Friday, July 1, 2011

क्या चवन्नी हटा रहे हो सरकार सीधे चवन्नी छाप लोगों को ही हटा दो,न रहेगा गरीब और ना होगी गरीबी!

सरकार ने चवन्नी कू बंद कर दिया है।पता नही क्या कारण है।ढलाई में नुकसान की बात कहेंगे तो सौ ऐसी सरकारी दुकान गिनाई जा सकती है जो हमेशा घाटे में ही चलती है।खैर पता नही क्यों इस चवन्नी से खफ़ा हो गई सरकार्।इससे पहले एकन्नी,दुअन्नी भी बंद की जा चुकी है।एक पैसा,दो पैसा ,तीन पैसा और पंजी,दस्सी भी गुज़रे ज़माने की बात हो गई है।ले देके एक चवन्नी थी जो इस देश के चवन्नी छाप लोगों की तरह अपने अस्तीत्व को बचाने के लिये संघर्ष कर रही थी।उसका संघर्ष शायद देखा ही नही गया सरकार से और कर दिया बंद चवन्नी को।अब चवन्नी छाप लोगों को तो हटा नही सकते सो चवन्नी ही हटा दी।                                                                   अब हटाना ही था तो हटाते हज़ार का नोट।एक नोट में चार हज़ार चवन्नियां आती है सरकार।मगर उसे कैसे बंद कर सकते हैं ?वो गरीबों के पास तो होता ही नही है?सिर्फ़ बड़े लोगों के पास होता है।और कई बड़े-बड़े लोगों के पास तो इस्का अनएकाऊंटेड खज़ाना होगा।अगर उसे बंद कर देते तो उनका क्या होगा जिनकी हाबी ही बड़े नोट ज़मा करना?                                                                                                                                                       छोटे-मोटे लोगों के रोज़ काम आने वाली चवन्नी बंद करके पता नही क्या तोप मार लिया सरकार नें।वैसे भी सैकड़ो-लाखोम लोगों को जिन्हे सरकार काम तो कुछ नही देती,भीख भी नही,उन लोगों के लिये चवन्नी ही सहारा थी।मंदिरों मे भगवान के सामने मंहगी से महंगी मिठाई का भोग लगाने वाले पुजारी की थाली में कड़कड़ाते नोट डालने धर्मपरायण लोग मंदिरों से बाहर निकलते ही भीखारियों की भीड़ के सामने जेब में हाथ डाल कर चवन्नी ही टटोलते हैं।चवन्नी नही मिलने पर चिल्हर नही है कल ले लेना कह कर सरकार की तरह आश्वासन देकर बढ लेते हैं।अब तो चवन्नी है ही नही।देने का झंझट ही नही रहेगा।अच्छा है भगवान के दरबार में कुछ ज्यादा ही भीड़ लगने लगी थी,बाबाओं के पंडालों की तरह।बस अब ना चवन्नी रहेगीम्न भीख मिलेगी और ना भीड़ होगी मंदिरों में।ये साले भीखारी भी सरकार को लगता है भगवा वोट बैंक नज़र आ रहे थे।हो सकता  हो उनके चक्कर में ही चवन्नी निपट गई हो।                                                                                                     वैसे भी सरकार पूरी तरह से कटिबद्ध है गरीबी हटाने के लिये और उसी की चरणबद्ध योजना का ये पहला चरण लगता है चवन्नी का बंद करना।अब अट्ठन्नी बंद कर देंगे।एक और दो रूपये का नोट तो समझ लो बड़े लोगों की इकन्नी,दुअन्नी हो गई है।पांच रूपये का नोट कभी-कभार चवन्नी-अट्ठन्नी की तरह नज़र आ जाता है।सीधे दस और बीस से शुरु होती है हमारी मुद्राप्रणाली।यानी सिर्फ़ और सिर्फ़ बड़े लोगों के लिये है तो फ़िर यंहा इस देश में छोटे और गरीबों का क्या काम?घर में कपड़े मांज़ना,बरतन धोना,झाड़ू-पोछा लगाना,बच्चों को खिलाना,गाड़ी चलाना,बगीचों को पानी देना और कुत्तों को नहलाने से लेकर घुमाना और वो सब कराना जो अपने बच्चों को भी नही करा पाते।फ़िर ऐसे लोगों के लिये है ना बड़े-बड़े लोगों के पास नोतों के बंडल।देते रहेंगे और उसी से काम चलाते रहेंगे चवन्नी छाप लोग्।अब इनको तो बंद कर नही सकते ना सो इनकी रसद लाईन चवन्नी ही बंद कर दी।अब ना रहेंगे गरीब और ना रहेगी गरीबी।सरकार पर भी वादा खिलाफ़ी का आरोप नही लगेगा कि वो गरीबों के लिये कुछ नही कर रही है।अब इससे ज्यादा और क्या कर सकती है सरकार।गरीब भी नोट चलायेगा और अमीर भी।है ना समानता का नया फ़ंडा।और हम अपने विदेशी आकाओं को भी बता सकते हैं कि हमारे यंहा खर्च करने कि क्षमता बढ गई है अब लोग चिल्हर इस्तेमाल ही नही करते।हा हा हा हा।मस्त,बढिया काम कर रही है सरकार भिखारियों तक़ का हक़ मार रही है,और जमा कर रहे है राजा,कलमाड़ी,मधु कोड़ा,कन्नीमोज़ी।

4 comments:

Udan Tashtari said...

न रहेगा बाँस...न बजेगी बाँसुरी....

bhart yogi said...

अनिल भैय्या आपने भिखारियों की चिंता की है। ये बहुत बड़ी बात है। सरकार ने भिखारियों के हक पर डाका डाला है। लेकिन अब तो एक और दो रूपए भी बंद होते नजर आ रहे हैं। छत्तीसगढ में धीरे धीरे पांच रूपए माकेट से गायब हो गया है। पन्द्रह का माल बीस में बेचा जा रहा है। सवा रूपए का माल चवन्नी बंद होने से एक रूपए तो नहीं हुआ हां बारा आने मंहगा जरूर हो गया सीधे दो रूपए हो गया मेरा एक ही मानना है अमीर और अमीर हो गया और गरीब और गरीब हो गया एसे में हम नक्सलवाद को खत्म करने की बात कर हैं। गुरूवार 30 जून को आरआरएस प्रमुखो ने भाजपा शासित राज्यों की बैठक लेकर नक्सलवाद से निपटने कहा मैं भी मानता हूं कि नक्सलियों के पास चीनी हथियार है। वह देश के दुश्मन है लाल आतंक से वह चीनी आतंक बन जाएगें. लेकिन राष्ट्र हित के बारे में सबसे ज्यादा सोचने वाली आरएसएस इस विषय पर क्यो नहीं सोचती की एक चवन्नी ने पूरे भारत को गरीब बना दिया है। वान्देमातरम मैने बचपन में चित्रहार देखा था जिसमें नवंरग का एक गाना था ये ..माटी ..सभी ...की कहानी कहेगी

DUSK-DRIZZLE said...

CHHAVANANI CHHAP SAMPADAKO AUR PATRAKRO KE BARE MAIN KYA KHAYAL HAI APKA BHAIYA.
SANJAY VARMA

प्रवीण पाण्डेय said...

सोचना करोड़ों में होगा लेकिन चवन्नी भी बचानी होगी।