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Sunday, March 21, 2010

क्या आत्महत्या ही सारी समस्याओं का हल है?

क्या आत्महत्या ही सारी समस्याओं का हल है?ये सवाल मेरे अकेले का नही है और ये अचानक़ ही मेरे दिल-दिमाग में उथल-पुथल नही मचा रहा है।पिछले कुछ दिनों से इस सवाल ने मुझे बैचैन कर दिया है।आखिर आत्महत्या से सारी समस्यायें खत्म कैसे हो सकती है?मेरे हिसाब से तो उसके बाद समस्यायें और बढ जाती है भले ये दिखने के लिये आत्मह्त्या करने वाला रहे या न रहे।

आत्मह्त्या,छोटा सा शब्द और छोटा सा ही मामला हम खबरचियों के लिये।कंही कोई फ़ालोअप नही कंही कोई पब्लिक इंट्रेस्ट नही।बस मरने वाले और उसके परिजनों,इष्टमित्रों तक़ सीमित रहता है ये मामला और बहुत ज्यादा तो हुआ तो दो-चार सेंटी टाईप के लोग च्च्च्च्च,च्च्च्च्च, करके अफ़सोस ज़ाहिर कर देते हैं बस।

इस आत्मह्त्या ने मुझे भी कुछ दिनों से विचलित कर रखा है।कल भी मैं इसी कारण अपनी सुनहरी यादों मे लौट नही पाया।कल फ़िर इंजीनियरिंग के एक छात्र ने आत्मह्त्या कर ली थी और एक बारहवीं की छात्रा ने भी।इसके पहले भी इंजीनियरिंग के दो छात्र जान दे चुके हैं और बारहवीं की एक छात्रा भी।लगातार आत्मह्त्या कंही न कंही ये सोचने को मज़बुर कर रही है कि इस पूरे मामले मे दोषी कौन है?आत्मह्त्या करने वाले या उसे ये कदम उठाने पर मज़बूर कर रहें हम लोग,यानी उनके परिजन?

आखिर ऐसी क्या वज़ह होती है जो उन्हे ये कदम उठाना पड़ता है।बारहवीं या इंजीनियरिंग के फ़र्स्ट ईयर का छात्र वयसंधी के मोड पर खड़ा हमारा उत्तराधिकारी होता है।वो दुधमुंहा बच्चा नही बल्कि समझदारी की दुनिया मे कदन रख चुका होता है।फ़िर उससे ऐसी बेवकूफ़ी की उम्मीद तो कोई नही कर सकता?तो फ़िर क्या वज़ह है कि वे ऐसा कठोर फ़ैसला ले लेते हैं जिसकी सज़ा वे अपनी जान देकर और पूरे परिवार को मरते दम तक़ सालते रहने वाला दुःख देकर भुगत लेते हैं।

देखने को तो ये बहुत मामली सी बात लगती है और खासकर तब जब मरने वाला कोई अपना ना हो।मगर जब कोई अपना होता है तो समझ मे आ सकता है,आत्महत्या का दर्द, मरने वाले से ज्यादा उसके जाने के बाद पीछे छूटे रिश्तेदार खासकर मां-बाप,भाई-बहन को होता है।

खैर इस बारे मे बहुत सी बातें पहले हुई होंगी और शायद होती ही रहेंगी तब-तक़,जब तक़ हम अपने बच्चों को उस स्थिती मे जाने के लिये ढकेलते रहेंगे।पता नही क्यों हम अपने बच्चों से ज़रूरत से ज्यादा अपेक्षा करने लगते हैं?क्यों हम उनसे हमेशा बेहतर और उससे भी बेहतर की उम्मीद करते हैं?मेरे भी घर मे दो बहुत ही छोटी क्लास के छात्र हैं।उनमे से एक क्लास थ्री की स्टूडेंट है मेरी भतीजी युति और दूसरा पी पी यानी के जी टू का स्टूडेंट है हर्षू।दोनो की ही मम्मी परीक्षा के समय बेहद तनाव मे रहती है और बच्चों को रिज़ल्ट खराब आया तो देखना,ये नही मिलेगा,वो नही मिलेगा कहकर धमकाते रहती है।मैने कई बार उन लोगों से कहा कि तुम लोग अपने मार्क्स बताओ फ़िर उनसे कुछ कहो।इस बात पर वे मेरे सामने तो कुछ नही कहती लेकिन बाद मे बच्चों को फ़िर से धमकी मिल जाती है बाबा को बताया ना तो देखना।

आखिर फ़र्स्ट आकर कर ही क्या लेगा बच्चा और अगर फ़ेल भी हो जाये तो क्या फ़र्क़ पड़ जायेगा।बहुत समय नही हुआ है जब यंही के एक कक्षा पांचवी की छात्रा को अप्रेल फ़ूल बनाने वालों ने फ़ेल बता दिया था और उस छोटी सी बच्ची ने आत्मह्त्या जैसा बड़ा कदम उठा डाला था।
पता नही मनोवैज्ञानिक इस मामले मे क्या कहतें हैं पर मुझे तो लगता है कि हमारी मह्त्वाकांक्षा,हमारी अपेक्षायें बच्चों को बेवज़ह तनाव मे रखती मे रखती है और जाने-अंजाने उनकी अपेक्षाओं पर खरी नही उतर पाने किस्थिति में उन्हे खुद को ही खत्म कर लेने जैसा कठोर कदम उठाने पर मज़बूर कर रही है।मैं समझता हूं अब भी बहुत कुछ नही बिगड़ा है हमे दूसरों के दुःख से सबक ले लेना चाहिये और अपने बच्चों को अपना स्टेटस सिंबल बनाने,अपने फ़्यूचर का जुगाड़ बनाने की बजाये उन्हे खुद अपना स्टेटस तय करने और अपना भविष्य बनाने के लिये स्वतंत्र कर देना चाहिये,वर्ना आत्मह्त्या विषाद का कारण बनती रहेंगी।

18 comments:

जी.के. अवधिया said...

"लगातार आत्मह्त्या कंही न कंही ये सोचने को मज़बुर कर रही है कि इस पूरे मामले मे दोषी कौन है?"

अनिल जी, दोषी है हमारी कुशिक्षा। आत्महत्या सबसे बड़ी कायरता है किन्तु यह शिक्षा हमारे यहाँ कभी दी ही नहीं जाती। विदेशों से प्रभावित इस देश की शिक्षानीति उम्मीद भी नहीं की जा सकती कि वह कुछ अच्छी शिक्षा दे पायेगी।

खुशदीप सहगल said...

अनिल भाई,
दरअसल आज जिस तरह हम बच्चों का पालन करते हैं, समस्या वही हैं...पहले या गांव में अब भी बच्चे मिट्टी में खेलते-पलते-बढ़ते हैं...वहीं से उनका इम्युन सिस्टम इतना ताकतवर हो जाता है कि बीमारियां उनके पास फटकती भी नहीं...साथ ही उनमें मुश्किल हालात से लड़ने का हौसला भी आ जाता है...और शहरों में हमारे घरों में क्या होता है...बच्चे को मिट्टी तो दूर पलंग से ही नीचे नहीं उतरने दिया जाता....अभी बच्चा रोना शुरू ही करता है, पूरा परिवार उसे चुप कराने के लिए जुट जाता है...छोटे-छोटे बच्चों को ही हेवी एंटीबायोटिक्स खिलाई जाती हैं...उनका इम्युन सिस्टम मज़बूत हो तो हो कहां से...यही बच्चे काक्रोच, छिपकली से इतना डरते हैं, अगर कहीं सांप दिख जाए तो फिर उनकी हालत अपने आप ही समझ आ सकती है...बच्चों की केयर करना अच्छी बात है, लेकिन कभी कभी उन्हें खुले में भी छोड़ना चाहिए...बच्चों को अपने विवेक से फैसले लेने के लिए प्रेरित करना चाहिए...बड़े होकर यही उनका आत्मविश्वास बढ़ाने में काम आएगा...अगर हर बात पर वो आपके फैसलों से ही चलते रहेंगे तो ये उन्हे गलाकाट प्रतियोगिता के माहौल में दब्बू ही बनाएगा...और यही कमजोरी कभी कभी इतनी बढ़ जाती है कि कच्चे दिमाग हालात से लड़ने में खुद को असहाय पाते हैं तो आत्महत्या जैसे दुस्साहस की बात भी सोचने लगते हैं...

जय हिंद..

ललित शर्मा said...

कल मै इस इंजिनियर बालक के
अंतिम संस्कार में शरीक हुआ।
बहुत दुर्भाग्यजनक था।
पुरे परिवार का बुरा हाल था।
एक जवान बेटे का असमय चले
जाना बड़ा ही दुखद था।

बहुत दुखद घटना थी।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आत्महत्याओं का आंकड़ा तेजी से बढ़ा है। पूँजीवाद के विकास का यह चरण जिस कदर लोगों को प्रतियोगिता में लाकर खड़ा करता है उस ने सभी को असहज कर दिया है।
इस अर्थ व्यवस्था ने जीवन मूल्यों को बदला है। अब जीवन एक बाजार दिखाई देता है। इस बाजार में सट्टे की हार आत्महत्या तक ले जाती है।
लगता है हम बच्चों को सटोरियों में बदल रहे हैं।

मनोज कुमार said...

अपने बच्चों को अपना स्टेटस सिंबल बनाने,अपने फ़्यूचर का जुगाड़ बनाने की बजाये उन्हे खुद अपना स्टेटस तय करने और अपना भविष्य बनाने के लिये स्वतंत्र कर देना चाहिये
एक विचारोत्तेजक आलेख। आपसे सहमत।

राज भाटिय़ा said...

जो बच्चे आत्महत्या करते है उस के पीछे उन के मां बाप का ही हाथ होता है.... मैने खास कर ओर भारतियो मे यह बात देखी है की बच्चे को पेदा होते है अपने सपने धोपने लगेगे, तुम यह बनो तुम वो बनो कम से कम ९०% इस से कम आने पर लानत मनालत... ओर फ़िर कई बच्चे अपनी मार्क सीट मां बाप के मुंह पर मारते है ओर चले जाते है इस बकवास दुनिया से....
बहुत सुंदर लिखा आप ने

काजल कुमार Kajal Kumar said...

समाज में हर रोज़ और सिकुड़ती परिभाषाएं शायद इन प्रवृतियों के उद्वेलन में सहायक हो रही हैं.

sangeeta swarup said...

आपकी चिंता जायज़ है...आज कल पढाई के साथ बच्चे कितना तनाव झेलते हैं ये आत्महत्या के आंकड़े स्वयं ही गवाही देते हैं...बहुत अच्छा लेख लगा...काश इसे पढ़ कर माता पिता बच्चों के बारे में सोचें...

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

आत्महत्या शॉर्टकट संस्कृति का औजार है। वह संस्कृति जो रटने, चोरी करने, स्वास्थ्य की बजाय क्रीम पोत कर सुन्दर बनने को प्रेरित करती है। वही असफल होने पर अपने को समाप्त करने को भी!

दीपक 'मशाल' said...

आत्महत्या है तो हल लेकिन....... बिना बैलों का.. :)

डॉ महेश सिन्हा said...

अपने देश में आजकल बच्चों पर पूरी तरह से मानवाधिकार का हनन हो रहा है अगर ऐसा विदेश में होता तो माँ बाप जेल में होते

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

सर, अच्छा लेख है. वैसे आत्महत्या का निर्णय आदमी बड़ी ही कठिन स्थितियों में लेता है. लेकिन बच्चों द्वारा प्रेशर में यह किया जाना तो उनके मां-बाप की फेल्योर को दर्शाता है.

Ajay Tripathi said...

aatm hatya achchi bat nahi hai es anjam tak pahuchana bhi chanik ya ganbhir chinta ka karan hota hai

DR. ANWER JAMAL said...

aise bhi log hue hain.
jinhe duniya pujti hai,
woh bhi suicide karke mar gaye.
woh to gurukul men padhe the.
pls see my article and educate ur children about Islam, The real Sanatan Dharma
http://vedquran.blogspot.com/2010/03/under-shadow-of-death.html

boletobindas said...

दादा निराशा में इंसान क्या नहीं कर गुजरता, .... नए दौर में कंपटिशन के दौर में बच्चों को क्या करना चाहिए ये सब मां-बाप बताते हैं पर इससे जुडे दबाव से कैसे निपटना चाहिए ये कोई मां-बाप नहीं जानता, अपनी पूरी न हुई ख्वाहिश का दबाव भी उनपर डाल देता है....यानि शुरुआत ही खराब है....पहला शिक्षक ही अनजान है....तो फिर इस तरह की घटना से रोज दो-चार होना ही पड़ेगा....


पर दादा .......
हंसी जो आपके कान में गूंज रही थी, वो तो पूरी तरह से साझा कीजिए...

सतीश सक्सेना said...

बच्चों पर मानसिक दवाब बनाने में अक्सर माता पिता की अपेक्षा ही दोषी है, फास्ट डिविजन से काम नहीं चलता उसे टॉप मार्क्स चाहिए अन्यथा अछे कोलेज में एडमिशन नहीं होगा ! अक्सर माँ बाप यह असहनीय दवाब में अपने मासूम को सालों रखते हैं ...और इस दौरान खुद कोई त्याग या अच्छा अनुकूल माहौल देने का प्रयत्न नहीं करते नतीजा एक मासूम गहरे अन्धकार की तरफ खिचता चला जाता है !
बहुत बढ़िया और आवश्यक पोस्ट !
शुभकामनायें अनिल भाई

SANJEEV RANA said...

अनिल जी ,ये जानकर हर बार दुःख होता हैं की फिर आज फलां बच्चे ने suside कर लिए हैं.
iske कारण तो बहुत हैं और में ये समझता हु की जब तक ये अफरा - तफरी का दौर चलता रहेगा तब तक ये बातें तो होती ही रहेगी

शरद कोकास said...

कहीं उस छात्र ने अभी आई आमिर खान की फिल्म तो नही देखी थी ?