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Sunday, August 9, 2009

भगवान इससे अच्छा तो तू मुझे मुख्यमंत्री का कुत्ता बना देता!

सुबह-सुबह अख़बार् पर नज़र डाली तो ये पढ कर सन्न रह गया कि शहर के जाने-माने इंस्टिट्यूट मे एक घायल की डाक्टर के आने तक़ वंहा बैठे-बैठे जान चली गई।ब्लाग जगत मे आने पर पता चला कि मध्यप्रदेश के सीएम के कुत्ते को इलाज के लिये भोपाल से जबलपुर भेजा गया है।भाई रविंद्र कैलासिया ने बखूबी इस खबर को खबर की तरह पेश कर वो सब कुछ कह दिया जो एक पत्रकार को कहना चाहिये।उनकी जितनी तारीफ़ की जाय कम है।

लेकिन इन दोनो खबरों ने मुझे हिला कर रख दिया।यंहा मरीज को सीटी स्कैन कराने के लिये डाक्टरो का घण्टो इंतज़ार करना पडा और इस कारण वो इलाज के बिना ही दुनिया छोड गया। और दूसरी तरफ़ वो कुत्ता है जिसे अब राजधानी के डाक्टरो के बाद जानवरो के अस्पताल के विशेषज्ञ डाक्टर देख रहे हैं।कई बार गरीबो को अस्पताल की बैंच पर बैठे डाक्टरों का इंतज़ार करते देखा है।उस समय डाक्टर अंदर अपने,हम जैसे दोस्तो से गप्प लड़ाने मे व्यस्त हों।खैर यंहा रोना सरकारी अस्पताल का नही है।मोटी रकम लेकर सीटी स्कैन करने वाले नोट छापने की मशीन चलाने वाले कारखानो का है।उस मरीज के साथ गये लोगो से पहले ही साडे तीन हज़ार की रसीद काट दी गई,ये देखे बिना की डाक्टर है या नही। अफ़सोस की बात तो ये है कि इसी संस्थान मे पिछले सप्ताह ही एक महिला मरीज के कपडे बदलते समय मोबाईल फ़ोन मे कैमरे से रिकार्डिंग की शिकायत सामने आई थी।एक वार्ड ब्याव को गिरफ़्तार कर मामला रफ़ा-दफ़ा कर दिया गया था।
पहले जो हुआ वो शैतानियत का नंगा नाच था और जो कल हुआ वो भी हैवानियत का नंगा नाच ही है।एक मरीज मौत से जूझ रहा था और स्टाफ़ ने घण्टो तक़ डाक्टर को बुलाया तक़ नही।मै ये नही कहता कि वो बच ही जाता लेकिन बिना इलाज के तडप-तडप कर मर जाना वो भी किसी गांव मे नही,बल्कि राजधानी मे,शर्म से डूब मरने वाली बात है।जवान लडका था वो।दूध लेने निकला था।परिवार मे एक अबोध बच्चा भी है जिस पर अनाथ होने का ठप्पा लगाने का ज़िम्मेदार कौन है समझ नही पा रहा हूं।वो तेज रफ़्तार स्कोर्पियो वाला जिसने उसे ठोकर मारी,या वो अस्पताल वाला जिसने इलाज से पहले सीटीस्कैन करवाने भेज दिया,या फ़िर सीटी स्कैन मशीन चलाने वाले मशीन नुमा इंसान जो खुद को डाक्टर भी कहते हैं।मेरे बहुत से दोस्त डाक्टर हैं और उनसे भी इस बात पर मेरी बहस होगी लेकिन क्या इससे वो जवान लडका वापस ज़िंदा हो जायेगा।

उसकी तडप को मै महसूस कर रहा हूं और मुझे ऐसा लग रहा है कि कंही कभी ऐसा मेरे साथ न हो जाये।उस दर्द की कल्पना करके ही मैं कांप रहा हूं। ऐसा किसी के भी साथ हो सकता है सो मेरे साथ भी। ऐसे मे मुझे रविंद्र भाई की पोस्ट ने हिला कर रख दिया।मुझे ऐसा लगा कि इंसान से तो मुख्यमंत्री का कुत्ता होना अच्छा है।फ़ाईव स्टार स्टैण्डर्ड आफ़ लिविंग।बडे -बडे लोगो पर खुलकर भौंकने की आज़ादी।किसी भी छोटे-मोटे नौकरों को काट लेने की छूट।बीमार होने पर हाई प्रोफ़ाईल डाक्टरों से ईलाज॥एसी मे रहना,एसी कार मे घूमना-फ़िरना।तीन चार नौकर सेवा करने वाले।बडे-बड़े लोगो की जबरिया तारीफ़ और क्या चाहिये जीवन मे। बहुत सोच कर ऐसा लगा कि भगवान ने मेरे साथ अन्याय किया है।इससे अच्छा तो वो मुझे कुत्ता बना देता,तो लाईफ़ का मज़ा आ जाता।