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Friday, November 28, 2008

क्‍या बिना लात खाए हम देश भक्त नहीं हो सकते

मुंबई में आतंकवादियों ने जिस तरह धमाके किए उससे सारे देश में ऐसा लगता है अचानक देश भक्ति का तूफान आ गया है। सुबह से मोबाईल पर देशभक्ति से भरे एसएमएस आने का सिलसिला चल पड़ा है। कोई भगवा पट्टी धारण करने की बात कह रहा है, तो कोई आतंकवादियों को भगवान से मिलाने की बात कह रहा है। किसी को अफ़जल गुरू याद आ रहा है, तो किसी को राज ठाकरे की खामोशी पर ऐतराज है। ऐसे एसएमएस एक नहीं ढेरों आए हैं। एसएमएस वही भेजने वाले अलग-अलग।

सुबह-सुबह आए एक एसएमएस ने मुझे हैरान कर दिया। एसएमएस भेजने वाला निशाचर है और अधिकांश एसएमएस को रात को करता है और उसके एसएमएस रात के लायक ही होते हैं। सुबह-सुबह मिले एसएमएस को पढ़ा तो लगा मस्‍तराम का वो शिष्‍य अचानक देश भक्‍त हो गया है। हमेशा अश्‍लील और द्विअर्थी एसएमएस भेजने वाले उस दुर्जन के एसएमएस में गंदगी नहीं कूट-कूटकर देशभक्ति भरी हुई थी।

अकेला वो ही नहीं था और भी कई लोग उसी केटेगरी के थे जिनके एसएमएस आज बदले-बदले से नज़र आए। जिधर गया और जिससे मिला बस एक ही चर्चा। आतंकवादियों से तो निपटना ही होगा। बहुत हो गया सहते-सहते। बर्दाश्‍त की भी हद होती है। हम क्‍या..........हैं। सीधे पाकिस्‍तान पर हमला कर देना चाहिए। न रहेगा बांस न बजेगी बांसूरी। साला हिन्‍दू होना पाप हो गया है। हिन्‍दुओं को गाजर-मूली समझ लिए हैं। जो मर्जी हमें पीटकर चला जाता है। आखिर कब तक चलेगा ये बम-धमाकों का सिलसिला।

हमेशा धंधे का रोना रोने वाले व्‍यापारी दोस्‍तों से लेकर पढ़े-लिखे संवेदनशील डॉक्‍टर दोस्‍तों और कथित रूप से समाज सुधार का ठेका लेने वाले पत्रकार साथी, सभी एक सुर अलापते नज़र आए। प्रेस क्‍लब परिसर में एक फव्‍वारा है। उसमें हम लोगों ने कुछ मछलियां पाली हैं। मैंने उसका गंदा हो चुका पानी बदलने के आदेश दे दिए थे, जिस पर अमल करते समय कुछ छोटे-छोटे मछली के बच्‍चे मर गए थे। आज क्‍लब पहुंचते ही कुछ सदस्‍यों ने क्‍लब के स्टॉफ की लापरवाही से हुई मछलियों की मौत पर नाराजगी जाहिर की और जैसे ही मैंने उनसे कहा कि मुंबई में इतने लोग मर गए हैं उसकी कोई चिंता नहीं, मछलियों के मरने पर रो रहे हो। बस, फिर क्‍या था सारा माहौल देशभक्ति से लबालब हो गया। कुछ तो ऐसा लगा कि सीधे पाकिस्‍तान जाकर हमला कर देंगे। आतंक के खिलाफ इतने कड़े तेवर मैं पहली बार देख रहा था।

वहां से निकलकर कुछ दोस्‍तों से मिलने गया। सबके दफ्तरों में टीवी चल रहा था और चर्चा में था आतंकवाद। आज जैसी देशभक्ति की बयार बह रही है उससे लगता है कि हमसे ज्‍़यादा राष्‍ट्रभक्‍त सारी दुनिया में कोई दूसरा नहीं हो सकता।

मैं दफ्तर आ गया और वहां भी वही माहौल नज़र आया। अपने कमरे में बैठकर खामोशी से विचार करने लगा, तो एक बात साफ समझ में आई कि हम सब लातों के भूत हैं। बातों से हमारी अकल ठिकाने नहीं आती। आतंकवादियों ने जिस तरह हमारे घर में घुसकर हमें पीटा है उससे ज्‍यादा शर्मनाक क्‍या हो सकता है और उनकी पिटाई से अलगाव वादियों के खिलाफ नफरत तो बढ़ी ज़रूर साथ ही बढ़ी देशभक्ति की भावना। मगर ये भावना कब तक कायम रहेगी इसकी गारंटी मेरे पास नहीं है। धीरे-धीरे, जैसे-जैसे माहौल शांत होता जाएगा, शायद देशभक्ति का ऊफान भी ठंडा पड़ता जाएगा। हम शायद आदि हो चुके हैं इन सब बातों के। फिर कभी धमाके होंगे और फिर आएगा तूफान देशभक्ति का। फिर कोई हमें लात मारेगा फिर हम नींद से जागेंगे, फिर जागेगी देशभक्ति की भावना, फिर चिल्‍लाएंगे सारे जहां से अच्‍छा हिन्‍दोस्‍तां हमारा। लेकिन ऐसा लगता है इस देश का भला लात खाने के बाद आने वाले देशभक्ति के तूफान से नहीं होने वाला। इसके भले के लिए तो देशभक्ति की सुनामी चाहिए जो बहाकर ले जाए आतंकवाद को। जाहिर है सुनामी लात खाने से नहीं उससे भी ज्‍यादा मार खाने से आएगी। जब हर कोई आतंकवाद की आग में खुद को जलता महसूस करेगा, शायद तब।

31 comments:

COMMON MAN said...

सही लिख रहे हैं, हमारी स्मरण शक्ति बहुत कमजोर है, इतिहास से कभी हमने सबक नहीं लिया, क्षमा शोभती उस भुजंग को जिस के पास गरल हो. केंचुओं से डसने की उम्मीद.

राजन् said...

वोट की राजनीति ने आतंकी हमलों से निपटने की दृढ इच्छाशक्ति खत्म कर दी है, खुफिया तंत्र की नाकामयाबी की वजह भी सत्ता है, संकीर्ण हितों- क्षेत्र, भाषा, धर्म, जाति, लिंग- से ऊपर उठ कर सोचने वाले नेता का अभाव तो समाज को ही झेलना होगा, मुंबई हमलों के बारे में सुनने के बाद मैं काफ़ी बेचैन हूँ. सवाल है ख़ुफ़िया तंत्र की नाकामी का या कुछ और. इसे मैं सिर्फ़ राजनीतिक नाकामी कहूंगा जिसकी वजह से भारत में इतनी बड़ी आतंकवादी घटना हुई.

राजन् said...

वोट की राजनीति ने आतंकी हमलों से निपटने की दृढ इच्छाशक्ति खत्म कर दी है, खुफिया तंत्र की नाकामयाबी की वजह भी सत्ता है, संकीर्ण हितों- क्षेत्र, भाषा, धर्म, जाति, लिंग- से ऊपर उठ कर सोचने वाले नेता का अभाव तो समाज को ही झेलना होगा, मुंबई हमलों के बारे में सुनने के बाद मैं काफ़ी बेचैन हूँ. सवाल है ख़ुफ़िया तंत्र की नाकामी का या कुछ और. इसे मैं सिर्फ़ राजनीतिक नाकामी कहूंगा जिसकी वजह से भारत में इतनी बड़ी आतंकवादी घटना हुई.

कुश said...

आपने बिल्कुल ठीक कहा.. मगर ठंडे पड़े तवे पर रोटी भी तो नही सकती.. आग लगती है तभी रोटी सिंकती है..

दीपक said...

सबसे पहली बात तो ना ही पाटिल मे दम है ना ही सरदार मे और ना ही सरकार मे !! आलोक जी सही कहते है ये सिर्फ़ बोरा भर-भर के भाषण करना जानते है इनकी तुष्टीकरण की निती ने ना जाने कितनो की जान ले ली !!

ये सिर्फ़ ईटली चालीसा ही पढेंगे और इन सांसदो को तो देखिये टिकिट की लाबिंग मे अव्वल नंबर रहेंगे मगर अब जुबान तक नही खुल रही है !!

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बिल्कुल सही लिखा है आपने ..अभी देख का खूब खून उबल रहा है सबका पर कुछ दिन सब अपने में मस्त हो जायेंगे ..फ़िर से कुछ होगा इस तरह का तो फ़िर से यही सब दोहराया जाएगा ..

poemsnpuja said...

shayad aap sach kah rahe hain, hamein aadat ho gayi hai. magar aap ye to dekhiye ki aaj kitne log vakai kuch karne ke bare me soch rahe hain.aur vote dene jaise chote magar mahatvapoorna kadam ke baare me bhi baat kar rahe hain. agar jitni baatein ho rahi hain uska 25pratishat bhi amal me laaya gaya to kaafi bada badlav hoga.

poemsnpuja said...

shayad aap sach kah rahe hain, hamein aadat ho gayi hai. magar aap ye to dekhiye ki aaj kitne log vakai kuch karne ke bare me soch rahe hain.aur vote dene jaise chote magar mahatvapoorna kadam ke baare me bhi baat kar rahe hain. agar jitni baatein ho rahi hain uska 25pratishat bhi amal me laaya gaya to kaafi bada badlav hoga.

ab inconvenienti said...

तीन दिन में ये खून का उबाल ठंडा पड़ जाएगा, जनता की याददाश्त बहुत कमज़ोर होती है. २५०० सालों से हम लातें ही तो खा रहे हैं, कुछ याद रखा? महीने भर के अन्दर फ़िर देखना..........

Gyan Dutt Pandey said...

आतंक के खिलाफ इन्कलाब आज आना था। अब तक नहीं आया। शायद कल आये!
इन्तजार किया जाये।

परमजीत बाली said...

आपने बिल्कुल ठीक कहा..

सागर नाहर said...

दो दिन, सर बस दो दिन। देख लेना हम ब्लॉगर ही दो दिन बाद इस विषय को भूल जायेंगे और फिर से किसी मजाकिया पोस्ट पर खी खी करती टिप्पणीयाँ देते नजर आयेंगे।

ताऊ रामपुरिया said...

भाई ये जज्बा कायम रहे तो कोई बात बने वरना तो इतिहास गवाह है ! क्या कहे ? अब तक थक चुके हैं ! उन शहीदों को श्रद्धांजलि !

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

कोई घटना हमें आंदोलित नहीं कर प् रही है क्योंकि हमारा खून ठंडा हो गया है . हम किसी चमत्कार की आशा कर रहे है .जो इस कलयुग मे सम्भव नहीं .मैं भी दोषी हूँ क्योकि जबान तो चलती है लेकिन कुछ करने की हिम्मत नहीं . क्योकि मेरी प्रथमिकता देश नहीं परिवार है और कोई माई का लाल बाते कुछ भी करे लेकिन है वह मेरी ही श्रेणी का

डॉ .अनुराग said...

इन बलिदान ओर इस हादसे को ख़बर की तरह न भूले ......यही चेतावनी है हम सभी के लिए...इस देश की बढती आर्थिक ओर दूसरी ताकत से कई लोग परेशान थे...हमें सावधानी ओर हिम्मत से एकजुट रहकर उस देश ओर वहां के लोगो की चालो में नही आना होगा जो ख़ुद बरबाद ओर बदहाल है ....कडा ओर माकूल जवाब देने की जरुरत है अब पानी सर से ऊपर हो गया है

Vidhu said...

किंतु लात खाकर भी देशभक्त बन ही जायेंगे,येभी तो जरूरी नही ..

Mired Mirage said...

सही कह रहे हैं ।
घुघूती बासूती

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

यह शोक का दिन नहीं,
यह आक्रोश का दिन भी नहीं है।
यह युद्ध का आरंभ है,
भारत और भारत-वासियों के विरुद्ध
हमला हुआ है।
समूचा भारत और भारत-वासी
हमलावरों के विरुद्ध
युद्ध पर हैं।
तब तक युद्ध पर हैं,
जब तक आतंकवाद के विरुद्ध
हासिल नहीं कर ली जाती
अंतिम विजय ।
जब युद्ध होता है
तब ड्यूटी पर होता है
पूरा देश ।
ड्यूटी में होता है
न कोई शोक और
न ही कोई हर्ष।
बस होता है अहसास
अपने कर्तव्य का।
यह कोई भावनात्मक बात नहीं है,
वास्तविकता है।
देश का एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री,
एक कवि, एक चित्रकार,
एक संवेदनशील व्यक्तित्व
विश्वनाथ प्रताप सिंह चला गया
लेकिन कहीं कोई शोक नही,
हम नहीं मना सकते शोक
कोई भी शोक
हम युद्ध पर हैं,
हम ड्यूटी पर हैं।
युद्ध में कोई हिन्दू नहीं है,
कोई मुसलमान नहीं है,
कोई मराठी, राजस्थानी,
बिहारी, तमिल या तेलुगू नहीं है।
हमारे अंदर बसे इन सभी
सज्जनों/दुर्जनों को
कत्ल कर दिया गया है।
हमें वक्त नहीं है
शोक का।
हम सिर्फ भारतीय हैं, और
युद्ध के मोर्चे पर हैं
तब तक हैं जब तक
विजय प्राप्त नहीं कर लेते
आतंकवाद पर।
एक बार जीत लें, युद्ध
विजय प्राप्त कर लें
शत्रु पर।
फिर देखेंगे
कौन बचा है? और
खेत रहा है कौन ?
कौन कौन इस बीच
कभी न आने के लिए चला गया
जीवन यात्रा छोड़ कर।
हम तभी याद करेंगे
हमारे शहीदों को,
हम तभी याद करेंगे
अपने बिछुड़ों को।
तभी मना लेंगे हम शोक,
एक साथ
विजय की खुशी के साथ।
याद रहे एक भी आंसू
छलके नहीं आँख से, तब तक
जब तक जारी है युद्ध।
आंसू जो गिरा एक भी, तो
शत्रु समझेगा, कमजोर हैं हम।
इसे कविता न समझें
यह कविता नहीं,
बयान है युद्ध की घोषणा का
युद्ध में कविता नहीं होती।
चिपकाया जाए इसे
हर चौराहा, नुक्कड़ पर
मोहल्ला और हर खंबे पर
हर ब्लाग पर
हर एक ब्लाग पर।
- कविता वाचक्नवी
साभार इस कविता को इस निवेदन के साथ कि मान्धाता सिंह के इन विचारों को आप भी अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचकर ब्लॉग की एकता को देश की एकता बना दे.

राज भाटिय़ा said...

आधे तो कल तक ही भुल जायेगे, आप ने बिलकुल सही फ़रमाया, बाकी दो चार दिन मै...
धन्यवाद

cmpershad said...

परंतु उस आग की लपटों को हमारे नेता इस देश के अल्पसंख्यको पर जुल्म का इल्ज़ाम धरेंगे





खरी-खरी said...

अनिल जी, मुश्किल ये है कि हमारे पास विकल्प नही है। कांग्रेस को गाली देकर हटाये तो भाजपा है। भाजपा को कन्धार वाला मसला निपटाते हम देख चुके है। लेफ्ट तो चीन की पार्टी है। उनसे उम्मीद बेकार है। बसपा और समाजवादी तो आतंकियो के हमदर्द की पार्टी है। बस इतने मे ही से किसी को चुनना हमारी मजबूरी है। कोई नया दिखता नही है। सभ्य लोग तो राजनीति मे आयेंगे नही। इसलिये आगे भी ऐसा होता रहेगा।


आज हम करीब सौ लोगो ने छत मे खडे होकर पूरा जोर लगाकर प्रार्थना की शहीदो के लिये। और फिर एक मिनट तक पाटिल जैसे नपुंसको को जमकर कोसा। उम्मीद है हमारी प्रार्थना काम आयेगी और आह भी।

cmpershad said...

लगता है आतंकवाद और भ्रष्टाचार का चोली-दामन का साथ है वर्ना इतना उत्पात अकेले आतंकवादी नहीं मचा सकते।

NIRBHAY said...

Main aap ko aaj tak SMS ke mudde par bar bar likhne ka karan samajh nahi paya. aise SMS computer se bheje jate hain, jaise SBI, ICICIbank etc. ke SMS yeh sabhi computer se bheje jate hai.

Abhi jo aatanki hamala hua hai yeh BHARATVARSH par hua hai, INTERNATIONAL terrorist ne INDIA ko soft target paya hai. Iska vastvik roop International Muslim Jehad hai, Marne wale mostly Hindu, Muslman, Jews, USA, AUSTRALIA, BRITAIN, ISRAIEL and other countries ke nagrik hain, TARGET mumbai nahi tha, agar aisa hota to poore mumbai me 1993 jaise TERRORIST attack hote. ek aatankwadi toh TAJ hotel me 10 months se trainee Sheff tha, itna aslaha poore 10 mahino se dheere dheere wahan pahuncha hai, fir Nariman house me bhi terrorist 6-7 months se rah rahe the, jama kar rahe the aslaha.
Rahi baat RAJ THAKRE ki, unka subject maharashtra me marathi logon ki roji roti ka hai. Itne salo se Bihar & UP me state development ke nam par har sal 20,000 crore ya usse jyada ka fund milta hai, aazadi ke bad ke 61 sal me mile 20,000.00*61 = 12,20,000 crore se jyada paise se Bihar & UP ne kya development kiya, bijali,sadak, pani ki moolbhoot suvidha nahi de paye yeh log.

Deshbhakti ki bhavna? Wah! bhai Wah!
poora desh corruption se aakanth dooba hai aur fir yeh bat!

DOSTON SE VAFA KI UMMIDEN,
KIS JAMANE KE AADMI TOOM HO.

is pure case me ISRAEL ne INDIAN govt. ko diya bamboo kabile tarif hai, pure matter ko dhyan se dekho Nariman House me hee Indian Air Force ke Helicopter se commandos utare gaye, shayad yeh ISRAIEL se aaye commandos hee the.

ISRAIEL KI DESHBAKTI KI BHAWANA SE HUME SIKHNA CHAHIYE.

is pure case me Pakistan me situated militant tranee ke thikane se janme terrorist ka hath hai, Jo Pakistan ki Abhi democratic sarkar par sawaliya nishan lagana chahten hai & India Pakistan ka war chahten hai jis se fir wahan Military ka RAJ chahten hai.

YEH INTERNATIONAL TERRORISM KA HISSA HAI, NOTHING ELSE.

BBC bhi pahle isko halke se le raha tha bad me uska tone badal gaya.

SMS ki baat karna mischievies hai aur samajh se pare hare hai.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

गर्व है अपने सैनिकों पर जिन्होंने इतना धैर्य और परिपक्वता दिखाकर शान्ति से इतनी बड़ी कारवाई को अंजाम दिया.

seema gupta said...

" सच कहा बेहद शर्मनाक और दर्दनाक है.., सभी शहीदों को श्रधान्जली

डा. अमर कुमार said...


अनिल जी, मैं आपके ज़ज़्बे और प्रश्न से सहमत हूँ ।
पर ? पर.. यह भी गौर करें कि क्या यह कम है कि,
इस घड़ी में हम एकजुट हैं, इस लात से मिले चोट की बिलबिलाहट सारे देश में फैली हुयी है ?
मैं तो इसी को गनीमत मान रहा हूँ ।
कुछेक दिनों के लिये आपस की छीछालेदर लोग भूले हुये हैं, यही संतोष है ।
एक गर्व है, कि हम कितने सक्षम हैं, यह साबित कर दिया है ।
किन्तु एक शर्म भी है, हमारे नेतृत्व में ऎसी दृढ़ इच्छाशक्ति क्यों नहीं स्थिर रहती ?
भारतीय ज़ाँबाजों का लोहा पूरा विश्व मानता है,
फिर भी असहाय बने रहना और अपनी अस्मिता को बलत्कृत होते देखते रहने की क्या मज़बूरी है ?
यदि एकजुट हो ताल ठोंक लें, तो स्थायी शान्ति हासिल करना कठिन नहीं.. समरथ को नहिं दोष गोसाँई !
अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रियाओं को बाद में देखा जायेगा ।
पर.. पर, मुझे पूर्ण विश्वास है,
कि लात की इस चोट को कुछ दिनों तक सहला कर, यह देश यह नेतृत्व भूल जाने वाला है !
कटु सत्य यही है

Suresh Chiplunkar said...

भारत के हि्न्दुओं की देशभक्ति "बासी कढ़ी का उबाल" है या पेशाब का झाग, जैसे कारगिल के समय झाग उठा था, वैसा ही अभी उठा है… जब कारगिल का ही एक जवान महीनों तक अस्पताल में एड़ियां रगड़ रहा था तब किसी को देशभक्ति याद नहीं आई थी… लद्दाख में जवानों के जूतों की खरीदी की फ़ाइल को लटकाने वाला अफ़सर आज भी मजे कर रहा है, पेट्रोल पंप पाने के लिये जवान के बूढ़े माँ-बाप आज भी चक्कर खा रहे हैं, किस देशभक्ति की बात कर रहे हो भाऊ, इस देश की जनता जूते खाते-खाते उसकी आदी हो चुकी है…

मिहिरभोज said...

शर्मनाक,दर्दनाक,शहीदों को नमन,नहीं छोङेगै,चाय की सिप के साथ कितने लोगों को ये बातें करते सुना पिछले दो दिनों मैं....

पंगेबाज said...

हमरी देश भक्ती शाम को दो पैग अंदर पहुचने के बाद जागती है और सुबह नींद खुलने के साथ हम अपने काम पर वापस होते है. तब ऐसे विचारो की हम हसी उडाते खुद को सेकुलर साबित करने मे बिताते है

Arvind Mishra said...

पुसदकर जी ऐसी घटनाओं के बाद देश भक्ति का ऐसा सैलाब सहज और स्वाभाविक है -यह शायद वयंग का विषय नही होना चाहिए .आपने यह सजेस्ट भी नही किया की किया क्या जाना चाहिए ? मेरी राय में सबसे उचित यह होगा की बिना और समय गवाए पाक अधिकृत काश्मीर में हमें फुल फोर्स के साथ सैन्य कार्यवाही कर आतंकी प्रशिक्षण केन्द्रों को नष्ट कर देना चाहिए !

प्रतीक माहेश्वरी said...

अरे साहब..यह आप क्या कह रहे हैं ?
यह सब बातें भूलने की नहीं होती..मैं तो कहता हूँ जो यह बात भूल गया वह जवान से बुजुर्ग बन गया...याददाश्त अच्छी नहीं है उनकी...
यह समय अब कुछ करने का है...जब लोहा गरम हो तभी हथौड़ा मार देना चाहिए...सुना था किसी से...ज़रूरत है बड़े लोगों के मार्गदर्शन की..
मैंने भी इसी वाकये को ले कर एक पोस्ट लिखा है..पढ़ें और बताइए की आगे क्या कर सकते हैं...
धन्यवाद...शुभकामनाएं..