Wednesday, June 19, 2013

ईश्वरीय चमत्कार ना माने पर इंजिनीयरिंग की तो मिसाल मानना ही पडेगा

त्रिवेणी संगम के बीच सदियों से अक्षत खड़ा आठवीं सदी का कुलेश्वर महादेव मंदिर बहुत से लोगों के लिए ईश्वरीय चमत्कार से कम नहीं है, और जो ईश्वर पर आस्था नहीं रखते उनके लिए भी कम से कम इंजीनियरिंग की मिसाल तो है ही। इसी नदी पर बना पुल 40 साल भी नहीं टिक पाया है और ये खड़ा है सदियों से जस का तस।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से मात्र 45 कि.मी. दूर है पवित्र नगरी राजिम। यहाँ पैरी,सोंढूर और महानदी का त्रिवेणी संगम है। नदी के एक किनारे भगवान राजीवलोचन का मंदिर है और नदी के बीच में कुलेश्वर महादेव का। नदी के ठीक किनारे एक और महादेव का मंदिर जिसे मामा का मंदिर भी कहा जाता है और कुलेश्वर महादेव को भाँजे का मंदिर कहते है। ऐसी मान्यता है कि बाढ़ में जब कुलेश्वर महादेव का मंदिर डूबता था तो वहाँ से आवाज़ आती थी मामा बचाओ। इसीलिए यहाँ नाव पर मामा-भाँजे को एक साथ सवार होने नहीं दिया जाता।

खैर ये तो है आस्था और कहावतों की बात। लेकिन एक महत्वपूर्ण तथ्य ये भी है कि सातवीं-आठवीं शताब्दी का ये मंदिर आज भी खड़ा है मौसम को चुनौतियाँ देता हुआ। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि इसी नदी पर मंदिर से कुछ ही दूरी पर नयापारा और राजिम दोनों बस्तियों को जोड़ने वाला पुल है। सन् 1971 में यातायात के लिए खोला गया ये नेहरू पुल आज खस्ताहाल होकर खतरनाक स्थिति में पहुँच गया है। आधुनिक इंजीनियरिंग का नमूना 40 साल भी नहीं टिक पाया है और उसी जलधारा के बीचों-बीच खड़ा कुलेश्वर मंदिर उस काल की स्ट्रक्चरल, जियोलॉजिकल और इंजीनियरिंग के ज्ञान का प्रमाण दे रहा है।

बरसात के दिनों में बाढ़ का पानी कई-कई दिनों मंदिर को डुबाए रखता है। हाल में तो नदी का गुस्सा कम नज़र आता है लेकिन कुछ सालों पहले जब उसे बांधों से नहीं बांधा गया था तो उसकी उफनती जलधारा क़हर बरपाती जाती थी। इसके बावजूद बाढ़ लाखों क्यूसेक पानी का दबाव अपने बेहतरीन अष्टकोणीय ढाँचे पर आसानी से झेलता आ रहा है कुलेश्वर महादेव। मंदिर का आकार 37.75 गुना 37.30 मीटर है। इसकी ऊँचाई 4.8 मीटर है मंदिर का अधिष्ठान भाग तराशे हुए पत्थरों से बना है। रेत एवं चूने के गारे से उनकी जोड़ाई हुई है। इसके विशाल चबूतरे पर तीन तरफ से सीढ़ियाँ बनी हुई है। नदी की गहराई निरंतर रेत के जमाव से कम हो चुकी है इसलिए मंदिर का चबूतरा लगभग डेढ़ मीटर गहराई तक रेत में ढका हुआ माना जाता है। इसी चबूतरे पर पीपल का एक विशाल पेड़ भी है।

चबूतरा अष्टकोणीय होने के साथ ऊपर की ओर पतला होता गया है। यहाँ उस काल के भवन निर्माताओं के भू-गर्भ विज्ञान के कौशल का पता चलता है। उन्होंने लगभग 2 कि.मी. चौड़ी नदी के बीच और जहाँ देखो वहाँ तक फैले रेत के समुंदर के बीच इस मंदिर की नींव के लिए ठोस चट्टानों का भूतल ढूंढ निकाला था। एकदम बारीक बालू से भरी नदी के बीच एक इमारत को खड़ा करना और उसे सदियों तक टिका रहने लायक बनाने के लिए की गई साइट सिलेक्शन आज के पढ़े-लिखे अत्याधुनिक निर्माण कर्ताओं के लिए आदर्श प्रस्तुत करती है।

तमाम धारणाओं-अवधारणाओं के बावजूद कुलेश्वर महादेव की संरचना जल प्रवाह से होने वाले परिणाम जैसे क्षरण, भू-स्खलन, आर्द्रता और ताप प्रतिरोध से आजतक सुरक्षित है। संरचना स्थानीय भूरा बलुवा और काले पत्थरों से बनी हुई है। नदी की धारा इस अष्टकोणीय संरचना से टकराकर विकेन्द्रित और अभिसरित हो जाती है। प्रवाह के साथ बहने वाले रेत के घर्षण से भी ये अप्रभावित ही है। इंजीनियरिंग की ये शानदार मिसाल आस्था और धर्म को छोड़कर भी अपनी उत्कृष्टता का कायल कर देती है।
हाँ अगर मान्यताओं की बात करें तो ऐसा कहा जाता है कि नदी किनारे बने मामा के मंदिर के शिवलिंग को जैसे ही नदी का जल छूता है उसके बाद बाढ़ उतरनी शुरू हो जाती है। सावन के इस पवित्र महीने में तो श्रध्दालुओं का वहाँ तांता लगा रहता है, वैसे साल भर लोग यहाँ भगवान शंकर के दर्शन के लिए आते रहते हैं। इसके निर्माण के काल पर विवाद हो सकता है लेकिन राजिम के अन्य मंदिर सातवीं-आठवीं शताब्दी के हैं इसलिए इसे भी उसी काल का माना जाता है। ये राज्य सरकार द्वारा संरक्षित स्मारक है और ये प्राचीन काल में छत्तीसगढ़ में मरीन इंजीनियरिंग, जियोलॉजी और कंस्ट्रक्शन इंजीनियरिंग के अत्यंत विकसित होने का सबूत देता है। भगवान शंकर का दर्शन आपको कैसा लगा अपनी राय ज़रूर दीजिएगा। अगली बार आपको बताएँगे छठवीं शताब्दी के ईंटों से बने लक्ष्मण मंदिर के बारे में।

7 comments:

पूरण खण्डेलवाल said...

विचित्र और आश्चर्यजनक जानकारी !!

HARSHVARDHAN said...

आपकी पोस्ट को आज के ब्लॉग बुलेटिन 20 जून विश्व शरणार्थी दिवस पर विशेष ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। सादर ...आभार।

तुषार राज रस्तोगी said...

सार्थक पोस्ट जय हो |

प्रवीण पाण्डेय said...

मन से बनाने का और धन से बनाने का यही अन्तर है।

arvind mishra said...

कुलेश्वर महादेव सचमुच अद्भुत लग रहा है !

Rahul Singh said...

रोचक प्रस्‍तुति. अगले पोस्‍ट की प्रतीक्षा है.

rk dutta said...

अति सुंदर लेख , धन्यवाद्