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Sunday, August 31, 2008

अब बताईए भला औरत की दुश्मन औरत नहीं तो कौन है?

अक्सर किसी महिला को प्रताड़ित करने या उसे जलाने का मामला बिना पुरूष के पूरा नहीं नहीं होता। लेकिन रायपुर में जो कुछ हुआ वो ये सोचने पर मजबूर कर गया कि महिलाओं पर अत्याचार या अन्याय के लिए दोषी पुरूष या खुद औरत। एक औरत को ज़िंदा जला दिया गया और जलाने वाली भी औरतें ही थी कोई मर्द नहीं।

राजधानी के संजय नगर की रजनी बाई (उम्र 28साल) पति बलराम देवांगन सरकारी अस्पताल में मौत से जूझ रही है। उसकी हालत बेहद गंभीर है। उसका पति बलराम कुछ समय से बेरोजगार घूम रहा था। रजनी ने अपने 3 बच्चों को पालने के लिए खुद काम करना शुरू कर दिया था। वो अपने पति की अलाली और घुमक्कड़पन से परेशान थी। तंग आकर उसने बलराम के खिलाफ थाने में मारपीट की शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने महिला की शिकायत पर उसके पति बलराम को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था। रात को रजनी को बुरी तरह जली हुई हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने पुलिस को महिला से बात करने अथवा बयान लेने की अनुमति नहीं दी। उसकी हालत में सुधार नहीं हुआ तो तहसीलदार की मौजूदगी में उसका मृत्यु पूर्व बयान दर्ज किया गया।

रजनी ने जो बयान दिया, वो हैरान कर देने वाला है। उसने अपनी 75 साल की बूढ़ी सास और 35 साल की विधवा ननद पर मिट्टी तेल छिड़कर ज़िन्दा जला देने का आरोप लगाया। पुलिस ने सास और ननद को दफा 307 और 34 के तहत गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया। जहाँ से उन्हें जेल भेज दिया गया। अब घर में 5 बच्चे ऐसे हो गए हैं जिनका भविष्य खतरे में पड़ गया है। हालाकि बलराम का भाई कन्हैया उसी मकान में रहता है, लेकिन बलराम जेल में उसकी पत्नी अस्पताल में, उसकी विधवा बहन और माँ जेल में और 2 भाँजे व 3 बच्चे घर में हैं।

इस पूरे प्रकरण पर गौर से नज़र डालें तो एक बात साफ नज़र आती है कि जलने-जलाने के मामले में दोनों ही पक्ष से महिला ही है। इसमें पुरूष कोई नहीं है। अब जली हुई बहू रजनी की बात का यकीन करें तो 75 साल की सास द्वारा मिट्टी तेल डालकर उसे ज़िन्दा जलाने की कोशिश को हैवानियत ही कहा जाएगा। और अगर 75 साल की सास की बात मानें तो खुद जलकर उस पर आरोप लगाने वाली बहू की करतूत को क्या कहा जा सकता है? वैसे आस-पड़ौस के लोगों के मुताबिक रजनी को उसकी सास और ननद ने नहीं जलाया, बल्कि उसने खुद को जलाया और जब बयान हुआ तो गुस्से में उसने सास और ननंद को फंसा दिया।

अब चाहे रजनी सच बोल रही हो या झूठ, फंसने वाली तीनों महिलाएँ ही है। रजनी ज़िन्दगी और मौत के बीच झूल रही है तो उसकी सास और ननद जेल में बंद हैं। रजनी बच जाती है तो भी सास और ननद सज़ा से नहीं बच सकते और अगर उसे कुछ हो जाता है तो सज़ा और बढ़ सकती है। ऐसे में उन 5 बच्चों का क्या दोष ? रजनी के 3 और उसकी ननद के 2 बच्चे अब बलराम के भाई कन्हैया के भरोसे में हैं, जो पहले ही अपने परिवार को बड़ी मुश्किल से पाल रहा है। रजनी का बड़ा बेटा मात्र 4 साल का है और 2 बच्चे बहुत छोटे हैं।
इस मामले में कहीं किसी पुरूष का नाम सामने नहीं आया। आग लगने की घटना के समय घर में तीनों महिलाएँ ही थी। अब चाहे आग सास और ननद ने लगाई हो या खुद बहू ने, दोषी उन तीनों महिलाओं में से ही है। जरा सा गुस्सा एक नहीं दो परिवार को तबाही के कगार पर ले गया है। इस मामले में आप ही बताईए भला औरत का दुश्मन औरत नहीं तो कौन है ?

3 comments:

सुजाता said...

इस मामले में आप ही बताईए भला औरत का दुश्मन औरत नहीं तो कौन है ?
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हाँ आपने सही कहा। औरत ही औरत की दुश्मन है।हमने मान लिया।आप ग्लानि मुक्त रहें।पुरुष की ओर से स्पष्टीकरण दे देकर स्वयम को हलकान न करें।
अंग्रेज़ों की फौज में जो भारतीय सिपाजी थे वे भी अपने ही भारतीय भाइयों पर गोली चलाते और डंडे बरसाते थे जिसका महज़् कारण अंग्रेज़ मालिक की कृपा पाना था।सो सरकारी नौकरी की गुलामी का लालच देकर फूट न डाली होती अंग्रेज़ों ने और बागियों को पीटने वाले भारतीयो नौकरों को ईनाम और उपधियाँ न मिलती होतीं तो शायद अंग्रेज़ों का राज करना ही सम्भव न होता।
पर यह गहरी बात है। आप इतना ही जन रखिये कि औरत औरत की दुश्मन है।और बार बार इसे पुष्ट भी कीजिये,उदाहरण ला लाकर ।
जहाँ 75 वर्ष की माँ और बहन एक पुरुष पर निर्भर हों और उसे भी उसकी पत्नी जेल भिजवा दे तो वे तो उस औरत की ही दुश्मन होंगी न जिसने उनका सहारा छीन लिया । वह जैस भी रहा हो अपनी पत्नी के साथ उन स्त्रियों का तो पालन कर्ता था न। वे आत्मनिर्भर होतीं तो यह स्थिति न आती ।
एक तय माइंड सेट से निकल कर सोचने की कोशिश करें ज़रा ,अन्यथा न लें।

सादर

Suresh Chandra Gupta said...

अनिल जी, अपराध में भले ही केवल स्त्री शामिल हो पर उस के मूल में पुरूष की ही गलती होती है. यह एक सोच है जो आज कल ब्लाग्स पर काफ़ी नजर आता है. बैसे जिस अपराध की बात आप कर रहे हैं वह किसी विशेष समय पर मौजूदा हालात से प्रभावित हो कर घटने वाले अपराधों में लगता है. इस से फायदा किसी का नहीं हुआ. न ही इस अपराध के लिए पूरी नारी जाति जिम्मेदार कही जा सकती है.

Anonymous said...

neelima-mujhekuchkehnahai.blogspot.com
ब्लॉग पर वो रंगों वाली लड़की पढी
हर रोज की तरह उस दिन भी उस लड़की ने बहुत से सपने देखे थे। कुछ सोती आंखों से तो कुछ जागती कल्पनाओं में। उसे कभी समझ नहीं आया कि उसके सपनों में रंग आधे-अधूरे क्यों हैं. ये पहली उससे कभी हल नहीं हुई। फिर एक दिन सफेद घोड़े पर बैठा एक राजकुमार आया। वो उसके जिंदा सपनों में रंग भरने लगा। अब वो सुबह उठती तो रंगों का दरिया उसके सामने होता। रातभर उसके सपने इन्द्रधनुष की तरह रंगों से जगमगाते रहते। लोग कहते उसकी मासूम हंसी में अब एक खनक घुल गई है।

.....और फिर एक दिन वो राजकुमार उससे बगैर कुछ कहे सुने उससे हमेशा के लिए बहुत दूर चला गया, बहुत दूर। तब से उसके सपनों के सारे रंग उड़ गए। अब बस बचा है तो एक रंग
उस ब्लॉग पर अनोनिमस कमेन्ट नही लेते है और अभी मेरा अकाउंट नही है इस लिए मजबूर होकर अपना कमेन्ट यहाँ दे रहा हूँ कि शायद neelima इसे पढ़ ले या कोई उनको बता दे वैसे इसके बारे में आप भी आगे लिख सकते है
आपकी कहानी अधूरी लगी क्योकि आजके इस नारीवादी समय में आपको कहानी के अंत में उस राजकुमार को कोसना का ऐसा सुनहरा मौका छोड़ना नही चाहिए था
उस राजकुमार के बहाने सारे पुरुषों को सदियों से जुल्म ढहने वाले अत्याचारी अपराधी नारियो का शोषण करने वाले विलेन के रूप में प्रतिबिंबित करते हुए यह भी सिद्ध करने का अवसर नही छोड़ना था कि पुरूष तो सदा से ही अत्याचारी भावनाशून्य पाषाण ह्रदय धोखेबाज होते है तथा सारी नारिया भोली संवेदनशील समर्पित मधुर वाणी से भरी निष्कपट होती है.
सारी नारियो को जाग्रत करना चाहिए था कि पुरूष नामक जानवर से हमेशा दूर रहो इसी में सारी नारियो का कल्याण होगा.
कृपया इसे डिलीट न करे.