Sunday, February 15, 2009

कोई चाचा का स्कूल दिखा रहा है तो कोई नाना की यूनिवर्सिटी,इतनी पब्लिसिटी तो आतंकियो को करोड़ो खर्च करके भी नही मिलती

फ़ुर्सत से खबर देखने के लिये टीवी आन किया तो देखा एक भतीजा पहली बार कैमरे पर लश्कर के स्कूल के बारे मे बताने का दावा कर रहा था।चैनल बदला तो नातिन तालिबान नाना की यूनीवर्सिटी का प्रोस्पेक्टस बता रही थी।बात सिर्फ़ प्रोस्पेक्टस तक़ सीमित नही थी,बाकायदा सर्टिफ़िकेट,डिग्री और पीएचडी तक के बारे मे बताया जा रहा था।ऐसा लग रहा था कि बच्चों के लिए एड्मिशन के पहले स्पेशल प्रोग्राम दिखाया जा रहा हैं।न्युज़ चैनल वाले जिस तरीके से चाचा का स्कूल या नाना की यूनिवर्सिटी दिखा रहे थे उतनी पब्लिसिटी तो आतंकियो को करोड़ो खर्च करके भी नही मिलती।

अब बोलना तो नही चाहिए मगर बोले बिना रहा भी नही जाता।लेकिन वाह रे इलेक्ट्रानिक मीडिया,ज़रा तो असर होता,जब सरकार सर पर सवार होती है तो अभिव्यक़्ति की स्वतंत्रता याद आ जाती है और जब सरकार शांत हो जाती है तो फ़िर सब पुराने ढर्रे पर चलने लगता है।न्यूज चैनल पर जिस तरीके से आतंकी ट्रेनिंग दिखाई गई उसे देख कर ये लगने लगा कि ये उस स्कूल या कालेज के लिये स्टुडेंट्स को प्रमोट करने वाला प्रोग्राम है।

एक दूसरे से आगे निकल जाने की होड़ मे ये राष्ट्र हित से भी आगे निकल जाते हैं और जब बात बिगड़ती है तो फ़िर अभिव्यक़्ति का हित दिखने लगता है।पता नही ये होड़ कंहा ले जाएगी न्यूज़ चैनलो को।एक ने लाया लश्कर का आतंक तो दूसरा ले आया तालिबान का तमाशा।चौंका देने वाली बात तो ये कि दोनो ही दावा कर रहे थे कि उनका कैमरा पहली बार वंहा पहुंचा।हां एक बात तो माननी पडेगी चैनल वालो की उन्हे कुछ और पता हो न हो दूसरे चैनल पर रात को क्या आने वाला है,पता रहता है।

मै हिम्मत करके दो न्यूज़ चैनल तक़ बदल पाया। हो सकता है तीसरे,चौथे,पांचवे…………………… और पचासवे चैनल पर भी ऐसा ही कुछ आ रहा हो।मै उन तमाम खोजी पत्रकारो से माफ़ी मांग लेता हूं कि मै उनके चैनल की ज्यादा तारीफ़ नही कर पाया। अपने देश मे क्या हो रहा है ये तो पता नही मगर पाकिस्तान मे क्या हो रहा है ये हमारे भाई लोग बड़ी आसानी से पता भी लगा लेते है और फ़टाक से ब्रेक भी कर देते हैं।

और सबसे हैरान करने वाली बात तो ये है कि अपनी न्यूज़ के एक्स्क्लूसिव होने के दावे के साथ-साथ वो पाकिस्तानी टीवी की सौजन्यता भी बता देते हैं।फ़ाईल शाट्स को एक्स्क्लूसिव बताने के दावे पर भी लगता है कि यू-ट्यूब से लिये जाने वाले शाट्स पर हुई बह्स की तरह बहस हो ही जानी चाहिये न्यूज़ बेचने वालो मे।आखिर ये धंधे का सवाल जो है भले गंदा क्यों न हो,मामला एक नंबर का गंदा होने का भी तो है।

17 comments:

संकेत पाठक... said...

सब टी.आर.पी. का खेल है भाई, कुछ किया नही जा सकता. आगे आगे देखते रहिये होता है क्या..

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

वाह रे इलेक्ट्रानिक मीडिया,ये धंधे का सवाल जो है

राज भाटिय़ा said...

यह सब पेसे का खेल है, ओर यह टी वी चेनल है किस के? कभी किसी ने सोचा है?? पता तो हमे भी नही, लेकिन होगे किसी नेता के ही.
धन्यवाद

AKSHAT VICHAR said...

वाह रे इलेक्ट्रानिक मीडिया,ज़रा तो असर होता,जब सरकार सर पर सवार होती है तो अभिव्यक़्ति की स्वतंत्रता याद आ जाती है और जब सरकार शांत हो जाती है तो फ़िर सब पुराने ढर्रे पर चलने लगता है
hamesha news banate ho kbhi to news dikhao yar.

ज्ञानदत्त । GD Pandey said...

हो सकता है तीसरे,चौथे,पांचवे…………………… और पचासवे चैनल पर भी ऐसा ही कुछ आ रहा हो।
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बाप रे! चैनल ही चैनल। इत्ते चैनल हो गये हैं तो खबर का मलीदा ही निकाल देते होंगे!

हरि said...

गंदा है पर धंधा है।

COMMON MAN said...

धंधा है पर गंदा है.

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

वाकई में सिर्फ धंधे का ही सवाल है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर ये लोग शायद नैत्तिकता एवं राष्ट्रहित जैसे मूल्यों का परित्याग ही कर बैठे हैं.
अगर कुछ बचा है तो सिर्फ ओच्छी पत्रकारिता.....

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बेईमान व्यक्ति अनीति से कोई भी धंधा करता है तो ऐसा ही होता है. ऐसे लोग अध्यापक बनें तो शिक्षण को भी कलंकित करते हैं.

P.N. Subramanian said...

इन चेनलों के स्वामित्व का अध्ययन किया जावे तो समझ में आ जावेगा बहुत कुछ, जैसा राज जी ने कहा. बड़ी शर्मनाक स्थिति बन गई है और कोई नियंत्रण भी नहीं है.बहुत ही सुंदर आँखें फाड़ने वाला आलेख है. साधुवाद.

डॉ .अनुराग said...

शाम को शाहरुख़ खान की सर्जरी राष्ट्रीय चिंता का विषय थी

गौतम राजरिशी said...

काश कि ये बातें वहाँ तक पहुँचे और हाँ ब्लौग वाला खिताब पर ढ़ेरों बधाई

सतीश सक्सेना said...

बहुत ठीक लिखा है अपने, बहुत समय से न्यूज़ देखना ही बंद कर दी है !
शुभकामनायें !

अजित वडनेरकर said...

बहुत अच्छा लिखा आपने। टीवी मीडिया में ज्यादा दिमाग लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
ज्यादा कुछ कहा न जाएगा...कुछ अच्छे लोग भी हैं वहां, वे बुरा मान जाएंगे...पर वे कुछ करते क्यों नहीं ?

राधिका बुधकर said...

ये इलेक्ट्रोनिक मिडिया ख़ुद ही नही जानता की वह दिखा क्या रहा हैं,सिर्फ़ TRP का खेल हैं . दुःख की बात यह हैं की जिस साधन से देश को सर्वाधिक लाभ हो सकता था,वही इलेक्ट्रोनिक मिडिया सर्वाधिक गिर रहा हैं ,आप विश्वास नही करेंगे ,मैंने महीनो से न्यूज़ देखना बंद कर दिया हैं ,सारी वही उटपटांग खबरे ,अब मैं न्यूज़ देखती हूँ तो सिर्फ़ हेडलाइंस ,या आवाज जैसे बिजनेस चेनल .बाकि पेपर पढ़ लिया ,

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

टीवी समाचार के लिए खोल लें तो लगता है हम पर बलात्कार हो रहा है।

अल्पना वर्मा said...

bahut sahi pakdaa hai aapne...

bahut badiya observation..