Sunday, September 7, 2008

स्कूलों के लिए शिक्षक दिवस बड़ा या परीक्षा

स्कूलों के लिए शिक्षक दिवस बड़ा होता है या परीक्षा ? मेरा ये सवाल पूछना बहुत से लोगों को अटपटा लग रहा होगा। ये भी कोई पूछने की बात है शिक्षक दिवस ही बड़ा होता है, मगर रायपुर में ऐसा नहीं हुआ यहां की मिशनरी स्कूलों में शिक्षक दिवस मनाया ही नहीं गया। बल्कि उस दिन स्कूलों में परीक्षा ली गई और एक स्कूल तो शिक्षक दिवस मनाता ही नहीं।

मैं जात-पात पर भरोसा नहीं करता और न ही ऐसी बातों को हवा देना ज़रूरी समझता हूँ मगर शिक्षक दिवस पर रायपुर की कुछ स्कूलों में शिक्षकों का सम्मान न कर उनसे जब परीक्षा का काम दिया गया तो मेरा इस बात पर नाराज़ होना खुद मुझे जायज लग रहा है। और शायद इसीलिए जिस स्कूल में मैंने पढ़ाई उसकी इस हरकत पर मुझे बहुत गुस्सा आया। अकेला वो ही नहीं था ये हरकत करने वाला। शहर के सभी मिशनरी स्कूलों में शिक्षक दिवस का अता-पता नहीं था।

दरअसल सारा मामला कंधमाल उड़ीसा के चर्चों पर हुए हमलों से संबंधित है। इसका सबूत है कुछ दिनों पूर्व छत्तीसगढ़ की सारी ईसाई मिशनरी स्कूलों का बंद रखकर विरोध करना। उड़ीसा के चर्चों पर हुए हमलों के विरोध में छत्तीसगढ़ के स्कूलों का बंद होना समझ से परे था। खैर सब लोगों ने इसे महज विरोध का एक तरीका माना, लेकिन चंद दिनों के बाद ही उन स्कूलों में शिक्षक दिवस का न मनाया जाना और उन स्कूलों में उसी परीक्षा लिया जाना कहीं न कहीं मामले के संदिग्ध होने की चुगली करता है। इसके ठीक दूसरे दिन ननों के हमलों का विरोध करना लोगों का रायपुर का एक चर्च में इकट्ठा होना, विरोध के बजाय ईसाई समाज का शक्ति प्रदर्शन ही माना जाएगा।

उड़ीसा के चर्चों पर हमले हो रहे हैं, तो छत्तीसगढ़ के स्कूल बंद हो रहे हैं और शिक्षक दिवस मनाना छोड़ स्कूल में परीक्षा ले रहे हैं ये हाल है ईसाई मिशनरी स्कूलों का। और मान लो अगर रोम में कुछ गड़बड़ होती है तो पता नहीं ये लोग विरोध में क्या-क्या मनाना बंद कर देंगे। अब शिक्षक दिवस नहीं मनाने के पीछे परीक्षा लेने जैसे अधकचरा तर्क को कैसे सही माना जा सकता है? न केवल शैक्षणिक कैलेण्डर बल्कि सभी कैलेण्डरों में शिक्षक दिवस पर अवकाश तय होता है। और परीक्षाएं स्कूल प्रबंधन अपनी सुविधा से तय करते हैं इसलिए शिक्षक दिवस को छोड़ परीक्षाएं तय होती रही है। सालों-साल से ये परंपरा चली आई है, पर अचानक इस परंपरा का इस बार यूं टूट जाना वो भी पड़ोस के राज्य में हो रहे सांप्रदायिक हिंसा के बाद, एक खराब संकेत ही माना जा सकता है। वैसे भी ईसाई मिशनरी के स्कूल आए दिन कभी चूड़ियाँ न पहनने या बिन्दी न लगाने के नाम पर विवाद में आते रहे हैं। उनके खिलाफ इसलिए भी माहौल ख़राब रहता है और ऐसे में शिक्षक दिवस नहीं मनाना अवसरवादी और उन्मादी लोगों को मनचाहा मौका देने के समान है।

शिक्षक दिवस शिक्षकों के सम्मान का दिन होता है और इस दिन उनका सम्मान न कर उनसे काम लिया जाना, ईसाई मिशनरी के स्कूलों की सामंतवादी प्रवृत्ति का सबूत माना जा सकता है। बहरहाल ये तकदीर की बात है कि इस बात का पता फसादी लोगों को नहीं चल पाया और वे इस मौके का फायदा उठाने से चूक गए। लेकिन ऐसा करके उन स्कूलों ने उन लोगों की सहानुभूति भी खोना षुरू कर दिया है जो हमेशा से जात-पात के नाम पर राजनीति से दूर रहते आए हैं। ऐसी घटनाएँ ही धीरे-धीरे आक्रोश को जन्म देती है और आगे चलकर उसकी परिणीति खतरनाक हो सकती है।
एक और स्कूल है जिसकी शाखाएँ सारे देश में हैं। यहाँ तो शिक्षक दिवस मनाया ही नहीं जाता। उनके लिए शिक्षक दिवस से बड़ा उनके चेयरमेन का जन्मदिन होता है। उसी दिन वे बच्चों से जबरिया चेयरमेन के लिए ग्रीटिंग कार्ड मंगवाते हैं और उसे चेयरमेन को भेज देते हैं। अब बताईए जिस देश में रहते हों उसी देश के तीज-त्यौहारों को न मानना उस देश के रहने वालों को नाराज़ करना नहीं है तो क्या है ? बहुत से लोग मेरी इस बात से सहमत होंगे और बहुत से असहमत। सभी का सहमत होना ज़रूरी भी नहीं है। असहमति भी सुधार के लिए ज़रूरी होती है लेकिन वो तथ्यपरक हो तो बेहतर रहता है। सीधे-सीधे एक लेख के आधार पर किसी को किसी विचारधारा विशेष का ठहरा देना शायद जायज नहीं होता। कहने का तात्पर्य ये है कि मैं ईसाई विरोधी या घोर हिन्दूवादी या साम्प्रदायिक विचारों वाला नहीं हूँ। लेकिन स्कूलों में जिस तरह शिक्षक दिवस को दरकिनार किया उसका विरोध करना मेरे लिए ज़रूरी था। आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

13 comments:

राज भाटिय़ा said...

भारत मे यह सब मुमकिन हे, क्यो कि इस देश मे सब को अपनी अपनी पडी हे, देश की नही, ओर सभी अपने बच्चो को ऎसे स्कुलो मे पढा कर अपने को ओरो से ऊंचा समझते हे, तो ऎसे हालात एक दिन तो होने ही थे.
धन्यवाद

संगीता पुरी said...

जिस देश में रहते हों उसी देश के तीज-त्यौहारों को न मानना उस देश के रहने वालों को नाराज़ करना नहीं है तो क्या है ? बिल्कुल सही कहा। मैं भी ईसाई विरोधी या घोर हिन्दूवादी या साम्प्रदायिक विचारों वाली नहीं हूँ। लेकिन स्कूलों में जिस तरह शिक्षक दिवस को दरकिनार किया गया, उसका विरोध करना हमारे सबके लिए जरूरी है, क्यूंकि शिक्षक दिवस राष्ट्रीय त्यौहार है, इसमें धर्म संप्रदाय की कोई बात है ही नहीं।

ताऊ रामपुरिया said...

अनिल जी आपकी बात से मैं सहमत तो हूँ ! पर मेरे मन में कुछ सवाल भी हैं !क्या कोई मुझे बताएगा की ये मिसनरी स्कुल यहाँ क्यूं पनप रहे है ? कौन है जो इनको बुला कर लाया ? इनका तो मतलब साफ़ है की इन्होने अपने धर्म के प्रचार प्रसार का माध्यम , इन स्कुलो को बना रखा है ! पर हम भी शायद
कही ना कही दोषी तो है ! हम क्यो अपने बच्चो को इन्ही स्कुलो में पढाना चाहते है ? ये सब समस्याए ख़त्म हो सकती हैं ! पर हमें कुछ करना पडेगा !
और मुझे लगता है की समय आता जा रहा है ! आपका इस विषय में लिखना भी इसी दिशा में एक कदम है ! शुभकामनाएं !

Shastri said...

बहुत सशक्त एवं सटीक विश्लेषण!!

राज भाटिया जी ने सही कहा है कि "भारत मे यह सब मुमकिन हे, क्यो कि इस देश मे सब को अपनी अपनी पडी हे, देश की नही, ओर सभी अपने बच्चो को ऎसे स्कुलो मे पढा कर अपने को ओरो से ऊंचा समझते हे, तो ऎसे हालात एक दिन तो होने ही थे."



-- शास्त्री जे सी फिलिप

-- हिन्दी चिट्ठाकारी के विकास के लिये जरूरी है कि हम सब अपनी टिप्पणियों से एक दूसरे को प्रोत्साहित करें

vipinkizindagi said...

raj ji sahi kah rahe hai....
post achchi hai....

उमेश कुमार said...

पुसदकर जी अब संस्कारो की बात ही बेमानी सी लगती है।लोग पहले बच्चो को संस्कार देने के लिए जतन करते थे।गुरू जी और शिक्षक ही सही माएने मे बिद्यार्थी के लिए शिक्षा के पर्याय होते थे। बाद मे आध्यापक हुए जो केवल अध्यापन तक अपनी जिम्मेदारी मान बैठे उसके बाद कांनवेन्ट कल्चर आया जंहा छात्र उपभोक्ता हुए और टीचर बिकाउ माल।बाजारवाद के इस युग मे किसे पडी है की वे देश के महान शिक्षक आदरणीय सर्वपल्ली राधाकृष्णन को जाने या बच्चो को बताएं। लोग मानते है की इनको जानने से रोटी नही मिलेगी लेकिन मेरा मानना है की वे लोगो को मलाई का हकदार बना सकते है अगर "जी के" मे शिक्षक दिवस के बारे मे पूछा जाए जिसका उत्तर तो वही होगा जिससे हम कोई सरोकार नही चाहते।

उदय said...

मिसनरी स्कूल, अस्पताल, चर्च,इत्यादि स्थापित करने के पीछे जो मकसद था वो आज सफल हो रहा है, वो होशियार आदमी थे जो 100 साल - 50 साल आगे की सोचकर रणनीति बना कर काम करते थे, आज के आजाद भारत के बुद्धिमानों की तरह नही जिनकी रणनीति / योजना एक-दो साल में ही धराशायी हो जाती है।
अनिल जी, आपने बहुत अच्छा मुद्दा उठाया है यह जाति-धर्म से ओत-प्रोत नही है वरन राष्ट्र से जुडा है, इस दिशा में अवश्य ही सार्थक प्रयास होने चाहिये।
www.netajee.com

Udan Tashtari said...

पर्व और परीक्षा-दोनों ही आवश्यक हैं और संतुलन की आवश्यक्ता है. आपने बहुत अच्छा विश्लेषण किया. आभार.

सचिन मिश्रा said...

Bahut accha likha hai.

Gyandutt Pandey said...

यह अच्छा नहीं है। सब स्ट्रीम के लोग उत्कृष्ट काम करें और उत्कृष्टता में प्रतिस्पर्धा करें न कि मानसिक संकुचन में।

seema gupta said...

लेकिन स्कूलों में जिस तरह शिक्षक दिवस को दरकिनार किया उसका विरोध करना मेरे लिए ज़रूरी था।
"very intersting artical to read , and we respect your thoughts you have expressed through this articl and above said few words"

Regards

दीपक said...

अनिल जी ,

भारत स्वतंत्र है इसलिये किसी पर यह दबाव बनाया जाना कि उसे शिक्षक दिवस मनाना ही है यह औचित जान पडता है हम पिछले साठ साल से आजादी का जश्न मना रहे है,आप ही कहे कितनी आस्था रह गयी है लोगो कि इस पर्वपर इसिलिये मुझे यह सोच ठीक नही लगती रहा सवाल मिशनरी स्कुलो का तो इनकी पढाई और व्यस्था हमसे अच्छी है इसिलिये ये ठीके है बात योग्यता की है इसी मिशनरी ने अजीत जोगी जैसे नेता पैदा किये है ,हमने ऐसी प्रतिभा को सहेजना भी जरुरी नही समझा था ॥इसिलिये यहा सवाल है शिक्षा पद्धत्ती का ना कि शिक्षक दिवस मनाने का ॥कुछ वक्त यहा बर्बाद करे
http://deepakviplaw.blogspot.com/2008/03/blog-post_21.html

अनुराग said...

ज्ञान जी ने पते की बात कही है ..वैसे कोई भी इन्सान अगर धर्म को शिक्षा से जोड़े वो ग़लत है चाहे वे कोई भी हो.....