19 मई 2008 को मानवाधिकार की टीम दिल्ली से बस्तर आई थी.उस समय लिखी गई मै अपनी एक पोस्ट आज फिर शेयर कर रहा हूं."अपने ही घर में शरणार्थी हो गया है बस्तर का आदिवासी".. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर केन्द्रीय मानवाधिकार आयोग की टीम बस्तर आई है। बड़े अफसरों से सजी टीम नक्सल विरोधी आंदोलन सलवा-जुडूम के राहत शिविरों की जांच कर देखेगी वहां मानव अधिकारों का हनन तो नहीं हो रहा । प्रशासनिक और राजनैतिक कार्यवाहियों से बस्तर के आदिवासियों को क्या मिल पायेगा ये तो पता नहीं लेकिन यहां ये तय है कि बस्तर का आदिवासी अपने ही घर में शरणार्थी हो गया है।
खुले आसमान के नीचे घनघोर घने जंगलों से अपनी रोटी खुद छीन कर खाने वाला आदिवासी अब राहत शिविरों में सरकारी खाना खाने के लिये लादन लगाता है। नक्सलियों और सरकार इन दो पाटों के बीच फंसे आदिवासी ने जब खुद को दोनों से मुक्त कराने के लिये सिर उठाकर इकट्ठा होना शुरू किया तो उनके आंदोलन सलवा-जुडूम को भाजपा सरकार ने संरक्षण देकर हाईजैक करने की कोशिश की। उसी के साथ कांग्रेस के नेता महेन्द्र कर्मा ने भी इस मुद्दे को सरकार के हाथ जाता देख उस पर अपना दावा ठोक दिया।
बस यहीं से आदिवासियों के सलवा-जुडूम पर भाजपा सरकार और कांग्रेस की मुहर लग गई और आंदोलन पर नक्सली कहर बढ़ता चला गया। नतीजन जंगल में आजाद घूमने वाले आदिवासी अपने घरों को छोड़कर सुरक्षा के नाम राहत शिविरों में रहने को मजबूर हो गये । अब जो अपने घरों को छोड़ सरकारी राहत शिविरों में रहेगा उसे शरणार्थी ही तो कहा जाएगा। न कोई भूकंप आया , न कोई बाढ़ और न ही कोई ज्वालामुखी फटा लेकिन बस्तर में सरकारी राहत शिविर खुल गए क्योंकि वहां प्राकृतिक नहीं मानव निर्मित बारूदी धमाके होने लगे थे।
दोरनापाल, जगरगुंडा समेत एक दर्जन से ज्यादा सरकारी राहत शिविर में जंगल का आजाद राजा आदिवासी सरकारी टाईम टेबल के अनुसार एक रिफ्यूजी की जिंदगी जीने पर मजबूर है। उसकी आजादी छिन चुकी है और जिंदगी खतरे में पड़ गई है। शिविर छोड़ना है सरकारी ठप्पा लग जाने के कारण नक्सलियों के निशाने पर आना तय हो चुका है। दरअसल बस्तर का आदिवासी दोतरफा मार झेल रहा है। सरकार की बात करता है तो नक्सलियों का निशाना बनता है और अगर सरकार के साथ नहीं जाता तो नक्सलियों का मुखबीर होने के संदेह में पुलिस का टारगेट हो जाता है।
ऐसे में कायदे से देखा तो नुकसान सिर्फ और सिर्फ आदिवासियों का हो रहा है। उनके नुकसान से शायद दूसरे प्रदेश के बेरोजगारी से तंग आकर बंदूक उठाने वाले नौजवानों को या बस्तर से 400 किलोमीटर दूर प्रदेश की राजधानी रायपुर में बैठे हुक्मरानों का बहुत ज्यादा लेना-देना नहीं है। नक्सली बंदूक के दम पर वहां आदिवासियों के शोषण के नाम पर सत्ता कायम करना चाहते है तो सरकार अपनी सत्ता बचाए रखने के लिये फोर्स झोंक रही है। सरकार और नक्सली दोनों के ही शक्ति प्रदर्शन के बीच निर्दोष आदिवासी मारे जा रहे है। सरकारी फोर्स के बूटों की कीलें या नक्सलियों के जूतों की ठोकरें बस्तर की शांत धरती को लहुलुहान कर रही है।
भाजपा और कांग्रेस के नेताओं के अलावा विदेशी पैसों से राजधानी दिल्ली और रायपुर में बैठे एनजीओं चलाने वाले समाज के कथित ठेकेदारों की एक बड़ी फौज भी इस बात को लेकर चिन्तित है। उन्हें भी लगता है वहां मानव अधिकारों का उल्लघंन हो रहा है। अब सवाल ये उठता है कि क्या एक आदमी का निर्दोष मारा जाना इस बात को साबित करने के लिये काफी नहीं है। जान तो फिर जान है चाहे वो आदिवासी की हो या वहां पर पुलिस या रिजर्व फोर्स के जवानों की क्यों न हो। लोग मर रहें है, अपना घर छोड़कर शिविरों में रह रहें है। कभी कोई नेता जाता है तो कभी अफसरों की टीम जाती है। केन्द्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटील भी वहां गए। उन्होंने भी कहा कि नक्सलियों से बात हो सकती है। अब बात कौन करेगा, कैसे करेगा ये पता नहीं! और इसके साथ ही उन्होंने राज्य की भाजपा सरकार को हर संभव मदद करने का वादा भी कर दिया।
राजनैतिक भूलभूलैया में भटक रहे बस्तर को आजादी के आधा दशक बीत जाने के बाद भी विकास के नाम पर कुछ भी नहीं मिला था। हाल के सालों में जरूर कुछ इलाकों में सड़के बनना शुरू हुई थी और विकास के नाम गांवों में हैंडपंप खोदे गए थे। कुछ गांवों की तकदीर थोड़ी ज्यादा अच्छी थी जहां प्राइमरी स्कूल बने और बहुत ज्यादा अच्छी तकदीर वाले गांवों में बिना डाक्टर, स्टॉफ और दवाईयों वाले प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र भी बने । बस इससे ज्यादा आदिवासियों का कुछ नहीं मिला और आजादी के सालों बाद जो कुछ मिला उसे अब नक्सली निशाना बना रहे है। अभी हाल ही में नौ स्कूलों की बिल्डिंग ध्वस्त कर दी। वैसे भी गांव छोड़कर कैम्प में रहने के बाद गांव के गांव खाली हो गए है। उन सरकारी बिल्डिगों में अब रातों का या तो गश्त पर निकली पुलिस पार्टियां आराम करती है या नक्सली। और इस बीच आमना-सामना हो जाए तो जंगल गोलियों की गूंज से कांप उठता है और कांप उठते है राहत शिविरों के शरणार्थी भी। आखिर कैम्प से वापसी का कोई रास्ता भी है। क्या जंगल की खुली हवा में वे सांस ले पायेंगे। ताड़ी और सल्फी के मस्त के मादक सुरूर में वे झूम पायेंगे! ये सारे सवाल कैम्प में ही उठते होंगे और वहीं दम तोड़ देते होंगे! इन सवालों को शहर तक आने के लिये शायद कोई रास्ता नहीं मिल रहा है।
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Tuesday, May 28, 2013
Friday, November 18, 2011
कांगेर घाटी, जैव विविधता झरनों और कुंवारे वनों का अद्भूत संगम

बस्तर के मुख्यालय जगदलपुर से महज 27 कि.मी. दूर है कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान। जैव विविधता के कारण इसे जीव मंडल (बॉयोस्फियर) रिजर्व भी घोषित किया गया है। गुफाओं और अंधी मच्छलियों के अलावा खुबसूरत झरने, घना जंगल, जीव जन्तु और कीट, पक्षी भी इसकी शान बढ़ाते हैं। वनदेवी का यौवन कांगेर घाटी में देखते ही बनता है। मंत्रमुग्ध कर देने वाले दृश्यों की श्रृंखला बांहें पसारे मानो आने वाले पर्यटकों का स्वागत करती नज़र आती है। कांगेर अपने भरपूर वनस्पति, जीवों, झरनों, झीलों और गुफाओं के कारण प्रकृति प्रेमियों के लिए अद्भूत स्थान हैं।कुदरत के इस अनमोल खजाने को बचाये रखने के लिए जुलाई 1982 में इसे राष्ट्रीय उद्यान घोषित कर दिया गया। सरकारी घोषणा अपने उद्देश्य पर कहां तक खरी उतरी है ये बहस का मुद्दा हो सकता है लेकिन इसके प्राकृतिक सौंदर्य पर कोई सवाल नहीं खड़े किए जा सकते। वन्यप्राणियों को सुरक्षा और बेहतरीन शरणस्थल देने के साथ ही पर्यटकों और प्रकृति प्रेमियों के लिए इसे आकर्षक बनाना सरकार का मुख्य उद्देश्य था।
कांगेर तीरथगढ़ नामके खुबसूरत झरने से शुरू होकर उड़ीसा की सीमा पर कोलाब नदी तक फैला है। जंगल के बीचोबीच कांगेर नदी इठलती बलखाती अपना सफ़र करती है। लगभग 200 स्क्वेयर कि.मी. में फैला कांगेर दक्षिण पैनिंनसुलर मिक्सड डेसिडुअस जंगल, आर्द्र सागौन जंगल जिसमें साल, बीजा, साजा, हल्दू, चार, तेन्दू, कोसम, बेंत, बांस और न जाने कितनी ही वनौषधियों के पौधों को अपने में समेटे हुए है।
शेर(बाघ), तेन्दुआ(पेन्थर), कोटरी यानि बार्किंग डीयर, माउस डीयर, चीतल, भालू, जंगली सूअर, लोमड़ी, भेडि़या, पैंगोलिन, बंदर, लंगूर, सेही, सिवेट, नेवला, सोन कुत्ता, खरगोश और सियार इस राष्ट्रीय उद्यान के खजाने के रत्न हैं। इनके अलावा मगर, कछुआ, अजगर, पहाड़ी मैना, भृगराज, उल्लू, वनमुर्गी, क्रेस्टेड सर्पेंट, ईगल, श्यामा और तितलियों से भरा पूरा है ये राष्ट्रीय उद्यान।
कांगेर घाटी में खुबसूरत पहाडि़यां, रंग बिरंगी तितलियां, कल कल करते झरने, रहस्यमयी गुफाएं और कीट पतंगों के अजीबो गरीब संगीत से आप चमत्कृत हो जाएंगे। यहां की कोटमसर गुफा आकर्षण का प्रमुख केन्द्र है। इसे 1900 में खोजा गया और लगभग आधी शताब्दी बाद 1951 में डॉ. शंकर तिवारी ने इसका सर्वे किया। 330 मीटर लंबी और 20 से 72 मीटर तक चौड़ी गुफा में ड्रिप स्टोन, स्टेलेग्माइट और छत से लटकते यानि स्टेलेक्टाइट की खुबसूरती देखते ही बनती है। सफेद चूना पत्थर से बनाई गई कुदरत की कलाकारी का जादू यहां सर चढ़कर बोलता है। कुदरत का जादू अभी भी जारी है यानि संरचनाओं का बनना शुरू है। गुफा में कई छोटे छोटे पोखर हैं जिसमें विश्व प्रसिद्ध अंधी मच्छलियां और मेंढक पाए जाते हैं। यहां अंधेरे की जि़न्दगी के और भी कई खिलाड़ी पाए जाते हैं जिनमें झिंगुर, सांप, मकड़ी, चमगादड़ उल्लेखनीय है। गुफा के आखिरी छोर पर स्टेलेग्माइट यानि ज़मीन से उभरी संरचनाओं से बना एक शिवलिंग है। कोटमसर जैसी ही कैलाश गुफा भी है और दण्डक गुफा इनमें सबसे नई है। इसे अप्रैल 1995 में खोजा गया। यहां गुफा 2 हिस्सों में बंटी है, दूसरे हिस्से में जाने के लिए घुटनों के बल जाना पड़ता है।
यहां तीरथगढ़ जलप्रपात भी देखने लायक है। लगभग 50 मीटर की ऊंचाई से गिरने वाला झरना नीचे पहुंचने से पहले 3 चरणों में बंटता है। झरने के तीनों चरणों तक नीचे उतरने के लिए सीढि़यां बनी हुई है। यहां एक शिव पार्वती का मंदिर है। पर्यटकों के लिए शेड बने हुए हैं और घाटी और झरने खुबसूरती को निहारने के लिए वॉच टॉवर भी बनाए गए हैं। घाटी में ही कांगेर नदी पर कोटमसर गांव के पास झरनों की श्रृंखला है। पथरिली चट्टानें, उथला पानी और कलकल करते झरनों का सुमधुर संगीत यहां की वादियों को और खुबसूरत बना देते हैं। कांगेर नदी पर ही 4 हेक्टेयर में फैली हुई कुदरती विशाल झील है, इसे भैंसा दरहा कहा जाता है। चारों ओर से घने बांस के जंगलों और झूरमुटों से घिरी हुई इस झील में आकर पहाड़ों को कूदते फांदते चीरते हुए आगे बढ़ती है अल्हड़ कांगेर नदी एकदम शांत हो जाती है। ये झील आगे जाकर उड़ीसा की शबरी यानि कोलावा नदी से मिल जाती है। झील मगर और कछुओं का कुदरती ठिकाना है।
कोटमसर से कैलाश गुफा की ओर जाते समय एक तरफ कांगेर नदी का यौवन अंगड़ाई लेता नज़र आता है, तो दूसरी ओर घने जंगलों में पेड़ों से लिपटी लताएं मानो जादू सा कर देती है। ऊंचे ऊंचे पहाड़ों की खामोशी ड्राइव का भरपूर आनंद देती है। घाटी 1 नवंबर से 30 जून तक ही खुली रहती है और यहां सुबह 8 बजे से शाम 4 बजे तक ही प्रवेश दिया जाता है।रूकने के लिये अब यंहा किसी प्रकार की कोई दिक्कत नही है।पर्यटन ,मंत्री बृजमोहन अग्रवाल की रूची ने इस क्षेत्र को बेहतर पर्यटन स्थल के रुप में विकसित कर दिया है। यहां कोटमसर, नेतानार, तीरथगढ़ में 2 कमरों वाले जंगल विभाग के रेस्टहाउस हैं। इसके अलावा जगदलपुर में रेस्टहाउस और अच्छे होटलों की कोई कमी नहीं है। नजदीक का हवाई अड्डा रायपुर है जो देश के सभी बड़े शहरों से जुड़ गया है। रायपुर से जगदलपुर लगभग 300 कि.मी. है और ये रास्ता भी रायपुर से 100 कि.मी. दूर चारामा के बाद से जंगलों, पहाड़ों और घाटियों से गुजरता है। ये भी ड्राइव का अद्भूत आनंद देता
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Friday, August 19, 2011
स्वामी जी भ्रष्टाचार से फ़ुरसत मिले तो बस्तर आ जाना और हो सके तो नक्सलियों से कहना कि निर्दोष जवानो को मारना छोड़ें।
एक छोटी सी पोस्ट बेहद बड़ा और गंभीर सवाल लिये हुये।और भी कई गम है ज़माने में भ्रष्टाचार के सिवाय।नक्सलवाद भी एक फ़ोड़ा है को नासूर बन गया है।आज रात फ़िर छुटटी पर जा रहे 9 जवानों को लगभग डेढ सौ नक्सलियों ने घेर कर मौत के घाट उतार डाला।इस वारदात मे चार और जवान गंभीर रूप से घायल है और एक ट्रेक्टर चालक मारा गया है।औपचरिकता के लिये मुख्यमंत्री डा रमन सिंह के घर आला अफ़सरों की बैठक हो गई है।मेरा सवाल ये है कि उन नौ जवानों के घर में आये आंसूओं के सैलाब को कौन थामेगा?क्या स्वामी जी को भ्रष्टाचार के आंदोलन से फ़ुरसत मिलेगी?क्या वे कभी नक्सलियों को कह पायेंगे कि निर्दोष जवानो का खून बहाना बंद करें।
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Friday, March 18, 2011
राष्ट्रभाषा हिंदी का विरोध करना क्या राज्द्रोह नही है?
राष्ट्रभाषा हिंदी का नक्सली विरोध करने लगे हैं!उनका कहना है कि बस्तर के वनांचलों मे गोंडी बोली का ही इस्तेमाल किया जाना चाहिये।ऐसा करके पता नही वे क्या साबित करना चाह रहे हैं?ठीक है गोंडी बोली के प्रचार-प्रसार पर दिया जाता है तो समझ में आता है मगर उसके साथ-साथ हिंदी का विरोध?ये समझ से परे है।मेरा सवाल ये है कि क्या राष्ट्रभाषा हिंदी का विरोध राष्ट्रद्रोह की श्रेंणी में नही आता? नक्सलियों ने बाकायदा पोस्टर और बैनर लगा कर हिंदी के विरोध में मोर्चा खोल दिया है।उनका गोंडी से कथित मोह का दिखावा तो समझ में आता है।ऐसा करके वे स्थानीय लोगों को अपने से जोड़े रखने की कोशिश तेज़ कर रहे हैं,जो धीरे-धीरे उनसे दूर खिसक रहे हैं।मगर हिंदी का विरोध,उसके खिलाफ़ वातावरण बना कर क्या करेंगे?क्या ये कोई नये अलगाववादी अभियान की साजिश है? सड़क का विरोध करना,स्कूलों और अस्पताल भवनों को उड़ाना,विकास नही होने के नाम पर विकास के रास्ते पर रोड़े खड़े करना,ये उनकी अब तक़ की रणनीति रही है।वे इस तरीके से उन्हे अलग-थलग रखने की कोशिश कर रहे थे और अब हिंदी का विरोध?ये तो एक खतरनाक साजिश का हिस्सा नज़र आता है।इस बारे में उन लोगों को भी सोचना चाहिये जो नक्सलियों के समर्थकों को जेल से छुड़ाने में लगे रहते हैं।ज़रा-ज़रा सी बात पर उन्हे कानून और मानवाधिकारों का हनन नज़र आता है।क्या उन्हे अब राष्ट्रभाषा हिंदी के विरोध में कोई बुराई नज़र आयेगी या भी उन्हे सही ही नज़र आयेगा?मुझे लगता है कि समय आ गया कि उन्हे अब अपनी आंखों पर से विदेशी धन से चल रहे एनजीओ के चढाये गये चश्मे उतार फ़ेंकना चाहिये।
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Wednesday, March 16, 2011
आखिर विकास की परिभाषा क्या है?गाड़ियां जलाना,सड़के खोदना,रेल लाईने उड़ाना?स्कूल,अस्पताल उड़ाना?चाहते क्या हैं,नक्सली?
बस्तर में नक्सलियों का उत्पात जारी है।उन्होने रावघाट-दल्ली राजहरा रेल लाईन के निर्माण के लिये समतलीकरण के काम में लगी 17 मशीनों को जला कर खाक कर दिया।करोड़ो रूपये का नुकसान करके नक्सलियों ने उस रेल लाईन के निर्माण कार्य मे बाधा डाल दी है।ये वही नक्सली है जो कहते हैं कि वे अन्याय और शोषण के खिलाफ़ लड़ रहे हैं!उनका दावा है कि बस्तर में विकास नही हुआ है।अब अगर वंहा विकास नही हुआ था तो उसकी ज़िम्मेदार उस समय की सरकारें हो सकती है,लेकिन अभी जो विकास हो रहा है उसे रोकने वालों को क्या कहा जाये,ये भी उन नक्सलियों को बताना चाहिये! बस्तर पर सालों-साल इस बहस के बाद कि उनके मूल स्वरूप को बनाये रखना चाहिये या नही?विकास से उसके मूल स्वरूप पर विपरित प्रभाव पड़ेगा या नही?या उनकी परंपराओं को बनाये रखने का उन्हे अधिकार है?तमाम तरह की बहस (जिसमे शायद आदिवासी को छोड़ सभी शामिल थे),के बाद जब उन्हे समाज की मुख्य धारा से धारा से जोड़ने और विकास की रफ़्तार तेज हुई तो अब नक्सलियों को वंहा विकास पसंद नही आ रहा है।पहले समाज शास्त्री,मानव विज्ञानी और दुसरे ठेकेदारों के कारण वंहा विकास नही हो पाया अब नक्सली रोड़े अटका रहे हैं। दोनो ही स्थिती में नुकसान आदिवासी का हो रहा है और इस नुकसान पर पहले कोई और चिल्ला रहा था और अब कोई और्।जो पहले चिल्ला रहा था,वो अब खुद नुकसान पहुंचा रहा है,और जो अब चिल्ला रहे हैं,उन्होने पहले कभी इस ओर ध्यान ही नही दिया था।कुल मिलाकर देखा जाये तो वंहा बस्तर का आदिवासी ही पिस रहा है,मर रहा है! चलो इस बात को मान लिया जाये कि वंहा विकास नही हुआ,या बहुत धीमी गति से हुआ?ये उनके साथ अन्याय है और ये उनके मौलिक अधिकारों का हनन और उनका शोषण भी है।मगर अब आज़ादी के बाद जब उन्हे स्कूल,अस्पताल और सामूदायिक भवन जैसी सुविधायें मिलना शुरू हुई है तो उसे तोड़ कर क्या साबित किया जा रहा है? सड़के बनती है नही तो खोद देते हैं? बीआरओ जैसी संस्था को वंहा सड़क बनाने मे सालों लग गये। सड़क से ,स्कूल से,अस्पताल से,रेल लाईन से आखिर नक्सलियों को परहेज़ क्यों है?चाहे राज्य सरकार बनाये या केन्द्र सरकार बनाये,विकास तो बस्तर का हो ही रहा है ना?और फ़िर नक्सलियों की लड़ाई भी तो इसी बात की है कि वंहा विकास नही हुआ है।एक और कहते हैं विकास नही हुआ और दूसरी ओर विकास के तमाम रास्तों पर बारूदी सुरंग बिछा रहे हैं,आखिर उनके विकास की परिभाषा है क्या?ये तो समझ में आये,मुझे तो समझ में नही आया इस तरह मशीनों को जलाना और स्कूल,अस्पतालों को उड़ाना?आपको क्या लगता है?बताईयेगा ज़रूर्।
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Saturday, February 12, 2011
नौकरी छोड़ने की शर्त पर हुई पुलिस वालों की रिहाई?क्या ये शर्त मानवाधिकार का हनन नही है?
ज़िंदा रहने के लिये नौकरी छोड़ना ज़रूरी है?ज़िंदा रहने के लिये नौकरी करना?ये सवाल सामने खड़ा है उन पांच जवानो के जिन्हे कल नक्सलियों नें नौकरी छोड़ने की शर्त पर रिहा किया। नकस्ल प्रभावित छत्तीसगढ के बस्तर ज़िलें में नक्सलियों ने अपनी अदालत,जनसुनवाई में अगवा किये गये पांच जवानों को नौकरी छोड़ने की शर्त पर रिहा करने का फ़ैसला सुनाया।वंहा हज़ारों की संख्या मे ग्रामीणों के साथ-साथ जवानों की रिहाई के लिये मध्यसतता करने वाले अग्निवेश के अलावा मानवाधिकार के जाने-माने राष्ट्रीय स्तर के कई पैरोकार-ठेकेदार मौज़ूद थे।उनके सामने नक्सलियों ने जवानों को नौकरी छोड़ने की शर्त पर ज़िंदा छोड़ा।अब सवाल ये उठता है कि ज़िंदा रहने के लिये नौकरी छोड़ना ज़रूरी है?ज़िंदा रहने के लिये नौकरी करना?
क्या कोई नौकरीपेशा इंसान इस ज़माने में बिना कोई काम किया जीवनयापन कर सकता है?क्या कोई नौकरीपेशा बिना नौकरी किये अपना परिवार पाल सकता है?क्या वो बिना नौकरी किये ज़िंदगी की गाड़ी खींच सकता है?अगर उसे ज़िंदा रहने के लिये नौकरी की ज़रूरत नही होती तो क्यों जाता वो जान हथेली पर लेकर बस्तर मरने के लिये?आखिर वो नौकरी करता ही क्यों,अगर उसका गुज़ारा नौकरी के बिना हो सकता था,तो?
समझ में नही आता इतने बड़े खुद को स्वामी कहने वाले विद्वान,अग्निवेश के मन मे ये सवाल क्यों नही उठा?मानवाधिकार वादियों की नेता कविता श्रीवास्तव,गौतम नौलखा,वी सुरेश,हरीश दीवान आदि-आदि के मन में क्यों नही उठा?उनके मन में तो ये सवाल भी आना चाहिये था कि बंदूक की नोक पर किसी की नौकरी छीनना मानवाधिकार का हनन है?शायद उन्हे ये पता ही नही होगा कि नौकरी छोड़कर कोई भी इंसान अपना परिवार नही पाल सकता है,ज़िंदा नही रह सकता है?खैर ये तो वही जान सकता है जो छोटी-मोटी नौकरी करता हो उन पुलिस जवानों जैसी।जिसे महिने में एक बार मुट्ठी भर रूपये मिलते हों महीने भर ज़िंदगी दांव पर लगाकर बारूदी सुरंगों से अटे पड़े बस्तर के जंगलों में।
उन लोगों को क्या मालूम होगा ज़िंदा रहने के लिये नौकरी कितनी ज़रूरी है,जिन्होने कभी नौकरी की ही ना हो?जिन्हे नेतागिरी के लिये हर महीने मोटी रकम मिल जाती हो?जिन्हे बेवज़ह बकवास करने और सरकारों(खासकर भाजपा)के खिलाफ़ जातिवाद से लेकर अनाप-शनाप आरोप लगाने पर विदेशी धनराशियों पर फ़ल-फ़ूल रहे एनजीओ से चंदा मिलता हो?उन लोगो को कैसे पता हो सकता है नौकरी के बिना ज़िंदा रहना,और नक्सलियों की कैद में रहना एक समान ही है?
चलिये जाने दिजीये ये नौकरी-फ़ौकरी की मीडिल और लोअर मीडिल क्लास बातें।एसी कमरों मे बैठ कर गरीबी और आम आदमी की हालत पर टेसूये बहाने वाले उन एलिट लोगों को ये तो बताना चहिये कि नक्सलियों की कैद से रिहा होने के लिये अब उन जवानों को करना क्या चाहिये?क्या उन्हे भी बंदूक उठाकर जीवनदान देने वालों के साथ हो जाना चाहिये?क्या उन्हे रिहाई के लिये दलाली करने वालों का झण्डा थाम लेना चाहिये?ऐसा क्या करना चाहिये कि उनके बच्चों की स्कूल समय पर पट सके?बूढे मां-बाप के मेड़िकल से दवा खरीद सके?बहन-भाई की शादी के लिये बारात का इंतजाम कर सके?उसकी रिहाई के लिये दिन-रात आंसू बहाते और हर किसी से उसकी रिहाई की गुहार लगाते-लगाते सूख चुके सकी पत्नी के ओंठो पर छोटी सी मुस्कान लाने के लिये वो साड़ी खरीद सके?
इन सब के लिये लगता है रूपया,जो उन्हे मिलता था नौकरी से,और आप उन्से कह रह नौकरी छोड़ कर ज़िंदा रहो?ये कैसे संभव हो सकता है?बिना सांस लिये ज़िंदा रहने की शर्त के समान है और अफ़सोस की बात तो ये है कि पांच पुलिस वाले के मानवाधिकार का हनन हुआ भी तो मानवाधिकार वादियों के ठेकेदारों के सामने।पता कभी आईना देखते समय ये खुद से बात करते भी हैं या नही?कभी आईना उन्हे चिढाता भी या नही?कभी खुद की आंखों में आंखे डालते समय नज़रे झुक जाती है या नही?
क्या कोई नौकरीपेशा इंसान इस ज़माने में बिना कोई काम किया जीवनयापन कर सकता है?क्या कोई नौकरीपेशा बिना नौकरी किये अपना परिवार पाल सकता है?क्या वो बिना नौकरी किये ज़िंदगी की गाड़ी खींच सकता है?अगर उसे ज़िंदा रहने के लिये नौकरी की ज़रूरत नही होती तो क्यों जाता वो जान हथेली पर लेकर बस्तर मरने के लिये?आखिर वो नौकरी करता ही क्यों,अगर उसका गुज़ारा नौकरी के बिना हो सकता था,तो?
समझ में नही आता इतने बड़े खुद को स्वामी कहने वाले विद्वान,अग्निवेश के मन मे ये सवाल क्यों नही उठा?मानवाधिकार वादियों की नेता कविता श्रीवास्तव,गौतम नौलखा,वी सुरेश,हरीश दीवान आदि-आदि के मन में क्यों नही उठा?उनके मन में तो ये सवाल भी आना चाहिये था कि बंदूक की नोक पर किसी की नौकरी छीनना मानवाधिकार का हनन है?शायद उन्हे ये पता ही नही होगा कि नौकरी छोड़कर कोई भी इंसान अपना परिवार नही पाल सकता है,ज़िंदा नही रह सकता है?खैर ये तो वही जान सकता है जो छोटी-मोटी नौकरी करता हो उन पुलिस जवानों जैसी।जिसे महिने में एक बार मुट्ठी भर रूपये मिलते हों महीने भर ज़िंदगी दांव पर लगाकर बारूदी सुरंगों से अटे पड़े बस्तर के जंगलों में।
उन लोगों को क्या मालूम होगा ज़िंदा रहने के लिये नौकरी कितनी ज़रूरी है,जिन्होने कभी नौकरी की ही ना हो?जिन्हे नेतागिरी के लिये हर महीने मोटी रकम मिल जाती हो?जिन्हे बेवज़ह बकवास करने और सरकारों(खासकर भाजपा)के खिलाफ़ जातिवाद से लेकर अनाप-शनाप आरोप लगाने पर विदेशी धनराशियों पर फ़ल-फ़ूल रहे एनजीओ से चंदा मिलता हो?उन लोगो को कैसे पता हो सकता है नौकरी के बिना ज़िंदा रहना,और नक्सलियों की कैद में रहना एक समान ही है?
चलिये जाने दिजीये ये नौकरी-फ़ौकरी की मीडिल और लोअर मीडिल क्लास बातें।एसी कमरों मे बैठ कर गरीबी और आम आदमी की हालत पर टेसूये बहाने वाले उन एलिट लोगों को ये तो बताना चहिये कि नक्सलियों की कैद से रिहा होने के लिये अब उन जवानों को करना क्या चाहिये?क्या उन्हे भी बंदूक उठाकर जीवनदान देने वालों के साथ हो जाना चाहिये?क्या उन्हे रिहाई के लिये दलाली करने वालों का झण्डा थाम लेना चाहिये?ऐसा क्या करना चाहिये कि उनके बच्चों की स्कूल समय पर पट सके?बूढे मां-बाप के मेड़िकल से दवा खरीद सके?बहन-भाई की शादी के लिये बारात का इंतजाम कर सके?उसकी रिहाई के लिये दिन-रात आंसू बहाते और हर किसी से उसकी रिहाई की गुहार लगाते-लगाते सूख चुके सकी पत्नी के ओंठो पर छोटी सी मुस्कान लाने के लिये वो साड़ी खरीद सके?
इन सब के लिये लगता है रूपया,जो उन्हे मिलता था नौकरी से,और आप उन्से कह रह नौकरी छोड़ कर ज़िंदा रहो?ये कैसे संभव हो सकता है?बिना सांस लिये ज़िंदा रहने की शर्त के समान है और अफ़सोस की बात तो ये है कि पांच पुलिस वाले के मानवाधिकार का हनन हुआ भी तो मानवाधिकार वादियों के ठेकेदारों के सामने।पता कभी आईना देखते समय ये खुद से बात करते भी हैं या नही?कभी आईना उन्हे चिढाता भी या नही?कभी खुद की आंखों में आंखे डालते समय नज़रे झुक जाती है या नही?
Saturday, January 1, 2011
हे प्रभु उन्हें सद्बुद्धि देना
हे प्रभु, नववर्ष, हिन्दू नहीं अंग्रेजी नववर्ष पर आपसे यह प्रार्थना है कि छत्तीसगढ के बारे में कुछ भी नहीं जानने वाले, विदेशों में रहने वाले अज्ञानियों को सद्बुद्धि देना। हो सके तो उन्हें क्षमा भी कर देना क्योंकि वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं। वे तो बस यहां के कुछ अंग्रेजी परस्त कथित बुध्दिजीवियों, मानवाधिकारवादियों के बताए झूठ को ही सच मान रहे हैं। इसमें उनकी गलती भी नहीं है इसलिए उन्हें क्षमा जरूर करना और सद्बुद्धि भी जरूर देना ताकि उन्हें सिर्फ तीन आदमियों को सजा देना ही अन्याय न लगे। उन्हें ये भी पता होना चाहिए कि बस्तर में सैकडों गांव 21वीं सदी में अंधेरे में डूबे हुए हैं। डूबे नहीं बल्कि अंधेरे में डूबो दिए गए हैं। उन लोगों ने, जिनके शहरी संपर्क सूत्रों को सजा देने के बाद विदेशों में हो-हल्ला मचाया जा रहा है।
छत्तीसगढ में आज पहली बार विरोध के नाम पर खानापूर्ति की शुरूआत की गई है वो भी राजधानी में। इससे पहले कथित मानवाधिकारवादी डॉ. विनायक सेन और उनके साथियों को सजा सुनाए जाने के बाद छत्तीसगढ में किसी ने विरोध तक नहीं किया था। जहां का मामला वहां विरोध न होकर विरोध शुरू हुआ अमेरिका से। और धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फिर एक बार छत्तीसगढ में पनप रहे लाल आतंकवाद के पोषक तत्व सक्रिय हो गए हैं। ठीक वैसे ही जब डॉ. विनायक सेन को जनसुरक्षा अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया था। तब भी दुनिया भर के देशों के साथ-साथ दिल्ली में उनकी गिरफ्तारी पर जमकर हाय-तौबा मची थी। तब उनकी गिरफ्तारी पर सवाल उठाए गए थे। और अब उन्हें सजा देने पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
सवाल तो यह भी उठता है कि क्या ये न्यायपालिका को प्रभावित करने का षडयंत्र नहीं है? क्या ये न्यायपालिका की अवमानना नहीं है? क्या ये न्यायपालिका पर अप्रत्यक्ष रूप से दबाव बनाने की कोशिश नहीं है? सवाल और भी बहुत से हैं। कांग्रेस के दिग्विजय सिंह जो कभी अखंड मध्यप्रदेश जिसमें छत्तीसगढ भी शामिल था के मुख्यमंत्री रहे हैं, डॉ. विनायक सेन को भला आदमी ठहराने पर तुले हुए हैं। उस डॉ. विनायक सेन को जिन्हें अदालत ने नक्सलियों की मदद करने का आरोपी प्रमाणित पाया है। उन नक्सलियों का जिन्होंने कभी उनके मंत्रिमंडल के साथी मंत्री लिखीराम कावरे के घर में घुसकर हत्या कर दी थी। ऐसे में दिग्विजय सिंह का नक्सली समर्थकों के समर्थन में बयानबाजी करना उनके कार्यकाल में नक्सलियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं होने पर सवाल खडे करता है।
सवाल और भी हैं। जिस तरह अंग्रेजी परस्त लोग अंग्रेजी नए साल को हिन्दू नववर्ष की बजाय नया साल साबित करने पर तुले हुए हैं ठीक उसी तरह कुछ अज्ञानी लोग अदालत में राजद्रोह का मामला प्रमाणित होने पर दोषी करार दिए जाने वाले डॉ. विनायक सेन और उनके साथियों को निर्दोष और भला साबित करने पर तुले हुए हैं। उन्हें पता ही नहीं है कि वे कर क्या रहे हैं। जिस दिन डॉ. सेन और उनके साथियों को सजा सुनाई गई तब से बस्तर में नक्सलियों का उत्पात जारी है। वहां सडकें खोद दी गई हैं। वहां बिजली के खंभे गिरा दिए गए हैं। आवागमन ठप पडा है। चाहे सडक मार्ग का हो या रेल। बिजली जो गई है आज तक लौटी नहीं है।
सारा जहां विज्ञान के इस दौर में जगमग लट्टुओं से रात के अंधेरे को चीरकर आराम की जिंदगी जी रहा है वहीं बस्तर के बीजापुर के लोग फिर एक बार आदिमकाल में पहुंचा दिए गए हैं। क्या उनके हिस्से की बिजली चुरा लेना मानवाधिकार का हनन नहीं है? आज भी सरपंच, उपसरपंच और ग्रामीणों की मुखबिरी के नाम पर नक्सली हत्या कर रहे हैं, क्या ये मानवाधिकार का हनन नहीं है? मानवाधिकार के मायने क्या सिर्फ मानवाधिकार संगठन से जुडे लोगों के लिए ही है? मानवाधिकार क्या सिर्फ डॉ. विनायक सेन और उनके साथियों का ही है? क्या बस्तर में बारूदी सुरंगों का शिकार हुए पुलिसकर्मियों के परिवार का कोई मानवाधिकार नहीं होता? रास्ता खोद देना, लोगों को आने-जाने से रोकना क्या इस बारे में कभी कोई मानवाधिकारवादी संगठन कुछ बोलेगा? बस्तर के दुरूह जंगली इलाकों में बिजली के खंभे गिरा देना कहां का न्याय है। क्या विदेशों में गला फाड-फाडकर रो रहे रूदालियों को कभी इस बात पर भी रोना आएगा? क्या उन्हें कभी ये पता भी चल पाएगा कि बस्तर में लाल आतंकवाद की असलियत क्या है? क्या अकारण मारे जा रहे निर्दोष ग्रामीण और पुलिस वालों के घरवालों की चीखें उनके कानों पर पडा लाल पर्दा फाड सकेंगी? हे प्रभु बीते साल जो कुछ हुआ सो हुआ नए साल में ऐसा कुछ भी न हो और हो सके तो उन अज्ञानियों को सद्बुद्धि देना।
Thursday, September 2, 2010
आन्ध्र के पोलावरम बांध मे डूब कर खत्म हो जायेंगे दोरला आदिवासी!खामोश क्यों हैं मानवाधिकारवादी,पर्यावरणवादी और नक्सलवादी?
गोंड जनजाति की 56 शाखाओं मे से एक दोरला जनजाति भारत मे सिर्फ़ बस्तर और खासकर दक्षिण बस्तर मे ही रहती है।द्रविड़ संस्कृति के बेहद करीब है दोरला जनजाति की संस्कृति।दोरला तेलगु से संबंधित दोरली भाषा बोलते हैं।आंध्र प्रदेश मे प्रस्तावित पोलावरम बांध का छ्त्तीसगढ सरकार पहले भी ज़ोरदार विरोध कर चुकी है मगर उस बांध को हरी झण्डी मिल चुकी है।
इस बांध के बनने से पता नही किसे क्या फ़ायदा होगा मगर भारत मे रहने वाली दुर्लभ दोरला जनजाति के लगभग 13000 लोगों के अस्तित्व पर संकट के बादल छ्ये हुयें हैं।आदिवासियों की खासियत होती है कि ये अपना मूल स्थान नही छोडते और बांध बनने से डूबान मे आ रहे इनके तमाम गांवों का व्यवस्थापन कैसे और कौन कर पायेगा ये अभी तक़ नही हो पाया है।
छत्तीसगढ के बस्तर के आला अफ़सर इस काम को असंभव बता कर पहले ही सरकार को सचेत कर चुके हैं ।वैसे दक्षिण बस्तर मे अपना अघोषित साम्राज्य स्थापित करने मे जी-जान से जुटे कथित आदिवासी समर्थक नक्सलियों ने भी इस मामले मे मुंह तक़ नही खोला है और ना ही अप्रत्यक्ष रूप से उन्हे समर्थन करने वाले कथित मानवाधिकारवादी और पर्यावरणविदों की इस ओर नज़र गई है।शायद आदिवासी सिर्फ़ म्यूज़ियम मे रखने की और उसके बारे मे बढ-चढ कर बातें करके खुद को प्रगतिशील बताने का ज़रिया भर बस हैं।
यंहा के मानवव विज्ञान विशेषज्ञों का कहना है कि न केवल दोरला बल्कि कोई भी आदिवासी व्यस्थापन को स्वीकार नही कर पाता।अब सवाल ये उठता है कि क्या पोलावरम बांध मे दुर्लभ और सारे देश मे सिर्फ़ बस्तर मे मिलने वाली दोरला जनजाति का नामोनिशान मिट जायेगा और वो हमारी भावी पीढी को पढाने के लिये सिर्फ़ किताबों मे नज़र आयेगी?उनके साथ-साथ बस्तर के कुदरती साल के जंगल भी खतरे मे हैं और जैव-विविधता का अनूठा उदाहरण प्रकृति का अनुपम उपहार भी पानी के नीचे डूब कर कहतम हो जायेगा?
इस बांध के बनने से पता नही किसे क्या फ़ायदा होगा मगर भारत मे रहने वाली दुर्लभ दोरला जनजाति के लगभग 13000 लोगों के अस्तित्व पर संकट के बादल छ्ये हुयें हैं।आदिवासियों की खासियत होती है कि ये अपना मूल स्थान नही छोडते और बांध बनने से डूबान मे आ रहे इनके तमाम गांवों का व्यवस्थापन कैसे और कौन कर पायेगा ये अभी तक़ नही हो पाया है।
छत्तीसगढ के बस्तर के आला अफ़सर इस काम को असंभव बता कर पहले ही सरकार को सचेत कर चुके हैं ।वैसे दक्षिण बस्तर मे अपना अघोषित साम्राज्य स्थापित करने मे जी-जान से जुटे कथित आदिवासी समर्थक नक्सलियों ने भी इस मामले मे मुंह तक़ नही खोला है और ना ही अप्रत्यक्ष रूप से उन्हे समर्थन करने वाले कथित मानवाधिकारवादी और पर्यावरणविदों की इस ओर नज़र गई है।शायद आदिवासी सिर्फ़ म्यूज़ियम मे रखने की और उसके बारे मे बढ-चढ कर बातें करके खुद को प्रगतिशील बताने का ज़रिया भर बस हैं।
यंहा के मानवव विज्ञान विशेषज्ञों का कहना है कि न केवल दोरला बल्कि कोई भी आदिवासी व्यस्थापन को स्वीकार नही कर पाता।अब सवाल ये उठता है कि क्या पोलावरम बांध मे दुर्लभ और सारे देश मे सिर्फ़ बस्तर मे मिलने वाली दोरला जनजाति का नामोनिशान मिट जायेगा और वो हमारी भावी पीढी को पढाने के लिये सिर्फ़ किताबों मे नज़र आयेगी?उनके साथ-साथ बस्तर के कुदरती साल के जंगल भी खतरे मे हैं और जैव-विविधता का अनूठा उदाहरण प्रकृति का अनुपम उपहार भी पानी के नीचे डूब कर कहतम हो जायेगा?
Monday, May 17, 2010
चिदंबरम जी नक्सली यात्री बस उडाने लगे हैं,तीस लोग मरे हैं,क्या अब भी आप कहेंगे कि सेना नही भेजेंगे!
बस्तर के लिये आज काला दिन है!बस्तर क्या सारे छत्तीसगढ के लिये काला दिन है.नक्सलियों ने पहली बार यात्री बस यात्री बस को बारुदी सुरंग से उडा दिया.बस मे यात्रियों के साथ कुछ जवान भी सवार थे.अभी कल ही नक्सलियों ने आधा दर्जन नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया था.तब भी मुख्यमंत्री डा रमन सिंह ने कहा था कि ये कायराना हरकत है और आज भी संभवतः यही कहेंगे!इसके अलावा और कर भी क्या सकते हैं.आपने तो पहले ही अपनी और अपनी नेता और उनकी सरकार की अंतर्राष्ट्रीय इमेज बनाये रखने के लिये दिल्ली मे चिल्ला चिल्ला कर कहा था कि हम नक्सलियों से निपटने के लिये सेना का इस्तेमाल नही करेंगे.आप की उस बयानबाज़ी से क्या असर पडा देख लिजिये.कल आधा दर्जन निरीह और निर्दोष नागरिक और आज तो पता नही कितने?पहली सूचना के अनुसार तीस और भी बढ सकते हैं.क्या आपको अब भी लगता है कि नक्सलियों से बात होनी चाहिये?क्या उनके खिलाफ़ सेना का इस्तेमाल आपको अब भी गलत लगता है?
तो फ़िर बताईये चिदंबरम जी कि और कितना खून बहान पडेगा बस्तर में.और कितने बच्चों को असमय अनाथ होना पडेगा?और कितनी बहनों का सुहाग उजडवागे?और कितने बुढों की लाठियां तोडोगे?कुछ तो शर्म आनी चाहिये केन्द्र सरकार को और उसके चमचों को.आखिर कब तक चलेगा बस्तर ,छत्तीसगढ और अन्य नक्सल प्रभावित इलाकों मे खूनी खेल.सब रुकना चाहिये और तत्काल रुकना चाहिये,कैसे रुकेगा ये आप जानिये?
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Wednesday, April 21, 2010
जंहा दिल खुशी से मिला मेरा वंही सर भी मैने झुका दिया!
जंहा दिल खुशी से मिला मेरा वंही सर भी मैने झुका दिया!ये बात सौ प्रतिशत सही उतरती है बस्तर के भोले-भाले आ
दिवासियों पर।जिस पर विश्वास किया उस पर सब कुछ निछावर करते आ रहे हैं और मान्य्ताओं का तो फ़िर क्या कहना।उनकी एक अनोखी मान्यता की खबर मुझे भी मिली जो आप लोगों को बता रहा हूं।बस्तर के मुख्यालय जगदलपुर से कांगेर घाटी की ओर जाने पर लगभग पचास किमी पर मुख्य मार्ग से कुछ अंदर जंगल मे एक मंदिर है जंहा बीमार लोग अपनी बीमारी ठीक करने के लिये चश्मा चढाते हैं।बोलचाल की भाषा मे चश्मे वाली मैया का मंदिर कहा जाता है।भोले-भाले आदिवासी आज भी अपनी बीमारियों के इलाज के लिये डाक्टरों के पास जाने की बजाय अपने बेगा-गुनिया से झाड़-फ़ूंक कराते है या फ़िर चश्मे वाली मैया जैसे और भी देवी-देवता हैं उनके पास्।
दिवासियों पर।जिस पर विश्वास किया उस पर सब कुछ निछावर करते आ रहे हैं और मान्य्ताओं का तो फ़िर क्या कहना।उनकी एक अनोखी मान्यता की खबर मुझे भी मिली जो आप लोगों को बता रहा हूं।बस्तर के मुख्यालय जगदलपुर से कांगेर घाटी की ओर जाने पर लगभग पचास किमी पर मुख्य मार्ग से कुछ अंदर जंगल मे एक मंदिर है जंहा बीमार लोग अपनी बीमारी ठीक करने के लिये चश्मा चढाते हैं।बोलचाल की भाषा मे चश्मे वाली मैया का मंदिर कहा जाता है।भोले-भाले आदिवासी आज भी अपनी बीमारियों के इलाज के लिये डाक्टरों के पास जाने की बजाय अपने बेगा-गुनिया से झाड़-फ़ूंक कराते है या फ़िर चश्मे वाली मैया जैसे और भी देवी-देवता हैं उनके पास्।आज़ादी के इतने
सालों बाद भी इलाज का ये तरीका बताता है कि विकास सारी दुनिया मे जिस रफ़्तार से भी दौड़ा होगा यंहा बस्तर मे वो रेंग भी नही पाया है।यंहा आज भी बुखार का इलाज मरीज को चिंटियों से भरी बोरी मे डाल कर किया जाता है।ताड़ी और सल्फ़ी की मादकता मे मस्त आदिवासियों को पता ही नही चला कि विकास की दौड़ मे वे कितने पीछे हैं और उन्हे इस बात से शिकायत भी नही है।वे तो आज भी अपनी ही दुनिया मे मस्त हैं जंहा प्यार और विश्वास के सिवाय और कुछ नही मिलता।
सालों बाद भी इलाज का ये तरीका बताता है कि विकास सारी दुनिया मे जिस रफ़्तार से भी दौड़ा होगा यंहा बस्तर मे वो रेंग भी नही पाया है।यंहा आज भी बुखार का इलाज मरीज को चिंटियों से भरी बोरी मे डाल कर किया जाता है।ताड़ी और सल्फ़ी की मादकता मे मस्त आदिवासियों को पता ही नही चला कि विकास की दौड़ मे वे कितने पीछे हैं और उन्हे इस बात से शिकायत भी नही है।वे तो आज भी अपनी ही दुनिया मे मस्त हैं जंहा प्यार और विश्वास के सिवाय और कुछ नही मिलता।अब चाहे राज्य सरकार चि
कित्सा सुविधा के लिये डेड़ सौ करोड़ रूपये के पैकेज की घोषणा करे या तीन सौ करोड़ की,आदिवासियों को क्या फ़र्क़ पड़ता है।बीमार हुआ तो चले जायेंगे चश्मे वाली मैया की शरण में।बताया जाता है जंगल आदिवासियों को उनकी जरुरत की सारी चींज़े दे देता है सिवाय नमक के।और उसी नमक को लेने के लिये आदिवासी जंगल से बाहर आता था और व्यापारियों को चिरौंजी देकर नमक लेता था।इस बात का उल्लेख एक बार अखण्ड मध्यप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल ने बस्तर प्रवास पर कर दिया था तो बड़ा बखेड़ा हुआ था।आखिर पूरा न सही थोड़ा बहुत तो सच
होगा ही।आज भी बस्तर का आदिवासी मौसम मे महुआ सस्ते मे बेच देता है और आफ़ सीज़न में कोल्ड स्टोरेज मे रखा वही महुआ उसे कई गुना महंगा खरीदना पड़ता है।पता नही ये विकास नाम का धावक कब इस तरफ़ आयेगा।शायद उसे किसी ने यंहा के बीहड जंगलो और खून बरसाते नक्सलियों के बारे मे बता दिया है।शायद उसे सरकार की सुरक्षा व्यवस्था पर भरोसा नही है या फ़िर उसे रोज़ हो रही सुरक्षा कर्मियों की मौत की खबर डरा रही है।कारण चाहे जो भी हो ये तो तय है विकास बाबू ने यंहा आने मे देर तो की है और अब भी अगर वे समय पर नही पंहुचे तो फ़िर उनके पास सिवाय इस बात के और क्या चारा होगा कि एक चश्मा लें और मैया को चढा दें।मुझे लगता है कि उनके पास और कोई उपाय है भी नही।
कित्सा सुविधा के लिये डेड़ सौ करोड़ रूपये के पैकेज की घोषणा करे या तीन सौ करोड़ की,आदिवासियों को क्या फ़र्क़ पड़ता है।बीमार हुआ तो चले जायेंगे चश्मे वाली मैया की शरण में।बताया जाता है जंगल आदिवासियों को उनकी जरुरत की सारी चींज़े दे देता है सिवाय नमक के।और उसी नमक को लेने के लिये आदिवासी जंगल से बाहर आता था और व्यापारियों को चिरौंजी देकर नमक लेता था।इस बात का उल्लेख एक बार अखण्ड मध्यप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल ने बस्तर प्रवास पर कर दिया था तो बड़ा बखेड़ा हुआ था।आखिर पूरा न सही थोड़ा बहुत तो सच
होगा ही।आज भी बस्तर का आदिवासी मौसम मे महुआ सस्ते मे बेच देता है और आफ़ सीज़न में कोल्ड स्टोरेज मे रखा वही महुआ उसे कई गुना महंगा खरीदना पड़ता है।पता नही ये विकास नाम का धावक कब इस तरफ़ आयेगा।शायद उसे किसी ने यंहा के बीहड जंगलो और खून बरसाते नक्सलियों के बारे मे बता दिया है।शायद उसे सरकार की सुरक्षा व्यवस्था पर भरोसा नही है या फ़िर उसे रोज़ हो रही सुरक्षा कर्मियों की मौत की खबर डरा रही है।कारण चाहे जो भी हो ये तो तय है विकास बाबू ने यंहा आने मे देर तो की है और अब भी अगर वे समय पर नही पंहुचे तो फ़िर उनके पास सिवाय इस बात के और क्या चारा होगा कि एक चश्मा लें और मैया को चढा दें।मुझे लगता है कि उनके पास और कोई उपाय है भी नही।Thursday, February 18, 2010
क्या पुलिस वाले इंसान नही कीड़े-मकौड़े है? क्या उनका कोई मानवाधिकार नही?
सुबह-सुबह मोबाईल की स्क्रीन पर एक अंजान नम्बर चमका।थोड़ा कन्फ़्यूसियाने के बाद सोचा कौन हो सकता है?जिज्ञासा के कीड़े को शांत करने की गरज़ से रिस्क लेकर काल रिसीव कर ली।उधर से आवाज़ पहचानी-पहचानी सी थी लेकिन एकदम से पहचान नही पाया और पूछ बैठा कौन?उधर से आवाज़ आई अच्छा बेटा हम कौन?कोई नेता होता तो?जी!जी भैया!जी सर जी!और हम कौन?ठीक है बेटा?मैं अब तक़ समझ गया था कि कोई अपना ही होगा?मैं पहचानने की कोशिश कर ही रहा था कि वो बोला अबे कभी पुराने दोस्तों से भी बात-वात कर लिया करो!मैने कहा ऐसी बात नही है यार!यार?चल नाम तो बता बे?मैं खामोश ही रहा!वो बोला अबे नाम तक़ जानता नही,मैं कंहा से तेरा यार हो गया !मैं अब तक़ उसे पहचान चुका था!मैने कहा आगे बोल कैसे याद किया!वो भी समझ गया कि मैं उसे पहचान चुका हूं।वो बोला अबे कभी ये जानने के लिये भी फ़ोन कर लिया कर कि ज़िंदा भी हूं या मर-खप गया हूं!मैने कहा सुबह-सुबह तो शुभ-शुभ बोल!वो हंसा और बोला कि क्या शुभ और क्या अशुभ!खैर मैं भी गलत बोल गया,मरने की खबर तो तुम लोगों को पहले ही मिल जाती है,खासकर हम पुलिस वालों की,क्यों सही है ना?मैने कहा अब बकवास बंद कर और आगे बोल,फ़ोन क्यों लगाया?क्यों फ़ोन नही लगा सकता क्या? इतना भी हक़ नही है क्या?बोलेगा तो नही लगाऊंगा आगे से?मैं उसकी नाराज़गी को समझ गया और उसे दूर करने की गरज़ से बोला छोड़ ना बे,ये बता तू है कंहा आजकल!वो बोला कब्रिस्तान के बाहर!मैं बोला क्या बक़ रहा है बे!सच कह रहा हूं।मैने अपना ही सवाल बदला और फ़िर से पूछा तेरी पोस्टिंग कंहा है?
वो खिलखिलाकर कर हंसा और बोला सवाल बदलने से क्या जवाब बदल जायेगा!सच ही कह रहा हूं,कब्रिस्तान के बाहर ही पोस्टिंग समझ ले।मैंने कुछ नही कहा तो,वो बोला तक़दीर का फ़ेर है प्यारे जब तक़ ज़िंदा है तब तक़ घर में,और जिस दिन अपने नाम की गोली चली तो डायरेक्ट ट्रांसफ़र कब्रिस्तान में।तू आयेगा ना बे!के बिज़ी रहेगा किसी प्रेस काम्फ़्रेंस में,या किसी नेता के यंहा तेल लगाता बैठा रहेगा!वैसे तेरा इस मामले रिकार्ड ठीक ही है,शादी-बारात में जाये न जाये तू अंतिम यात्रा मे शामिल ज़रूर होता है।आयेगा ना बे!चक्र लेकर आयेगा या माला लेकर?मैने कहा सुबह-सुबह पी लिया है क्या?अबे पी भी लूंगा तो क्या फ़र्क़ पड़ेगा?कौन चेक करेगा और करेगा भी तो क्या कर लेगा?जंहा भी ट्रांसफ़र करेगा इससे तो अच्छी ही जगह होगी?और फ़िर कौन सा पुलिस वाला ट्रांसफ़र से बचा है?किसी भी रात को बीबी-बच्चों से गले लगकर सर्च पर निकलो और पता चला दूसरे दिन खुद सर्च किये जा रहे हों?
मैने कहा छोड़ फ़लतू बातों को ये बता तेरा इधर आना नही होता क्या?होता है, लेकिन पूरा टाईम इस साहब से लेकर उस साब और इस नेता से लेकर उस नेता को तेल लगाने से ही फ़ुरसत नही मिलती।मैं खामोश ही रहा!उसका बोलना शुरू ही रहा!कालेज के दिनो से ही वो खूब बोलता था और हमेशा हंसता रहता था।हर बात को पूरी दमदारी से कहता था और गलत बात पर बहस करने से कभी पीछे नही हटता था।लेकिन आज उसकी आवाज़ मे वो दम नज़र नही आ रहा था।खोखली लग रही थी उसकी हंसी भी और आवाज़ भी।उसका बिंदास स्टाईल बिलकुल भी नही बदला था लेकिन लग रहा था कि शायद ज्यादा दिनों तक़ चलने वाला नही है।इस बीच पता नही वो क्या बड़बड़ाता रहा।मैं इस दौरान उसके साथ कालेज मे गुज़ारे दिनों मे लौट गया था।
अचानक़ मेरा ध्यान उसकी गालियों से टूटा।वो बोला अबे मैं जो बोल रहा वो सुन रहा है या मैं जबरन ही भौंक रहा हूं।मैने हड़बड़ा कर कहा नही भाई सुन रहा हूं।वो फ़िर बोला तो डर क्यों रहा है बे।तेरी आवाज़ टें क्यों बोल रही है।फ़ट रही है क्या साले सच सुनने में।कभी चलना दिखाऊंगा तुझे मौत का खौफ़ क्या होता है?वंहा शहर मे बैठ कर सुरक्षा मे चूक निकालते हो।सूचना तंत्र की असफ़लता बताते हो?सरकार का विश्वास खोना कहते हो?पुलिस से ज्यादा जनता का नक्सलियों पर विश्वास बताते हो?अबे कभी आओ और सबसे बड़ा सच देखो,मौत के खौफ़ का सच!
अब तक़ मेरा अंदर धधक रहा गुस्से का ज्वालामुखी धुंआ उगलने लगा था।मैने कहा मार क्यों नही डालते सालों को?खत्म कर दो समस्या को जड़ से!वो ज़ोर से हंसा!इस बार उसकी हंसी खोखली नही थी।वो बोला क्या समझता है कोई इस समस्या को बचाके रखना चाहता है?क्या कोई अपनी मौत का सामान खुला छोड़ देना चाहता है?सब यही चाहते हैं लेकिन्………वो एकाएक खामोश हो गया।मैने उस जानलेवा खामोशी को तोड़ा और पूछा लेकिन क्या?वो बोला लेकिन कोई चाह कर भी ऐसा नही कर सकता।पता हैं क्यों?मुझे लगा कि मैं उसके सम्मोहन मे बंध चुका था,जैसा वो कह रहा था मैं वैसा ही कर रहा था।उसके क्यों की तर्ज़ पर मैने पूछा क्यों?वो हंसा और बोला क्योंकि इस देश मे अपराधियों को ज़िंदा रहने का अधिकार है?क्योंकि लोगों के खून से होली खेलने वालों के मानवाधिकार हैं?क्योंकि उन्हे मारने पर चिल्लाने वाले तुम जैसे लोग इस समाज के ठेकदार हैं?क्योंकि उनको मामूली खरोंच भी लगने पर हाई-कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक़ याचिकाओं की बाढ ला देने वाले एनजीओ और दुसरे समाजसेवी संगठन है?
मेरी प्रतिरोध करने की ताक़त खत्म हो गई थी।उसका बोलना शुरू था।उसने सवाल किया हम लोग कौन हैं बे?क्या हम लोग इंसान नहीं हैं?क्या हमारे मानवाधिकार नही है?क्या हमे ज़िंदा रहने का हक़ नही है?क्या हमे मौत बरसाने वालों को मौत के घाट उतारने का अधिकार नही है?क्या हमारे मरने पर मानवाधिकारों का हनन नही होता?क्या हमारे मरने पर कभी किसी संगठन को किसी कोर्ट मे याचिका लगाते देखा है?पुलिस की जांच रोकने,उसकी कथित ज्यादती रोकने के लिये कानून के दरवाजे खड़खड़ाये जाते हैं?क्या कानून के रखवालों की सुरक्षा के लिये कभी ऐसा किया जाता है?गिरफ़्तारी पर रोक की मांग होती है क्या कभी नक्स्लियों के गोलियां चलाने,बारूदी सुरंग बिछाने के खिलाफ़ आवाज़ उठती है?क्या मानवाधिकार सिर्फ़ कसाब जैसे विदेशी आतंकवादी का ही होता है?क्या सालस्कर,करकरे और दूसरे पुलिस वालों का ये अधिकार नही था?क्या इस देश में पुलिस के अलावा सब मानव है?और पुलिस वालें क्या कीड़े-मकौड़े हैं?
जवाब दे ना बे!चुप क्यों है!मैंने चुप रहने मे ही भलाई समझी!वो फ़िर शुरू हो गया!अबे कीड़े-मकौड़ों तक़ को अपनी ज़िंदगी बचाने के लिये हमलावर को मार डालने का हक़ कुदरत ने दिया है,लेकिन हम लोग,हम लोगों को कानून से बांधकर हाथ में हथियार दिये गये हैं।किसी खतरनाक नक्सली को गोलियां चलाते हुये मार डालों तो सवाल ही सवाल खड़े रहते हैं।साला इससे ज्यादा शर्मनाक क्या हो सकता है कि जिनके जान-माल की सुरक्षा के लिये हम गोलियां चलाते हैं वही ये सवाल करते हैं कि क्या बिना गोली चलाये काम नही चल सकता?वे ही सवाल खड़ा कर देते हैं कि क्या मरने वाला सच मे नक्सली था?वे ही ये सवाल खड़ा कर देते हैं कि पुलिस ने दबाव हटाने के लिये और झूठी तारीफ़ पाने के लिये एक बेकसूर को मार डाला?जो हम पर गोलियां चलाये वो बेकसूर और जवाब मे हम गोलियां चलाये तो गुनहगार्।वाह रे सिस्टम!अबे देखता है ना पुलिस की शहादत पर सवाल उठते?बड़े-बड़े नेता भौंक उठे थे बाटला हाऊस एनकाऊंटर के बाद मोहनचंद शर्मा की शहादत पर सवाल लगाते हुये?क्या हुआ उन लोगों को दिखा नही क्या दो दर्ज़न पुलिस वालों को शिल्दा मे नक्सलियों ने मार डाला?चलो पुलिस वाले गंदे होते हैं,भ्रष्ट होतें और मानव नही कीड़े-मकौड़े होते हैं,लेकिन अभी एक दर्ज़न ग्रामीणो को भी तो मार डाला है नक्सलियों ने,क्यों खामोश है दिग्विजय सिंह?और तुम लोग उसे दिग्गी राजा कहते हो,लिखते हो,वो राजा है बे?अब क्यों खामोश है वो?क्या मुसलमान ग्रामीण मरेंगे और वो भी उत्तरप्रदेश मे मरेंगे तभी चिल्लायेगा क्या तुम लोगों का दिग्गी राजा?
फ़िर तुम्हारे वो फ़्रंट पेज पर छपने वाले मानवाधिकारवादी कंहा है?पढा है ना आज का अख़बार?मैं चुप ही रहा।वो उधर से लगभग चिल्लाया अबे पढा है या नहीं?मैं फ़िर खामोश रहा,वो गुस्से से चिल्लाया मर गया क्या बे?मैने कहा पढा है?क्या पढा है?तुम लोगों को तो वो खबर दिखी ही नही होगी।सुप्रीम कोर्ट मे छत्तीसगढ सरकार को चार सप्ताह मे जवाब देना है उस पर आदिवासियों पर अत्याचार के आरोप हैं,उस पर मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोप हैं।क्या सरकार आदिवासियों पर अत्याचार कर रही है?क्या आदिवासियों के राहत कैम्पों मे हुये नरसंहारों,नरसंहार कह सकता हूं ना,उसने लम्बी सांस लेकर पूछा?मैने कहा हां वो नरसंहार ही था।तो क्या उस पर किसी मानवाधिकार के ठेकेदारों ने उंगली उठाई थी?क्या मेधा,क्या अरूंधती और दूसरी और सो काल्ड सेलेब्रेटिज़ वंहा पर बेमौत मारे गये लोगों पर रोई थी?क्या ये लोग सिर्फ़ विदेशी हमलों और बड़े शहरों के बम्ब धमाकों और सिर्फ़ और सिर्फ़ साम्प्रदायिक फ़्लेवर के मामलो पर ही रोते हैं और मोमबत्ती जलाते हैं?
क्या हो गया बे?चुप क्यों हैं?बहुत बक-बक करा करता था पहले तो?मैने सुना है तू भी सेलेब्रेटी टाईप का कुछ हो गया है?मैने कहा ऐसी बात नही है?ऐसी बात नही तो जवाब दे ना बे क्या पुलिस वाले मानव नही हैं?क्या उनका मानवाधिकार नही है?क्या वे कीड़े-मकौड़े हैं?मेरे पास जवाब होता तो देता।मैने उससे कहा सुन भाई एक इम्पार्टेंट काल आ रही है दूसरे फ़ोन पर उसे अटैण्ड कर लूं क्या?उसने कहा अच्छा बेटा अब हमसे भी इम्पोर्टेंट होने लग गये लोग?उसने कहा जवाब मिले तो फ़ोन लगाना और बात करना वरना कोई ज़रूरत भी नही है तुम लोगों से बात करने की।और उसने गुस्से से फ़ोन काट दिया।मैं काफ़ी देर तक़ फ़ोन को देखता रहा कि शायद आदत के अनुसार फ़ोन काटने के बाद वो दोबारा काल करेगा,पर उसका नम्बर अब तक़ स्क्रीन पर नही चमका।मेरे पास भी जवाब नही है इसलिये मेरी भी हिम्मत नही हुई उसे काल करने की।अगर आपके पास जवाब हो तो मुझे भी बताईयेगा,मेहरबानी होगी।
वो खिलखिलाकर कर हंसा और बोला सवाल बदलने से क्या जवाब बदल जायेगा!सच ही कह रहा हूं,कब्रिस्तान के बाहर ही पोस्टिंग समझ ले।मैंने कुछ नही कहा तो,वो बोला तक़दीर का फ़ेर है प्यारे जब तक़ ज़िंदा है तब तक़ घर में,और जिस दिन अपने नाम की गोली चली तो डायरेक्ट ट्रांसफ़र कब्रिस्तान में।तू आयेगा ना बे!के बिज़ी रहेगा किसी प्रेस काम्फ़्रेंस में,या किसी नेता के यंहा तेल लगाता बैठा रहेगा!वैसे तेरा इस मामले रिकार्ड ठीक ही है,शादी-बारात में जाये न जाये तू अंतिम यात्रा मे शामिल ज़रूर होता है।आयेगा ना बे!चक्र लेकर आयेगा या माला लेकर?मैने कहा सुबह-सुबह पी लिया है क्या?अबे पी भी लूंगा तो क्या फ़र्क़ पड़ेगा?कौन चेक करेगा और करेगा भी तो क्या कर लेगा?जंहा भी ट्रांसफ़र करेगा इससे तो अच्छी ही जगह होगी?और फ़िर कौन सा पुलिस वाला ट्रांसफ़र से बचा है?किसी भी रात को बीबी-बच्चों से गले लगकर सर्च पर निकलो और पता चला दूसरे दिन खुद सर्च किये जा रहे हों?
मैने कहा छोड़ फ़लतू बातों को ये बता तेरा इधर आना नही होता क्या?होता है, लेकिन पूरा टाईम इस साहब से लेकर उस साब और इस नेता से लेकर उस नेता को तेल लगाने से ही फ़ुरसत नही मिलती।मैं खामोश ही रहा!उसका बोलना शुरू ही रहा!कालेज के दिनो से ही वो खूब बोलता था और हमेशा हंसता रहता था।हर बात को पूरी दमदारी से कहता था और गलत बात पर बहस करने से कभी पीछे नही हटता था।लेकिन आज उसकी आवाज़ मे वो दम नज़र नही आ रहा था।खोखली लग रही थी उसकी हंसी भी और आवाज़ भी।उसका बिंदास स्टाईल बिलकुल भी नही बदला था लेकिन लग रहा था कि शायद ज्यादा दिनों तक़ चलने वाला नही है।इस बीच पता नही वो क्या बड़बड़ाता रहा।मैं इस दौरान उसके साथ कालेज मे गुज़ारे दिनों मे लौट गया था।
अचानक़ मेरा ध्यान उसकी गालियों से टूटा।वो बोला अबे मैं जो बोल रहा वो सुन रहा है या मैं जबरन ही भौंक रहा हूं।मैने हड़बड़ा कर कहा नही भाई सुन रहा हूं।वो फ़िर बोला तो डर क्यों रहा है बे।तेरी आवाज़ टें क्यों बोल रही है।फ़ट रही है क्या साले सच सुनने में।कभी चलना दिखाऊंगा तुझे मौत का खौफ़ क्या होता है?वंहा शहर मे बैठ कर सुरक्षा मे चूक निकालते हो।सूचना तंत्र की असफ़लता बताते हो?सरकार का विश्वास खोना कहते हो?पुलिस से ज्यादा जनता का नक्सलियों पर विश्वास बताते हो?अबे कभी आओ और सबसे बड़ा सच देखो,मौत के खौफ़ का सच!
अब तक़ मेरा अंदर धधक रहा गुस्से का ज्वालामुखी धुंआ उगलने लगा था।मैने कहा मार क्यों नही डालते सालों को?खत्म कर दो समस्या को जड़ से!वो ज़ोर से हंसा!इस बार उसकी हंसी खोखली नही थी।वो बोला क्या समझता है कोई इस समस्या को बचाके रखना चाहता है?क्या कोई अपनी मौत का सामान खुला छोड़ देना चाहता है?सब यही चाहते हैं लेकिन्………वो एकाएक खामोश हो गया।मैने उस जानलेवा खामोशी को तोड़ा और पूछा लेकिन क्या?वो बोला लेकिन कोई चाह कर भी ऐसा नही कर सकता।पता हैं क्यों?मुझे लगा कि मैं उसके सम्मोहन मे बंध चुका था,जैसा वो कह रहा था मैं वैसा ही कर रहा था।उसके क्यों की तर्ज़ पर मैने पूछा क्यों?वो हंसा और बोला क्योंकि इस देश मे अपराधियों को ज़िंदा रहने का अधिकार है?क्योंकि लोगों के खून से होली खेलने वालों के मानवाधिकार हैं?क्योंकि उन्हे मारने पर चिल्लाने वाले तुम जैसे लोग इस समाज के ठेकदार हैं?क्योंकि उनको मामूली खरोंच भी लगने पर हाई-कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक़ याचिकाओं की बाढ ला देने वाले एनजीओ और दुसरे समाजसेवी संगठन है?
मेरी प्रतिरोध करने की ताक़त खत्म हो गई थी।उसका बोलना शुरू था।उसने सवाल किया हम लोग कौन हैं बे?क्या हम लोग इंसान नहीं हैं?क्या हमारे मानवाधिकार नही है?क्या हमे ज़िंदा रहने का हक़ नही है?क्या हमे मौत बरसाने वालों को मौत के घाट उतारने का अधिकार नही है?क्या हमारे मरने पर मानवाधिकारों का हनन नही होता?क्या हमारे मरने पर कभी किसी संगठन को किसी कोर्ट मे याचिका लगाते देखा है?पुलिस की जांच रोकने,उसकी कथित ज्यादती रोकने के लिये कानून के दरवाजे खड़खड़ाये जाते हैं?क्या कानून के रखवालों की सुरक्षा के लिये कभी ऐसा किया जाता है?गिरफ़्तारी पर रोक की मांग होती है क्या कभी नक्स्लियों के गोलियां चलाने,बारूदी सुरंग बिछाने के खिलाफ़ आवाज़ उठती है?क्या मानवाधिकार सिर्फ़ कसाब जैसे विदेशी आतंकवादी का ही होता है?क्या सालस्कर,करकरे और दूसरे पुलिस वालों का ये अधिकार नही था?क्या इस देश में पुलिस के अलावा सब मानव है?और पुलिस वालें क्या कीड़े-मकौड़े हैं?
जवाब दे ना बे!चुप क्यों है!मैंने चुप रहने मे ही भलाई समझी!वो फ़िर शुरू हो गया!अबे कीड़े-मकौड़ों तक़ को अपनी ज़िंदगी बचाने के लिये हमलावर को मार डालने का हक़ कुदरत ने दिया है,लेकिन हम लोग,हम लोगों को कानून से बांधकर हाथ में हथियार दिये गये हैं।किसी खतरनाक नक्सली को गोलियां चलाते हुये मार डालों तो सवाल ही सवाल खड़े रहते हैं।साला इससे ज्यादा शर्मनाक क्या हो सकता है कि जिनके जान-माल की सुरक्षा के लिये हम गोलियां चलाते हैं वही ये सवाल करते हैं कि क्या बिना गोली चलाये काम नही चल सकता?वे ही सवाल खड़ा कर देते हैं कि क्या मरने वाला सच मे नक्सली था?वे ही ये सवाल खड़ा कर देते हैं कि पुलिस ने दबाव हटाने के लिये और झूठी तारीफ़ पाने के लिये एक बेकसूर को मार डाला?जो हम पर गोलियां चलाये वो बेकसूर और जवाब मे हम गोलियां चलाये तो गुनहगार्।वाह रे सिस्टम!अबे देखता है ना पुलिस की शहादत पर सवाल उठते?बड़े-बड़े नेता भौंक उठे थे बाटला हाऊस एनकाऊंटर के बाद मोहनचंद शर्मा की शहादत पर सवाल लगाते हुये?क्या हुआ उन लोगों को दिखा नही क्या दो दर्ज़न पुलिस वालों को शिल्दा मे नक्सलियों ने मार डाला?चलो पुलिस वाले गंदे होते हैं,भ्रष्ट होतें और मानव नही कीड़े-मकौड़े होते हैं,लेकिन अभी एक दर्ज़न ग्रामीणो को भी तो मार डाला है नक्सलियों ने,क्यों खामोश है दिग्विजय सिंह?और तुम लोग उसे दिग्गी राजा कहते हो,लिखते हो,वो राजा है बे?अब क्यों खामोश है वो?क्या मुसलमान ग्रामीण मरेंगे और वो भी उत्तरप्रदेश मे मरेंगे तभी चिल्लायेगा क्या तुम लोगों का दिग्गी राजा?
फ़िर तुम्हारे वो फ़्रंट पेज पर छपने वाले मानवाधिकारवादी कंहा है?पढा है ना आज का अख़बार?मैं चुप ही रहा।वो उधर से लगभग चिल्लाया अबे पढा है या नहीं?मैं फ़िर खामोश रहा,वो गुस्से से चिल्लाया मर गया क्या बे?मैने कहा पढा है?क्या पढा है?तुम लोगों को तो वो खबर दिखी ही नही होगी।सुप्रीम कोर्ट मे छत्तीसगढ सरकार को चार सप्ताह मे जवाब देना है उस पर आदिवासियों पर अत्याचार के आरोप हैं,उस पर मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोप हैं।क्या सरकार आदिवासियों पर अत्याचार कर रही है?क्या आदिवासियों के राहत कैम्पों मे हुये नरसंहारों,नरसंहार कह सकता हूं ना,उसने लम्बी सांस लेकर पूछा?मैने कहा हां वो नरसंहार ही था।तो क्या उस पर किसी मानवाधिकार के ठेकेदारों ने उंगली उठाई थी?क्या मेधा,क्या अरूंधती और दूसरी और सो काल्ड सेलेब्रेटिज़ वंहा पर बेमौत मारे गये लोगों पर रोई थी?क्या ये लोग सिर्फ़ विदेशी हमलों और बड़े शहरों के बम्ब धमाकों और सिर्फ़ और सिर्फ़ साम्प्रदायिक फ़्लेवर के मामलो पर ही रोते हैं और मोमबत्ती जलाते हैं?
क्या हो गया बे?चुप क्यों हैं?बहुत बक-बक करा करता था पहले तो?मैने सुना है तू भी सेलेब्रेटी टाईप का कुछ हो गया है?मैने कहा ऐसी बात नही है?ऐसी बात नही तो जवाब दे ना बे क्या पुलिस वाले मानव नही हैं?क्या उनका मानवाधिकार नही है?क्या वे कीड़े-मकौड़े हैं?मेरे पास जवाब होता तो देता।मैने उससे कहा सुन भाई एक इम्पार्टेंट काल आ रही है दूसरे फ़ोन पर उसे अटैण्ड कर लूं क्या?उसने कहा अच्छा बेटा अब हमसे भी इम्पोर्टेंट होने लग गये लोग?उसने कहा जवाब मिले तो फ़ोन लगाना और बात करना वरना कोई ज़रूरत भी नही है तुम लोगों से बात करने की।और उसने गुस्से से फ़ोन काट दिया।मैं काफ़ी देर तक़ फ़ोन को देखता रहा कि शायद आदत के अनुसार फ़ोन काटने के बाद वो दोबारा काल करेगा,पर उसका नम्बर अब तक़ स्क्रीन पर नही चमका।मेरे पास भी जवाब नही है इसलिये मेरी भी हिम्मत नही हुई उसे काल करने की।अगर आपके पास जवाब हो तो मुझे भी बताईयेगा,मेहरबानी होगी।
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