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Tuesday, June 25, 2013
.सिर्फ कायर कह देने से काम नही चलेगा.कुछ करना भी पडेगा.वर्ना इतिहास तो अपना काम कर ही रहा है.वो भी सिर्फ कायर शब्द का ही इस्तेमाल करेगा.
न केवल मुझे बल्कि सभी को याद होगा स्कूल के दिनों में हिन्दी के विरूद्धार्थी शब्द और उनका वाक्यों में प्रयोग.कायर शब्द तब भी सुना था और तब से लेकर आज तक सुनता ही आ रहा हूं.तब स्कूल के मास्टर इसका ज्यादा इस्तेमाल करते थे लेकिन आज देश के प्रधानमंत्री समेत बहुत से नेता इसका बार बार इस्तेमाल कर रहे हैं.पक गये है कान सुन सुन कर और इतनी बार तो मास्साब ने रट्टा मार मार कर याद नही कराया होगा.बचपन से कायर शब्द का अर्थ और उसका वाक्यों में प्रयोग जान गये है पर उसके विरुद्धार्थी शब्द का क्या हुआ बडे गुरूजी?बडे गुरुजी यानी युनिवर्सिटी के मास्साब.कभी कायर के विरुद्धार्थी शब्द का भी अर्थ बताते हुये उसका वाक्य में प्रयोग कीजिये सरजी.या फिर देश के तमाम स्कूलों से हिंदी के शब्दकोष से वीरता शब्द ही हटा दो.हम सब कायर शब्द के और कायरता के कायल हो जायेंगे.झंझट खत्म.जिनके परिवार का सदस्य शहीद होता है वही उसका दर्द जानता है.सिर्फ कायर कह देने से काम नही चलेगा.कुछ करना भी पडेगा.वर्ना इतिहास तो अपना काम कर ही रहा है.वो भी सिर्फ कायर शब्द का ही इस्तेमाल करेगा.
Friday, August 19, 2011
स्वामी जी भ्रष्टाचार से फ़ुरसत मिले तो बस्तर आ जाना और हो सके तो नक्सलियों से कहना कि निर्दोष जवानो को मारना छोड़ें।
एक छोटी सी पोस्ट बेहद बड़ा और गंभीर सवाल लिये हुये।और भी कई गम है ज़माने में भ्रष्टाचार के सिवाय।नक्सलवाद भी एक फ़ोड़ा है को नासूर बन गया है।आज रात फ़िर छुटटी पर जा रहे 9 जवानों को लगभग डेढ सौ नक्सलियों ने घेर कर मौत के घाट उतार डाला।इस वारदात मे चार और जवान गंभीर रूप से घायल है और एक ट्रेक्टर चालक मारा गया है।औपचरिकता के लिये मुख्यमंत्री डा रमन सिंह के घर आला अफ़सरों की बैठक हो गई है।मेरा सवाल ये है कि उन नौ जवानों के घर में आये आंसूओं के सैलाब को कौन थामेगा?क्या स्वामी जी को भ्रष्टाचार के आंदोलन से फ़ुरसत मिलेगी?क्या वे कभी नक्सलियों को कह पायेंगे कि निर्दोष जवानो का खून बहाना बंद करें।
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Wednesday, April 7, 2010
अरूंधति आओ,देखो 76 जवानों को मौत के घाट उतार दिया गया है?अच्छा लग रहा है ना सुनकर?पड़ गई ना कलेजे में ठंडक?हो गया ना तुम्हारा बस्तर आना सफ़ल?
अरूंधति आओ,देखो 76 जवानों को मौत के घाट उतार दिया गया है?अच्छा लग रहा है ना सुनकर?पड़ गई ना कलेजे में ठंडक?हो गया ना तुम्हारा बस्तर आना सफ़ल?तुम तो सात दिन रहीं थी नक्सलियों के साथ,है ना?उनकी दलाली मे एक बड़ा सा लेख भी लिख मारा था,है ना?बड़ी तारीफ़ हुई होगी,है ना?खैर रोकड़ा तो मिला ही होगा,इस बार नही पूछुंगा,है ना,क्योंकि इसका तो सवाल ही नही उठता।
क्या अब दोबारा बस्तर आओगी अरूंधति?क्या उन 76 जवानों की शहादत पर बिना रोकड़ा लिये कुछ लिख पाओगी?नही ना?हां तुम क्यों लिखोगी?तुम्हे तो यंहा की सरकार,यंहा की पुलिस शोषक नज़र आती है?तुम्हे अच्छे नज़र आते हैं खून की नदियां बहाने वाले नक्सली।तुम्हे अच्छे लगे हैं उनके शिविर मे दिखाये गये वीडियो।तुम्हे अच्छा लगा,उन वीडियो को देखकर वंहा बैठे नक्सलियों का उबाल मारता खून।तुम्हे अच्छा लगा तत्काल विस्फ़ोटक बना कर पुलिस पार्टी को उड़ाने को तत्पर भटके हुये युवाओं का जोश,है ना।भई ये मैं नही कह रहा हूं,मुझे किसी ने बताया कि तुमने बहुत दमदारी और दिल से नक्सलियों की अपने लेख मे वक़ालत की है।
खैर ये तो धंदे की बात है।मगर क्या तुम कल्पना कर सकती हो एक साथ 76 जवानो की बलि।इतने तो आजकल दो देशों की सीमाओं पर हुई मुठभेड़ मे नही मरते अरुंधति जी।दम है तो आओ एक बार फ़िर से बस्तर और उसका खून से सना चेहरा भी दिखाओ दुनिया को,खासकर अपनी उस दुनिया को जो गुज़रात,महाराष्ट्र मे जाकर मोमबत्तियां जलाता है।हिंदू धर्म की वकालत और विदेशी त्योहारों का विरोध करने वालों को पिंक चड़डियां भेजता है।क्या आओगी बस्तर मोमबत्तियां जलाने के लिये?कितनी जलाओगी और कंहा-कंहा जलाओगी?साढे छः सौ जवान शहीद हो चुके हैं हाल के सालों में।इतने शायद युद्ध मे भी नही मरते।आपके फ़ेवरेट स्टेट गुज़रात मे भी नही!
क्यों आओगी यंहा?है ना।सरकार से रोकड़ा तो मिलने वाला नही फ़िर इनसे संबंध का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कोई लाभ भी नही?है ना।मगर सोचो,अरूंधति जवानों को अगर तुम क्रूरता करने वाले राज्य का अंग भी मान लो,तो भी इस घटना से एक और घटना भी तो पैदा हुई है।क्या 76 जवानों के मारे जाने से 76 बहने विधवा नही हुई हैं?क्या 76 बहने रक्षा-बंधन पर उन भाईयों का इंतज़ार नही करती रहेंगी?क्या 76 बूढी हो चली माताओं की कमज़ोर हो चली आंखों से आंसूओं की गंगा नही बह रह होगी?क्या उन्हे अब अपने लाड़ले दोबारा दिख पायेंगे?क्या उनके मुंह से ये नही निकल रहा होगा हे ईश्वर यही दिन दिखाने के लिये ज़िंदा रखा था?
किसने दिखाया ये दिन उन 76 परिवारों को?आपके उन चहेते कथित क्रांतिकारियों ने?जिनके आतिथ्य का सात दिनों तक़ लुत्फ़ उठाती रही आप?क्या आप जायेंगी उन 76 परिवारों मे से एक के भी घर?कैसी औरत हो?क्या औरत होकर भी औरतों का दर्द नही समझ पा रही हो?क्या असमय विधवा होने के दुःख पर नही लिख सकती कुछ तुम?क्या बुढी आंखो के आंसूओं का दर्द बयां नही कर सकती तुम्हारी कलम्।क्या औरतों पर सेक्स और पेज थ्री टाईप का ही लिखने मे मज़ा आता है?
आओ अरुंधति फ़िर से सात दिनों तक़ बस्तर आओ।और लिखो बस्तर का सच्।तब लगेगा कि तुम सच मे लिखने वाली हो वर्ना ऐसा लगेगा कि तुम नक्सलियों के प्रायोजित प्रोग्राम के तहत बस्तर आई थी और उनका पेमेंट लेकर पब्लिसिटी के लिये अपनी साख दांव पर लगा कर एक लेख लिख मारा है तुमने।दम है तो आओ बस्तर और कर दो सच को उज़ागर।बताओ दुनिया को कि यंहा असली शोषण कौन कर रहा है?बताओ,नक्सलियों के पास कैसे-कैसे घातक और आधुनिक हथियार हैं?बताओ उनको कैसे मिल रहे हैं हथियार?बताओ उनको और कौन-कौन कर रहा है मदद?पर्दे के पीछे छीपे आप जैसे कितने और हमदर्द हैं उनके?उनकी मदद के आरोप मे पकड़ाये डा विनायक सेन को छुडाने के लिये पूरी ताक़त लगाने वाले कथित बुद्धिजीवी और मानवाधिकारवादियों के गिरोह कितना बड़ा है और उसकी जड़े कंहा-कंहा,किस-किस देश मे फ़ैली हुई है?है दम?तो आओ बस्तर एक बार फ़िर।वरना हम तो यही सवाल करेंगे,76 जवानों की मौत से खुश हैं ना आप?कलेजे मे ठंडक पड़ गई है ना?आपका बस्तर आना सफ़ल हो गया ना?
क्या अब दोबारा बस्तर आओगी अरूंधति?क्या उन 76 जवानों की शहादत पर बिना रोकड़ा लिये कुछ लिख पाओगी?नही ना?हां तुम क्यों लिखोगी?तुम्हे तो यंहा की सरकार,यंहा की पुलिस शोषक नज़र आती है?तुम्हे अच्छे नज़र आते हैं खून की नदियां बहाने वाले नक्सली।तुम्हे अच्छे लगे हैं उनके शिविर मे दिखाये गये वीडियो।तुम्हे अच्छा लगा,उन वीडियो को देखकर वंहा बैठे नक्सलियों का उबाल मारता खून।तुम्हे अच्छा लगा तत्काल विस्फ़ोटक बना कर पुलिस पार्टी को उड़ाने को तत्पर भटके हुये युवाओं का जोश,है ना।भई ये मैं नही कह रहा हूं,मुझे किसी ने बताया कि तुमने बहुत दमदारी और दिल से नक्सलियों की अपने लेख मे वक़ालत की है।
खैर ये तो धंदे की बात है।मगर क्या तुम कल्पना कर सकती हो एक साथ 76 जवानो की बलि।इतने तो आजकल दो देशों की सीमाओं पर हुई मुठभेड़ मे नही मरते अरुंधति जी।दम है तो आओ एक बार फ़िर से बस्तर और उसका खून से सना चेहरा भी दिखाओ दुनिया को,खासकर अपनी उस दुनिया को जो गुज़रात,महाराष्ट्र मे जाकर मोमबत्तियां जलाता है।हिंदू धर्म की वकालत और विदेशी त्योहारों का विरोध करने वालों को पिंक चड़डियां भेजता है।क्या आओगी बस्तर मोमबत्तियां जलाने के लिये?कितनी जलाओगी और कंहा-कंहा जलाओगी?साढे छः सौ जवान शहीद हो चुके हैं हाल के सालों में।इतने शायद युद्ध मे भी नही मरते।आपके फ़ेवरेट स्टेट गुज़रात मे भी नही!
क्यों आओगी यंहा?है ना।सरकार से रोकड़ा तो मिलने वाला नही फ़िर इनसे संबंध का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कोई लाभ भी नही?है ना।मगर सोचो,अरूंधति जवानों को अगर तुम क्रूरता करने वाले राज्य का अंग भी मान लो,तो भी इस घटना से एक और घटना भी तो पैदा हुई है।क्या 76 जवानों के मारे जाने से 76 बहने विधवा नही हुई हैं?क्या 76 बहने रक्षा-बंधन पर उन भाईयों का इंतज़ार नही करती रहेंगी?क्या 76 बूढी हो चली माताओं की कमज़ोर हो चली आंखों से आंसूओं की गंगा नही बह रह होगी?क्या उन्हे अब अपने लाड़ले दोबारा दिख पायेंगे?क्या उनके मुंह से ये नही निकल रहा होगा हे ईश्वर यही दिन दिखाने के लिये ज़िंदा रखा था?
किसने दिखाया ये दिन उन 76 परिवारों को?आपके उन चहेते कथित क्रांतिकारियों ने?जिनके आतिथ्य का सात दिनों तक़ लुत्फ़ उठाती रही आप?क्या आप जायेंगी उन 76 परिवारों मे से एक के भी घर?कैसी औरत हो?क्या औरत होकर भी औरतों का दर्द नही समझ पा रही हो?क्या असमय विधवा होने के दुःख पर नही लिख सकती कुछ तुम?क्या बुढी आंखो के आंसूओं का दर्द बयां नही कर सकती तुम्हारी कलम्।क्या औरतों पर सेक्स और पेज थ्री टाईप का ही लिखने मे मज़ा आता है?
आओ अरुंधति फ़िर से सात दिनों तक़ बस्तर आओ।और लिखो बस्तर का सच्।तब लगेगा कि तुम सच मे लिखने वाली हो वर्ना ऐसा लगेगा कि तुम नक्सलियों के प्रायोजित प्रोग्राम के तहत बस्तर आई थी और उनका पेमेंट लेकर पब्लिसिटी के लिये अपनी साख दांव पर लगा कर एक लेख लिख मारा है तुमने।दम है तो आओ बस्तर और कर दो सच को उज़ागर।बताओ दुनिया को कि यंहा असली शोषण कौन कर रहा है?बताओ,नक्सलियों के पास कैसे-कैसे घातक और आधुनिक हथियार हैं?बताओ उनको कैसे मिल रहे हैं हथियार?बताओ उनको और कौन-कौन कर रहा है मदद?पर्दे के पीछे छीपे आप जैसे कितने और हमदर्द हैं उनके?उनकी मदद के आरोप मे पकड़ाये डा विनायक सेन को छुडाने के लिये पूरी ताक़त लगाने वाले कथित बुद्धिजीवी और मानवाधिकारवादियों के गिरोह कितना बड़ा है और उसकी जड़े कंहा-कंहा,किस-किस देश मे फ़ैली हुई है?है दम?तो आओ बस्तर एक बार फ़िर।वरना हम तो यही सवाल करेंगे,76 जवानों की मौत से खुश हैं ना आप?कलेजे मे ठंडक पड़ गई है ना?आपका बस्तर आना सफ़ल हो गया ना?
Thursday, November 26, 2009
आज मूड़ बहुत खराब है!
एक माईक्रोपोस्ट के बहाने छोटा सा सवाल सामने रख रहा हूं,अगर जवाब मिला तो अच्छा लगेगा वरना ब्लागिंग तो मज़बूरी हो ही गई है।आज मूड़ बहुत खराब है!लिखने का मन नही कर रहा था इसलिये आज दूसरों का लिखा पढता रहा और जैसा समझ मे आया उस पर कमेण्ट भी करता रहा।ये काम तो चल ही रहा था मगर दिल-दिमाग ठिकाने पर नही थे।वंहा रह-रह कर सवालों के अंधड़ उठ रहे थे।सवाल तो बहुत से हैं मगर फ़िलहाल सिर्फ़ एक ही,इस देश मे शहीदों को याद करने के लिये मोमबत्ती तो सब जला सकते है मगर वंदे मातरम नही गा सकते,आखिर क्यों?बस इससे ज्यादा कुछ नही लिखूंगा,आज मेरा मूड बहुत खराब है।
Friday, July 17, 2009
हां मै मुख्यमंत्री का चमचा हूं!
अगर अच्छे काम की तारीफ़ का ये ईनाम है तो ये ही सही।मुझे इस बात का ज़रा भी डर नही लग रहा है कि कोई मुझ जैसे आक्रामक और विद्रोही के मुंह से किसी की जी भर के तारीफ़ सुन कर क्या कहेगा?मुझे आज ये कहने में ज़रा भी संकोच नही हो रहा है कि मुख्यमंत्री रमन सिंह एक नेक दिल इंसान ही नही एक अच्छे राजनेता है।उन्होने शहीद एस पी विनोद चौबे और उप निरीक्षको के परिजनो के लिये अनुकम्पा नियुकति के नियमो मे ढील देते हुये उनके परिजनो को डिप्टी कलेक्टर/डिप्टी एस पी और सहायक उप निरीक्षक के पद पर नियुक्ती का फ़ैसला किया।ये फ़ैसला वाकई महत्वपूर्ण है।इससे पहले किसी भी मुख्यंमंत्री ने ऐसा नही किया।शहीद होने वाले निरीक्षको या उप निरीक्षको के परिजनो को सिपाही के पद पर नियुकति मिला करती थी।उनके लिये इतना करने वाले रमन सिंह का यदी मुझे ज़िंदाबाद करना पड़े तो भी मुझे शरम नही आयेगी।मुझे वो भी मंज़ूर है।यंहा मै ये साफ़ कर देना चाहूंगा कि मरने वालो मे मेरा कोई सगा तो दूर,दुर-दूर का रिश्तेदार नही है।और तो और मेरा कोई भी रिश्तेदार किसी भी सरकारी नौकरी मे नही है।इसके बावज़ूद रमन सिंह की और उनके मंत्रिमंडल की तारीफ़ करनी होगी जिसने इतना बडा फ़ैसला लिया।इस माम्ले मे मै सालो से लिखता आ रहा हूं और इस पर बहस भी कर रहा हूं और इसे अमलीजामा पहनाने की कोशिश भी।आज अचान्क रमन सिंह के फ़ैस्ले ने मुझे अपनी 29 अप्रेल को लिखी एक पोस्ट की याद दिला दी।इस पोस्ट को आज मै उसी संदर्भ मे रिपोस्ट कर रहा हूं।कृपा कर इसे पढे बिना कोई भी प्रतिक्रिया न दे।
Wednesday, April 29, 2009
मैं उपनिरीक्षक की विधवा!क्या मेरा सुहाग लुटना,क्या मेरी दुनिया उजड़ना,क्या मेरे बच्चों का भविष्य बर्बाद होना महज़ इत्तेफ़ाक़ हैं?
छत्तीसगढ मे अचानक बड़े-बडे लोगो की बढती दिलचस्पी और बडे-बडे नामधारियों के दौरे देखकर मुझे लगा कि मेरे भी दिन फ़िर जायेंगे! मगर ऐसा कुछ नही हुआ! वे लोग आये तो मगर रटे-रटाये तोते की तरह सिर्फ़ और सिर्फ़ पढाई हुई बात कह कर चले गये।मुझे उम्मीद थी कि उनमे से एक तो कम से कम औरत होने के नाते ही मेरा दर्द समझेगी मगर सब सपनो की तरह टूट गया। और मज़बूर होकर मेरे दिल से सिर्फ़ आह ही निकल सकी कि मैं उपनिरीक्षक की विधवा!क्या मेरा सुहाग लुटना,क्या मेरी दुनिया उजड़ना,क्या मेरे बच्चों का भविष्य बर्बाद होना महज़ इत्तेफ़ाक़ हैं?
मेरी भी अपनी खूबसूरत दुनिया थी।मेरे पति को रिश्वत के भूत से ज्यादा देशभक्ती के ज़ूनून ने जकड़ रखा था।नई-नई नौकरी और नई-नई शादी।राजधानी के मलाईदार इलाके की पोस्टिंग के बाद उसी थाने बने रहने के लिये मोटी रकम की फ़रमाईश के बाद बस्तर की पोस्टिंग की धमकी पर हमने मिलकर चर्चा की।सब दोस्तो ने कहा कि सिद्धांत छोडो और कमाओ,कमाने दो का रास्ता पकडो,मगर उन्होने साफ़ मना किया।मैने भी खुशी-खुशी पति का हौसला बढाते हुये हर-हाल मे ईमानदारी की सूखी रोटी खाकर सुखी जीवन जीने का संकल्प दोहरा दिया,और हम राजधानी की चमक-धमक से दूर बस्तर के जंगल मे फ़ेंक दिये गये। ऐसे की चाह कर भी वापस निकल न सके।
शुरू के दिन तो बड़े मज़े से गुज़रे।वंहा जाकर एक बार और हमारी बगिया मे फ़ुल खिलाऽब हम दो और हमारे दो थे।बडी लड़की नर्सरी जाने लायक हो गई थी,और जहां हमारी पोस्टिंग थी वहां नर्सरी एक सपने के समान थी।तब पहली बार लगा था कि देशप्रेम और राष्ट्रभक्ति जैसी बाते किताबों मे ही ठीक लगती है।बच्चो के भविष्य को ध्यान मे रखते हुये मैने इनसे कहा कि वापस किसि अच्छे शहर चल्ते हैं।उन्होने भी बेहद थके हुये स्वर ने कहा था कि ट्राई करते हैं।उस दिन मुझे लगा था कि वे बस्तर के जंगलो मे मौत से रोज़ जंग लड़ते हुये हुये जवानी मे ही बूढे हो चले हैं।वो जोश वो जुनूं सब बस्तर के हने जंगलो मे गुम होता नज़र आया।
मै रोज़ उनसे पूछ्ती कि क्या हुआ?और रोज़ उनका जवाब होता सब ठीक हो जायेगा।फ़िर एक दिन गुज़र जाता,ऐसा करते-करते साल गुज़र गये। हमे ऐसा लगने लगा कि हम बस्तर के लिये ही बने है। छोटू अब चलने लगा था और तुतली भाषा मे बात करने लगा था। अब मैने ज़िद पकड़ ली थी कम से कम बच्चो को पढा लिखा तो लूं।मेरी ज़िद भी उन्हे अंदर से तोड़ रही है ये मुझे पता ही नही चला।रोज़ सुबह बच्चो की पढाई के सवाल के साथ उन्हे घर से ड्यूटी के लिये विदा करती थी और रात को घर मे घुसते समय फ़िर से उन्ही सवालो के साथ स्वागत करती थी।
रोज़-रोज़ के सवालो से लगता है वे भी त्रस्त आ गये थे,एक दिन उन्होने कहा कि मै कुछ न कुछ करता हूं,मुझे तंग मत किया करो,कुछ दिनो की मोहलत दो। और कुछ दिनो बाद उन्होने मुझ्से कहा कि तैयारी करो। हम वापस जा रहे हैम्। मै हैरान थी।मैने पूछा सच और उन्होने कहा हां!कैसे ?इसका जवाब तो जैसे रुला देने वाला था।उन्होने मेरी ज़ीद से परेशान होकर वापस शहर मे पोस्टिंग के लिये अपना पुशतैनी मकान बेच कर एडवांस दे दिया था।मै भी वापसी की तैयारियो मे जुटी हुई थी कि एक रोज़ ये गश्त से लौटे नही।सुबह काफ़ी देर होने के बाद भी जब इनकी कोई खबर नही आई और थाने के अलावा दूसरे लोग घर के आस-पास मंडराने लगे तो माथा ठनका और जो मेरा शक़ था वो सच निकला।
मेरी दुनिया उजड़ चुकी थी।उनका चेहरा होता तो शायद आखिरी बार देख भी लेती।लोथड़ो को बटोर कर लाश का शकल देने की कोशिश की गई थी और पता नही किस हवलदार का हाथ य किस सिपाही का पैर भी शामिल था उनकी लाश में।पता नहि कितनी बार मै बेहोश हुई हूंगी और जब होश मे आई तो मुझे अनुकंपा की भीख मे सिपाही की नौकरी दे दी गई। अब मै उप निरीक्षक की बीबी नही एक सिपाही हूं,जिसका जवान जिस्म साब लोगो की भूखी आंखो की आग मे झुलस कर कब बूढा हो गया पता ही नही चला। अब मुझे ज़रूरत भी नही मह्सूस होती किसी अच्छी प्राइवेट नर्सरी की।मेरे बच्चे सरकारी स्कूल मे पढ रहे हैं।उन्का भविष्य बनने से पहले ही बिगड़ गया है।मेरे सपने सज़ने से पहले ही उजड़ चुके हैं।
मेरी भी अपनी खूबसूरत दुनिया थी।मेरे पति को रिश्वत के भूत से ज्यादा देशभक्ती के ज़ूनून ने जकड़ रखा था।नई-नई नौकरी और नई-नई शादी।राजधानी के मलाईदार इलाके की पोस्टिंग के बाद उसी थाने बने रहने के लिये मोटी रकम की फ़रमाईश के बाद बस्तर की पोस्टिंग की धमकी पर हमने मिलकर चर्चा की।सब दोस्तो ने कहा कि सिद्धांत छोडो और कमाओ,कमाने दो का रास्ता पकडो,मगर उन्होने साफ़ मना किया।मैने भी खुशी-खुशी पति का हौसला बढाते हुये हर-हाल मे ईमानदारी की सूखी रोटी खाकर सुखी जीवन जीने का संकल्प दोहरा दिया,और हम राजधानी की चमक-धमक से दूर बस्तर के जंगल मे फ़ेंक दिये गये। ऐसे की चाह कर भी वापस निकल न सके।
शुरू के दिन तो बड़े मज़े से गुज़रे।वंहा जाकर एक बार और हमारी बगिया मे फ़ुल खिलाऽब हम दो और हमारे दो थे।बडी लड़की नर्सरी जाने लायक हो गई थी,और जहां हमारी पोस्टिंग थी वहां नर्सरी एक सपने के समान थी।तब पहली बार लगा था कि देशप्रेम और राष्ट्रभक्ति जैसी बाते किताबों मे ही ठीक लगती है।बच्चो के भविष्य को ध्यान मे रखते हुये मैने इनसे कहा कि वापस किसि अच्छे शहर चल्ते हैं।उन्होने भी बेहद थके हुये स्वर ने कहा था कि ट्राई करते हैं।उस दिन मुझे लगा था कि वे बस्तर के जंगलो मे मौत से रोज़ जंग लड़ते हुये हुये जवानी मे ही बूढे हो चले हैं।वो जोश वो जुनूं सब बस्तर के हने जंगलो मे गुम होता नज़र आया।
मै रोज़ उनसे पूछ्ती कि क्या हुआ?और रोज़ उनका जवाब होता सब ठीक हो जायेगा।फ़िर एक दिन गुज़र जाता,ऐसा करते-करते साल गुज़र गये। हमे ऐसा लगने लगा कि हम बस्तर के लिये ही बने है। छोटू अब चलने लगा था और तुतली भाषा मे बात करने लगा था। अब मैने ज़िद पकड़ ली थी कम से कम बच्चो को पढा लिखा तो लूं।मेरी ज़िद भी उन्हे अंदर से तोड़ रही है ये मुझे पता ही नही चला।रोज़ सुबह बच्चो की पढाई के सवाल के साथ उन्हे घर से ड्यूटी के लिये विदा करती थी और रात को घर मे घुसते समय फ़िर से उन्ही सवालो के साथ स्वागत करती थी।
रोज़-रोज़ के सवालो से लगता है वे भी त्रस्त आ गये थे,एक दिन उन्होने कहा कि मै कुछ न कुछ करता हूं,मुझे तंग मत किया करो,कुछ दिनो की मोहलत दो। और कुछ दिनो बाद उन्होने मुझ्से कहा कि तैयारी करो। हम वापस जा रहे हैम्। मै हैरान थी।मैने पूछा सच और उन्होने कहा हां!कैसे ?इसका जवाब तो जैसे रुला देने वाला था।उन्होने मेरी ज़ीद से परेशान होकर वापस शहर मे पोस्टिंग के लिये अपना पुशतैनी मकान बेच कर एडवांस दे दिया था।मै भी वापसी की तैयारियो मे जुटी हुई थी कि एक रोज़ ये गश्त से लौटे नही।सुबह काफ़ी देर होने के बाद भी जब इनकी कोई खबर नही आई और थाने के अलावा दूसरे लोग घर के आस-पास मंडराने लगे तो माथा ठनका और जो मेरा शक़ था वो सच निकला।
मेरी दुनिया उजड़ चुकी थी।उनका चेहरा होता तो शायद आखिरी बार देख भी लेती।लोथड़ो को बटोर कर लाश का शकल देने की कोशिश की गई थी और पता नही किस हवलदार का हाथ य किस सिपाही का पैर भी शामिल था उनकी लाश में।पता नहि कितनी बार मै बेहोश हुई हूंगी और जब होश मे आई तो मुझे अनुकंपा की भीख मे सिपाही की नौकरी दे दी गई। अब मै उप निरीक्षक की बीबी नही एक सिपाही हूं,जिसका जवान जिस्म साब लोगो की भूखी आंखो की आग मे झुलस कर कब बूढा हो गया पता ही नही चला। अब मुझे ज़रूरत भी नही मह्सूस होती किसी अच्छी प्राइवेट नर्सरी की।मेरे बच्चे सरकारी स्कूल मे पढ रहे हैं।उन्का भविष्य बनने से पहले ही बिगड़ गया है।मेरे सपने सज़ने से पहले ही उजड़ चुके हैं।
कभी-कभी आप लोगो की बड़ी-बड़ी बाते सुनती हूं तो ऐसा लगता है कि कभी कोई हमारे बारे मे भी बोलेगे मगर आप लोगो को तो सिर्फ़ छतीसगढ मे एक आदमी ही नज़र आता है।कभी दिल्ली की महिलाओ को छत्तीसगढ पर रोते देखती हूं तो लगता है कि अब वो हम लोगो के लिये भी बोलेंगी। हमारा क्या दोष हमे सिपाही क्यों बनाया गया?अनुकम्पा देना ही था उसी पद पर देते जिस पद पर हमारा पति था?मगर अफ़्सोस इस मामले कोई नही बोला। हवाई जहाज मे दुनिया घूमने वालि औरते भी नही बोली और ना ही कानून के बड़े-बड़े जानकार बोले और देश-विदेश के महान लोगो को तो इस बारे मे मालूम ही नही,क्योंकी उन्हे बताया गया ही नही।उन्हे तो सिर्फ़ ये मालूम है कि छत्त्तीसग़ढ मे सिर्फ़ एक आदमी के साथ अन्याय हो रहा है और जो हमारे साथ या हम जैसे और लोगो के साथ हुआ वो क्या न्याय है!
Sunday, July 12, 2009
अब तो बर्दाश्त से बाहर हो गया नक्सलियों का उत्पात!एस पी समेत 30 को मार डाला!क्या अब भी खामोश रहेंगे मानवाधिकारवादी?
सुबह राजनांदगांव के मदनवाड़ा इलाके मे नक्सलियों ने पुलिस पार्टी पर हमला किया और घिरे हुये जवानो की मदद के लिये एसपी विनोद चौबे खुद वंहा जाने के निकले मगर वे अपने मातहत जवानो की मदद नही कर पाये और शहीद हो गये।ये पहला नक्सल हमला है जिसमे एस पी रैंक का अफ़सर शहीद हुआ है।इसके पहले एडीशनल एस पी भास्कर दीवान शहीद हुये थे।इस हमले मे नक्सलियो ने उस इलाके मे दह्शत के अपने साम्राज्य को और बढा लिया है।एक नही तीस-तीस पुलिस वाले शहीद हुयें है।क्या इस पिछडे इलाके मे आये दिन आकर नक्सलियो की मदद के आरोप मे जेल मे बंद एक डाक्टर की रिहाई के लिये आंदोलन चलाने वाले मानवाधिकारवादी इस मामले मे मुंह खोलेंगे या उनके लिये शहीद का मतलब सिर्फ़ पुलिस के हाथों मरने वाले नक्सली ही हैं।उनकी खामोशी अब तो बर्दाश्त से बाहर हो रही है साथ ही नक्सलियों का उत्पात भी !एस पी समेत 30 को मार डाला गया !क्या अब भी खामोश रहेंगे मानवाधिकारवादी?एस पी विनोद चौबे पिछले ढाई साल से राजनांदगांव ज़िले के एस पी थे।वे काफ़ी समय तक़ रायपुर मे भी पदस्थ रहे हैं।इससे पहले सरगुजा ईलाके मे भी नक्स्लियों के खिलाफ़ उन्होने बढिया काम किया था।राजनांदगांव मे भी उन्हे आम आदमी का पुलिस वाला समझा जाता था।बेहद सरल स्वभाव के इस अफ़सर को बहुत से लोग पुलिस अफ़सर से ज्यादा विचारक और समाज सुधारक मानते हैं।ईमानदारी के मामले मे उनका नाम पुलिस की लिस्ट मे शीर्ष पर था और सच पूछा जाये तो उनमे वर्तमान पुलिसिया गुण तो नाम मात्र को नही थे।उनकी शहादत की खबर की पुष्टी से इलाके मे शोक की लहर दौड़ गई। शहीद विनोद चौबे समेत सारे शहीद जवानो को आखिरी सलाम्।
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शहीद
Wednesday, May 13, 2009
नक्सली अब राजधानी से बस कुछ ही किलोमीटर दूर!
सिहावा-नगरी इलाके मे नक्सलियो ने धमाका कर तेरह जवानो को शहीद कर दिया।इस वारदात ने सरकार के होश उड़ा दिये।वही सरकारी टाईप्ड बयान की फ़ोटो कापी जारी हो गई कि शहीदो का बलिदान व्यर्थ नही जायेगा। होम मिनिस्टर से लेकर विपक्ष यानी कांग्रेस के नेता तक़ घटनास्थल का मुआयना कर आये।महामहिम राज्यपाल ने भी अफ़सरो को तलब कर जानकारी ले ली मगर इस सबसे क्या उन तेरह जवानो की जान वापस आ सकती है।अख़बारो मे छपे एक बयान पर भी नज़र पड़ी है कि नक्सलियो से संबंधो के आरोप मे छ्त्तीसगढ की जेल मे बंद डा बिनायक सेन की रिहाई की मांग के लिये देश और विदेश के कई बड़े शहरो मे प्रदर्शन होंगे।पता नही क्यों इन गिरोहबाज़ मानवाधिकारवादियों को असमय शहीद कर दिये गये पुलिस वालो और उनके परिवार वालो का अधिकार और दर्द नज़र नही आता।
हो सकता है मेरा ये लिखना किसी जनवादी भाई को मेरे बिनायक सेन का विरोधी होना लगे?मगर मै ये बात साफ़ कर देना चाहता हूं कि अकेला मैं नही छत्तीसगढ मे कोई भी उनका व्यक्तिगत रूप से विरोधी नही होगा लेकिन जिस आरोप के तहत वे बंद है और जिनसे संबंधो के आरोप मे वे बंद है उन लोगो का आये दिन छतीसगढ की शांत धरा पर धमाके करना और खून की नदिया बहाना किसी को भी पसंद नही आता सिवाय एक विचारधारा के समर्थको के। हमारा विरोध उनसे भी नही वे अपनी विचारधारा को मानने के लिये स्वतंत्र है मगर उस स्वतंत्रता का मतलब क्या किसी को भी कभी भी मौत के घाट उतार देना होता है।
मुझे ये बात भी आज तक़ समझ नही आई कि जितने भी बड़े-बड़े इंसानी हक़ के पैरोकार है क्या उन्हे छत्तीसगढ मे सिर्फ़ एक आदमी के साथ ही अन्याय होता नज़र आता है?क्या एक साथ तेरह लोगो की अकाल मौत उनके और उनके परिवार के अधिकारो का हनन नही है।घटनास्थल पर जा चुके लोगो के अनुसार वंहा पडा एक मोबाईल उस समय भी बज़ रहा था।लम्बी घण्टी इस बात का सबूत थी कि उसके परिवार वाले उससे ज़रूरी बात करना चाह रहे थे। हो सकता है फ़ोन का न ऊठना उनके मन मे अनिष्ठ की आशंका जगा रहा हो? हो सकता है कोई अबोध बच्ची अपने पापा से गर्मियो की छुट्टियां लग गई है कह कर ज़ल्दी घर आने की रोज़ाना की जाने वाली बाल-सुलभ मनुहार दोहराने वाली हो?हो सकता है ब्याह के बाद पहली बार छुट्टियो मे मायके जाने के छटपटा रही नव्ब्याहता अपने पति से काम-धाम छोड कर घर आने लिये प्यार भरी तक़रार करने वाली हो?हो सकता है बुढे मां-बाप बीमारी के इलाज या दवा के लिये रूपये ज़ल्द भेजने के लिये सुबह-सुबह उसे याद दिलाना चाह रहे हो?होने को तो बहुत कुछ हो सकता है मगर एक बात जो नही हो सकती वो ये है कि वो अब कभी भी फ़ोन उठाकर अपनी लाडली को झुठे बहाने बना बहला नही सकता।थोड़ी तक़रार के बाद ज़ल्द आने का झूटा दिलासा देकर बीबी को टाल नही सकता,रूपये भेज चुका हूं कहकर बुढे मां-बाप के ओंठों पर मुस्कान नही लौटा सकता।
मगर ये सब शायद कुछ संगठन के पदाधिकारियों को नज़र नही आता या फ़िर वे देखना ही नही चाह्ते।दूसरी वाली बात ही सही होगी क्योंकि लगता है वे नक्सली वारदातो मे मर रहे पुलिस वालो को शहीद ही नही मानते होंगे।उनके लिये तो वे ही शहीद होंगे जिन्हे नक्सली शहीद करार दे। आखिर नक्सली भी तो शहीदी सप्ताह मनाते है और उनसे संबंध के आरोपो मे जेल मे बंद आरोपी को छ्डाने मे जीतनी ताक़त ये लोग लगा रहे है उससे तो यही लगता है कि जेल मे बंद आरोपियों के साथियो की वे मदद ही करना चाह रहे हैं।
खैर छतीसगढ मे रायपुर से लगे धमतरी ज़िले मे नक्सलियो का धमाका अच्छा संकेत नही है।वैसे तो उनका राजधानी आना-जाना और यंहा रहना नई बात नही लेकिन माईन्स बिछा कर तेरह जवानो को उड़ा देना उनके बढते हौसले का सबूत है। और साथ ही नक्सलियो को समर्थन के आरोप मे जेल मे बंद पीयूसीएल के एक नेता के की रिहाई के लिये लंदन,इटली,एडिनबर्ग,समेत यूरोप और अमेरिका के बड़े शहरो मे धरना प्रदर्शन होना भी इस बात को सोचने पर मज़बूर कर देता है कि इनके चाहने वालो की जड़े कहां तक़ फ़ैली है। आखिर लंदन मे भारतीय उच्चायोग के साम्ने धरना देकर वे साबित क्या करना चाह्ते हैं?अफ़सोस की बात तो ये है अपनी मानवाधिकारवादी आंखो से ये लोग सिर्फ़ एक ही तरफ़ देख पाते है दूसरी ओर शायद नही देखना उनकी विदेशो से कंट्रोल होने वाली फ़ंडिंग की मज़बूरी है।
हो सकता है मेरा ये लिखना किसी जनवादी भाई को मेरे बिनायक सेन का विरोधी होना लगे?मगर मै ये बात साफ़ कर देना चाहता हूं कि अकेला मैं नही छत्तीसगढ मे कोई भी उनका व्यक्तिगत रूप से विरोधी नही होगा लेकिन जिस आरोप के तहत वे बंद है और जिनसे संबंधो के आरोप मे वे बंद है उन लोगो का आये दिन छतीसगढ की शांत धरा पर धमाके करना और खून की नदिया बहाना किसी को भी पसंद नही आता सिवाय एक विचारधारा के समर्थको के। हमारा विरोध उनसे भी नही वे अपनी विचारधारा को मानने के लिये स्वतंत्र है मगर उस स्वतंत्रता का मतलब क्या किसी को भी कभी भी मौत के घाट उतार देना होता है।
मुझे ये बात भी आज तक़ समझ नही आई कि जितने भी बड़े-बड़े इंसानी हक़ के पैरोकार है क्या उन्हे छत्तीसगढ मे सिर्फ़ एक आदमी के साथ ही अन्याय होता नज़र आता है?क्या एक साथ तेरह लोगो की अकाल मौत उनके और उनके परिवार के अधिकारो का हनन नही है।घटनास्थल पर जा चुके लोगो के अनुसार वंहा पडा एक मोबाईल उस समय भी बज़ रहा था।लम्बी घण्टी इस बात का सबूत थी कि उसके परिवार वाले उससे ज़रूरी बात करना चाह रहे थे। हो सकता है फ़ोन का न ऊठना उनके मन मे अनिष्ठ की आशंका जगा रहा हो? हो सकता है कोई अबोध बच्ची अपने पापा से गर्मियो की छुट्टियां लग गई है कह कर ज़ल्दी घर आने की रोज़ाना की जाने वाली बाल-सुलभ मनुहार दोहराने वाली हो?हो सकता है ब्याह के बाद पहली बार छुट्टियो मे मायके जाने के छटपटा रही नव्ब्याहता अपने पति से काम-धाम छोड कर घर आने लिये प्यार भरी तक़रार करने वाली हो?हो सकता है बुढे मां-बाप बीमारी के इलाज या दवा के लिये रूपये ज़ल्द भेजने के लिये सुबह-सुबह उसे याद दिलाना चाह रहे हो?होने को तो बहुत कुछ हो सकता है मगर एक बात जो नही हो सकती वो ये है कि वो अब कभी भी फ़ोन उठाकर अपनी लाडली को झुठे बहाने बना बहला नही सकता।थोड़ी तक़रार के बाद ज़ल्द आने का झूटा दिलासा देकर बीबी को टाल नही सकता,रूपये भेज चुका हूं कहकर बुढे मां-बाप के ओंठों पर मुस्कान नही लौटा सकता।
मगर ये सब शायद कुछ संगठन के पदाधिकारियों को नज़र नही आता या फ़िर वे देखना ही नही चाह्ते।दूसरी वाली बात ही सही होगी क्योंकि लगता है वे नक्सली वारदातो मे मर रहे पुलिस वालो को शहीद ही नही मानते होंगे।उनके लिये तो वे ही शहीद होंगे जिन्हे नक्सली शहीद करार दे। आखिर नक्सली भी तो शहीदी सप्ताह मनाते है और उनसे संबंध के आरोपो मे जेल मे बंद आरोपी को छ्डाने मे जीतनी ताक़त ये लोग लगा रहे है उससे तो यही लगता है कि जेल मे बंद आरोपियों के साथियो की वे मदद ही करना चाह रहे हैं।
खैर छतीसगढ मे रायपुर से लगे धमतरी ज़िले मे नक्सलियो का धमाका अच्छा संकेत नही है।वैसे तो उनका राजधानी आना-जाना और यंहा रहना नई बात नही लेकिन माईन्स बिछा कर तेरह जवानो को उड़ा देना उनके बढते हौसले का सबूत है। और साथ ही नक्सलियो को समर्थन के आरोप मे जेल मे बंद पीयूसीएल के एक नेता के की रिहाई के लिये लंदन,इटली,एडिनबर्ग,समेत यूरोप और अमेरिका के बड़े शहरो मे धरना प्रदर्शन होना भी इस बात को सोचने पर मज़बूर कर देता है कि इनके चाहने वालो की जड़े कहां तक़ फ़ैली है। आखिर लंदन मे भारतीय उच्चायोग के साम्ने धरना देकर वे साबित क्या करना चाह्ते हैं?अफ़सोस की बात तो ये है अपनी मानवाधिकारवादी आंखो से ये लोग सिर्फ़ एक ही तरफ़ देख पाते है दूसरी ओर शायद नही देखना उनकी विदेशो से कंट्रोल होने वाली फ़ंडिंग की मज़बूरी है।
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