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Wednesday, April 7, 2010

अरूंधति आओ,देखो 76 जवानों को मौत के घाट उतार दिया गया है?अच्छा लग रहा है ना सुनकर?पड़ गई ना कलेजे में ठंडक?हो गया ना तुम्हारा बस्तर आना सफ़ल?

अरूंधति आओ,देखो 76 जवानों को मौत के घाट उतार दिया गया है?अच्छा लग रहा है ना सुनकर?पड़ गई ना कलेजे में ठंडक?हो गया ना तुम्हारा बस्तर आना सफ़ल?तुम तो सात दिन रहीं थी नक्सलियों के साथ,है ना?उनकी दलाली मे एक बड़ा सा लेख भी लिख मारा था,है ना?बड़ी तारीफ़ हुई होगी,है ना?खैर रोकड़ा तो मिला ही होगा,इस बार नही पूछुंगा,है ना,क्योंकि इसका तो सवाल ही नही उठता।
क्या अब दोबारा बस्तर आओगी अरूंधति?क्या उन 76 जवानों की शहादत पर बिना रोकड़ा लिये कुछ लिख पाओगी?नही ना?हां तुम क्यों लिखोगी?तुम्हे तो यंहा की सरकार,यंहा की पुलिस शोषक नज़र आती है?तुम्हे अच्छे नज़र आते हैं खून की नदियां बहाने वाले नक्सली।तुम्हे अच्छे लगे हैं उनके शिविर मे दिखाये गये वीडियो।तुम्हे अच्छा लगा,उन वीडियो को देखकर वंहा बैठे नक्सलियों का उबाल मारता खून।तुम्हे अच्छा लगा तत्काल विस्फ़ोटक बना कर पुलिस पार्टी को उड़ाने को तत्पर भटके हुये युवाओं का जोश,है ना।भई ये मैं नही कह रहा हूं,मुझे किसी ने बताया कि तुमने बहुत दमदारी और दिल से नक्सलियों की अपने लेख मे वक़ालत की है।
खैर ये तो धंदे की बात है।मगर क्या तुम कल्पना कर सकती हो एक साथ 76 जवानो की बलि।इतने तो आजकल दो देशों की सीमाओं पर हुई मुठभेड़ मे नही मरते अरुंधति जी।दम है तो आओ एक बार फ़िर से बस्तर और उसका खून से सना चेहरा भी दिखाओ दुनिया को,खासकर अपनी उस दुनिया को जो गुज़रात,महाराष्ट्र मे जाकर मोमबत्तियां जलाता है।हिंदू धर्म की वकालत और विदेशी त्योहारों का विरोध करने वालों को पिंक चड़डियां भेजता है।क्या आओगी बस्तर मोमबत्तियां जलाने के लिये?कितनी जलाओगी और कंहा-कंहा जलाओगी?साढे छः सौ जवान शहीद हो चुके हैं हाल के सालों में।इतने शायद युद्ध मे भी नही मरते।आपके फ़ेवरेट स्टेट गुज़रात मे भी नही!
क्यों आओगी यंहा?है ना।सरकार से रोकड़ा तो मिलने वाला नही फ़िर इनसे संबंध का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कोई लाभ भी नही?है ना।मगर सोचो,अरूंधति जवानों को अगर तुम क्रूरता करने वाले राज्य का अंग भी मान लो,तो भी इस घटना से एक और घटना भी तो पैदा हुई है।क्या 76 जवानों के मारे जाने से 76 बहने विधवा नही हुई हैं?क्या 76 बहने रक्षा-बंधन पर उन भाईयों का इंतज़ार नही करती रहेंगी?क्या 76 बूढी हो चली माताओं की कमज़ोर हो चली आंखों से आंसूओं की गंगा नही बह रह होगी?क्या उन्हे अब अपने लाड़ले दोबारा दिख पायेंगे?क्या उनके मुंह से ये नही निकल रहा होगा हे ईश्वर यही दिन दिखाने के लिये ज़िंदा रखा था?
किसने दिखाया ये दिन उन 76 परिवारों को?आपके उन चहेते कथित क्रांतिकारियों ने?जिनके आतिथ्य का सात दिनों तक़ लुत्फ़ उठाती रही आप?क्या आप जायेंगी उन 76 परिवारों मे से एक के भी घर?कैसी औरत हो?क्या औरत होकर भी औरतों का दर्द नही समझ पा रही हो?क्या असमय विधवा होने के दुःख पर नही लिख सकती कुछ तुम?क्या बुढी आंखो के आंसूओं का दर्द बयां नही कर सकती तुम्हारी कलम्।क्या औरतों पर सेक्स और पेज थ्री टाईप का ही लिखने मे मज़ा आता है?
आओ अरुंधति फ़िर से सात दिनों तक़ बस्तर आओ।और लिखो बस्तर का सच्।तब लगेगा कि तुम सच मे लिखने वाली हो वर्ना ऐसा लगेगा कि तुम नक्सलियों के प्रायोजित प्रोग्राम के तहत बस्तर आई थी और उनका पेमेंट लेकर पब्लिसिटी के लिये अपनी साख दांव पर लगा कर एक लेख लिख मारा है तुमने।दम है तो आओ बस्तर और कर दो सच को उज़ागर।बताओ दुनिया को कि यंहा असली शोषण कौन कर रहा है?बताओ,नक्सलियों के पास कैसे-कैसे घातक और आधुनिक हथियार हैं?बताओ उनको कैसे मिल रहे हैं हथियार?बताओ उनको और कौन-कौन कर रहा है मदद?पर्दे के पीछे छीपे आप जैसे कितने और हमदर्द हैं उनके?उनकी मदद के आरोप मे पकड़ाये डा विनायक सेन को छुडाने के लिये पूरी ताक़त लगाने वाले कथित बुद्धिजीवी और मानवाधिकारवादियों के गिरोह कितना बड़ा है और उसकी जड़े कंहा-कंहा,किस-किस देश मे फ़ैली हुई है?है दम?तो आओ बस्तर एक बार फ़िर।वरना हम तो यही सवाल करेंगे,76 जवानों की मौत से खुश हैं ना आप?कलेजे मे ठंडक पड़ गई है ना?आपका बस्तर आना सफ़ल हो गया ना?

Tuesday, April 7, 2009

कम से कम अदालत के फ़ैसले का तो सम्मान करिये अरुंधतिजी

जन-सुरक्षा कानून के तहत बाईस महिनो से जेल मे बंद डा विनायक सेन की रिहाई की मांग के लिये राजधानी रायपुर मे हर सोमवार को प्रदर्शन का कार्यक्रम चलाया जा रहा है।इसी के तहत कल अरुंधति राय यहां आई और सरकार को कोस कर वापस लौट गई।उन्होने जेल मे बंद करने वाली सरकार पर तो जमकर आरोप लगाये मगर डा सेन को अदालत ने जमानत पर रिहा करने की अर्जी को नामंज़ूर क्यों की ,इस पर कुछ नही कहा। डा सेन की रिहाई की मांग करने वाले ये तो कहते है कि सरकार के पास उनके खिलाफ़ कोई ठोस सबूत नही है,फ़िर उन्हे जमानत क्यो नही मिल पा रही इस बात का उनके पास कोई जवाब नही है।मानवाधिकारो की वकालत करने वालो के पास शायद इस सवाल का भी जवाब नही होगा कि अदालत के फ़ैसले का सम्मान करने की बजाये उसके खिलाफ़ जन आंदोलन खड़ा करना या धरना-प्रदर्शन और रैली करना क्या अदालत के काम-काज को प्रभावित करने की कोशिश नही है?क्या ये अदालत की अवमानना नही है?डा सेन को रिहा कराने के लिये अदालत छोड़ आंदोलन का सहारा लेना कितना सही है?क्या अदालत के फ़ैसलो का सम्मान नही किया जाना चाहिये?क्या अदालत के फ़ैसले जो पक्ष मे आते हैं,या सरकारों,खास कर गुजरात सरकार के खिलाफ़ होते है,सिर्फ़ वे सही है?क्या अदालत के फ़ैसलो का सम्मान नही किया जाना चाहिये?

डा सेन की रिहाई की मांग के समर्थन मे अरूंधति राय भी कल यंहा आई थी।हर लेखक को समाज सेवा करना चाहिये,और इस मुल्क मे जो भी चल रहा है उस पर लिखा जाना चाहिये,पत्रकारो को भी लिखना चाहिये।ये सब कहा अरुंधति राय ने।कल पत्रकारो से बातचीत मे उन्होने हर किसी को समाज सेवा करने की सलाह दे ड़ाली। अब समाज सेवा कैसी होनी चाहिये,कैसे करनी चाहिये इन सब बातो के बारे मे तो कुछ नही कहा और तो और अपने रायपुर आने के प्रयोजन के बारे मे भी बहुत से सवालो का जवाब दिये बिना ही उन्होने जाने मे ही भलाई समझी।शायद उनके पास समय नही था।बस टोकन अटेंडेंस ज़रूरी थी जिस आंदोलन के लिये उतना ही समय इन्वेस्ट करके वे लौट गईं।



अरुंधति राय रायपुर आई थी जन सुरक्षा कानून के तहत जेल मे बंद डा विनायक सेन को रिहा कराने के लिये चलाये जा प्रदर्शन कार्यक्रम मे हिस्सा लेने।इसी बीच आयोजको ने मुझ्से संपर्क करके अचानक प्रेस कान्फ़्रेंस लेने की अनुमती चाही।मैने आनन-फ़ानन व्यवस्था करवाई।प्रेस कान्फ़्रेंस मे एक विचारधारा से जुड़े हुये कहिये या समर्थक़ कहिये,लोगो ने विनायक सेन की रिहाई की मांग की।उनमे अरुंधति राय के साथ शामिल थे डा सुभाष गोहळेकर,डा अभय शुक्ला और अनुराधा तलवार समेत कुछ और समाज सेवी। अनुराधा तलवार ने तो यंहा तक़ कह ड़ाला कि छत्तीसगढ के लोग आवाज़ उठाने मे डरते हैं।शायद उनके आंदोलन को वैसा सपोर्ट नही मिल रहा है जैसा उन्होने सोचा था।

अरुंधति से जब पूछा गया कि जिस डा विनायक सेन की रिहाई की मांग वे लोग कर रहे हैं,उनकी ज़मानत अर्जी अदालत से खारिज हो चुकी है,क्या कानून विशेषज्ञों से भरी उनकी टीम अदालत मे अपना पक्ष सही ढग से नही रकह पाई?इस बात का जवाब किसी के पास नही था,सो सवाल को जैसे तैसे टाला गया।सरकार को कोसने और राजधानी रायपुर मे बैठे-बैठे आदिवासियो के नक्सल विरोधी आंदोलन सलवा-जुड़ूम को कोसना तो उनकी मज़बूरी थी क्योंकि वे जिस को रिहा करने की मांग कर रहे है उन्हे नक्सलियो से संबंध होने के आधार पर ही गिरफ़तार किया गया है।उनका समर्थन करना है तो उनके विरोधियो का विरोध करना ज़रूरी हो जाता है।

डा विनाय्क सेन दोषी है या निर्दोष मै इस विषय पर कुछ नही कहना चाहता क्योंकि ये काम अदालत का है।लेकिन मेरा सवाल ये है कि न्याय प्रक्रिया पर पूरा-पूरा विश्वास रखने वाले संगठन और न्यायपालिका से रिटायर विशेषज्ञो से ज़ुड़े संगठन उनकी अदालत से रिहाई कराने की बजाये धरना-प्रदर्शन और रैलियो का सहारा ले रहें है।मेरा एक सवाल ये भी है क्या अदालत के फ़ैसले के बाद उस फ़ैसले का सम्मान करने की बजाय उसके खिलाफ़ धरना-प्रदर्शन कर जन-आंदोलन खड़ा करना क्या अदालत पर दबाव बनाना नही है?क्या ऐसे मे उनकी रिहाई के लिये देश-विदेश से मांग उठना अदालत को प्रभावित करने के प्रयास नही माने जा सकते?क्या ये विरोध प्रदर्शन अदालत की अवमानना नही है?और भी बहुत से सवाल हैं जो मेरे मन मे उमड-घुमड़ रहे हैं,जिन्हे फ़िर कभी और रखूंगा आप लोगों के सामने।