गलती किसकी?बच्चे की?बाईक की?लाड-प्यार की?ज़िद की?भगवान की?तकदीर की?देखादेखी की?फैशन की?या फिर मां-बाप की?
ये सवाल अटपटा जरुर है मगर है बेहद जरुरी.खासकर उन परिजनो के लिये जिनके बच्चे बाईक चलाने की ज़िद करते है,उम्र ना होने पर भी,और जिनकी ज़िद पुरी हो जाती है,मां बाप के लाड प्यार के कारण.ऎसी ही ज़िद यंहा मामा मामी के घर रह कर पढने आये स्कूली छात्र अपूर्व ने.कक्षा 12 का छात्र था वो.अंबिकापुर का रहने वाला था उसे मां बाप ने बडी उम्मीद से अच्छी पढाई के लिये राजधानी भेजा था.वो ज़िद कर रहा था बाईक की और उसके पिता ने 15 दिन पहले 1 लाख 60 हज़ार रूपये मूल्य की शानदार बाईक खरीद के दी थी.पिता को क्या मालूम था ये उनका बच्चे को खुश करने के लिये दिया जाने वाला उपहार खुद उन्हे ज़िंदगी का भर का गम दे जायेगा.अभी पिछ्ले दिनो एक शाम अपूर्व बाइक पर सवार होकर निकला तो सही पर कभी न वापस आने के लिये.उसने सुरक्षा के लिये हेल्मेट भी नही पहन रखा था और उपर से ईयर फोन लगा कर बाईक चला रहा था.अचानक एक और बाईक से वो जा टकराया और सिर पर चोट आने के कारण असमय ही काल के गाल में समा गया.पिछे छोड गया वो बाईक और टूटे फुटे सपने जो उसे लेकर उसके मां बाप ने बुने थे.अब बताईये भला रोते बिलखते परिजनो की क्या गलती है?गलती किसकी है मेरी तो समझ से परे है.शायद इसिलिए मैने ये सवाल यंहा खडा किया है.आखिर बच्चे की हर ज़िद जो जायज ना हो पूरी करना जरूरी तो नही?आखिर उमर होने से पहले बाईक चलाना कोई बहादुरी तो नही?कभी कभी दिल कडा करके बच्चे को मना करना उसके पल दो पल के रोने धोने का कारण हो सकता है पर शायद वो ज़िंदगी भर के रोने धोने से ज्यादा बेहतर रहेगा.मेरे खयाल से बच्चो को उनकी उमर और सेहत के हिसाब से गाडियां देनी चाहिये,ना कि उनकी इच्छा और फैशन के मुताबिक.और सबसे बडी बात तो ये है कि यदि जरूरी ना हो तो उन्हे बाईक देनी ही नही चाहिये.अब इसके बाद भी ममता हिलोरे मारे,लाड प्यार उफान मारे तो क्या किया जा सकता है.आखिर मऱज़ी है आपकी क्योंकी बच्चा भी है आपका.
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Wednesday, July 25, 2012
Friday, August 20, 2010
सेलिब्रेशन का ये कौन सा तरीका है?
सेलिब्रेशन आजकल फ़ैशन के साथ-साथ स्टेटस सिंबल बन गया है।खासकर युवा पीढी तो सेलिब्रेशन कि दिवानी हो गई है।सेलिब्रेट करने का कोई मौका हाथ से नही जाने देती।ठीक है अच्छी बात है खूबसूरत पलों को यादगार बनाने के लिये जश्न कोई बुरी बात नही है,मगर जो जश्न ज़िंदगी भर के लिये ज़ख्म दे जाये उसे क्या कहें?जी हां मै सच कह रहा हूं।छत्तीसगढ भी विकास की दौड़ मे सरपट भाग रहा है और यंहा की युवा पीढी उससे भी तेज़।युवा वर्ग हर दिन-हर पल को यादगार बनाये रखना चाहता है और कभी-कभी उसकी ये दिवानगी उसके परिजनों के लिये ज़िंदगी भर का गम दे जाती है।चार दिन की छुट्टी के बाद जब रायपुर लौटा तो दूसरे दिन सुबह की अख़बार की एक खबर मुझे विचलित कर गई।जन्म दिवस सेलिब्रेट कर वापस लौट रहे तीन छात्रों की सड़क दुर्घटना मे मौत हो गई थी।सब पास के ज़िले के पालिटेक्निक कालेज के छात्र थे और हास्टल मे रह रहे थे।पंद्रह छात्रो की टोली एक छात्र राजेश का ब'ड्डे सेलिब्रेट करने शहर से बाहर ढाबे गये और आधी रात को वापस लौटते समय उनमे से तीन की मौत हो गई जिसमे ब'ड्डे बाय भी शामिल है।अब बताईये उनका ये सेलिब्रेशन उनके परिजनो को कितना भारी पड़ गया।क्या-क्या सपने संजो रखे होंगे घर वालों ने?अब उसका जब अगला ब'ड्डे आयेगा तब क्या बितेगी घर वालों पर?और ये सिर्फ़ एक साल की ही बात नही है,उसका ब'ड्डे हर साल आयेगा और तमाम उम्र उसके घर वाले उसे सेलिब्रेट करने की बजाये शायद रोते ही रहेंगे।ये पहली खबर नही है।इससे पहले भी मेरे सीनियर छात्र नेता और दबंग भाजपा नेता ने अपने पुत्र को ज्न्म दिन पर खो दिया था। वो भी हास्टल के दोस्तो के साथ अपना ब'ड्डे सेलिब्रेट करके लौट रहा था कि आधी रात को हाईवे पर दौड़ती मौत यानी ट्रक ने उसे अपने आगोश मे ले लिया था।पिछले साल ही एक पत्रकार साथी का पुत्र,फ़र्स्ट ईयर इंजीनियरिंग का छात्र अपने साथियों के साथ बड्डे सेलिब्रेट करने गया तो वापस आंसुओं का सैलाब लेकर लाश बन कर लौटा।ऐसे और भी उदाहरण है।मैं सेलिब्रेशन का विरोधी नही हूं और ना ही युवा पीढी की आज़ादी का!मगर मेरा सवाल ये है कि आज़ादी का मतलब उन्माद तो नही है?आज़ादी का मतलब गैर्ज़िम्मेदारी तो नही है?आज़ादी का मतलब विद्रोह तो नही है?आज़ादी का मतलब परंपराओं की धज्जियां उड़ाना तो नही है?सेलिब्रेशन का मतलब सिर्फ़ ढाबा पार्टी या दारू पार्टी तो नही है?पता नही मुझे ये हाई-स्पीड बाईक और कारें अचानक खराब लगने लगी है?मुझे बच्चों,युवाओं और छात्रों की पार्टियों से भी दहशत होने लगी है?आपको क्या लगता है बताईगे ज़रूर।
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