?चुनाव मे खुल कर दारू की नदियां बहती रही?वोट खरीदने का नंगा नाच हो रहा है छत्तीसगढ मे मगर अख़बार खामोश है,आखिर पैकेज का सवाल है बाबा?ऐसा लगता है कि अख़बार वालो को तो इससे अच्छा डायरेक्ट भीख़ मांगना ही शुरू कर देना चाहिये?ये पैकेज का सिस्टम उसका सुधरा हुआ रूप ही लगता है।हो सकता है गुस्से मे कुछ् ज्यादा लिख गया हूं।जिस किसी सज्जन को बुरा लगे उनसे एडवांस मे माफ़ी मांग रहा हूं।ये पोस्ट समर्पित है फ़ुरसतिया अनूप शुक्ल,महफ़ूज़ अली,दीपक मशाल,गिरीश बिलौरे और ब्लाग जगत के तमाम साथियों को जिनके स्नेह के कारण मै अभिव्यकति की स्वतंत्रता के इस सशक्त माध्यम मे फ़िर से लौट रहा हूं।
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Thursday, December 17, 2009
आखिर मिल ही गया जवाब शशिकपूर के सवाल का,अमिताभ को!
आपको फ़िल्म दीवार मे शशिकपूर का वो हिट डायलाग तो याद है ना जिस पर अमिताभ खामोश रह जाते हैं,जी हां वही ………………मेरे पास मां है।इस का जवाब ढूंढते-ढूंढते लगभग तीस साल बीत चुके हैं और अब जाकर कंही अमिताभ को शशिकपूर के टक्कर का डायलाग मिला है।भले ही तीस साल लग गये हों मगर फ़िल्म इंडस्ट्री के उस हिट सवाल का जवाब आखिर ढूंढ ही लिया अमिताभ ने।
तेरे पास मां है,तो मेरे पास पा है।
कैसा लगा जवाब बताईयेगा ज़रूर्।
तेरे पास मां है,तो मेरे पास पा है।
कैसा लगा जवाब बताईयेगा ज़रूर्।
Sunday, December 13, 2009
लेटअस प्लान एन मीट सम डे।
समय के बदलते मिज़ाज़ पर एक और छोटी सी पोस्ट जिसमे बात बहुत बड़ी छुपी हुई है।कालेज मे साथ पढे और अब आईएफ़एस अफ़सर मित्र ने समय मे आये इस बदलाव को खुद तो महसूस किया ही,साथ ही उसने सभी दोस्तो को इस बात को बताने के लिये एसएमएस भी किया।
उसका एसएसएस था,
Remember the time when freinds used to say"lets meet n plan something".
Now a days freinds says"lets plan n meet somaday".
freinds r same but time has changed.
दोस्तो के मिलने-जुलने मे आई कमी और सबके अपनी-अपनी दुनिया मे मस्त रहने से कभी-कभी पुराने दोस्तों के साथ गुज़रे दिन याद बनकर टीस मारते हैं।एक ही शहर मे रहकर कई-कई महीने नही मिल पाने की तक़लीफ़ तो मै भी महसूस कर रहा हूं।आप को क्या लगता है बताईयेगा ज़रूर्।
उसका एसएसएस था,
Remember the time when freinds used to say"lets meet n plan something".
Now a days freinds says"lets plan n meet somaday".
freinds r same but time has changed.
दोस्तो के मिलने-जुलने मे आई कमी और सबके अपनी-अपनी दुनिया मे मस्त रहने से कभी-कभी पुराने दोस्तों के साथ गुज़रे दिन याद बनकर टीस मारते हैं।एक ही शहर मे रहकर कई-कई महीने नही मिल पाने की तक़लीफ़ तो मै भी महसूस कर रहा हूं।आप को क्या लगता है बताईयेगा ज़रूर्।
Sunday, December 6, 2009
कितना बदल गया है सब कुछ, समय के साथ-साथ खुद समय भी बदल गया है शायद!
एक बहुत छोटी सी पोस्ट समय के बदलते मिजाज़ पर।बात बहुत छोटी सी है मगर इसके मायने बहुत बड़े है।ये इस बात का सबूत भी है कि हमने समय के साथ तरक्की तो बहुत कर ली मगर उसके साथ ही बहुत कुछ पीछे छूटता चला गया है।
सदियों पहले इंसान के पास घड़ी नही थी मगर उसके पास समय भरपूर था और आज लगभग हर इंसान के पास घड़ी है मगर समय्……………?समय शायद किसी के पास नही है।शायद मेरे पास भी नही।जभी तो मैं भी चंद लाईनो मे इस पोस्ट को निपटा रहा हूं।ये बात मुझसे कही मेरे छोटे भाई जैसे भतीजे,यंहा के होटल और प्रापर्टी मार्केट के दिग्गज़ कमलजीत सिंह होरा ने।उम्र बहुत ज्यादा नही मगर अनुभव बहुत ज्यादा जभी तो महसूस कर लिया कि कितना बदल गया है सब कुछ, समय के साथ-साथ।और मुझे तो लगता है कि खुद समय भी बदल गया है शायद!आपको क्या लगता है बताईगा ज़रूर।इस भागती-दौड़ती दुनिया मे सब भागते चले जा रहे मिल भी रहे हैं तो चलते-चलते,किसी के पास समय नही हैं आखिर क्यों?
सदियों पहले इंसान के पास घड़ी नही थी मगर उसके पास समय भरपूर था और आज लगभग हर इंसान के पास घड़ी है मगर समय्……………?समय शायद किसी के पास नही है।शायद मेरे पास भी नही।जभी तो मैं भी चंद लाईनो मे इस पोस्ट को निपटा रहा हूं।ये बात मुझसे कही मेरे छोटे भाई जैसे भतीजे,यंहा के होटल और प्रापर्टी मार्केट के दिग्गज़ कमलजीत सिंह होरा ने।उम्र बहुत ज्यादा नही मगर अनुभव बहुत ज्यादा जभी तो महसूस कर लिया कि कितना बदल गया है सब कुछ, समय के साथ-साथ।और मुझे तो लगता है कि खुद समय भी बदल गया है शायद!आपको क्या लगता है बताईगा ज़रूर।इस भागती-दौड़ती दुनिया मे सब भागते चले जा रहे मिल भी रहे हैं तो चलते-चलते,किसी के पास समय नही हैं आखिर क्यों?
Friday, December 4, 2009
मैंने इससे पहले खुद को इतना बेबस और लाचार कभी नही पाया था!
सारी रात खांसते-छिंकते बीती थी और बड़ी मुश्किल से सुबह सुबह नींद लगी थी कि मोबाईल ने घनघनाना शुरु कर दिया। लगातार बज़ रहे फ़ोन ने अज़ीब सी खीज़ पैदा कर दी थी और दुनिया भर की गालियां बक़ते हुये मैने फ़ोन को देखा तो एक नही कई मिस्ड काल नज़र आ रही थी,सभी एक ही नम्बर से थी।बापू के नाम से थी वे सारी काल्ज़।बापू मेरे स्कूल का दोस्त जिसका सरनेम गांधी होने के कारण उसका नाम ही बापू पड़ गया था।उसका फ़ोन काफ़ी समय बाद आया था और लगातार कई काल्ज़,मुझे समझ मे आ गया कंही न कंही,कोई न कोई गड़बड़ ज़रूर है।सो मैने फ़ोन बज़ते ही काल रिसीव की और पूछा बापू क्या बात है कुछ गड़बड़ तो नही है?इस पर उसका जवाब था कुछ नही बहुत गड़बड़ है,तू सीधे इस अस्पताल आ जा।मैने कुछ नही कहा और आने की बात कह कर उठा और तबियत खराब होने के बावज़ूद तैयार होकर निकल पड़ा था अस्पताल की ओर।
रास्ते मे फ़िर फ़ोन बज़ा तो मैने कहा बापू वंही आ रहा हूं।पर उधर से बापू ने नही उसकी भांजी ने जवाब दिया कि मामाजी आप प्लीज़ डाक्टर से प्यार से पूछना?पापाजी ठीक हो रहे हैं थोड़ी एक्स्ट्रा केयर उन्हे ज़ल्द ठीक कर देगी।मैने कहा बेटा मैं वंही आ रहा हूं।वो फ़िर बोली मामाजी कंही प्रेस वालों को देख कर अस्पताल वाले हाथ खडे ना कर दे।मैने कहा बेटा चिंता मत करो मैं वंही आकर बात करता हूं।बापू के जीजाजी शहर के बाहरी हिस्से मे बने एक नये सुपर स्पेशलिटी अस्पताल मे भर्ती थे।
मैं वंहा पहुंचा तो बापू बाहर ही खड़ा था।हम लोग नीचे रिसेप्शन मे ही बैठ गये।मैने पूछा क्या बात है बापू?वो पूरी तरह टूटा हुआ था।उसने गहरी सांस ली और कहा यार मेरी समझ मे कुछ नही आ रहा है।मै न चाहते हुये भी सब समझ गया था।मैने पूछा भांजी कंहा है,वो बोला वो पाठ करने बैठ गई है।मैने पूछा डाक्टर क्या कह रहा है?वो बोला हम लोगों से ज्यादा भांजी बात करती है और डाक्टर की तसल्ली भी दमदार नज़र नही आ रही है।वो बोला मैने तेरे को इसिलिये बुलाया है तू एक्चुअल पोज़िशन पूछ और अगर वाकई एक्स्ट्रा केयर की ज़रूरत है तो उसके लिये बोल दे!वो बोला यार ये बच्चे लोग भी समझते नही है।बीस दिन हो गये हैं।न हील डुल रहे हैं,न होश मे आ रहे हैं,वेंटिलेटर पर हैं।अस्पताल का बील तेजी से बढ रहा है।जीजाजी के घर के सामने वाली सड़क पर अंडरब्रिज बन जाने से दुकान का भट्ठा बैठ गया है।इससे पहले एस्कार्ट्स मे भर्ती थे।इससे पहले भी जीजाजी का लफ़्ड़ा तूने ही निपटाया था।उस समय भी अच्छी-खासी प्रापर्टी उस समय लूटा चुके थे।बस इतना समझ ले हालत बहुत अच्छी नही है।
मुझे कुछ समझ नही आ रहा था।मैने सीधे डा अजय को फ़ोन लगाया और उसे सारी बात बताई।उसने कहा तू वंही बैठ मैं पूछ कर बताता हूं।तीन-चार मिनट बाद ही उसका फ़ोन आ गया और उसने कहा कि पेशेंट की हालत बहुत ज्यादा खराब है,तू तो समझता है एक्स्टरनल सपोर्ट पर चल रहे हैं।रिकवहरी मुशकिल दिख रही है।बीमारी कोई भी बची नही है।भर्ती हुये थे मलेरिया के लिये,फ़िर कार्डियक प्राब्लम,फ़िर रीनल और बाद मे ब्रेन भी डेमेज़ हो गया है।एज फ़ैक्टर भी है।मेरे ख्याल से तो तू उनको समझा और घर ले जा।अब जो होना है वो अस्पताल मे भी उतना ही संभव है जितना घर पर्।मुझे लगा जैसे कान सुन्न होते जा रहे हैं।इतना सब डाक्टर ने मुझे बता दिया वो मैं उस लड़की को कैसे बता पाऊंगा,जो हर वक़्त भगवान से अपने पिता की सलामती चाह रही थी।
मैं सोच ही रहा था कि रिसेस्पशन से हमारे लिये अनाऊंस हुआ, डाक्टर बुला रहे थे।अजय ने उन्हे बता दिया था,मैं रिसेप्शन मे बैठा हूं।अंदर एक नही कई डाक्टर बैठे थे।इससे पहले मैं या डाक्टर कुछ कहते बापू शुरू हो गया ये मेरा स्कूल का दोस्त है।इसको पता लगा तो ये बस मिलने चला आया।मैने इसको बताया कि आप लोग बहुत मेहनत कर रहे हैं।भांजी ने भी आपलोगों की बहुत तारीफ़ की है।डाक्टर और मैं सारा माज़रा समझ चुके थे।उसने कहा अनिल जी देखिये लोगों की एक्स्पेक्टेशन बहुत रहती है?मैने कहा हां आजकल कुछ ज्यादा ही हो गई है और शायद इस्लिये रियेक्शन भी बहुत होते हैं,लेकिन यकीन मानिये ये लोग उनमे से नही है।उसने कहा कि डा अजय को मैने सब बता दिया है।हम लोग तो पेशेंट के लिये उम्मीद छोड़ नही सकते लेकिन यंहा उनकी बिटिया को कुछ ज्यादा ही उम्मीद है।वो आयुर्वेदिक,होम्योपैथिक और पता नही क्या-कया इलाज साथ मे करना चाह रही है हमने उसे मना भी नही किया है।हम लोग चाय पीने के बाद उठे तो डाक्टर ने मुझसे कहा सब तो समझ गये हैं लेकिन उनकी बिटिया नही समझ पा रही है।तब तक़ बापू बाहर निकल चुका था।डाक्टर ने कहा हो सके तो आप उसे समझाईये।मैने कहा ट्राई करता हूं और मै बाहर निकल गया।
मैने बापू से कहा मैं शाम को आता हूं।फ़िर बात करेंगे।बापू की आंखों में डर के साथ-साथ दुखः का समदंर उमड़ रहा था।मै उससे आंख मिला कर विदा भी नही ले पाया।उसने कहा फ़ोन करना और आना पक्का।मैंने उसका फ़ोन उठाना बंद कर दिया है पता नही कब गलत समाचार आ जाये।दोबारा अस्पताल भी नही गया,उस लडकी से सामना करने की हिम्मत नही हो पा रही थी जो हर वक़्त अपने पिता को अच्छा होने की आस लिये संघर्ष कर रही थी।डा की बात भी मेरे दिमाग मे उथल-पुथल मचाये हुये थी,क्या अब मरीज के रिश्तेअदारों को उम्मीद भी नही करना चाहिये?मै उस लड़की को कैसे समझा सकता था कि बेटा अब तुम्हारे पापा नही बचेंगे।इन्हे अस्पताल से घर ले चलते हैं?क्या ये इतना आसान है?बहुत कठोर और पत्थर दिल समझता था मै अपने आप को लेकिन जब मामला अपना होता है तो शायद सब कुछ बदल जाता है।मैंने इससे पहले खुद को इतना बेबस और लाचार कभी नही पाया था!
रास्ते मे फ़िर फ़ोन बज़ा तो मैने कहा बापू वंही आ रहा हूं।पर उधर से बापू ने नही उसकी भांजी ने जवाब दिया कि मामाजी आप प्लीज़ डाक्टर से प्यार से पूछना?पापाजी ठीक हो रहे हैं थोड़ी एक्स्ट्रा केयर उन्हे ज़ल्द ठीक कर देगी।मैने कहा बेटा मैं वंही आ रहा हूं।वो फ़िर बोली मामाजी कंही प्रेस वालों को देख कर अस्पताल वाले हाथ खडे ना कर दे।मैने कहा बेटा चिंता मत करो मैं वंही आकर बात करता हूं।बापू के जीजाजी शहर के बाहरी हिस्से मे बने एक नये सुपर स्पेशलिटी अस्पताल मे भर्ती थे।
मैं वंहा पहुंचा तो बापू बाहर ही खड़ा था।हम लोग नीचे रिसेप्शन मे ही बैठ गये।मैने पूछा क्या बात है बापू?वो पूरी तरह टूटा हुआ था।उसने गहरी सांस ली और कहा यार मेरी समझ मे कुछ नही आ रहा है।मै न चाहते हुये भी सब समझ गया था।मैने पूछा भांजी कंहा है,वो बोला वो पाठ करने बैठ गई है।मैने पूछा डाक्टर क्या कह रहा है?वो बोला हम लोगों से ज्यादा भांजी बात करती है और डाक्टर की तसल्ली भी दमदार नज़र नही आ रही है।वो बोला मैने तेरे को इसिलिये बुलाया है तू एक्चुअल पोज़िशन पूछ और अगर वाकई एक्स्ट्रा केयर की ज़रूरत है तो उसके लिये बोल दे!वो बोला यार ये बच्चे लोग भी समझते नही है।बीस दिन हो गये हैं।न हील डुल रहे हैं,न होश मे आ रहे हैं,वेंटिलेटर पर हैं।अस्पताल का बील तेजी से बढ रहा है।जीजाजी के घर के सामने वाली सड़क पर अंडरब्रिज बन जाने से दुकान का भट्ठा बैठ गया है।इससे पहले एस्कार्ट्स मे भर्ती थे।इससे पहले भी जीजाजी का लफ़्ड़ा तूने ही निपटाया था।उस समय भी अच्छी-खासी प्रापर्टी उस समय लूटा चुके थे।बस इतना समझ ले हालत बहुत अच्छी नही है।
मुझे कुछ समझ नही आ रहा था।मैने सीधे डा अजय को फ़ोन लगाया और उसे सारी बात बताई।उसने कहा तू वंही बैठ मैं पूछ कर बताता हूं।तीन-चार मिनट बाद ही उसका फ़ोन आ गया और उसने कहा कि पेशेंट की हालत बहुत ज्यादा खराब है,तू तो समझता है एक्स्टरनल सपोर्ट पर चल रहे हैं।रिकवहरी मुशकिल दिख रही है।बीमारी कोई भी बची नही है।भर्ती हुये थे मलेरिया के लिये,फ़िर कार्डियक प्राब्लम,फ़िर रीनल और बाद मे ब्रेन भी डेमेज़ हो गया है।एज फ़ैक्टर भी है।मेरे ख्याल से तो तू उनको समझा और घर ले जा।अब जो होना है वो अस्पताल मे भी उतना ही संभव है जितना घर पर्।मुझे लगा जैसे कान सुन्न होते जा रहे हैं।इतना सब डाक्टर ने मुझे बता दिया वो मैं उस लड़की को कैसे बता पाऊंगा,जो हर वक़्त भगवान से अपने पिता की सलामती चाह रही थी।
मैं सोच ही रहा था कि रिसेस्पशन से हमारे लिये अनाऊंस हुआ, डाक्टर बुला रहे थे।अजय ने उन्हे बता दिया था,मैं रिसेप्शन मे बैठा हूं।अंदर एक नही कई डाक्टर बैठे थे।इससे पहले मैं या डाक्टर कुछ कहते बापू शुरू हो गया ये मेरा स्कूल का दोस्त है।इसको पता लगा तो ये बस मिलने चला आया।मैने इसको बताया कि आप लोग बहुत मेहनत कर रहे हैं।भांजी ने भी आपलोगों की बहुत तारीफ़ की है।डाक्टर और मैं सारा माज़रा समझ चुके थे।उसने कहा अनिल जी देखिये लोगों की एक्स्पेक्टेशन बहुत रहती है?मैने कहा हां आजकल कुछ ज्यादा ही हो गई है और शायद इस्लिये रियेक्शन भी बहुत होते हैं,लेकिन यकीन मानिये ये लोग उनमे से नही है।उसने कहा कि डा अजय को मैने सब बता दिया है।हम लोग तो पेशेंट के लिये उम्मीद छोड़ नही सकते लेकिन यंहा उनकी बिटिया को कुछ ज्यादा ही उम्मीद है।वो आयुर्वेदिक,होम्योपैथिक और पता नही क्या-कया इलाज साथ मे करना चाह रही है हमने उसे मना भी नही किया है।हम लोग चाय पीने के बाद उठे तो डाक्टर ने मुझसे कहा सब तो समझ गये हैं लेकिन उनकी बिटिया नही समझ पा रही है।तब तक़ बापू बाहर निकल चुका था।डाक्टर ने कहा हो सके तो आप उसे समझाईये।मैने कहा ट्राई करता हूं और मै बाहर निकल गया।
मैने बापू से कहा मैं शाम को आता हूं।फ़िर बात करेंगे।बापू की आंखों में डर के साथ-साथ दुखः का समदंर उमड़ रहा था।मै उससे आंख मिला कर विदा भी नही ले पाया।उसने कहा फ़ोन करना और आना पक्का।मैंने उसका फ़ोन उठाना बंद कर दिया है पता नही कब गलत समाचार आ जाये।दोबारा अस्पताल भी नही गया,उस लडकी से सामना करने की हिम्मत नही हो पा रही थी जो हर वक़्त अपने पिता को अच्छा होने की आस लिये संघर्ष कर रही थी।डा की बात भी मेरे दिमाग मे उथल-पुथल मचाये हुये थी,क्या अब मरीज के रिश्तेअदारों को उम्मीद भी नही करना चाहिये?मै उस लड़की को कैसे समझा सकता था कि बेटा अब तुम्हारे पापा नही बचेंगे।इन्हे अस्पताल से घर ले चलते हैं?क्या ये इतना आसान है?बहुत कठोर और पत्थर दिल समझता था मै अपने आप को लेकिन जब मामला अपना होता है तो शायद सब कुछ बदल जाता है।मैंने इससे पहले खुद को इतना बेबस और लाचार कभी नही पाया था!
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