Monday, November 12, 2012

धर्मांतरण को कम्पलसरी कर दो ना.ना रहेगा हिंदू ना रहेगा प्रदूषण का झंझट

दीवाली को पटाखे मत फोडो.होली पर रंग मत खेलो.मिठाई मत खाओ.चाकलेट खाओ और खिलाओ.बलि मत दो.ये मत करो,वो मत करो.पटाखे फोडने से प्रदूषण होता है,रंग खेलने से जल संकट उत्पन्न होता है.बलि प्रथा क्रूरता का प्रतीक है.जानवरो पर अत्याचार है पाप है.ठीक है मान लेते हैं.लेकिन क्या ये सारे उपदेश सिर्फ और सिर्फ हिंदूओ के लिये ही है.बहुसंख्यको के इस देश में बहुसंख्यको को अपने त्योहार परम्परागतक तरीके से मनाने से मना
 करने के लिये बहानो के जाल बुने जा रहे है.ये षडयंत्र सिर्फ हिंदू के तीज त्योहारो को ही निशाना बना रहे है.मान लेते है पटाखो से प्रदूषण होता है,तो कितना होता है?सारे देश में दीवाली के दिन फोडे गये पटाखो से ज्यादा प्रदूषण तो एक ही दिन में किसी भी शहर का औद्योगिक केंद्र फैला देता है.हमारे शहर रायपुर से लगा औद्योगिक केंद्र का एक दिन का तो एक दिन में कई दीवालियो को काला कर रहा है.फिर जिन पटाखो से दीवाली पर प्रदूषण होता है उन पटाखो से न्यू ईयर पर क्यों नही होता?नेताओं के विजय जुलूस पर क्यों फ़ोडने दिये जाते है पटाखे.होली पर रंग खेल्ने से पानी की बर्बादी होती है.अच्छा तो नेताओ के बंगलो में गाडियो का काफिला धोने से लेकर कुत्ते बिल्ली तक़ को नहलाने में क्या पानी की बरबादी नही होती?किसानो के लिये बनाये गये बांधो से उद्योगो को पानी देने से पानी बरबाद नही होता?बलि देना हिंदूओ के त्योहारों में पाप है और बाकि लोगो के लिये पुण्य.नये साल मे रात भर फोडो पटाखे.इतना नाटक करने से अच्छा सीधे सीधे देश में धर्मांतरण को कम्पलसरी कर दो ना.ना रहेगा हिंदू ना रहेगा प्रदूषण का झंझट.थू है साले दोगले सिस्टम पर.

6 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

हम्‍म.

एक दृष्‍टि‍कोण ये भी है.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

सुन्दर प्रस्तुति!
--
दीवाली का पर्व है, सबको बाँटों प्यार।
आतिशबाजी का नहीं, ये पावन त्यौहार।।
लक्ष्मी और गणेश के, साथ शारदा होय।
उनका दुनिया में कभी, बाल न बाँका होय।
--
आपको दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ!

अहफ़ाज रशीद said...

seedhi baat. no bakwaas.

GYanesh Kumar said...

अनिल जी सर्वप्रथम दीपावली की हार्दिक शुभकामनाऐं।
शाबास मेरे यार मजा आ गया।उस कालनेमि नहेरु के हाथ में प्रथम सत्ता क्या आयी उसने इसे अपनी बापौती ही बना डाला। और हिन्दु आज तक इसके खिलाफ एक जुट नही हो पाया है।हिन्दु की यह त्रासदी ही है कि यह पिछले 1200-1300 वर्षों से एकजुट ही नही हो पा रहा है।अब नया घटनाक्रम देखों पता नही गडकरी ने कोई घोटाला किया है या नही औऱ जब आपको कुछ दिखाई दे तभी तो बोलोगे कि बह वेईमान है किन्तु नही सबकी अपनी अपनी महत्वाकांक्षा कभी क्लीन चिट देते है तो वही व्यक्ति दीपावली की सौगात में कहता है कि कोई क्लीन चिट नही दी उधर भारतीयता के दुश्मन वेईमानी के पुराने कीर्तिमान तौड़ नया कीर्तिमान गढ़ रहे हैं फिर भी कही टूटन नही सब के सब एक जुट होकर भारत को गटक रहें हैं लैकिन कभी हिन्दुत्व के पुरोधा बनने बाले वालासहाव ठाकरे हिन्दु को प्रान्त में बांटकर अलग कर देते हैं कभी कोई मोदी के नाम पर एकजुट नही हो सकता कभी कोई आडवाणी जिन्ना को महान बताता है कभी गडकरी सहाव उस नालायक दाउद से महान विवेकानन्द की तुलना कर देते हैं।मुझे तो लगता है कि शायद हिन्दु मरने के लिए विल्कुल तैयार वैठा है।लैकिन भाई ऐसे तो मरा नही जाऐगा भई हम तो कलम के सिपाही हैं लिखेंगे जरुर और चाहैं जेल ही क्यों न हो जाए जब तक जीवन है हिन्दु को जरुर जगाएगें।आपकी टिप्पणी वर्तमान ईसाईयत व इस्लामिक मानसिकता पर अच्छा उत्तर है।मजी आ गया।
http://rastradharm.blogspot.in/ज्ञानेश कुमार वार्ष्णेय

Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता said...

baaba re :)

काजल कुमार Kajal Kumar said...

आप बहुत गुस्‍सा हैं