अरे इसमे हंसने की कोई बात नही है भैया!मै मज़ाक भी नही कर रहा हूं!सीरियसली बता रहा हूं।हमारे प्रदेश मे आजकल यही चल रहा है।इंजीनिअर बनाने की इतनी दुकाने खुल गई है कि अब ग्राहक ही नही मिल रहे हैं।अभी कांऊसलिंग शुरू हुई है और कांऊसलिंग के बाहर निजी ईंजीनियरिंग कालेजों का मीनाबाज़ार लग गया है।रंग-बिरंगे बैनर और पोस्टरों से सजे स्टाल पर खड़े लोग किसी भी बैगधारी को देखते ही उस पर टूट पड़ते है जैसे रेल से उतरते यात्री पर कुली य बस से उतरने वाले पर रिक्शे वाले।आदमी लाख चिल्लाये अरे मै तो सब्ज़ियां खरीदने बाज़ार जा रहा हूं,कोई सुनने को खाली नही रहता।सारे के सारे उसे पेल देते है अपने-अपने कालेज का स्वर्णिम रिकार्ड्।
ऐसा लगता है कि कोई सेल लगी हो इसके साथ ये फ़्री की तर्ज़ पर पढाई के साथ प्लेसमेंट की गारंटी,फ़ीस मे छ्ट,सबसे नज़दीक कैम्पस,बस की सुविधा,फ़ैकल्टियओं के फ़ोटो और जाने क्या-क्या बताना पड़ रहा है दुकानदारों को।और तो और उनका स्टाफ़ घूम-घूम कर छात्रढूंढ रहा है।मास्टर तो कांसलिंग के लिये कैम्पस मे जाने वाले छात्रो के साथ फ़र्ज़ी पालक बन कर जा कर अंदर से बच्चे पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं।लेकिन कांपिटिशन इतना ज्यादा है कि दूसरी दुकान के लोग शिकाय्त कर उन्हे पकड़वा रहे हैं।कल ही बिलासपुर के तीन मास्टरो को पालक बनकर अंदर जाते समय पकड़ा गया था,उन्होने लिख कर माफ़ी मांगी की आगे से ऐसा नही होगा।बच्चा पकडने की होड मे मचने वाले हडकम्प के कारण ही इस साल कैम्पस के बाहर स्टाल लगाने की अनुमति मिली है दुकानदारों को ।
दरअसल ऐसा शुरू से नही हो रहा है।शुरूआत मे निजी कालेज एक दो ही थे।तो उनकी कमाई और अकड़ देख कर कई लोगो को उस दुकान से होने वाले मुनाफ़े के लालच मे खींचा और देखते ही देखते 48 दुकाने हो गई है इस सोलह ज़िले वाले छोटे से प्रदेश मे।हालत ये है कि पिछले साल ही करीब-करीब सत्ताईस सौ सीटे खाली रह गई थी और इस बार नई दुकानो के खुलने से आठ हजार सीटे और बढी है।कुछ दुकानो का तो अख़बारों मे फ़ुल-फ़ुल पेज विज्ञापन देने के बावज़ूद अभी तक़ खाता तक़ नही खुला है।अब बताईये भला ऐसे मे अगर दुकानदार अपने मास्टर से कहे अगर पढाने का शौक है तो जाओ बच्चा पकड़ कर लाओ! तो क्या गलत है?और अगर बेचारा मास्टर अपनी नौकरी चलाने और अपने मालिक की दुकान चलाने के लिये भेस बदलकर पालक बन कर काउंसलिग कैम्पस मे घुस कर बच्चे पकडने की कोशिश कर रहा है तो क्या गलत कर रहा है?अब इसमे हंसने की क्या बात है रोजी-रोटी का सवाल है भैया।