Showing posts with label save water holi hindu festival colour. Show all posts
Showing posts with label save water holi hindu festival colour. Show all posts

Thursday, March 5, 2009

दिवाली पर पटाखे मत फ़ोड़ो,होली पर रंग मत खेलो!तो क्या करें?वैलेंटाईन डे मनाये,न्यू ईयर मनाये?अपने त्योहार भूल जायें?

होली पर कहते है रंग मत खेलो पानी बचाओ।दिवाली पर कह्ते है कि पटाखे मत फ़ोड़ो प्रदूषण से बचाओ।तो क्या करे?वैलिंटाईन डे, मनायें,न्यू ईयर मनाये?समझ मे नही आता सारी सीख देशी त्योहारो के लिये,सारी छेडछाड़ देसी त्योहारो के साथ?ऐसा लगता है सोची-समझी साजिश के तहत हमारे देशी त्योहारो को धीरे-धीरे मारा जा रहा है?पतंग उड़ाना,लट्टू चलाना,बाटी खेलना तो भूल ही चुके हैं।वैसे भी इन त्योहारो पर सरकारी सखती का असर साफ़ दिखता है। होली पर पुलिस तंग करती है और शाम तक़ चलने वाले रंगो के त्योहार को दोपहर के पहले-पहले निपटा देती है।दिवाली पर भी समाज-सेवक लोगो की वज़ह से देर-रात तक़ पटाखे फ़ोड़ने पर पाबंदी लग गई है।

होली पर नया कन्सेप्ट लाये है समाज के ठेकेदार।सूखी होली या तिलक होली खेलकर रंग बचाने की बात कर रहे हैं।ठीक इस बात से किसी को भी ऐतराज़ नही होना चाहिये कि पानी बचाना चाहिये।लेकिन मेरा सवाल है कि क्या सिर्फ़ एक दिन,वो भी त्योहार के दिन पानी बचाने से जल-संकट हल हो जायेगा?क्या उन्हे सेठों और बड़े-बड़े लोगों के घरों की कारों को रोज़ धोने के लिये होली पर बहने वाले पानी से कई गुना ज्यादा खर्च होने वाले पानी की बर्बादी नज़र नही आती?क्या लाईन मे लग कर मुश्किल से पीने लायक पानी इकट्ठा करने वाली गरीब बस्तियो के संघर्ष के दिनों यानी गर्मियों मे बंगलो मे साब लोगो के पालतू कुत्तो तक़ रोज़ और कई बार तो दिन मे दो-दो बार नहाना नज़र नही आता?

क्या होली पर केवल कुछ घण्टे रंग नही खेलने से हम जल-संकट से बच जायेंगे? क्या होली से ही ये संकट उत्पन्न हुआ है?क्या शहरो के आस-पास उद्योगो द्वारा भूजल का अनाप-शनाप दोहन इसके लिये जिम्मेदार नही है?क्या उद्योगो को शहर से दूर नही लगाया जाना चाहिये?क्या दिवाली की रात फ़ोड़े जाने वाले पटाखों से,शहरो के आस-पास के उद्योगो द्वारा फ़ैलाये जाने वाले प्रदूषण से ज्यादा नुकसान होता है?क्या सार्वजनिक नल के लिये भी तरसने वाली गरीब बस्तियो के बगल की पाश कालोनी के बंगलों मे म्यूनिसिपल के नल कनेक्शन के साथ-साथ खुदा हुआ बोरिंग,जल के असमान वितरण की कहानी नही कहता?

मै गर्मियो मे अपने कुत्तो को रोज़ नहलाने वालों का,रोज़ अपनी मोटर कारें धुलवाने वालों का या नगर निगम और पर्सनल बोरिंग दोनो स्त्रोत के पानी का भरपूर दोहन करने वालो से न तो चिढता हूं और ना ही उनका विरोधी हूं।कभी ये सब हम भी किया करते थे।आज भी मेरी गाड़ी रोज़ धुलती है।कुत्ता पालना हमने बंद कर दिया वर्ना हमारा भी डागी रोज़ नहाता था।ऐसा मै इसलिये कह रहा हूं क्योंकि मै मानता हूं कि एक दिन होली पर रंग खेलने से ज्यादा पानी का नुकसान मै करते आया हूं।चूंकी मै हाईड्रो-जियोलाजिस्ट भी हूं इस्लिये इतना ज़रुर कह सकता हूं कि जल संकट से निपटने के लिये अपनी परंपरा,अपना त्योहार ही बलिदान करने से कुछ नही होगा।बहुत से शहरो मे,हमारे रायपुर मे भी आज तक़ नलो पर मीटर नही लगे है।पानी की भरपूर बरबादी होती है।टैंकरो मे पानी भरते समय ही इतना पानी एक दिन मे बह जाता है जितने मे शहर कई दिन तक़ होली खेल सकता है।

मेरा एक और सवाल है कि सारी रोक टोक हिंदू त्योहारो के लिये ही क्यों?होली पर हुड़दंग के नाम पर दोपहर बाद रंग खेलने पर पाबंदी लगा रहे हैं?तो तमाम विरोध और तमाशे के बावजूद वैलेंटाईन डे मनाने के लिये पुलिस सुरक्षा मुहैया करा रहे हैं?दिवाली पर रात दस बज़े के पटाखे फ़ोड़ो तो ज़ेल जाने की धमकी मिलती है तो न्यू ईयर पर तो पटाखे फ़ूटना ही आधी रात के बाद शुरू होते हैं?क्या तब प्रदुषण नही होता?जल संकट से बचने के लिये एक दिन का अभियान नही उसके असमान वितरण और उसके असामान्य दोहन पर भी रोक लगाने पर विचार करना होगा,न कि त्योहारो से छेडछाड करने की ज़रुरत है।