मैं कश्मीर की बात नही कर रहा हूं,कभी अमन और चैन का टापू कहलाने वाले छत्तीसढ की बात कर रहा हूं।यंहा मदनवाडा,(जंहा हाल ही मे एस पी समेत तीन दर्ज़न जवान नक्सली वारदात मे शहीद हो गये थे),मे पुलिस वाले कई सालो बाद तिरंगा फ़हरायेंगे वो भी ग्रामीणो के साथ्।सालो बाद तिरंगा फ़ैलाना अपने ही देश मे,और उसकी घोषणा करना,समझ से परे है।ये अकेला कस्बा नही है,ऐसे दर्ज़नो कस्बे और गांव है जंहा यही सब हो रहा है।
इसी इलाके मे ट्रांसफ़र के बाद पुलिस के पन्द्रह जवानों ने सस्पेंड होना मंज़ूर कर लिया मगर इसे नक्सलियो की दह्शत ही माना जायेगा कि वे वंहा नौकरी पर गये नही।उन्होने नौकरी दांव पर लगाना ज़रूरी समझा बनिस्बत ज़िंदगी दांव पर लगाने के।खैर उन्को क्या कहे वे तो छोटे कर्मचारी है उसी इलाके मे ट्रांसफ़र के बाद एक एएसपी ने वंहा जाने के बदले कोर्ट जाना उचित समझा और ट्रांसफ़र रूकवा लिया।जब एएसपी वंहा नही जा रहे है तो जवानो को क्यों जबरन भेजा जा रहा है?क्या उनको जीने की आज़ादी नही है?
दूसरे इलाको मे तो और बुरा हाल है।दस किलोमीटर की दूरी तय करने मे पुलिस को 48 घंण्टे से ज्यादा समय लग रहा है।पुलिस कोईलीबेडा इलाके मे घूसने मे पूरी एह्तियात बरतने का दावा कर रही है।पुलिस को वंहा एक ही परिवार के आठ लोगो को ज़िंदा जला दिये जाने के मामले की जांच करना है।मृतको मे एक दो साल की दुधमूंही बच्ची भी है।ये पहला मामला है निजी विवाद मे नक्सलियों के शामिल होने की बात सामने आ रही है।आठ लोगो को ज़िंदा जला देने के संगीन मामले की जांच दो दिन बीत तक़ शुरू भी नही हो पाई?क्या कोई सबूत मिलेगा?और क्या कोई गवाही देगा?न अपने हिसाब से देखने की आज़ादी?न बोलने की आज़ादी?
अबूझमाड के 4000 वर्ग किलोमीटर तक़ फ़ैले ईलाके के तीन सौ से ज्यादा गांवो मे से मात्र दो का ही विद्युतीकरण हो सका है आज तक़। सड़को का तो अता पता नही है।आज़ादी के इतने जश्न मनाने के बाद भी आज-तक़ वंहा के लोगो को अस्पताल आने के लिये कई किलोमीटर पैदल चलना पढता है।स्वाईन फ़्लू से पूणे मे एक आदमी मरता है तो सारे देश मे हल्ला मच जाता है।सब को अपने ज़िंदा रहने की चिंता है और जंगल मे बिना ईलाज हर साल एक नही दर्ज़नो लोग मर रहे है उन्की सुध लेने वाला कोई नही?
वैसे मुझे भी ये सब कहने का बहुत ज्यादा हक़ नही है क्योंकी मै तो आज़ाद हूं।कल शान से तिरंगा फ़हराऊंगा।वी आई पी पास घर आ जाता है।चाहे तो पुलिस परेड ग्राऊण्ड मे जाकर मुख्य कार्यक्रम देखूं या घर मे बैठ कर टीवी पर सबके खोकले संदेश सुनु।जगह-जगह शान से और कड़ी सुरक्षा मे तिरंगा फ़हराने के शाट्स देखूं और आंखे बंद कर अपने ही प्रदेश के जंगलो की दुर्दशा पर रोऊं?क्या फ़र्क़ पड़ता है?हां वैसे इस देश मे कम से कम रोने की तो आज़ादी है?