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Thursday, February 25, 2010
शांति से नही पूरी तसल्ली से निपटाये जा रहे हैं हिंदूओं के त्योहार!
होली आई नही कि प्रशासन को उसे शांतिपूर्ण ढंग से निपटाने की चिंता शुरु हो जाती है।इसके लिये शहर की शांति समिति की बैठक बुलाई जाती है और उसमे शामिल यस मैन पुलिस को कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिये अच्छे-अच्छे?सुझाव देते हैं।इस बार यंहा की शांति समिति ने गुब्बारों पर प्रतिबंध लगवा दिया है।इससे अच्छा तो ये होता कि रंग पर ही प्रतिबंध लगा देते।सात दिनों की होली अब सात घण्टे भी नही चलने दी जाती और धीरे-धीरे लगता है इसके लिये भी त्योहार बचाओ आंदोलन छेड़ना पड़ेगा। कहने को ये मामूली सी बात लगती है की गुब्बारों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है लेकिन ध्यान से देखा जाये तो भारत मे अमीर-गरीब सबके लिये समान ढंग से बना खुशियों-उमंगों और रंगों के त्योहार होली को बहुत शांति और पूरी तसल्ली से निपटाया जा रहा है।सिर्फ़ हुल्लड़ के नाम पर इस त्योहार को षड़यंत्र पूर्वक खत्म किया जा रहा है।क्या हुल्लड़ सिर्फ़ होली पर ही होता है,ये सवाल शायद सारे मामले को साम्प्रदायिक कर देगा फ़िर भी सवाल तो सवाल है।क्या विदेशी नये साल के स्वागत के नाम पर कम हुल्लड़ होता है?क्या इस दिन रात को दस या ग्यारह बज़े के बाद पटाखे फ़ोड़ने पर प्रतिबंध लगता है?क्या इस दिन पटाखो और आतिशबाज़ी से प्रदूषण नही होता?क्या इस दिन की चमक-दमक फ़िज़ूलखर्ची और दिखावा नही होती?क्या ये सब सिर्फ़ दीवाली पर होता है?क्या इस बहाने सिर्फ़ दीवाली का और हुल्लड़ -शराब खोरी के नाम पर होली का ही गला घोटा जायेगा?क्या नये साल पर युवाओं की टोलियां नशे मे धुत होकर मौज-मस्ती नही करती?तब कंहा रह जाती है कथित शांति समितियां। सवाल इस बात का नही है कि गुब्बारों पर प्रतिबंध लग गया,सवाल इस बात का है कि गुब्बारों से ऐसा कौन सा खतरा उत्पन्न हो सकता है?गुब्बारों से होली खासकर बच्चे खेलते हैं और छतों या बाल्कनी से खड़े होकर दूर से बिना खुद पकड़ मे आये लोगों को रंगने का मज़ा लेने वाले इसका इस्तेमाल करते हैं?अब गुब्बारे भी नही फ़ोड़ सकते रंग खेलने वाले बच्चे।गुब्बारे फ़ोड़ते दिखे तो बंद कर देगी पुलिस और आतंकवादी मज़े से बड़े-बड़े बम फ़ोड़ रहे हैं?उनको रोकने की हिम्मत तो है नही सो गुब्बारे फ़ोड़ने वाले बच्चों को ही पकड़ लो। होली की याद करो तो दिल दुखता है।होली को कितना छोटा कर दिया गया है।पहले सात-सात दिनों तक़ होली खेली जाती थी अब महज़ सात घण्टे भी नही मिलते खेलने के लिये।रायपुर की ही बात करें तो यंहा बंजारी चौक और सदर बाज़ार ईलाकों मे से निकलने वालों को कुछ दिन पहले ही अख़बारों मे विज्ञप्ति छपवा कर होली खेलने की सूचना दे दी जाती थी।उधर से गुज़रने वालो को बता दिया जाता था कि रंग शुरू होगया है रंगों से आपत्ती वाले उधर से ना गज़रे।लोग वंहा होली खेलने कम देखने के लिये ज्यादा जाते थे। अब तो सुबह सात बज़े होली शुरु होती है और दस बज़े से ही पुलिस वाले सायरन बज़ाते निकल पड़ते हैं शहर मे मानों पड़ोसी मुल्क ने आक्रमण कर दिया हो!होली के एक दिन पहले भी सारे शहर मे पूरी पुलिस फ़ोर्स अपनी तमाम गाड़ियों मे भर कर शहर को ड्रील के नाम पर आतंकित कर देती है।एक सप्ताह पहले से ही धरपकड़ शुरू हो जाती है,तमाम लोग जिनसे पुलिस को लगता है कि रंग मे भंग हो सकता है बुक कर दिये जाते हैं?क्या उनके अंदर रहने से सब कुछ शांति से निपट जाता है?अगर हां तो फ़िर होली के बाद उनको छोड़ते ही काहे के लिये हो। खैर जाने दिजिये सवाल तो ढेरों हैं व्यव्स्था के नाम पर किये जाने-वाले छल-प्रपंच के लिये लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो फ़िलहाल यही है कि हिंदूओं के त्योहारों को जानबुझकर खतम किया जा रहा उस देश मे जंहा हिंदू बहुसंख्यक हैं,अगर अल्पसंक्यक़ हो जायें तो पता नही क्या कर डालेंगे?
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