Thursday, October 15, 2009

ईमानदारी पाप है,ट्रांसफ़र इसका श्राप है,क्योंकी इस सड़ेले सिस्टम मे जनता नही,नेता जनता का बाप है

जी हां सही कह रहा हूं।यंहा एक ईमानदार अफ़सर फ़िर निपट गया।गलती सिर्फ़ इतनी थी कि वो आंखे बंद करके ठेकेदारों के बिल पास नही करता था।बिना वेतन नही लिये नौकरी कर रहे आई ए एस अफ़सर अमित कटारिया को नगर निगम के कमिश्नर पद से जाना ही पड़ा।वेसे ये कटारिया को ईमानदारी के भूत ने बुरी तरह जकडा हुआ है और इससे पहले भी इसी बीमारी की वज़ह से चर्चा मे रहे हैं।पदोन्नति मे रिश्वतखोरी का आरोप लगाकर सारे सीनियर आई ए एस को वैसे ही नाराज़ कर चुके थे और अब महापौर से भी भीड़ गये थे।खैर उनका कहना है कि मुझे फ़र्क़ नही पडता,काम कंही न कंही तो करना ही है।वैसे छत्तीसगढ मे ये पहला मौका नही है।इससे पहले एक सीनियर आई ए एस अफ़सर चीफ़ सेक्रेटरी बनने का सपना लिये हुये ही रिटायर हो गये और एक नही दो-दो बार उनसे जुनियर को उस पद पर पदोन्नति दे दी गई।

खैर कई शापिंग माल के मालिक युवा अमित कटारिया को आई ए एस अफ़सर बनते समय शायद ये सब पता नही होगा।यंहा तो माते 26 दिन मे चार करोड रूपये से भी ज्यादा और एक महीने मे ढाई करोड् से भी ज्यादा रकम का बिल बिना काम किये,कर दिये जाने का रिकार्ड बना रहे है अफ़सर।ऐसे मे नगर निगम जंहा अगले महीने चुनाव होने वाले हैं,वंहा ठेकेदारों के बिल अटके रहेंगे तो मनचाहे ईलाके मे सड़क़-बिजली-पानी के काम कैसे करवा पायेंगे चुनाव लडैया लोग्।बस फ़िर क्या था किसी न किसी बात पे उलझो और विवाद का पटाक्षेप अफ़सर की बलि सारी ट्रांसफ़र से हो ही जाता है,और हुआ भी।ईमानदार अमित कटारिया ईमानदारी की लडाई लड़ते-लड़ते खेत रहे।

नगर निगम से हर आदमी जुड़ा होता है इसलिये अमित का ट्रांसफ़र सारे शहर मे चर्चा का विषय हो गया है।जिसे देखो वो हैरान,परेशान होकर सिस्टम को गाली बक़ रहा है मगर नगर निगम के अधिकांश कर्मचारी-अधिकारी और ठ्केदार खुशियां मना रहे हैं।एक का कहना था,वो तो ठीक है ईमानदार है,लेकिन काम कंहा हो पा रहे है।ईमानदारी की वजह से करोड़ों के बिल अटके पड़े है और जब तक़ बिल क्लियर नही होते तब तक़ ठेकेदार काम नही कर रहे थे और काम नही होगा तो चुनाव क्या खाकर लड़ेंगे।वाह क्या लाजिक है।इस मामले मे विपक्ष यानी कांग्रेस के भी इक्का-दुक्का नेताओं ने अख़बारों मे बयान देकर विरोध की खानापूर्ती कर ली और निगम मे मिलिजुली कुश्ति चल रही है इस बात का एक बार और सबूत दे दिया।

हां जनता ज़रूर नाराज़ है मगर उसकी नाराज़गी की परवाह किसे है। चुन कर आ गये हैं सत्ता मे अब पांच साल सरकार उनकी रहेगी इसलिये परवाह है नही नगर निगम मे किसे वोट देती है जनता।विकास चाहिये तो रूलिंग पार्टी को वोट देना मज़बूरी है वरना काम चलेगा सरकारी स्पीड से।पब्लिक अब कर भी क्या सकती है।ये तो उस कटारिया को सोचना चाहिये था कि काहे ईमानदारी का ब्रांड एम्बेसेडर बना फ़िर रहा है।अब ईमानदार बने ही रहना है तो झेलो ट्रांसफ़र पे ट्रांसफ़र्।वैसे गनीमत है मुख्यंत्री डा रमन सिंह और रायपुर के एक युवा मंत्री राजेश मूणत जानते हैं कि अमित ईमानदार है इसलिये बहुत दूर कंही बस्तर या सरगुजा जैसे नक्सल प्रभावित अविकसित ईलाके मे नही फ़ेंका वरना गाते रहते चौबीसों घण्टे, ईमानदारी पाप है,ट्रांसफ़र इसका श्राप है,क्योंकी इस सड़ेले सिस्टम मे जनता नही,नेता जनता का बाप है !

32 comments:

महफूज़ अली said...

yahi system se vidroh karne ka man karta hai.........


Bureaucracy........... mein kai log achche bhi hain...........

पी.सी.गोदियाल said...

सही कहा आपने, इमानदार के लिए तो अपने परिवार के लिए दो जून की रोटी जुटाना मुश्किल हो रहा है ! सिर्फ सिस्टम को ही दोष देना भी गलत है ! सीधे तौर पर मेरा मानना है कि जनता ही भरष्ट है !

ललित शर्मा said...

अनील भैया-जय हो-ये तो होना ही था,
पैदा न हो जमी से नया आसमाँ कोई
मुझे डर लगता है आपकी रफ़्तार देखकर,

धन तेरस की शुभकामनाएँ आपको और कटारिया को,

ललित शर्मा said...

अनील भैया-जय हो-ये तो होना ही था,
पैदा न हो जमी से नया आसमाँ कोई
मुझे डर लगता है आपकी रफ़्तार देखकर,

धन तेरस की शुभकामनाएँ आपको और कटारिया को,

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

ईमानदारी पाप है,ट्रांसफ़र इसका श्राप है,क्योंकी इस सड़ेले सिस्टम मे जनता नही,नेता जनता का बाप है !

लगता है इस फर्जी बाप से ही निपटना पड़ेगा।

अनूप शुक्ल said...

कटारिया तो कई शॉपिंग माल्स के मालिक हैं सो इस ईमानदारी की कीमत को झेल गये। आम ईमानदार का क्या हाल होता होगा समझा जा सकता है।

संगीता पुरी said...

जब प्रतियोगिता की तैयारी कर रहे होते हैं वे .. तो देश की सेवा करने को लेकर आंखों में कितने सपने होते हैं उनके .. पर ऐसी हमारे देश में ऐसी व्‍यवस्‍था है कि .. आई ए एस बनते ही सब चूर चूर होने लगते हैं !!

Mishra Pankaj said...

कलजुग बैठा मार कुण्डली , जाऊ तो मै कहा जाऊ
हर घर में एक रावण बैठा , इतने राम कहा से लाऊ ?

एस.के.राय said...

अनिल पुसदकर जी ! श्री कटारिया जैसे लोग इस देश आज भी जीवित हैं ,जिन लोगों के नाम से हम ‘ाायद हम जीवित भी है ,आपने जिस व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाया हैं ,मै लगातार देखकर रहा हंु कि आपका आक्राश बढता जा रहा है ............... आग अब sholaa बनने लगा हैं ..........क्या बज्र बनने देर लगेगी ??? व्यावस्था को बदलना ही पडेगा ........... और हम इस सडी –गली व्यवस्था को बदलकर ही दम लेंगे, ताकि अमित कटारिया जैसे ईमानदारों लोगों पर उंगलि उठाने के पहले भ्रश्ट लोग हजारों बार सोचे ...

जी.के. अवधिया said...

नौकरी में ईमानदारों की यही नियति है।

"सत्यमेव जयते!"

राज भाटिय़ा said...

अरे भारत के हर शहर मै क्यो नही दो तीन आप जेसे अनिल पेदा हुये कम से कम लोगो की आंखे तो खोल सकते है, जनता तो जागरुक तो कर सकते है, मेरे पिता जी भी इसी बिमारी का शिकार रहे ओर जगह जगह अपनी ट्रासफ़र करवाते रहे.... लेकिन कभी डिगे नही अपनी इमान दारी से, ओर बडे बडे अफ़सर भी डरते थे उन से बहस करने से बचते थे, इस लिये मै समझ सकता हि अमित जी की बात
धन्यवाद
आप को ओर आप के परिवार को दीपावली की शुभकामनाये

अर्शिया said...

आप जैसे खरी खरी कहने वाले बहुत कम लोग हैं।
धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएँ।
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Suresh Chiplunkar said...

अनिल भाऊ, देश को तत्काल एक हिटलर की सख्त आवश्यकता है… या ऐसा कोई सिरफ़िरा व्यक्ति जो भ्रष्टाचारी को देखते ही उड़ा दे… दो-चार सौ ऐसे भ्रष्टों को मारा जाये शायद तब इस हाथी जैसे विशाल सिस्टम में थोड़ी हलचल हो… जनता कभी नहीं बोलेगी, कभी नहीं जागेगी, चुनाव में एक बार वोट देकर पेशाब के झाग की तरह बैठ जायेंगे सब के सब… यदि कोई जनजागरण करने निकल भी पड़ा तो उसकी ही आलोचना करेंगे…

Dr. Mahesh Sinha said...

यही इस देश का भाग्य है . नक्सलवाद भी जहाँ बाजारवाद बन जाता है. भ्रष्ट्र तंत्र इतना शक्तिशाली हो गया है. एक नव क्रांति ही इस देश का उद्धार कर सकती है.

Arvind Mishra said...

पुसदकर भाई इसी व्यवस्था में रो धो कर २७ वर्ष गुजार दिए -हर रोज लगता है हे भगवान् इस दारुण तंत्र से कब मुक्ति मिलेगी !

डॉ टी एस दराल said...

शुक्र है अमित कटारिया जैसे लोग हैं अभी.
वरना सारा सिस्टम ही भ्रष्ट है.
पर ओखली में सर दिया, तो मूसलों से क्या डरना.

निशाचर said...

अनिल जी, दुःख की बात है कि ज़माने को ईमानदारी के प्रति यह आग्रह पागलपन नजर आता है लेकिन अगर हमें इस व्यस्था तंत्र में बदलाव लाना है तो अमित कटारिया जी जैसे युवाओं की ही आज आवश्यकता है. यह शासन तंत्र केवल राजनीतिज्ञों के दम से नहीं चलता है इसकी रीढ़ होते है प्रशासनिक सेवा के यही अधिकारी. इन अधिकारीयों के लालच को ही राजनेताओं ने अपनी लिप्सा पूर्ति का साधन बना लिया है. नौकरी लेना तो दूर की बात है किसी IAS अधिकारी का स्थानांतरण भी कोई मुख्यमंत्री बिना प्रमुख सचिव के हस्ताक्षर के नहीं कर सकता. यदि प्रशासनिक अधिकारी ईमानदार हों तो किसी राजनेता की क्या मजाल है जो किसी भी प्रकार के अनैतिक और गैरकानूनी कार्य के लिए किसी अधिकारी को बाध्य कर सके. परन्तु क्षुद्र स्वार्थों के चलते प्रशासनिक अधिकारी पूरे तंत्र को भ्रष्ट नेताओं का गुलाम बना देते हैं. अमित जी आर्थिक रूप से सम्पन्न हैं इसलिए भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों के विरोध को अपने द्रनानिश्चय द्वारा धता बताने में सफल हो रहे हैं वरना अधिकतर अधिकारी तो आर्थिक संत्रास के आगे ही घुटने टेक देते हैं. जहाँ तक ट्रान्सफर की बात है तो सरकारी नौकरी में ट्रांसफर कोई सजा नहीं है. यह नौकरी का एक अंग है परन्तु भ्रष्ट अधिकारी और नेता इसे अपनों को बचाने और इमानदारों का मनोबल तोड़ने के लिए एक हथियार के रूप में प्रयोग करते हैं. महाराष्ट्र काडर के IAS अधिकारी श्री अरुण भाटिया का उनके ३३ साल के सेवाकाल में ३६ बार स्थानांतरण किया गया परन्तु उन्होंने घुटने नहीं टेके. हारकर महाराष्ट्र सरकार ने उनकी सेवा समाप्ति हेतु प्रस्ताव केंद्रीय गृहमंत्रालय को भेजा परन्तु गृहमंत्री लाल कृष्ण अडवाणी ने इसे ठुकरा दिया इस प्रकार एक ईमानदार अफ़सर इनका शिकार होने से बच गया. अरुण भाटिया और अमित कटारिया जैसे अधिकारी अपनी ईमानदारी से स्वयं पर उत्त्पन्न होने वाले निजी खतरों से अनभिज्ञ नहीं हैं परन्तु यदि उन्होंने कर्तव्यनिष्ठा, समाज हित और देश हित को अपने निजी स्वार्थों के ऊपर रखा है तो वे प्रशंसा और आदर के पात्र हैं. समाज उन्हें सिरफिरा समझ कर उनका निरादर करता है तो यह निश्चय ही चरित्रपतन की पराकाष्ठा है.

ताऊ रामपुरिया said...

क्या कहा जाये? इमानदारी का जमाना ही कहां है अब.

रामराम.

ज्ञानदत्त पाण्डेय| Gyandutt Pandey said...

ईमानदारी तो कबीर की लुकाठी है - जो घर जारे आपनो सो चले हमारे साथ!
और कबीर को फॉलो करने का अपने तरीके का आनन्द है।

महफूज़ अली said...

aapko deepawali ki haardik shubhkaamnayen......

दिगम्बर नासवा said...

अनिल जी ....... सच कहा है आजकल इमानदारी एक अभिशाप है ........
आपको और परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ

arun arora said...

ek aadmi sare system ki aisi taisi ferne me laga hai aur aap usaki tarfdari kar rahe hai ? sochiye is tarah ki harakato se desh kis disha me jayega ? swiss ki janata ka kya hoga ? kyaa aap desh ko falate fulate nahi dekhana chahate ? turant in sahab ka virodh kare aur aise logo se jald se jald bharat bhumee ko mukat karaye

P.N. Subramanian said...

कटारिया जी की जय हो.

अजय कुमार झा said...

जानते हैं अनिल जी मैं जहां काम करता हूं यानि अदालत वहां के लिये कहा जाता है कि वहां की दीवारें भी पैसा मांगती हैं। और उस जगह पर पिछले बारह वर्षों से पूरी इमानदारी से काम कर रहा हूं। मगर उसका परिणाम ये निकल रहा है कि कई लोगों की नजर में खटक रहा हूं..सोचता हूं कि किसी दिन ब्लोग्गिंग में ही खुल्लम खुल्ला लिखना शुरू कर दूं..तब शायद जेल जाने वाला पहला ब्लोग्गर भी बन जाउं। देखियेगा किसी न किसी दिन तो इस बात की अति होगी ही।

महफूज़ अली said...

@ Aadarniya Chiplunkar ji........

देश को तत्काल एक हिटलर की सख्त आवश्यकता है… या ऐसा कोई सिरफ़िरा व्यक्ति जो भ्रष्टाचारी को देखते ही उड़ा दे…...

Aaadarniya Chiplunkar ji.... mera yahi man kar raha hai ki wo HITLER main hi ban jaun........

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

कटारिया जैसे इन्सान ही आज इस अतिभ्रष्ट समय में भी ईमानदारी जैसे सदगुण को जीवित रखे हुए हैं ....

प्रकाश पाखी said...

अनिल जी बहुत सार्थक मुद्दे को उठाने के लिए आपका आभार!
अक्सर कहा जाता है कि ट्रांसफर और सस्पेंशन कोई सजा नहीं है...क्या वास्तव में ऐसा है?क्या सरकारी अधिकारी के परिवार और बच्चे नहीं होते है?मेरे खुद के पिछले पांच सालों में पाच ट्रांसफर हो चुके है और हर ट्रांसफर ऐसे समय हुआ कि बच्चों को एक साल में दो स्कूलों में भारती कराना पड़ा और बच्चों के इस वर्ष दसवी बार स्कूल बदल गया है...आपने सच कहा है ट्रांसफर श्राप है और इमानदार व्यक्ति का मनोबल तोड़ने के अलावा इसका कोई उपयोग नहीं है.अगर सड़ेले सिस्टम में भ्रष्टाचार है तो ऐसे व्यक्तिओं को सजा देने की नीति क्यों नहीं बनाई जाती है?यह बिना सजा वाला हथियार तो एक ईमानदार के खिलाफ ही चलाया जा सकता है.

शरद कोकास said...

मुझे बर्तोल ब्रेख्त की एक कविता याद आ गई " सरकार ने इस जनता मे विश्वास खो दिया है / मेरा सुझाव यह है कि सरकार / इस जनता को भंग कर दे / और / अपने लिये दूसरी जनता चुन ले "
इमानदारी का यही सिला मिलता है अनिल भाई फिर भी वह हर हालत मे बेईमानी से ज़्यादा पूजनीय है । जैसे काली लक्ष्मी से ज़्यादा शुभ्र लक्ष्मी । दिवाली की शुभकामनायें ।

योगेन्द्र मौदगिल said...

Jai Ho....

दीवाली हर रोज हो तभी मनेगी मौज
पर कैसे हर रोज हो इसका उद्गम खोज
आज का प्रश्न यही है
बही कह रही सही है

पर इस सबके बावजूद

थोड़े दीये और मिठाई सबकी हो
चाहे थोड़े मिलें पटाखे सबके हों
गलबहियों के साथ मिलें दिल भी प्यारे
अपने-अपने खील-बताशे सबके हों
---------शुभकामनाऒं सहित
---------मौदगिल परिवार

Udan Tashtari said...

कितना मजबूर हैं हम!!!

निशाचर said...

प्रकाश जी, आपकी बात समझ सकता हूँ और भावनाओं का आदर करता हूँ. लेकिन इस सड़े हुए सिस्टम में यदि आप ईमानदारी से काम करते हुए सर ऊँचा रखना चाहते है तो "सरफरोशी" की तमन्ना लेकार ही इस सिस्टम में प्रवेश करना चाहिए वरना समझौते करके सीधा रास्ता अपना लेना ही ठीक है. इसीलिए तो आज ईमानदार को सिरफिरा कहा जाता है.

बी एस पाबला said...

अन्य साथियों सहित संगीता पुरी जी व सुरेश चिपलूनकर जी के विचारों से सहमति।

बी एस पाबला