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Friday, January 15, 2010

अंधविश्वास क्या सिर्फ़ हिंदू धर्म मे ही है?मुख़ालफ़त क्या सिर्फ़ हिंदू मान्यता की हो सकती है?दम है तो कभी किसी दूसरे धर्म के बारे मे भी बेबाकी दिखाओ!

एक बात समझ मे नही आ रही है कि ये कथित नेशनल न्यूज़ चैनल वाले लोगों को शिक्षित करने पर क्यों तुले हुये हैं,खासकर हिंदूओं को।सब के सब चिल्ला रहे है ग्रहण के बारे मे धार्मिक या पारंपरिक मान्यताएं बकवास है।सब पानी पी-पी के ग्रहण और ज्योतिषियों के खिलाफ़ आग उगल रहे हैं लेकिन क्या कभी इतनी जागरूकता किसी दूसरे धर्म के अंधविश्वासों के खिलाफ़ दिखाई है।हिंदू मंदिर मे अगर बलि चढ जाये तो सारे देश के नैतिकता और सुधारवाद के ठेकेदार वंहा पंहुच जायेंगे और बतायेंगे सारे हिंदू गलत हैं,सारी मान्यताऐं गलत है।सिर्फ़ वे सही है।तो मेरा अनुरोध है कि एकाध बार ज़रा किसी त्योहार विशेष पर काटे जाने वाले सबसे निरीह प्राणी का बहता हुआ खून भी दिखा दे।अगर दम है तो ये बता दें कि किसी बेज़ुबान जानवर की जान लेकर आपको पुण्य कभी नही मिल सकता।दम है तो उसे भी बलि प्रथा कह कर विरोध करके दिखायें।अगर नही कर सकते तो काहे हिंदू धर्म के पीछे पड़े हुये स्वयंभू ठेकेदारों।कृष्ण को रसिया कहते समय ज़रा नही हिचकने वाले किसी दूसरे धर्म मे बिन-बाप के बच्चे और बिन ब्याही मां के बारे मे वो सब कह कर दिखाओ,जो समाज मे कहा जाता है।

नही आप लोग ये सब कह ही नही सकते क्योंकि मै जिस प्रथा के बारे मे कह रहा हूं वो आप लोगों के हिसाब से बलि नही कुर्बानी है शायद्।मैं जिस के बारे मे बात कर रहा हूं उसे आप एक त्योहार विशेष पर रात को महिमा मंडित करते हैं क्योंकी वो मां या माता नही है मदर है। है ना।वंदे मातरम के शाब्दिक अर्थ पर घण्टो बहस कर सकते हैं क्योंकि वंहा मदर या अम्मा नही है मां है।हिंदू धर्म के लोग यदि नदी मे डुबकी लगा दें तो अंधविश्वास,किसी पत्थर की पूजा करने लगे तो अवैज्ञानिक दृष्टिकोण,अज्ञान,अशिक्षा और पाखण्ड,जाने क्या-क्या।खुलकर बक़वास करते हैं आप लोग्।लेकिन आप लोगों से पूछा जाये कि भैया अगर ये सही है कि हिंदू अनपढ,अज्ञानी,अतार्किक,अवैज्ञानिक है तो एक जगह विशेष पर पत्थर फ़ेंक कर शैतान को मारने वाले कितने वैज्ञानिक हैं।कितने लोगों का पत्थर डाय्रेक्ट शैतान को लगता है और वो शैतान रहता कंहा है और क्या उतनी दूर तक़ आदमी का हाथों से फ़ेंका हुआ पत्थर जा सकता है?

छोड़ो गैर हिंदू धार्मिक मान्याताओं को उसके बारे मे पता है बात करने से ही…… है।अगर कोई बोला तो दफ़्तर मे घूस कर मारेंगे और कोई धर्मनिरपेक्ष नेता भी मुंह तक़ नही खोल पायेगा।आप लोगों की औकात सबको पता है।शांत और सहिष्णु हिंदू के खिलाफ़ ज़हर उगलो और अपने आपको समाज सुधारक,जागरूकता के होलसेल डीलर साबित करो।जो जितना दम है उतनी बात कर रहा है आज्।कोई किसी वैज्ञानिक को खाना खाते दिखा रहा है तो लोगों को खुले मे घूमते हुये।कोई ग्रहण को देखते हुये वैज्ञानिको से बतिया रहा है तो ज्योतिषियों और हिंदू धर्म या दर्शन शास्त्रियों का मज़ाक उड़ा कर अपने आपको महान तर्क शास्त्री या विद्वान साबित करने पर तुला हुआ है।इनमे से आधे से ज्यादा लोगों के घरों मे उनके परिवार वाले,माता-पिता,दादा-दादी,नाना-नानी वही सब कर रहे होंगे जिनका ये कथित पढे लिखे विद्वान बच्चे मज़ाक उडाते नज़र आ रहे हैं।दम है तो दिखाते अपने घरों का हाल।दूसरे के घर का तमाशा तो हमेशा अच्छा ही लगता है।

खैर जाने दिजिये ये तो सब जानते है अपने आप को प्रगतिशील,सुधारवादी,विद्वान और धर्मनिरपेक्ष साबित करने के लिये हिंदूओं को गाली देने से सस्ता कोई उपाय नही है।मेरा ये सवाल है कि ठीक है हम आपको वो सब मान लेते हैं जो साबित करने के लिये आज आप दिन भर ग्रहण के नाम पर बकवास कर रहे हैं।लेकिन क्या इस देश मे सिर्फ़ सूर्य ग्रहण और उससे जुड़े अंधविश्वास के खिलाफ़ ही जनजागरण अभियान ज़रूरी है?क्या सूर्य ग्रहण से ज्यादा दुष्प्रभाव आपको नशे का नज़र नही आता?क्या आपको नही लगता कि देश की युवा पीढी गुमराह हो रही है उन्हे नशे की राह पर ढकेला जा रहा है?क्या आपको नही लगता कि इस देश मे पानी और कैसेट्स के नाम पर आप लोगों के मालिक सीधे सीधे शराब कंपनियों का विज्ञापन दिखा कर जनता से धोकाधड़ी कर रहे हैं।क्या आप को नही लगता कन्या शालाओं के सामने गर्भनिरोधक गोलियों के विज्ञापनो के होर्डिंग क्या बालमन पर क्या दुष्प्रभाव डाल रहे हैं?क्या आपको नही लगता कि सारे देश मे स्कूलों के अगल-बगल ही पान ठेले खुलें हुए हैं,जंहा बिकने वाली सिगरेट,पान मसाले,तम्बाखू,गुटका स्कूली बच्चों को मौत के मुंह मे ढकेल रहे हैं?क्या ये सब हमारी युवा पीढी पर ग्रहण नही है?क्या इनके खिलाफ़ आप लोगों को आवाज़ नही उठाना चाहिये?क्या इन सब के खिलाह जागरूकता अभियान नही चलाना चाहिये?

अभियान चलाना तो जाने दिजिये ये बताईये कि क्या तोड़-मरोड़ कर दिखाये जाने वाले शराब कंपनियों के विज्ञापनो पर रोक नही लगनी चाहिये?क्या शराब कंपनियों को अपने ब्रांड का विज्ञापन करके दूसरे उत्पादों से ज्यादा शराब बेचने मे आप लोगों को मदद करनी चाहिये?सरकारी रोक के बावज़ूद कभी क्रिकेट मैच के प्रायोजकों के रूप मे तो कभी किसी अन्य रूप मे शराब मे ब्राण्ड दिखाने पर आप लोगों को जनहित मे रोक नही लगानी चाहिये?क्या इस बारे मे अभियान नही चलाया जाना चाहिये कि शराब बनाने वाली कंपनी दूसरे कई उत्पादों के लिये भले ही एक ही नाम रखे मगर शराब के लिये सिर्फ़ एक ब्राण्ड का उपयोग करे और उसे दिखाये जाने पर प्रतिबंध लगे?ये सब आप लोग कर ही नही सकते क्योंकि शराब कण्डोम और गर्भनिरोधक गोलियों के विज्ञापनो से होने वाली मोटी कमाई से ही तो चैनल चल रहा है और फ़िर इसके दुष्प्रभाव मे आने वाली युवा पीढी से आप लोगों के चैनलों की किमत तो कई गुना ज्यादा होगी,है ना?आप लोगों के लिये तो यही ठीक है जब हिंदूओं का कोई त्योहार आये,अपना भोंपू निकालो और चिल्ला कर कथित धर्मनिरपेक्षता और जागरूकता बेचो।गालियां बको हिंदूओं को हिंदूओं के देश मे और नक्सलियों,आतंकवादियों के साथ होने वाले व्यवहार को अत्याचार साबित करके सच्चे मानवाधिकारवादी बनकर अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार(खैरात) बटोरो।आप लोग इस ग्रहण के बारे मे ही बोल सकते हो। आप लोग सिर्फ़ हिंदू धर्म के खिलाफ़ ही बोल सकते हो अगर है दम तो फ़िर दिखा दो वो सब जो हमारे सवालों का जवाब है।मेरे सवाल आप लोगों के हिंदू विरोधी रवेये के खिलाफ़ है ना कि किसी अन्य धर्म के। मैं आप लोगों जैसा पाखण्डी धर्मनिरपेक्ष नही हूं।मैं सभी धर्मों का समान रूप से सम्मान करता हूं।यंहा उठाये गये सवाल किसी धर्म विशेष का विरोध करने के लिये नही बल्कि ये साबित करने के लिये उठाये गये हैं कि मीडिया सिर्फ़ हिंदू धर्म को सुनियोजित ढंग से टारगेट कर रहा है।