दो तीन दिनो से कथित समाजसेवी संस्थाओ के भाईयो और बहनो का लगातार फ़ोन आ रहा था।उन्हे मां की ज़रूरत थी मदर्स डे पर सम्मान के लिये! शर्त ये थी कि मां अच्छी होना चाहिये और गरीब भी,जिसने खुद दुःख उठाकर बच्चों को पढा लिखा कर बड़ा आदमी बनाया हो।मै हैरान था कि ये मां के साथ अच्छी और खराब के विशेषण कब से लगने लग गये।मै ये भी सोचने पर मज़बूर हो गया कि क्या मां का एक दिन सम्मान करने से सही मायने मे मां का कर्ज़ उतर सकता है।जैसे ही कोई कहता कि भैया प्लीज़ कोई अच्छी सी मां का पता चले तो बताना,सम्मान करना है, मदर्स डे पर,मेरा दिमाग फ़टने लगता था।ये शायद हमारी दिखावे की दुनिया की नीचता की पराकाष्ठा ही है॥
मन खटटा हो चला था।रह-रह कर सवाल दिमाग मे आतंकवादियो के बमो की तरह धमाके कर रहे थे।मां! अच्छी! और वो भी गरीब होगी ! तभी सम्मान की पात्र होगी?नही तो नही!अमीर या ठीक-ठाक घर की मां जिसके बच्चे समाज मे सम्मानजनक स्थान हासिल कर चुके है,उन्की उपलब्धी का कोई मतलब नही है क्या?
फ़िर मां तो मां है! उसके कदमो मे स्वर्ग होता है।उसको अच्छी या बुरी कैसे परिभाषित किया जा सकता है।परिभाषित तो औलाद होती है कि फ़लाना देखो पढलिख कर अपने मां-बाप का नाम रौशन कर रहा है या फ़िर, देखो हरकत उन बच्चों की मां-बाप का नाम डुबा रहे है।मैं तो अपनी जानकारी मे औलादों के ही अच्छी या बुरी होने की बात सुनते आया था ।ये पहला मौका है जब कथित समाज सेवको?को अच्छी मां ढूंढते देख रहा हूं।
ये खयाल भी आया कि ये लोग क्यों नही अपनी ही मां का सम्मान कर देते।ये सवाल भी मुझे काफ़ी परेशान करता रहा। अपने मां-बाप का सम्मान करने मे क्या परेशानी हो सकती है।आखिर वे उस हैसियत के हुये जिसमे फ़ालतू समय और फ़ाल्तू बच रहे रुपयों से फ़ाल्तू टाईप की समाज सेवा कर पा रहे हैं,ये भी तो मां के लालन-पालन और आशीर्वाद से ही संभव हुआ है।इस मामले मे मैनें अपने कुछ साथियों से चर्चा कि तो उनका कहना साफ़ था कि मां के साथ रहते होंगे तभी तो ना सम्मान करेंगे?उन्होने कहा कि आजकल एक मुहल्ले मे मां-बाप और बेटे अलग-अलग घरों मे रह रहे हैं।एक साथी का तो लहजा काफ़ी सख्त था।जितनी गंदी गालियां वो बक़ सकता था उसने बकी और कहा कि ये सब अब रईसों के चोचले हैं। मां-बाप का सम्मान हम लोग यदी ढंग से कर पाते तो बुज़ुर्गो के लिये आश्रम खोलने की नौबत ही क्यों आती।
उसकी बाते सुनने के बाद मेरी हिम्मत नही हुई और किसी से इस मामले मे चर्चा करने की।मैने आज सुबह अपनी आई, यानी मां से कहा कि आज मदर्स डे है! आपको क्या गिफ़्ट चाहिये?वो हंस कर बोली और क्या गिफ़्ट चाहिये तुम तीनो भाई मेरे साथ रहते हो।मेरा इतना ख्याल रखते हो।ये ही मेरे लिये दुनिया का सबसे अच्छा गिफ़्ट है।बचपन से तुम तीनो आपस मे लड़ते-झगड़ते आ रहे हो मगर आज तक़ अलग नही हुए यही मेरे लिये काफ़ी है।मै बोला आज मां का सम्मान किया जा रहा ………मेरी बात बीच मे ही काटते उन्होने कहा सम्मान दिखा के नही किया जाता बेटा।इन सब बातो मे कुछ नही रखा है,बच्चे बड़े होते है तो उन्हे लगता है कि वे सब कुछ सीख गये और अब उन्हे बड़े-बुजुर्गो की सीख की ज़रूरत नही है और शायद यंही से टकराव शुरू होता है।मां-बाप के लिये बच्चे कितने भी बड़े हो जायें बच्चे ही रह्ते हैं,और वे उसी हिसाब से व्यवहार करते है जो बड़े हो चुके बच्चो को पसंद नही आता और जो बच्चे बहुत बड़े हो जाते है उन्हे फ़िर किसी की ज़रुरत नही होती।तुम लोग अभी भी शायद बच्चे हो इस्लिये मां की ज़रूरत है,जिस दिन बड़े हो जाओगे………………उस्के बाद मै सुन नही सका और उठ कर दुसरे कमरे मे चला गया।मुझे लगा कि मैं छोटा बच्चा ही सही मुझे नही करना मां का सम्मान सिर्फ़ एक दिन।मुझे नही मनाना सिर्फ़ एक दिन का मदर्स डे।मेरे लिये हर दिन मदर्स डे रहेगा।आज फ़िर वही फ़ोन वही बधाईयां,मन फ़िर खट्टा हो गया है।बहुत कुछ लिखना चाह्ता था,मगर अपनी ये पुरानी पोस्ट याद आ गई,इसे दोबारा पेश करने का मन हुआ सो आपके सामने रख रहा हूं,दोबारा पढने पर यदी किसी को बुरा लगे तो क्षमा करियेगा।
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Sunday, May 8, 2011
Sunday, May 9, 2010
बढते वृद्धाश्रम और उसमे बढती माताओं की संख्या!क्या हमे मदर्स डे मनाने का हक़ है!
बढते वृद्धाश्रम और उसमे बढती माताओं की संख्या!क्या हमे मदर्स डे मनाने का हक़ है!ये सवाल मुझे कल से बेचैन कर रहा है।मदर्स डे पर स्पेशल स्टोरी के लिये कुछ ने पुछा तो मुझे कुछ सुझा भी नही।मुझे यंहा के बाल आश्रम मे रहने वाले बच्चे भी याद आये जिन्होने मुझे गांधी जयंती पर खाना खिलाया था।उन्होने तो मां को देखा भी नही होगा शायद।फ़िर याद आया यंहा करीब की बस्ती माना का वृद्धाश्रम!पिछ्ले साल गर्मियों मे गया था!पानी की किल्लत झेल रहे आश्रम मे रहने वाली,दुर्भाग्यशाली बच्चों की माताओं की हालत देख कर, जो आंसूओं ने पलकों की कैद को तोड़ने का विद्रोह किया था,उसे दबाने मे ही हालत खराब हो गई थी,और उसे दबाने के बाद दोबारा वंहा जाने की हिम्मत ही नही हुई।आज फ़िर वो सब कुछ आंखों के सामने घूम रहा है।सुबह से एसएमएस आ रहे है।मदर्स डे पर बधाईयों का सिलसिला थम ही नही रहा है।
मैने भी कुछ को धन्यवाद दिया और कुछ को आये हुये एसएमएस फ़ारवर्ड कर दिये।मुझे लगा कि औपचारिकता निभाने मे शायद हम लोगों की मास्टरी हो गई है।हम उस पश्चिम को पुरी तरह आत्मसात करने मे लगे हुये हैं,जो भौतिकवाद की अंधी दौड मे थक़ कर हमारी ओर देख रहा है।पश्चिम की तरह हम भी हर बात के लिये एक दिन मुकरर्र करके अपना कर्तव्य पूरा कर रहे हैं।
इसी पिछलग्गूपन की वजह से हम मदर्स डे मनाने मे लगें हुये।इस देश में जंहा मां को भगवान माना जाता है।जंहा नदियों को,जंहा गौ को और जंहा किताबों को मां माना जाता है,उस देश में वृद्धाश्रम खुलना और उसमे माताओं की संख्या का लगातार बढना क्या ये साबित करता है कि इस देश मे मां को भगवान माना जाता है?
खैर वे बदनसीब ही होंगे जिनके जीते-जी उनकी किसी आश्रम मे रहे।ईश्वर का लाख-लाख शुक्र है कि मैं उन बदनसीबों मे से नही हूं।पता नही उनकी क्या मज़बूरियां रही होंगी?मगर हम तीनो भाई एक साथ,एक ही घर में अपनी आई के साथ रहते हैं।शायद यही काफ़ी हमारे लिये मदर्स डे मनाने के लिये।दोनो भाई और मैं आपस मे छिट्पुट मतभेदों के बावज़ूद एक साथ रहकर अपनी मां का प्यार पाने मे सफ़ल हैं,मैं समझता हूं कि ये ईश्वर का सबसे बडा वरदान है।सच मे मां,मां है उसका कोई विकल्प नही।आज जो कुछ भी हूं,उसके आशीर्वाद से ही हूं।आई आपका आशीर्वाद सदा बना रहे।ब्लाग जगत मे भी बहुत सी मातायें हैं मैं उनसे भी आशीर्वाद की कामना करूंगा और ईश्वर से प्रार्थना करूंगा कि इस देश मे किसी भी माता को कभी किसी आश्रम का दरवाज़ा न देखना पड़े।
मैने भी कुछ को धन्यवाद दिया और कुछ को आये हुये एसएमएस फ़ारवर्ड कर दिये।मुझे लगा कि औपचारिकता निभाने मे शायद हम लोगों की मास्टरी हो गई है।हम उस पश्चिम को पुरी तरह आत्मसात करने मे लगे हुये हैं,जो भौतिकवाद की अंधी दौड मे थक़ कर हमारी ओर देख रहा है।पश्चिम की तरह हम भी हर बात के लिये एक दिन मुकरर्र करके अपना कर्तव्य पूरा कर रहे हैं।
इसी पिछलग्गूपन की वजह से हम मदर्स डे मनाने मे लगें हुये।इस देश में जंहा मां को भगवान माना जाता है।जंहा नदियों को,जंहा गौ को और जंहा किताबों को मां माना जाता है,उस देश में वृद्धाश्रम खुलना और उसमे माताओं की संख्या का लगातार बढना क्या ये साबित करता है कि इस देश मे मां को भगवान माना जाता है?
खैर वे बदनसीब ही होंगे जिनके जीते-जी उनकी किसी आश्रम मे रहे।ईश्वर का लाख-लाख शुक्र है कि मैं उन बदनसीबों मे से नही हूं।पता नही उनकी क्या मज़बूरियां रही होंगी?मगर हम तीनो भाई एक साथ,एक ही घर में अपनी आई के साथ रहते हैं।शायद यही काफ़ी हमारे लिये मदर्स डे मनाने के लिये।दोनो भाई और मैं आपस मे छिट्पुट मतभेदों के बावज़ूद एक साथ रहकर अपनी मां का प्यार पाने मे सफ़ल हैं,मैं समझता हूं कि ये ईश्वर का सबसे बडा वरदान है।सच मे मां,मां है उसका कोई विकल्प नही।आज जो कुछ भी हूं,उसके आशीर्वाद से ही हूं।आई आपका आशीर्वाद सदा बना रहे।ब्लाग जगत मे भी बहुत सी मातायें हैं मैं उनसे भी आशीर्वाद की कामना करूंगा और ईश्वर से प्रार्थना करूंगा कि इस देश मे किसी भी माता को कभी किसी आश्रम का दरवाज़ा न देखना पड़े।
Sunday, May 10, 2009
भैया प्लीज़ कोई अच्छी सी मां का पता चले तो बताना,सम्मान करना है,आज मदर्स डे है ना!
दो तीन दिनो से कथित समाजसेवी संस्थाओ के भाईयो और बहनो का लगातार फ़ोन आ रहा था।उन्हे मां की ज़रूरत थी मदर्स डे पर सम्मान के लिये! शर्त ये थी कि मां अच्छी होना चाहिये और गरीब भी,जिसने खुद दुःख उठाकर बच्चों को पढा लिखा कर बड़ा आदमी बनाया हो।मै हैरान था कि ये मां के साथ अच्छी और खराब के विशेषण कब से लगने लग गये।मै ये भी सोचने पर मज़बूर हो गया कि क्या मां का एक दिन सम्मान करने से सही मायने मे मां का कर्ज़ उतर सकता है।जैसे ही कोई कहता कि भैया प्लीज़ कोई अच्छी सी मां का पता चले तो बताना,सम्मान करना है, मदर्स डे पर,मेरा दिमाग फ़टने लगता था।ये शायद हमारी दिखावे की दुनिया की नीचता की पराकाष्ठा ही है॥
मन खटटा हो चला था।रह-रह कर सवाल दिमाग मे आतंकवादियो के बमो की तरह धमाके कर रहे थे।मां! अच्छी! और वो भी गरीब होगी ! तभी सम्मान की पात्र होगी?नही तो नही!अमीर या ठीक-ठाक घर की मां जिसके बच्चे समाज मे सम्मानजनक स्थान हासिल कर चुके है,उन्की उपलब्धी का कोई मतलब नही है क्या?
फ़िर मां तो मां है! उसके कदमो मे स्वर्ग होता है।उसको अच्छी या बुरी कैसे परिभाषित किया जा सकता है।परिभाषित तो औलाद होती है कि फ़लाना देखो पढलिख कर अपने मां-बाप का नाम रौशन कर रहा है या फ़िर, देखो हरकत उन बच्चों की मां-बाप का नाम डुबा रहे है।मैं तो अपनी जानकारी मे औलादों के ही अच्छी या बुरी होने की बात सुनते आया था ।ये पहला मौका है जब कथित समाज सेवको?को अच्छी मां ढूंढते देख रहा हूं।
ये खयाल भी आया कि ये लोग क्यों नही अपनी ही मां का सम्मान कर देते।ये सवाल भी मुझे काफ़ी परेशान करता रहा। अपने मां-बाप का सम्मान करने मे क्या परेशानी हो सकती है।आखिर वे उस हैसियत के हुये जिसमे फ़ालतू समय और फ़ाल्तू बच रहे रुपयों से फ़ाल्तू टाईप की समाज सेवा कर पा रहे हैं,ये भी तो मां के लालन-पालन और आशीर्वाद से ही संभव हुआ है।इस मामले मे मैनें अपने कुछ साथियों से चर्चा कि तो उनका कहना साफ़ था कि मां के साथ रहते होंगे तभी तो ना सम्मान करेंगे?उन्होने कहा कि आजकल एक मुहल्ले मे मां-बाप और बेटे अलग-अलग घरों मे रह रहे हैं।एक साथी का तो लहजा काफ़ी सख्त था।जितनी गंदी गालियां वो बक़ सकता था उसने बकी और कहा कि ये सब अब रईसों के चोचले हैं। मां-बाप का सम्मान हम लोग यदी ढंग से कर पाते तो बुज़ुर्गो के लिये आश्रम खोलने की नौबत ही क्यों आती।
उसकी बाते सुनने के बाद मेरी हिम्मत नही हुई और किसी से इस मामले मे चर्चा करने की।मैने आज सुबह अपनी आई, यानी मां से कहा कि आज मदर्स डे है! आपको क्या गिफ़्ट चाहिये?वो हंस कर बोली और क्या गिफ़्ट चाहिये तुम तीनो भाई मेरे साथ रहते हो।मेरा इतना ख्याल रखते हो।ये ही मेरे लिये दुनिया का सबसे अच्छा गिफ़्ट है।बचपन से तुम तीनो आपस मे लड़ते-झगड़ते आ रहे हो मगर आज तक़ अलग नही हुए यही मेरे लिये काफ़ी है।मै बोला आज मां का सम्मान किया जा रहा ………मेरी बात बीच मे ही काटते उन्होने कहा सम्मान दिखा के नही किया जाता बेटा।इन सब बातो मे कुछ नही रखा है,बच्चे बड़े होते है तो उन्हे लगता है कि वे सब कुछ सीख गये और अब उन्हे बड़े-बुजुर्गो की सीख की ज़रूरत नही है और शायद यंही से टकराव शुरू होता है।मां-बाप के लिये बच्चे कितने भी बड़े हो जायें बच्चे ही रह्ते हैं,और वे उसी हिसाब से व्यवहार करते है जो बड़े हो चुके बच्चो को पसंद नही आता और जो बच्चे बहुत बड़े हो जाते है उन्हे फ़िर किसी की ज़रुरत नही होती।तुम लोग अभी भी शायद बच्चे हो इस्लिये मां की ज़रूरत है,जिस दिन बड़े हो जाओगे………………उस्के बाद मै सुन नही सका और उठ कर दुसरे कमरे मे चला गया।मुझे लगा कि मैं छोटा बच्चा ही सही मुझे नही करना मां का सम्मान सिर्फ़ एक दिन।मुझे नही मनाना सिर्फ़ एक दिन का मदर्स डे।मेरे लिये हर दिन मदर्स डे रहेगा।
मन खटटा हो चला था।रह-रह कर सवाल दिमाग मे आतंकवादियो के बमो की तरह धमाके कर रहे थे।मां! अच्छी! और वो भी गरीब होगी ! तभी सम्मान की पात्र होगी?नही तो नही!अमीर या ठीक-ठाक घर की मां जिसके बच्चे समाज मे सम्मानजनक स्थान हासिल कर चुके है,उन्की उपलब्धी का कोई मतलब नही है क्या?
फ़िर मां तो मां है! उसके कदमो मे स्वर्ग होता है।उसको अच्छी या बुरी कैसे परिभाषित किया जा सकता है।परिभाषित तो औलाद होती है कि फ़लाना देखो पढलिख कर अपने मां-बाप का नाम रौशन कर रहा है या फ़िर, देखो हरकत उन बच्चों की मां-बाप का नाम डुबा रहे है।मैं तो अपनी जानकारी मे औलादों के ही अच्छी या बुरी होने की बात सुनते आया था ।ये पहला मौका है जब कथित समाज सेवको?को अच्छी मां ढूंढते देख रहा हूं।
ये खयाल भी आया कि ये लोग क्यों नही अपनी ही मां का सम्मान कर देते।ये सवाल भी मुझे काफ़ी परेशान करता रहा। अपने मां-बाप का सम्मान करने मे क्या परेशानी हो सकती है।आखिर वे उस हैसियत के हुये जिसमे फ़ालतू समय और फ़ाल्तू बच रहे रुपयों से फ़ाल्तू टाईप की समाज सेवा कर पा रहे हैं,ये भी तो मां के लालन-पालन और आशीर्वाद से ही संभव हुआ है।इस मामले मे मैनें अपने कुछ साथियों से चर्चा कि तो उनका कहना साफ़ था कि मां के साथ रहते होंगे तभी तो ना सम्मान करेंगे?उन्होने कहा कि आजकल एक मुहल्ले मे मां-बाप और बेटे अलग-अलग घरों मे रह रहे हैं।एक साथी का तो लहजा काफ़ी सख्त था।जितनी गंदी गालियां वो बक़ सकता था उसने बकी और कहा कि ये सब अब रईसों के चोचले हैं। मां-बाप का सम्मान हम लोग यदी ढंग से कर पाते तो बुज़ुर्गो के लिये आश्रम खोलने की नौबत ही क्यों आती।
उसकी बाते सुनने के बाद मेरी हिम्मत नही हुई और किसी से इस मामले मे चर्चा करने की।मैने आज सुबह अपनी आई, यानी मां से कहा कि आज मदर्स डे है! आपको क्या गिफ़्ट चाहिये?वो हंस कर बोली और क्या गिफ़्ट चाहिये तुम तीनो भाई मेरे साथ रहते हो।मेरा इतना ख्याल रखते हो।ये ही मेरे लिये दुनिया का सबसे अच्छा गिफ़्ट है।बचपन से तुम तीनो आपस मे लड़ते-झगड़ते आ रहे हो मगर आज तक़ अलग नही हुए यही मेरे लिये काफ़ी है।मै बोला आज मां का सम्मान किया जा रहा ………मेरी बात बीच मे ही काटते उन्होने कहा सम्मान दिखा के नही किया जाता बेटा।इन सब बातो मे कुछ नही रखा है,बच्चे बड़े होते है तो उन्हे लगता है कि वे सब कुछ सीख गये और अब उन्हे बड़े-बुजुर्गो की सीख की ज़रूरत नही है और शायद यंही से टकराव शुरू होता है।मां-बाप के लिये बच्चे कितने भी बड़े हो जायें बच्चे ही रह्ते हैं,और वे उसी हिसाब से व्यवहार करते है जो बड़े हो चुके बच्चो को पसंद नही आता और जो बच्चे बहुत बड़े हो जाते है उन्हे फ़िर किसी की ज़रुरत नही होती।तुम लोग अभी भी शायद बच्चे हो इस्लिये मां की ज़रूरत है,जिस दिन बड़े हो जाओगे………………उस्के बाद मै सुन नही सका और उठ कर दुसरे कमरे मे चला गया।मुझे लगा कि मैं छोटा बच्चा ही सही मुझे नही करना मां का सम्मान सिर्फ़ एक दिन।मुझे नही मनाना सिर्फ़ एक दिन का मदर्स डे।मेरे लिये हर दिन मदर्स डे रहेगा।
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