Saturday, June 13, 2009

ये किसने दुआ की थी बारिशों की!

भट्ठी से तप रहा शहर दोपहर को अचानक मीठी सी ठंडी लहर से झूमने लगा था।ऐसा लगा कि भगवान ने आसमान मे अपना एसी चालू कर दिया है।तभी दोपहर की चमकदार धूप पता नही क्यों शर्मा कर देहात की नई-नवेली दुल्हन की तरह अपने आप मे सिकुड़ने लगी और जनरल बोगी मे चिरौरी कर सीट के कोने मे बैठे बादल ने पसरना शुरू किया।थोड़ी ही देर मे आसमान पर उसका कब्जा था और मैं टाटा के शोरूम मे बैठा गाड़ी की ज़ल्दी डिलेवरी की दुआ करने लगा।मुझे आई(मां) के हाथ के बने प्याज के गर्मागर्म पकौड़े की याद सताने लगी थी।बरसात मे भीगने के बाद गरम पकौड़े खाने का मज़ा ही कुछ और होता है।

थोड़ी ही देर मे गाड़ी के मिलते ही लगा कि मौसम के साथ-साथ भगवान भी मेहरबान है।गाड़ी मे बैठ कर बाहर निकलते-निकलते बारिश की बूंदो ने गाड़ी की छत को म्यूज़िकल इंस्ट्रूमेंट बना कर नया तराना छेड़ दिया था।उस अलौकिक संगीत मे डूबा हुआ मै कब घर पहुंचा पता ही नही लगा।गाड़ी से उतर कर सीधे अंदर भागा।आई ने पूछा आज इस समय्।मैने कहा कुछ नही थोड़ी देर मे भजिये बना कर खिलाओगी क्या?उन्होने कहा अभी बना देती हूं।मैने कहा नही अभी मे छत पर जा रहा हूं।बड़ा हो गया है बच्चा नही है तू…… मैने उनकी बात सुनने की बजाय छत की ओर भागना ज्यादा मुनासिब समझा।आई की आवाज़ मेरा पीछा करते हुये आई और कान मे फ़ुसफ़ुसा के कहा कि पता नही कब सुधरेगा।

तब-तक़ बारिश की बूंदों ने भी धीरे-धीरे मतदान की तरह रफ़्तार पकड़ ली थी।अब उनका संगीत किसी विदेशी संगीत की तरह न समझ मे आने वाला होकर भी कानो मे मिश्री घोल रहा था।बूंदो के बोल समझ मे नही आ रहे थे मगर वे पैरो को थिरकने पर मज़बूर कर रहे थे।सर से लेकर पैर तक़ बारिश की बूंदों के रंग मे रंगने के बाद होश ही नही रहा कि समय कैसे बादलो की तरह उडता चला जा रहा है।बूंदे भी लगता है कि थक़ गई थी और उसकी रफ़्तार दम तोड़ने लगी थी।रह-रह कर गरजने और चमक्ने वाली बिज़ली भी खामोश होकर कही छुप कर बैठ गई थी।

नीचे से आई की आवाज़ ने बारिश के संगीत का जादू तोड़ा।अरे भजिये लाऊं क्या?मै आ रहा हूं आई, कह कर मै नीचे उतरा।कपड़े बदले और गर्मा गरम भजिये की प्लेट और टमाटर और हरी मिर्च-धनिये की चटनी लेकर उपर आया।बालकनी मे बैठ कर फ़िर से ज़ोर मारती बारिश की बूंदो की छमाछम सुनते हुये भजिये का स्वाद लेने लगा।वाह क्या बात है?दुनिया मे इससे अच्छा भजिया और कोई बना ही नही सकता होगा,ऐसा मैने सोचा और अलौकिक संगीत के साथ स्वाद के समंदर मे गोते खाने लगा।

अचानक़ बिजली रानी ने फ़िर से अपनी ताक़त दिखाना शुरू कर दिया और थोड़ी ही देर मे वो छतीसगढ के उत्पाती हाथियो की तरह आऊट आफ़ कंट्रोल होने लगी।उसकी उद्दंडता को देख बरखा रानी भला कंहा चुप रहने वाली थी।उसने भी अनुशासनहीनता मे कोई कमी नही की और अब गुलज़ार के गीतों सी मधुर बरखा रानी रामसे ब्रदर्स की फ़िल्म सी लगने लगी।रह-रह कर कड़कड़ाकर चमकने वाली बिजली ऐसा लग रहा था टार्च जलाकर देख रही हो कि है कोई जो उसका मुक़ाबला करने बाहर निकले।

अरे अंदर आ जा,नीचे से आई की आवाज़ ने ध्यान बंटाया।मैने कहा आ रहा हूं।इतने मे फ़िर बिजली चमकी और ऐसा लगा कि सामने थोड़ी दूर कंही गिरी है।अरे उस तरफ़ तो झोपड़पट्टी है।ओफ़ बुरा हाल होगा वंहा तो।अभी तो शुरूआत है। बारिश जब जवान होगी तब तो और कहर बरपायेगी।अचानक़ मै कई साल पीछे चला गया।याद आ गया मुझे बारिश के मौसम का हाल बयान करना।तालाबों का ओव्हर-फ़्लो होना,नालियो-नालो का फ़ूट जानां। निचली बस्तियों मे पानी भर जाना।रात-रात भर जाग कर गुज़ारना। दूसरे अख़बार मे छपी, नवजात शिशु को छाती से लिपटाये मां की तस्वीर देख कर संपादक का बड़बड़ाना। और, थोड़ा और,थोड़ा और ह्यूमन स्टोरी लिखने के लिये कहना।रात भर टपकती छतों के पानी को गिनती के बरतनों मे जमा करके ऊलीचना। भूख से बिलखते बच्चो को, परेशान होकर चुप कराने की बजाये पीटना।झडी यानी लगातार होने वाली बारिश मे दूसरे और तीसरे दिन भी चुल्हा नही जला सकने की हताशा।रोज कमा कर खाने वालो के चेहरो पर गहराती निराशा।

ओफ़ मै ये क्या सोचने लगा। मैने सिर को ज़ोरदार झटका दिया और उन खयालो को बाहर निकाल फ़ेकने की भरपूर कोशिश की।पर वो खयाल तो न चाहते हुये भी युपीए की सरकार की तरह रिपीट होने लगे।भूख से बिलखते बच्चे।गीले कपडो मे तरबतर घरों मे भरे पानी को बाहर फ़ेंकते लोग्।बिमारियो का संक्रमण रोकने के लिये मुंह पर मास्क पहने दवा बांटती मेडिकल टीम्।फ़ोटोग्राफ़र और विडीयोग्राफ़रो की टीम के साथ प्रभावित ईलाको का दौरा करते जन?प्रतिनिधि। अख़बारो मे गरीबी को छापने की होड़।मै परेशान हो गया ये क्या हो गया है मुझे।मै तो सारे काम-धाम ड्राप करके मौसम का मज़ा लेने घर आया था।तभी नीचे से आई ने आवाज़ दी, भजिया और दूं क्या बेटा?नही आई,पता नही, ये नही, मेरे मुंह से कैसे निकला।मुझे याद आया। एक ऐसी ही तूफ़ानी बारिश की अपनी रिपोर्ट का शीर्षक्।"ये किसने दुआ की थी बारिशों की"।मैने कुर्सी से उठते हुये प्लेट मे बचे भजिये के आखिरी टुकड़े को मुंह मे ड़ाला।पता नही क्यों आज आई के हाथ के भजिये मे वो स्वाद नही आया।

20 comments:

प्रवीण जाखड़ said...

बारिश की छप-छप और कहीं गाड़ी पर ढप-ढप अब इस संगीत को आप कई दिनों तक सुनेंगे, इंजॉय करेंगे। मानसून सर पर है समझिए।
मौसम को भी खुलकर इंजॉय कीजिए।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बारिश की कामना गरीब भी करता है, लेकिन साथ यह भी कि उस का घर न उजड़े। पर प्रकृति उसे एक ही चीज दे पाती है।
यह अभिशाप प्रकृति का नहीं इंसान की खुद की देन है। सोचते हैं किसी तरह यह अभिशाप मिट जाए।
आलेख संवेदनापूर्ण है। इंसानियत और संवेदनाएँ ही उँचा उठाती हैं।

NIRBHAY said...

"NEO LIBERALISATION" is desh ko kees hudd tak le jayega? Is me Kuchh Ek Sou(hudred) log "Arabpati" bante hai toh dusri taraf lakhon log dane-dane ke mohtaj ho jaten hai,inki jindagee in ke hathon me ho jati hai. Majboor ho gaye yeh log "Gaon" ko chhodne me. Shahar me "dehadee" ya kis "pety cotractor" ya "chawdi" se inka jeevan chal raha hai, Rahne ke liye "Jhuggi Jhopdi/Slums" me sahara jahan inka jeevan "Bilbilate Keede" ke mafiq chalta hai. Ab yeh yehan ke vote bank me tabdil hokar apni "Halat" ko aur "Bad-tar" bana chuke hai.
Ek tarf Mahatma Gandhi ne "Panchayti Rajya" kee kalpana kee thi usi samay yeh bhee kaha tha kee Congress ko ab bhang kar dena chahiye. Lekin awsarwadi logon ne baat nahi mani aur unki kahi apni matlab kee baton ko hee yaad rakha, Gaon me bhee Panchayati Rajya ne aapsi sadbhavna aur prem ko tod diya. Purane dharre me chal raha hai sab karobar naye kee kya "Apeksha" rakhen, vote de kar aakhir hum sub ruling party ke Ghulam hee toh rah jaten hai. Farak kya pada Aazadee pane ka. Atyant Hasyaspad lagta hai jab India ka per capita income me world level me niche se number lagta hai vahi World ke 100 Arabpati me Indian logon ka naam Pahle top ten me aata hai.
Film "Slumdog Millionre" me "Jay Ho" wale gane kee line ek karara vyang humari vyavastha par hai bus vohi yaad aata hai.
Hum Bhagwan/God ko hee "Jay Ho" kahen par ab is vyavstha ke hum ghulam inki "Jay Ho" kahten hai.

राज भाटिय़ा said...

अनिल जी आप ने पहले तो शायराना ढंग से मुढ अच्छा बना दिया, ओर मां के हाथ के बने भजिये का स्वाद भी चखा दिया बातो बातो मे फ़िर अपने दुसरे भाईयो के दुख का एहसास भी दिला दिया... जेसे चमचमती धुप मे कभी बादलो की ठंडी छांव तो कभी फ़िर से तेज कडकटी धुप.
धन्यवाद

Nitish Raj said...

राज भाटिया जी की अंतिम लाइन चुराने का दिल कर रहा है। बहुत अच्छा लगा आपने अलग अंदाज को अपनाया और ये भी अच्छा लगा कि शुरुआत और अंत को एक जैसा नहीं रखा। बहुत ही अच्छे शीर्षक के अंतर्गत लिखा ये लेख यदि कहीं कोई प्रतियोगिता हो तो इसे भेज सकते हैं। साथ ही पिछली कड़ी भी। पर भजिया के अंतिम टुकड़े को छोड़ सभी में स्वाद आया होगा।
अच्छी पेशकश।

अजित वडनेरकर said...

क्या कहने!!! सुपर्ब...बहुत अच्छी पोस्ट।
सारी शब्द शक्तियों का आपने इस्तेमाल कर डाला! अभिधा, लक्षणा, व्यंजना...क्या बात है अनिल भाई...
इस बारिश ने तो कलम में रस घोल दिया...गद्य हो तो ऐसा।
पकौड़े बहुत अच्छे लगते हैं, ईश्वर करे ये सुख आपको मिलता रहे...जितने दिन ईश्वर दे सके। आई को प्रणाम।
जैजै

Udan Tashtari said...

खुशी की बात है..रिमझिम बारिश का आनन्द लिजिये.

Ratan Singh Shekhawat said...

संवेदनापूर्ण आलेख !

अनिल कान्त : said...

are sir ji pahle aapne romantic kar diya aur fir man ko vichlit...aapne dono roop dikha diye baarish ke....

sach hi to hai is barkha rani se kya kya nahi hota
aaj ki post jandar hai

ali said...

सुंदर !
बहुत सुंदर !
बहुत ही सुंदर प्रविष्टि !

ताऊ रामपुरिया said...

आज तो लगता है बरसात हमारे यहा भी हो ही जायेगी. बहुत आस जगादी है आपने.:)

रामराम.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

भाटिया जी ने ठीक कहा, पहले तो इतना शायराना मूड बना दिया और फिर एकदम से ज़मीनी हकीक़क पर ला पटका. सच में यह दुनिया बड़ी कठिन है.

अल्पना वर्मा said...

बारिशें किसी के लिए ख़ुशी और किसी के लिए आंसू...
बारिशों से बस्तियां में पानी भर जाना और एक दिन की रोज़ी का छीन जाना..इन बातों का ख्याल ही दिल दुखा देने वाला होता है.आलेख संवेदनापूर्ण है.

अशोक पाण्डेय said...

यही संवेदना तो हमें कलम चलाने को मजबूर करती है और हमारी लेखनी को धार देती है। उत्‍कृष्‍ट लेखन।

Mahesh Sinha said...

हर चीज के कम से कम दो पहलू होते हैं विकास ओर विनाश में बाल के बराबर दूरी होती है

●๋• सैयद | Syed ●๋• said...

आपको नई गाड़ी के साथ साथ मानसून की पहली फुहार मुबारक ||

कल जयपुर में भी बारिश के आसार दिखे थे तो सोचा की घर जाकर हम भी भजिओं का आनंद लेंगे... पर कुछ ही मिनटों में बारिश का नामों निशान गायब...

भजिओं का आनंद तो लिया पर बारिश और भजिओं का कॉम्बिनेशन ही कुछ अलग है.

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

यहां तो बेसब्री से इंतजार है वर्षा का। वर्षा हो तो कुछ यातायात कम हो अपने पीक लेवल से!

अक्षय-मन said...

वाह एक समां बांध दिया आपके लेख ने बहुत बढ़िया जी......
मेरे ब्लॉग पर भी आपका स्वागत है.......

अक्षय-मन

कार्टूनिस्ट अजय सक्सेना said...

किसी ने कहा है की इन्द्रधनुष देखने की चाह रखने वाले बारिश की परवाह नहीं करते ..किसी झोपडे में रहने वाले बच्चे का भी इन्द्रधनुष देख कर ख़ुशी से भर जाता होगा पर तब नहीं जब बारिश ने उसके झोपडे को तबाह कर दिया हो और उसी टूटे हुए झोपडे की दीवार से इन्द्रधनुष निकलता उसे दिखाई दे रहा हो......आगे भी कई सालो तक आपको ऐसे ही पकौडे खाने मिलते रहे इस कामना के साथ ....

काजल कुमार Kajal Kumar said...

हे प्रभु, एक टुकडा बारिश यहाँ भी भेज देते तो अच्छा रहता..बाक़ी सब सब सह लूँगा.