
श्री लहरी की हालत देख कर लगता है अच्छा ही हुआ कि सुभाष बाबू इस देश वापस नही लौटे,वर्ना शायद आज़ादी पाने लेने वाले इस देश के ठेकेदार उनका हाल भी ऐसा ही कुछ कर देते। नेताजी के साथ आज़ादी की ज़ंग मे अपना सब कुछ न्योछावर कर देने वाले श्रीमोहन लहरी अपने बारे मे सिर्फ़ ये कहते हैं कि वे हिंदोस्तानी है। होशंगाबाद मे जन्मे लहरी जी को पांच भाषाओं का ज्ञान है।

नेताजी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले लहरी जी ने सोचा भी न होगा कि आज़ाद भारत मे उनसे और उन जैसे आज़ादी के अनेको दीवानों के साथ परायो जैसा सलूक होगा।लहरी जी ने आज़ाद हिंद फ़ौज़ मे भर्ती होने बाद अनेको मिशन को अंजाम दिया और देश-विदेश मे रह कर अपनी जंग जारी रखी।उनका विवाह सिंगापुर रेडियो मे कार्यरत फ़्लोरा फ़्रांसिस से हुआ था।बमबारी ,मे अपनी पत्नि फ़्लोरा और बिटिया की मौत के बाद लहरी जी सिंगापुर छोड़ कर रंगून चले गये और वंहा एक कर्नल के साथ मिलकर आज़ादी की लड़ाई की मशाल को जलाये रखा।

न सिर्फ़ नेताजी बल्कि आज़ादी के तमाम मतवालो की जान हथेली पर लेकर लड़ी गई आज़ादी की लड़ाई सफ़ल रही और जीत के जश्न मे डूबे भारतवासियो ने कुछ दीवानो को तो पहचाना मगर बहुत से लोगो को भुला दिया गया।लहरी जी भी उन बदनसीबो मे से एक हैं।उनकी किस्मत उतनी अच्छी नही थी कि उन्हे फ़्रीडम फ़ाईटर कोटे से पेट्रोल पंप या गैस एजेंसी मिल जाती।उन्हे तो पेंशन तक़ के लाले पड़े हुये है।
फ़िलहाल लहरी जी प्रदेश की भाजपा सरकार के बुलावे पर यंहा आने के बाद से बदहाली का जीवन व्यतीत कर रहे हैं।उनको चाय और भोजन छत्तीसगढ हाऊसिंग कार्पोरेशन की महिला कर्मी सोमबती के सहयोग से मिल जाता है।जिस हाल मे लहरी जी रह रहे हैं वो कतई भी आज़ादी के मतवाले की शान के अनुरूप नही है। हालांकि नेताजी सुभाष मंच के शैलेंद्र तिवारी और कांग्रेस नेता अरूण भद्रा ने अब लहरी जी की सेवा का जिम्मा ले लिया है,लेकिन ये अफ़्सोस की बात है सर्किट हाऊस और वी आई पी गेस्ट हाऊस मे मुफ़्त की राजषी सेवा का उपभोग करने वाले ट्टपूंजिये नेताओ को आज आज़ाद भारत मे सांस लेने का हक़ देने वाले को दो वक़्त की रोटी के लिये तरसना पड़ रहा है।(सभी फ़ोटो संतोष साहू से साभार)