Wednesday, December 3, 2008

आतंकवाद और पाकिस्‍तान के खिलाफ ऊफनते गुस्‍से को सफलता से नेताओं की तरफ मोड़ कर ले गया मीडिया।

इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया के रोल पर देश में बहस का सिलसिला शुरू हो गया है। आलोचना तो उसकी आए दिन होते रहती थी लेकिन मुंबई बम काण्‍ड में उसका रोल बेहद खराब रहा। उसकी विश्‍वसनीयता एक बार फिर दांव पर नज़र आ रही है। जिस तरीके से मीडिया ने आतंकवादी हमले के बाद देश में ऊफनते गुस्‍से के सैलाब को पाकिस्‍तान और आतंकवादियों की तरफ से मोड़कर नेताओं की ओर किया है उससे तो ये साफ जाहिर होता है कि कहीं न कहीं दाल में कुछ काला ज़रूर है।

बहुत गौर से देखा जाए तो मीडिया ने आतंकवादी हमले के बाद से जो लाइव कव्‍हरेज दिखाने की होड़ मचाई थी उससे देश में फैल रही देशभक्ति की लहर को आतंकवाद और पाकिस्‍तान के खिलाफ गुस्‍से के सैलाब में बदल दिया था। माहौल धीरे-धीरे गरमा रहा था और इस बात का एहसास शायद मीडिया को हो गया था। 2 दिनों तक आतंकवादी हमले और आतंकवादियों के खिलाफ आग उगलने वाला इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया अचानक मुड़ा और उसने निशाने पर लिया देश के नेताओं को। अन्‍टसंट सवालों से उत्‍तेजित होकर गिनती के 3-4 अति उत्‍साही मूर्ख टाइप के नेताओं ने अनाप-शनॉप बक दिया और इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया ने उस बात को पकड़कर सारे नेताओं पर निशाना साध लिया।

उसके बाद से मीडिया ने देश के नेताओं के खिलाफ मुहिम छेड़ दी। मुख्‍तार अब्‍बास नकवी, आर.आर. पाटिल, अच्‍युतानंद और राम माधव के मूर्खतापूर्ण बयानों को हथियार बनाकर उन्‍हीं के खिलाफ इस्‍तेमाल किया गया। ये बात नहीं है कि उन्‍होंने गलत बयान नहीं दिया। उनके बयान आपत्तिजनक तो थे, लेकिन उससे ज्‍यादा आपत्तिजनक मीडिया का उनके बयानों को लेकर अपनाया रवैय्या था। बार-बार सिर्फ उन्‍हीं बयानों को प्रसारित कर उनके खिलाफ उपजे आक्रोश को हवा दी गई और उससे ऊफनते गुस्‍से के गुबार को देश के सारे नेताओं के खिलाफ मोड़ दिया गया।

अब टीवी देखो तो ऐसा लगता है कि आतंकवादी हमला शायद हमारे देश के नेताओं ने ही किया हो। कहीं आतंकवादियों का जिक्र नहीं कहीं पाकिस्‍तान का जिक्र नहीं। बस नेताओं को कोसा जा रहा है जैसे सारी गलती सिर्फ नेताओं की हो और जिम्‍मेदार सिर्फ नेता ही हों।

दरअसल मीडिया ने अचानक नेताओं को निशाना नहीं बनाया है। ये सब कुछ सोची-समझी रणनीति के तहत हो रहा है। लगातार मंदी और बढ़ती महंगाई की मार से बुरी तरह टूट चुके बाज़ार से मिलने वाले मोटे विज्ञापनों का हिस्‍सा काफी छोटा हो चुका है और विज्ञापनों से होने वाली कमाई में हो रही कमी की भरपाई के लिए मीडिया को आने वाले दिनों में लगने वाले विज्ञापनों के महाकुंभ लोकसभा चुनाव से काफी उम्‍मीद है। हालाकि उसका पेट 5 राज्‍यों में हो रहे चुनाव में मिलने वाले विज्ञापनों से नहीं भरा सो उसने देश के सारे नेताओं को टार्गेट करके एक बेहद संवेदनशील मामले से उपजी नफरत को दुश्‍मनों की ओर से मोड़कर अपने ही लोगों की तरफ कर दिया। सारे नेताओं को निशाना बनाने का मकसद साफ नज़र आ रहा है। आने वाले लोकसभा चुनाव में सभी पार्टियों को अपनी ताकत का एहसास इलेक्‍ट्रॉनिक अभी से करा रहा है और कैसे जनमत तैयार करते हैं इसका नमूना पेश कर रहा है। विज्ञापनों से होने वाली मोटी कमाई पर उसकी नज़र ज़रूर है लेकिन इस लालच की चक्‍की में उसने देशभक्ति और देशद्रोहियों के खिलाफ उपजे घृणा को अपने फायदे के लिए पीसकर रख दिया है।

17 comments:

sareetha said...

यहां कौन किस को चूना लगा रहा है , पता लगाना बडा ही मुश्किल है । हर बार नूरा कुश्ती के पात्र बदल जाते हैं । दर्शक जनता सारे तमाशे में जोश खरोश से कभी तमाशबीन ,तो कभी हिस्सेदार बन जाती है । बहुत देर बाद जान पाती है ये भोली जनता कि उसे तो ठ्गों के गिरोह ने मिलकर चूना लगाया है ।
"हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजामे गुलिस्तां क्या होगा ।"

राज भाटिय़ा said...

आप ने बिलकुल सही लिखा है, ओर ऎसा होना नही चाहिये था, गलती तो हे हमरे नेताओ की ही ओर यह सब को पता भी है... अब जनता को सोचना चाहिये...
धन्यवाद एक अच्छी ओर उचित जानकरी देने के लिये

savita verma said...

sahi bat hai.i hate politics vali jamat british hukumat ki bhi aise hi pairokar thi.

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

रस्सी का साँप और साँप की रस्सी बनाने की कला सिर्फ मिडिया को ही आता है . लेकिन हर क.kisi ...... का दिन होता है अभी तो मिडिया के ही दिन चल रहे है

आदर्श राठौर said...

मात्र ऐसा नहीं है कि शेयरों की मंदी के चलते मीडिया ने ऐसा किया है। आप खुद पत्रकार हैं, आप में भी कहीं न कहीं रोष होगा नेताओं के प्रति। और ये वाकई मौका था इन नेताओं को गाली देने का। और इस मौके को मीडिया ने अच्छी तरह से भुनाया है

अशोक मधुप said...

बहुत अच्छा लेख, नेताआें की आैर ही ध्यान नही मोड़ा, इस प्रकरण की लाइव कवरेज दिखाकर अपनी पिटी भद्द से भी जनता का ध्यान हटाया है । अन्यथा लाइन कवरेज के नाम पर सैनी की दिखाई गई तैयारी से आंतकवादियों को लोगो केा अपना शिकार बनाने में सरलता मिली है

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

चाहे कुछ भी हो मीडिया के मालिक भी पूंजी की उसी प्रवृत्ति के हैं, जो अपना नफा-नुकसान सब से पहले और ऊपर रखती है।

NIRBHAY said...

yeh kahani agar india ke electronic media ki hai toh, fir pakistani media ki bhi suno, unka kahana hai ki yeh hamala, America,Hindu aur Yehudiyon ki saajish hai. yeh AATANKI hamla inka khud ka sponsored hai. electronic media ne live actions dikhaye hain, kitne terrorist mare gaye and live hai yeh toh Media ko indian govt. batayegi hi nahi, yeh national security ka mamla hai. Media ke pas hardly 20% jankari hee hogi jo unhe local police walon se ya press release se mili hai aur live action ke telecast se. bache 80% ka gape bharne ko media ko mouka mil gaya hai, is bar live jalte hue scenes, bombing sara desh dekha hai. Public ka pressure to banega hee Netaon par. Pachison news channel aa gaye hain, sabhi kisi na kisi party ke sponsor hai. Lekin sabhi ka soor attack ke samay ek hi tha. trasta ho gaye hain politicians ke vadon se koi kahta hai 100 deen me garibi hata denge, koi kahta hai aatankwadi ki delhi me muthbhedh FARZI thi, sabhi zhudhe vade karte rahten hai. Jo paye jaisa bak raha hai, indian citizen ko bahoot sasta kar diya hai. direction less thinking, confusing statement, kab tak chalega. kabhi mouka mila toh to falana party secular hai, falana fasist, fir result aaye toh wohi fasist party inko secular lagti hai. kitna bewquf banaenge, har elections me citizens ruling party ke against hee vote kar rahi, kab tak? iska end kahan hoga?

media bhi toh apni vishwasniyata kho chuka hai, "INDIA SHINING" rat raha tha result KANDA nikala. Narendra Modi haar raha hai aur result nikla woh jit gaya.

INDIAN PUBLIC LIVE COVERAGE KE STYA KO DEKH KAR AGITATE HUE HAI.
har aadmi channel badal badal kar news dekha hai.

Ab media post martem kar ke roji roti chalayegi hi, jo ki public man ne wali nahi. Ab use concrete result chahiye, jinda rahne ki gurantee milti hai usi ke baad public ko roji roti ka khayal aayega.

ताऊ रामपुरिया said...

अनिलजी , बात आपने बिल्कुल मौके की और सही उठाई है ! कुछ तो मंदी की मार है और कुछ मीडिया की आदत है ! मैं बात शुरू करना चाहूँगा इंदिरा जी की हत्या के समय की ! उस वक्त इलेक्ट्रोनिक मीडिया पूरा सरकार के आधीन था और जिस तरह से लगातार कैमरे को इंदिराजी की लाश पर फोकस करके रखा गया वो दृश्य आज भी कोई भुला नही होगा ! और उस वक्त के कत्ले आम में दूरदर्शन पर भी इल्जाम लगा था की लोगो की भावनाओं को भड़काया गया !

खैर आज निजी हाथो में मीडिया को अपनी कमाई के अलावा नंबर वन भी रहने की होड़ होती है और सबके पास राजदीप सरदेसाई तो होते नही हैं ! आजकल के जो टी.वी. पत्रकार हैं उनको मैं ग़लत नही कह रहा , पर अनुभव समय से ही आता है , जो उनको नही है ! सो वो कुछ की कुछ रिपोर्टिंग कर जाते हैं और मेरे समझ से लाईव टेलेकास्ट को स्टूडियो से एडिटर भी संभाल नही पाता होगा ! शायद समय ही नही मिलता होगा !

पहले ही दिन एक नामी चैनल ( नाम चाहे तो उस ब्लॉग की लिंक देदुन्गा कल ) की रिपोर्टर ने लाईव रिपोर्टिंग करते हुए कहा -- एंकाउन्टर विशेषग्य करकरे का आज ख़ुद एंकाउन्टर हो गया !

सो इलेक्ट्रानिक मिडीया की भी मजबूरी और स्वार्थ दोनों ही दिखाई देते हैं मुझे तो !

अब आप ही बताइये ! मुझे ऐसा लगता है की ना तो मिडीया भला है और नेताओं की तो बात ही करना बेकार है ! वैसे आपने बड़ी सामयीक और मौके के हिसाब का सवाल उठाया है !

रामराम !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

सही कहा अनिल जी. दूकान चलनी चाहिए. बीस रुपये मिलें तो ये पूरा मुल्क बेच दें!

अनुनाद सिंह said...

जबरजस्त निचोड़ निकाला है आपने ! साधुवाद।

मेडिया देश को सही रास्ते से भटकाने की पूरी कोशिश कर रहा है।

कुश said...

बिल्कुल सही दिशा में ध्यान दिलाया आपने.. यही तो हो रहा है

अनुनाद सिंह said...

आपने मिडिया के खेल का बहुत ही सही चित्र प्रस्तुत किया है।

मेडिया भारत को सही रास्ते पर पहुँचने से रोकने के लिये तरह-तरह के जुगाड़ कर रहा है।

Gyan Dutt Pandey said...

आपकी पोस्ट ने नया एंगल सुझाया। अब तक तो हम समझते थे कि यह मीडिया भोंपू है। पर यह तो शातिर शकुनि लगता है!

BrijmohanShrivastava said...

सर मुझे ज़्यादा तो पता नहीं है मगर कुछ होता है -क्या पता शायद टी आर पी या ऐसा ही कुछ कहते है

Pt. D.K.Sharma "Vatsa" said...

वर्तमान परिवेश में, सामाजिक सरोकारों से मीडिया का ताल्लुक नहीं रह गया है और इनका एकमात्र मकसद पैसा पीटना हो गया है। ये टीआरपी के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। आलम ये हो गया है कि अगर कोई जनमत सर्वेक्षण करवाया जाए तो पता चलेगा कि नेताओं के बाद लोग सबसे ज्यादा लानत-मलानत मीडिया की ही कर रहे हैं। लोगों की निगाह में मीडिया नेताओं से बडा नहीं तों उनके बाद सबसे बडा खलनायक तो बन ही गया है. बहरहाल , मीडिया भी एक उद्योग है और उद्योगों को चलाने के अपने कायदे-कानून होते हैं। पूंजी के भूमंडलीकरण और नई आर्थिक नीतियों की वजह से जो माहौल बना है और इसी के साथ-साथ मीडिया का जो तेजी से विस्तार हुआ है उसने मीडिया के एक नए रूप को सबके सामने रख दिया है। इसमें प्रिंट एवं इलैक्ट्रानिक दोनों माध्यम शामिल हैं मगर न्यूज चैनलों का प्रभाव-क्षेत्र सबसे व्यापक है। इसीलिए न्यूज चैनलों पर लोगों की निगाहें सबसे ज्यादा जाती हैं और वे ही निंदा का शिकार भी होते हैं। मुनाफावाद का सबसे अधिक नग्न रूप इसी माध्यम में नजर आ रहा है।

COMMON MAN said...

uchit likha hai aapne, electronic media me bhedchaal ki pratha hai jiske kaaran vah ek hi or dekhti hai, baaki pahlu chhoot jaate hain, jaise ki nirbhay ji ne bhi likha hai ki pakistani media kya dusprachar kar rahi hai uski taraf abhi tak bhartiya media ne dhyan nahi diya hai.