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Monday, July 22, 2013
ऊंगली पकड कर चलना सीखाने वाले आई और बाबूजी लेकर खेलना कूदना,पढना-लिखना सीखाने वाले तमाम गुरुजनो का नमन करता हूं.
गुरु पुर्णीमा के पावन अवसर पर बचपन से लेकर आज तक जिसने ज़िंदगी की दौड में जो कुछ भी सिखाया हो उन सभी गुरुओं को मैं साष्टांग दण्डवत करता हूं.स्व. बाबूजी और पूज्यनीय आई ने तो बोलना से लेकर चलना तक सिखाया और उन्ही के सीख का नतीजा है जो इतनी दूर तक बिना डगमगाये चलाया आया.फिर स्कूल के गुरुजन,कालेज के शिक्षकगण और पत्रकारिता में कलम को सही दिशा देने वाले तमाम गुरुजन.सभी का मै नमन करता हूं.पुराने पडोसी पप्पी भैया उर्फ विकमजीत शारदा जिन्होने पतंग उडाने से लेकर साईकिल चलाना तक सिखाया और तमाम वो लोग जिन्होने अच्छी बुरी सभी तरह की सीख देकर ज़िंदगी की बाधा दौड जीतने के लायक बनाया,मै उनका भी स्मरण करता हूं,वंदन करता हूं.पता नही क्यों और किसलिये मुझे भी कालेज के ज़माने से सब यार दोस्त गुरुदेव,उस्ताद और लीडर कहने लगे थे?मुझे इसका कारण आज तक़ पता नही चला पर अब ऎसा लगता है कि कंही इसके पीछे मेरा जन्म दिन ही तो कारण नही है.जी,सही पहचाना तिथी के अनुसार आज गुरु पुर्णीमा को मेरा भी जन्म दिन है.सुबह सुबह आई जबर्दस्ती नहाने भेज कर टिका लगाकर एक सौ एक रूपया देती थी.इस बार वे नागपुर में है और उन्होने फोन पर ही बधाई और आशिर्वाद का खज़ाना लुटा डाला.फिर छोटी बहन भांजी का भी फोन आ गया,भाईयों,बहुओं ने भी परंपरागत ढंग से चरण स्पर्श कर बधाई दे दी.सारे परिवार की बधाई बटौरने के बाद लगा कि कुछ बधाई और शुभकामनाये यंहा भी जुगाड लूं.क्योंकि आप सबकी दुआयें ही है जो गुरुओं के आशिर्वाद के साथ मिलकर तरक़्क़ी की राह को और आसान बना देती है.
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