Thursday, September 2, 2010

आन्ध्र के पोलावरम बांध मे डूब कर खत्म हो जायेंगे दोरला आदिवासी!खामोश क्यों हैं मानवाधिकारवादी,पर्यावरणवादी और नक्सलवादी?

गोंड जनजाति   की 56 शाखाओं मे से एक दोरला जनजाति भारत मे सिर्फ़ बस्तर और खासकर दक्षिण बस्तर मे ही रहती है।द्रविड़ संस्कृति के बेहद करीब है दोरला जनजाति की संस्कृति।दोरला तेलगु से संबंधित दोरली भाषा बोलते हैं।आंध्र प्रदेश मे प्रस्तावित पोलावरम बांध का छ्त्तीसगढ सरकार पहले भी ज़ोरदार विरोध कर चुकी है मगर उस बांध को हरी झण्डी मिल चुकी है।
इस बांध के बनने से पता नही किसे क्या फ़ायदा होगा मगर भारत मे रहने वाली दुर्लभ दोरला जनजाति के  लगभग 13000  लोगों के अस्तित्व पर संकट के बादल छ्ये हुयें हैं।आदिवासियों की खासियत होती है कि ये अपना मूल स्थान नही छोडते और बांध बनने से डूबान मे आ रहे इनके तमाम गांवों का व्यवस्थापन कैसे और कौन कर पायेगा ये अभी तक़ नही हो पाया है।
छत्तीसगढ के बस्तर के आला अफ़सर इस काम को असंभव बता कर पहले ही सरकार को सचेत कर चुके हैं ।वैसे दक्षिण बस्तर मे अपना अघोषित साम्राज्य स्थापित करने मे जी-जान से जुटे कथित आदिवासी समर्थक नक्सलियों ने भी इस मामले मे मुंह तक़ नही खोला है और ना ही अप्रत्यक्ष रूप से उन्हे समर्थन करने वाले कथित मानवाधिकारवादी और पर्यावरणविदों की इस ओर नज़र गई है।शायद आदिवासी सिर्फ़ म्यूज़ियम मे रखने की और उसके बारे मे बढ-चढ कर बातें करके खुद को प्रगतिशील बताने का ज़रिया भर बस हैं।
यंहा के मानवव विज्ञान विशेषज्ञों का कहना है कि न केवल दोरला बल्कि कोई भी आदिवासी व्यस्थापन को स्वीकार नही कर पाता।अब सवाल ये उठता है कि क्या पोलावरम बांध मे दुर्लभ और सारे देश मे सिर्फ़ बस्तर मे मिलने वाली दोरला जनजाति का नामोनिशान मिट जायेगा और वो हमारी भावी पीढी को पढाने के लिये सिर्फ़ किताबों मे नज़र आयेगी?उनके साथ-साथ बस्तर के कुदरती साल के जंगल भी खतरे मे हैं और जैव-विविधता का अनूठा उदाहरण प्रकृति का  अनुपम उपहार भी पानी के नीचे डूब कर कहतम हो जायेगा?

12 comments:

Rahul Singh said...

यथास्थिति और विकास का शाश्‍वत द्वंद.

PN Subramanian said...

राहुल जी ने जो कहा है उसके आगे कुछ कहने की गुन्जायिश ही नहीं बन रही है.

arvind said...

saarthak...jankaripurn lekh...badhiya post. krasnastami ki subhakaamanaayen.

18121907 said...

इस समस्या पर ध्यान आकर्षित करने के लिये आपका धन्यवाद

Vivek Rastogi said...

शायद आदिवासियों की यही नियती है।

राज भाटिय़ा said...

अजीब बात है? धन्यवाद इस जानकारी के लिये
कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ

प्रवीण पाण्डेय said...

एक और समस्या।

डॉ महेश सिन्हा said...

आंध्र में काँग्रेस सरकार है इसलिए उसका प्रोजेक्ट पर्यावरण मंत्रालय मंजूर कर देता है । इस योजना का प्रभाव न केवल बस्तर बल्कि पूरे भारत पर होगा , मध्य भारत की वन शृंखला को प्रभावित करके ।

ali said...

बड़ी ही चिंताजनक स्थिति है !

ताऊ रामपुरिया said...

जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं.

रामराम.

बेचैन आत्मा said...

पीपली लाइव के मीडिया की टीम वहाँ क्यों नहीं जाती!
क्या सभी का अस्तित्व होरी महतो की तरह समाप्त हो जाएगा!

शरद कोकास said...

जो लोग खामोश रहते आये है वे खामोश रहेंगे ही उनसे क्या उम्मेद कर सकते हैं ?