इस ब्लॉग पर आने के लिए शुक्रिया, कृपया कमेण्ट्स कर मुझे मेरी गलतियां सुधारने का मौका दें

Wednesday, February 25, 2009

क्या बेच रहे हो?अनचाहे गर्भ से मुक्ति की गारंटी!क्या सिखा रहे हो?उन्मुक्त यौनाचार!

पेश है एक माईक्रो पोस्ट्।हालांकी इस पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है पर बेशर्मी की हद पार कर चुके व्यापार जगत से ज्यादा गुस्सा देश को दिशा देने का दावा करने वाले न्यूज़ चैनल और अख़बारो मे इस विज्ञापन को देख कर आया।क्या दिखा रहे हैं ये लोग अनचाहे गर्भ से मुक्ति दिलाने वाली गोलियो का विज्ञापन?मै अभी प्रेग्नेन्ट नही होना चाहती हूं की पंच लाईन के साथ।कल रात हमसे भूल हुई?गोली खाईये और भूल से छूटकारा।और ऐसी गोलिया है तो डर किस बात का करिये भूल और अनचाहे गर्भ से मुक्ति पाने,वो भी बिना गर्भपात के झंझट का उपाय है गोली।क्या बेच रहे हो?अनचाहे गर्भ से मुक्ति की गारंटी!क्या सिखा रहे हो?उन्मुक्त यौनाचार!क्या हमे कभी आईना देखने पर शर्म आयेगी?आज से 14-15 साल पहले एक महिला महाविद्यालय के रास्ते पर गर्भपात के विज्ञापन के खिलाफ़ मैने अख़बार मे अपने काल्म मे लिख मारा था तो हंगामा हो गया था,और रातो-रात अस्पताल वालो ने उस विज्ञापन को हट्वा दिया था।अब सब कुछ बदल गया है?हम एड्वांस और प्रोग्रेसिव हो गये है शायद?अब दूरदर्शन पर इनकी खुशी का राज़ डिलक्स निरोध का सरकारी विज्ञापन शुरू होते ही टी वी बंद करने के दिन नही रहे।अब आप देखिये खुशी से कल रात भूल करने और प्रेग्नेन्ट नही होने के नुस्खे।पता नही क्या-क्या बेचेंगे हम?

22 comments:

बी एस पाबला said...

एक माइक्रो टिप्पणी:
क्या किसी धर्माचार्य या राजनेता ने ऐसे उत्पादों पर बंदिश की बात की है, पोप को छोड़कर?

राज भाटिय़ा said...

अनिल जी अगर किसी की बिटिया रानी अपने बाप से या मा से पुछ ले कि कल रात कोन सी भूल की जो यह गोली खानी पडेगी तो.....
अब यहा किस किस को रोये, मेरे पास कुछ पत्रिकाये हिन्दी मै आती थी ( भारत से ) ओर उन के हर दस्वे पेज पर यही कुछ लिखा होता था, मेरे बच्चे हिन्दी पढ लेते है, लेकिन शुकर उन्होने इन पर्तिकाओ को नही पढा, ओर फ़िर टी वी पर जब पुरा परिवार यह सब देखेगा तो...
आज चरित्र की बात करना गवांर कहलाना है, जितना बेशर्म उतना ही माड्रन....
धन्यवाद एक खुब सुरत लेख के लिये

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

विज्ञापन का स्वरूप ही बहुत भोंड़ा है। बहुत लोग इस पर जो कहना चाहते थे उसे आप ने स्वर दे दिया है।

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

सरकार भी चरित्र पतन को बढावा दे रही है . अगर इतना प्रचार चरित्र निर्माण पर दिया जाए तो इन सब भोडी चीजो से मुक्ति मिल जायेगी .

cg4bhadas.com said...

ऐसे विज्ञापन से उन्मुक्त यौनाचार को बढ़वा मिल रहा है एक ऑर तो सरकार गर्भ जाँच प्रतिबन्धित करती है ओए दूसरी ओर खुले बाजार में ये सब उपलब्ध करा रही है

Dr. Smt. ajit gupta said...

क्‍या सिखा रहे हैं? उन्मुक्‍त यौनाचार? आपके इस प्रश्‍न में कई प्रश्‍न और कई उत्तर हैं। सारी दुनिया भोगवादी समाज के निर्माण में लग गयी है। एक तरफ महिला को स्‍वतंत्र किया जा रहा है उसके काम स्‍वरूप को बढ़ावा दिया जा रहा है दूसरी तरफ रात-दिन मिडिया अश्‍लीलता परोस रहा है। बेचारा पुरुष बेहाल है। परिणाम है स्त्रियों से लेकर नन्‍हीं बालिकाओं तक का बलात्‍कार। मीडिया को व्‍यापार चाहिए उसकी सामाजिक जिम्‍मेदारी कुछ नहीं है। यह देश केवल सरकारों के बदौलत नहीं चल सकता, इसके लिए जागरूक समाज की आवश्‍यकता होती है। आपने ऐसा विषय उठाया इसके लिए शुभकामनाएं।

कुश said...

आपके विचार अपनी जगह सही है.. मगर यदि किसी पति पत्नी से ऐसा हुआ हो तो.. उसे उन्मुक्त यौनाचार नही कहा जाएगा.. और रही बात इन विग्यापनो की तो इन विगयपानो के आने से पहले ही जनसंख्या में हम रिकॉर्ड बना चुके थे.. मुझे नही पता ये सही है या नही.. लेकिन इसे पूरी तरह ग़लत कहना भी ठीक नही होगा..

डॉ .अनुराग said...

आदरणीय anil जी शायद विज्ञापन के तरीके से आप इत्तेफाक न रखे ...पर यकीन मानिये इस पेशे से जुड़े होने के कारण ये मै कह सकता हूँ..की इस pil की भी अपनी jarurat है ...हर दवा के अपने उपयोग है ओर उसके दुरूपयोग करने वाले लोग भी है पर प्राथमिकता शायद उपयोग को दी जानी चाहिए . लोग फंसिद्रिल खांसी की दवाई को नशे की तरह इस्तेमाल करते है ,ऐसे ही अनेस्थेसिया की एक ड्रग का बड़ी बड़ी पार्टियों में गलत इस्तेमाल हो रहा है .....मजदूर बेचारे हरे पत्ते की गोलिया खाकर सोते है....हाँ इतना ध्यान रखा जाये की .एक तय उम्र से पहले किसी व्यक्ति को खरीदने का अधिकार न हो .ओर chinhit kendro पर iski बिक्री हो

ज्ञानदत्त । GD Pandey said...

ओह, जटिल है कमेण्ट करना। भोंडेपन की सीमा में जाये बिना कैसे शिक्षित किया जाये जनता को इस बारे में - आइडिया नहीं।

परमजीत बाली said...

इस प्रकार के विज्ञापनों का असर बहुत दूरगामी होने वाला है।आने वाले समय में इस का प्रयोग बड़ों की बजाय छोटे अधिक करेगें।

cg4bhadas.com said...

छत्‍तीसगढ के विचार मंच में आपक स्‍वागत, है अगर आपके कोई भी खबर या जानकारी है जिसका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सम्बन्ध छत्तीसगढ से है तो बस कह दीजिये हमें इंतजार है आपके सूचना या समाचारों का घन्यवाद

Science Bloggers Association said...

इस विज्ञापन के कुछ पाजिटिव तथ्य भी हैं, हमें उनके बारे में भी सोचना चाहिए।

अनिल कान्त : said...

जहाँ इस तरह की दावा के सही लोगों को फायदे हैं ...वही इसका दुरुपयोग भी खूब होना तय है ...जिस तरह आजकल की पीड़ी इस बात से डरती थी कि कहीं अनचाहा गर्भ न ठहर जाए ...इसलिए गलत कदम उठाने से डर लगता रहा ...पर अब उन्हें ऐसा कुछ करने में न ही डर लगेगा न सोचना पड़ेगा ...हाँ लेकिन ये भी सच है कि सही लोगों को इसके फायदे भी होंगे .....लेकिन जिस तरह से इसका प्रचार प्रसार किया जा रहा है वो सोचनीय है

रंजना said...

इस विषय ने इसी तरह से इतना व्यथित किया है कि कुछ दिनों पूर्व मैंने भी इसपर एक पोस्ट डाली थी....

वस्तुतः सही गलत,भोंडापन शालीनता,करणीय अकरणीय इत्यादि के बीच कोई ठोस दीवार नहीं होती...आजकल तो लोग इसकी परिभाषा और सीमाओं को अपनी सुविधानुसार तय करते हैं.

भ्रूण हत्या/गर्भपात को रोकने में जो वरदान स्वरुप है,उसीका उपयोग लोग व्यभिचार के लिए करने लगें तो क्या कहा जा सकता है...नैतिकता की चिंता कितने लोग करना पसंद करते हैं. लेकिन एक तरह से देखा जाय तो यह दवा सही इस माने में है कि ,पहले जो अनैतिक संबंधों से उत्पन्न नवजात अबोध शिशु का निर्ममता पूर्वक वध कर दिया जाता था, अब कम से कुछ जाने तो बचेंगी.

और जहाँ तक विज्ञापन और मिडिया का प्रश्न है,उन्हें अपने कर्तब्यबोध का स्मरण रह कहाँ गया है.

सुजाता said...

अनिल जी ,

आपको ऐसा लगा तो शायद सही ही लगा होगा,लेकिन इस पोस्ट मे एक स्त्री के नज़रिए की कमी है।

दर असल बाज़ार ने जो जो उत्पाद बनाएँ हैं उनमे स्त्री के लिए सबसे उपयोगी गर्भनिरोधक हैं।स्त्री को अपनी अस्मिता और पहचान बनाने मे सबसे ज़्यादा उसके शरीर की यह रहस्यमय परिस्थितियाँ सब्से बड़ी बाधक साबित होतीं हैं कि वह जान ही नही पाती कि कब उसके शरीर ने क्या रचना शुरु कर दिया।मातृत्व का समय खुद चुन कर वह अधिक आज़ाद हुई है।

दूसरी बात ,

आप जानते ही होनेग कि आई पिल जैसी गोलियाँ आपातकाल के लिए हैं न कि गर्भपात के लिए जैस कि ऊपर के कमेंट मे कहा गया है।अनचाहे गर्भ को हटाना स्त्री के शरीर और स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक साबित होता है इसलिए यह उत्पाद सामने आने से बहुत सी स्त्रियों को लाभ हुआ है मानना होगा।

इस तकनीक के अभाव मे व्यभिचार नही होता या नही हो सकता ऐसा भी नही है, हर गर्भनिरोधक का प्रचार दर असल व्यक्ति की आज़ादी को और मज़बूती से रेखांकित रखता है इसलिए उसे लेकर बहुतो के मन मे परेशानी पैदा होती है।

बाकी ,
हर नई तकनीक और प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल जैसे नियंत्रित नही कर सकते आप वैसे ही इसका भी इस्तेमाल कौन कब करे इसे आप नियंत्रित नही कर सकते।

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

क्या भाईसाहब आपने क लिख दिया? जरा सोचिए उन नवजवानों की जो किसी कारण से कण्डोम न खरीद सके तो कम से कम इस गोली की मदद तो ले ही सकते हैं। अब वह बात नही रही जबकि यौनाचार के मामले मे षर्म करी जाती थी अब तो कहा जाता है कि जिसने की षर्म उसके फूटे कर्म। कर्म को कोई भी नहीं फोड़ना चाहता है और इसी कारण कभी परिवार नियोजन का साधन समझे जाने वाला निरोध अब एड्स को नियंत्रित करने औस षारीरिक सम्बन्धों में मददगार सिद्ध हो रहा है। यही तो हमारा देष है... जिये प्यारे और लगे रहो.... कि अब तो धोखे में भी कुछ कर डालो तो है न गोली.....

Anonymous said...

गंदा ही क्यों सोचते हैं आप..

मैं कई विषयों पर आपके लेख पढ़ रहा हूं, मुझे ऐसा लगता है कि आपकी सोच ही गंदी है, चाहे इस लेख में हो या आपकी पुरानी प्रेमकथाओं में, अपने आपको आप इतना महत्वपूर्ण क्यों बना लिया है ( शायद इसके पीछे आपका पारिवारिक संस्कार होगा)। आप गर्भनिरोध की गोली को चरित्र से जोड़ देते हैं, आपके दिमाग में इसके दुरूपयोग की ही बात क्यों आई, और क्या कोई अगर गलत कर भी रहा है और इस गोली से एक अनाथ जीवन धरती पर आने से बच रहा तो इसमें गलत क्या है। क्या आज ही लोगों का चरित्र हनन हो गया है, आदिमकाल से यह चल रहा है, लेकिन तब एक अनाथ के रूप में कोई गटर, नाली या कहीं और से जीवन शुरू करता था, यहां भगवान इंद्र का जब चरित्र ठीक नहीं था, उन्होंने अहिल्या के साथ क्या किया था पता है, ये चीजें रूकने वाली नहीं है, बात आपकी सोच का है आप इसे किस तरह सोचते हैं, मुझे तो आपकी सोच ही गलत लगती है, जैसा मैंने इससे पहले आपकी प्रेमकथाओं में पढ़ा, गलत सोच के साथ इतना अभिमान ठीक नहीं...

Anonymous said...

गंदा ही क्यों सोचते हैं आप..

मैं कई विषयों पर आपके लेख पढ़ रहा हूं, मुझे ऐसा लगता है कि आपकी सोच ही गंदी है, चाहे इस लेख में हो या आपकी पुरानी प्रेमकथाओं में, अपने आपको आप इतना महत्वपूर्ण क्यों बना लिया है ( शायद इसके पीछे आपका पारिवारिक संस्कार होगा)। आप गर्भनिरोध की गोली को चरित्र से जोड़ देते हैं, आपके दिमाग में इसके दुरूपयोग की ही बात क्यों आई, और क्या कोई अगर गलत कर भी रहा है और इस गोली से एक अनाथ जीवन धरती पर आने से बच रहा तो इसमें गलत क्या है। क्या आज ही लोगों का चरित्र हनन हो गया है, आदिमकाल से यह चल रहा है, लेकिन तब एक अनाथ के रूप में कोई गटर, नाली या कहीं और से जीवन शुरू करता था, यहां भगवान इंद्र का जब चरित्र ठीक नहीं था, उन्होंने अहिल्या के साथ क्या किया था पता है, ये चीजें रूकने वाली नहीं है, बात आपकी सोच का है आप इसे किस तरह सोचते हैं, मुझे तो आपकी सोच ही गलत लगती है, जैसा मैंने इससे पहले आपकी प्रेमकथाओं में पढ़ा, गलत सोच के साथ इतना अभिमान ठीक नहीं...

ज्ञान said...

चलिए लिखने वाले ने तो अपनी बात लिख दी। अब इस माइक्रो पोस्ट पर आयी टिप्पणियों का माइक्रो एनालिसिस किया जाये, बोले तो छिद्रान्वेषण

पाबलाजी पूछते हैं: क्या किसी धर्माचार्य या राजनेता ने ऐसे उत्पादों पर बंदिश की बात की है?
अब बतायो भई कोई इनको कि आये दिन खबरों में जिन महानुभावों के अड्डों से ऐसा ही कुछ मिलता है, क्या वे इस तरह की बात करेंगे?

भाटियाजी कहते हैं: मेरे पास कुछ पत्रिकाये हिन्दी मै आती थी …उन के हर दस्वे पेज पर यही कुछ लिखा होता था।
अंदाजे बयान से लगता है कि अब नहीं आती।

द्विवेदीजी कहते हैं: विज्ञापन का स्वरूप ही बहुत भोंड़ा है। जनाब, ऐसी वस्तुयों का विज्ञापन देना ही भोंड़ा है।

धीरू जी का कहना है: सरकार भी चरित्र पतन को बढावा दे रही है। अरे, एक से भले दो।

कुश जनसंख्या विस्फोट और पति पत्नी की भूल के बारे में बातें करते हुए भूल गये कि बात विज्ञापन के प्रस्तुतीकरण की हो रही है।

ज्ञानदत्त जी तो आमजन की खोपड़ी को उद्देलित करन वाले विज्ञापन को जटिल बता कर खास हो गये।

सुजाता जी तो इसे प्रकृति के खिलाफ जाने का उचित हथियार मानते हुए, स्त्री के नजरिये से लिखती हैं कि अपनी अस्मिता और पहचान बनाने मे सबसे ज़्यादा बड़ी बाधक उसके शरीर की यह रहस्यमय परिस्थितियाँ हैं, जिसके कारण वह गर्व महसूस करती है कि पूरूष को उसी ने जनम दिया है। स्त्रियों की सबसे बड़ी अनूभूति को भी नकारते हुये कह दिया कि वह जान ही नही पाती कि कब उसके शरीर ने क्या रचना शुरु कर दिया!! अरे वे तो कहती हैं कि हर गर्भनिरोधक का प्रचार दर असल व्यक्ति की आज़ादी को और मज़बूती से रेखांकित रखता है। अब इन्हें कौन सा परेशान व्यक्ति पूछे कि किसी की पिछली पीढ़ियों ने कितनी गुलामी झेली है, विचारों, आचारों, व्यवहारों, मानसिकता में? जो आज गर्भनिरोधक के प्रचार से अपने आप को आजाद मान रहे हैं।

एक अनाम महोदय तो घबड़ा गये कि उनकी गंदी सोच शायद ज़्यादा ना फैल पाये तो दो बार फैला दी, अपनी … और फिर अनिल जी की पुरानी प्रेमकथाओं में, अपने आपको इतना महत्वपूर्ण दिखाने से ही खुद के पारिवारिक संस्कार याद आने लगे, फिर अपने दिमाग की बजाय पहचान को बुरके के पीछे रखकर कहने लगे कि कोई गलती करके एक अनाथ को लाने से बचा रहा है तो बेचारी गोली की गलती क्यों बताते हो? मेरे ख्याल से ये भी गटर, नाली या कहीं और से जीवन शुरू करते ही बेचारे अनाथ होंगे तभी तो अपनी पहचान लेकर नहीं आये। वरना अपनी सोच को सामने रख्कर, दूसरों की सोच को गलत बताते हुये इतना अभिमान कैसे कर रहे हैं कि सही गलत भूल गये, अपनी सामजिक जिम्मेदारी भूल गये। शायद इन अनाम महाशय ने किसी का भी दूध नहीं पिया वरना एक मर्द की तरह आकर अपनी सही-गलत बातों पर हम जैसे लोगों की टिप्पणियां पाने वाले अनिल पुसदकर जी पर अपनी गटर की गंदगी न झाड़ते।

वैसे अनिल जी मैं भी परिवहन से जुड़ा हुया हूँ, कभी मुलाकात जरूर करूंगा। आपके मोतीबाग का कार्यालय मुझे ज्ञात है।

मुकेश कुमार तिवारी said...

अनिल जी,

आज के दौर की व्यवसायिकता के मुँह और हमारे गिरते हुये नैतिक मूल्यों पर एक करारा तमाचा मारता हुआ लेख.

मैं भी जब तकरीबन २३ साल पहले मुंबई पहली बार गया था और लोकल ट्रेनों में गर्भपात कराने वाले अस्पतालों के विग्यापन देख कर खुद ही शर्मिंदा हुआ था पर आज टी. व्ही. देखते हुये आदत सी हो आई है बिल्कुल भी क्षोभ नही होता.

अच्छे लेख के लिये बधाईयाँ.

मुकेश कुमार तिवारी

हरि said...

डा0 अनुराग सही कह रहे हैं।

NIRBHAY said...

"KYA BHOOL HO GAYI?",
agar shadi shuda hai toh phir yeh kya bhool hai? ya phir woh kisi doosare ki beebee thee. Shadi kiya hai, but natural hai kee Sukhad Dampatya Jeevan ek good sexual life se relate karta hai phycologist logon ka kehana hai. Advertisement hamesha emotions ko hit karta hai aur apne tamam social limitations ignore karta hai. Dharmik/Politicians is ka kya karen, Laloo toh poori ki poori cricket team le aaye dharti par, but Rabdidevi kabhi kahti hai kya Bhool ho gayi. India me Jansankhya ka visfot chal hee raha hai, koi nahi bolta bhool ho gayi, Ek bar Indira Gandhi ne jabardasti pakad pakad kar " NASBANDI" karvayi thi us ke baad unko kahna pada hamse bhool ho gayi. advertisement me mahila ka chehra aisa dikhta hai jaisa ek hee saptah me usko "BACHHA" ho jayega. Idiot hai advertisement ko bhee sensor board se pass karvana chahiye. Uddeshya sahi hai par Tariqa galat hai. Wah! re bhool ho gayi. Pahli aur aakhri bhool toh tumne shaadi karke kee, phir kya aage tumhe agarbatti stand dikhega.