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Tuesday, November 1, 2011
हीरो व ऎलेक्ज़ेंड्राईट की खदानो पर अब नक्सलियों का कब्ज़ा है जिसके भरोसे राज्य को टैक्स फ्री ज़ोन बनाने का सपना देखा गया था.
छत्तीसगढ पर खनिजों के मामले में ईश्वर की विशेष कृपा है.यंहा लोहे की खदानो के अलावा पहाड भी है.चूना पत्थर भी भरपुर है और शायद ही कोई बडा सिमेंट निर्माता हो जिसका यंहा कारखाना न हो.सामरिक महत्व का खनिज टीन तो सिर्फ यंही मिलता है.आण्विक खनिज भी मिलते है और वाणिज्यिक खनिज का भी यंहा प्रचुर भंडार है.सच कहा जाये तो गरीबों की ये धरती बहुत अमीर है.रत्नगर्भा वसुन्धरा.हीरे की खदानो और उसका एक विशिष्ट प्रकार ऎलेक्ज़ेंड्राईट सिर्फ यंही रिपोर्ट हुआ है.किम्बरलाईट पाईप यंहा एक नही कई है.इन्ही हीरों की खदानों के भरोसे छत्तीसगढ के राज्य बनते ही यंहा की सरकार ने इस राज्य को टैक्स फ्री ज़ोन बनाने की बात की थी.सरकारी बात तो खैर बात ही होती है.उस पर भले ही दुनिया भर की बात होती रही.हीरो से मिलने वाली रायल्टी का अनुमान भी लगा लिया गया.उसके भरोसे दुनिया मे अपनी अलग पहचान बनाने के दावे भी हुये.खैर दावे तो होते रहते है,मगर गरीबों की इस अमीर धरती पर दबे खज़ाने से सरकार इन ग्यारह सालों में एक हीरा भी नही निकाल पाई है.और अब निकाल भी नही पायेगी क्योंकी उस इलाके में नक्सलियों ने दस्तक दे दी है.दस्तक क्या दी है अब उस इलाके में उनका राज है कहा जा सकता है.राजधानी से महज़ 100 किमी दुर कांग्रेस अध्यक्ष के काफिले को भी नक्सली निशाना बनाचुके हैं और पुलिस पार्टियों को तो आये दिन निशाना बना रहे हैं.यानी खज़ाना जिसके भरोसे राज्य को टैक्स फ्री ज़ोन बनाना था गया हाथ से.सिर्फ राजनैतिक दांवपेंच ही दिखाये है अब तक़ यंहा की कांग्रेस और भाजपा की सरकारों ने.यही हाल बस्तर के लोहे की खदानो का है.यंहा एस्सार जैसे बडे समूह को काम करने के लिये नक्सलियों को टैक्स देना पड रहा है.इस बात का सबूत मिला उस कंपनी के अफसरों द्वारा नक्सलियों को रकम देने के मामले के खुलासे ने.खैर बहुत कुछ हो रहा है इस प्रदेश में.आज इस प्रदेश का जन्म दिन मनाया जा रहा है.आधे से ज्यादा इलाका नक्सलियों की गिरफ्त में आ चुका है और हमारा हौसला देखिये कि हम उत्सव मना रहे हैं.जय हो,जय छत्तीसगढ.
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Thursday, October 6, 2011
।नक्सल समस्या पर भी बड़बोले नेताओं को बुलाकर गर्मागरम बहस करा कर तो दिखाये साहब।
आज की सबसे बडी खबर बताई गई मुम्बई में आटो वालों की पिटाई और एक आटो रिक्शा को जलाने की घटना।देश का ठेका खुद ही ले लेने वाले चैनल वाले भाईयों ने आज फ़िर जनता का चैन छीन लिया।सुबह से बिना थके रात तक़ बस एक ही सवाल आखिर मुम्बई में राज किसका है?जय हो मेरे देश के स्वयंभू ठेकेदारो अरे भाई एक आटो रिक्शा जला है और जो आधा दर्ज़न मारपीट हुई उसमे भी कोई गंभीर रूप से घायल नही हुआ,मर्ना तो बहुत दूर की बात है।बस चढ बैठे राज ठाकरे पर।मैं भी मराठी हूं लेकिन राज ठाकरे के तरीके से सहमत नही हूं। मेरा सवाल ये है कि जब एक आटो के जलाये जाने पर आप महाराष्ट्र में सरकार नही होने की बात कह सकते हो।मुम्बई की सड़को पर राज ठाकरे का राज बता सकते हो।तो फ़िर इस बारे में भी आपकी बहुमूल्य राय जानना चाहुंगा कि जंहा आये दिन आटो से कई गुना बड़ी गाड़ीयां जलाई जाती हो,एक नही कई लोग मार दिये जाते हो,जंहा रात को रेलगाड़ी नही चलाई जा सकती हो।उस पर तो कुछ कहिये साहब्। यंहा छत्तीसगढ में तो आये दिन डम्पर,डोज़र,टिप्पर,ट्रक,ड्रिलिंग रिग और जाने क्या-क्या जला दिये जाते है।एक नही दर्ज़नों बल्कि सैकडो आटो आ जायेंगे उसकी किमत पर।इसके अलावा नक्सली आये दिन किसी न किसी की जान ले ही रहे हैं।उन्होने साल भर से ज्यादा समय पहले हावड़ा-मुम्बई रेल लाईन पर दौड रही शालीमार एक्स्प्रेस को गिरा दिया था।दर्ज़नो लोग मारे गये थे।और उस घटना के बाद मेरा मुम्बई जाना भी टल गया।शालीमार एक्स्प्रेस के गिरा दिये जाने के बाद आज तक़ उस मार्ग पर रात को रेल नही चलाई जाती है। क्या रेलमार्ग पर सरकार की मर्ज़ी के मुताबिक नही बल्कि नक्सलियों की मर्ज़ी के मुताबिक रेलों को निर्धारित समय पर ना चला कर घण्टो देर से चलाया जाना शायद नज़र ही नही आता भाई लोगों को।आज तक़ नही बुलाया इस विषय पर किसी विशेषज्ञ को बहस के लिये।क्यों?क्या डर लगता है।यंहा छत्तीसगढ में आये दिन मुठभेड होती है नक्सलियों सेआये दिन लोग मरते है?क्या इस मामले पर बहस नही होनी चाहिये?क्या यंहा बिज़ली के टावर गिरा कर सात-सात दिनों तक़ इलाके को अंधेरे में डुबो देने वाले तो आपकी नज़र में निर्दोष है,उन्हे सर्टिफ़िकेट की भी ज़रुरत नही सब कुछ प्रायोजित। कभी इस बारे मे भी कुछ कहिये जनाब्।नक्सल समस्या पर भी बड़बोले नेताओं को बुलाकर गर्मागरम बहस करा कर तो दिखाये साहब।
Friday, August 19, 2011
स्वामी जी भ्रष्टाचार से फ़ुरसत मिले तो बस्तर आ जाना और हो सके तो नक्सलियों से कहना कि निर्दोष जवानो को मारना छोड़ें।
एक छोटी सी पोस्ट बेहद बड़ा और गंभीर सवाल लिये हुये।और भी कई गम है ज़माने में भ्रष्टाचार के सिवाय।नक्सलवाद भी एक फ़ोड़ा है को नासूर बन गया है।आज रात फ़िर छुटटी पर जा रहे 9 जवानों को लगभग डेढ सौ नक्सलियों ने घेर कर मौत के घाट उतार डाला।इस वारदात मे चार और जवान गंभीर रूप से घायल है और एक ट्रेक्टर चालक मारा गया है।औपचरिकता के लिये मुख्यमंत्री डा रमन सिंह के घर आला अफ़सरों की बैठक हो गई है।मेरा सवाल ये है कि उन नौ जवानों के घर में आये आंसूओं के सैलाब को कौन थामेगा?क्या स्वामी जी को भ्रष्टाचार के आंदोलन से फ़ुरसत मिलेगी?क्या वे कभी नक्सलियों को कह पायेंगे कि निर्दोष जवानो का खून बहाना बंद करें।
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Thursday, July 21, 2011
कांग्रेसियों पर हमला हुआ तो छत्तीसगढ में राष्ट्रपति शासन चाहिये और मुम्बई में आतंकवादियों का हमला हुआ तो?
छत्तीसगढ में एक बार फ़िर नकसलियों ने वारदात की है।चार लोगों की मौत हो गई है और दर्ज़न भर घायल हुये हैं।इस वारदात के बाद सवाल ये भी उठता है कि अगर नक्सली कांग्रेस नेताओं पर हमला करना चाह्ते थे तो गाड़ियों के काफ़िले के बीच चल रही सरकारी गाड़ी को उन्होने क्यों उड़ाया?क्या उन्हे पता था कि सरकारी गाड़ी भी काफ़िले में चल रही है?और अगर हां उन्हे ये पता था तो उन्हे ये भी पत होगा कि किस गाड़ी में कौन नेता बैठा है?फ़िर उन्होने नेताओं की गाड़ी छोड़ सरकारी गाड़ी को ही निशाना क्यों बनाया? खैर जाने दिजीये।ये नक्सलियों की मर्ज़ी है किसे भुने,किसे चुने,और किसे बख्शे।लेकिन इस वारदात के तत्काल बाद कांग्रेस के रविंद्र चौबे ने प्रदेश में राष्ट्रपति शासन की मांग कर डाली है।यानी कांग्रेस पर हमला हुआ तो स्थिति इतनी बिगड़ गई।चार लोगों की मौत हुई है और राष्ट्रपति शासन की मांग उठ गई।और मुम्बई में हुये हमले में तो कई गुना ज्यादा लोगों की जानें गई तो वंहा कौन सा शासन लगाना चाहिये इस बारे में शायद ही कुछ बोल पाये कोई। अफ़सोस की बात है कि नक्सल जैसी गंभीर समस्या पर भी कांग्रेस राजनीति से बाज़ नही आती।उन्ही की पार्टी के नेता महेन्द्र कर्मा आदिवासियों के नक्सल विरोधी सलवा-जुडुम के घोर समर्थक थे तो बाकी कांग्रेसी उनका विरोध करने से नही चूकते थे।ये प्रदेश सबका है और सिर्फ़ नक्सलियों के मामले एकजुट होकर लड़कर सारे देश में मिसाल कायम करने की बजाय,प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष तो बाकायदा बस्तर को अलग राज्य बनाने की मांग ऊठने पर उसका समर्थन करने की बात कहकर एक नई समस्या के बीज़ बोने से पीछे नही हटे। अब तो उनके ही काफ़िले पर हमला कर दिया है नक्सलियों ने।अब क्या कहेंगे?इस बार तो हमला रायपुर ज़िलें मे हुआ है।तो क्या रायपुर को भी अलग राज्य बनाने की मांग का समर्थन करेंगे कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार पटेल? पूर्व डीजीपी विश्वरंज़न पर हमेशा आरोप लगाते रहने के बाद उन्हे हटाये जाने के कदम का स्वागत करने वाले कांग्रेस के नेताओं अब किस पर आरोप लगायेंगे?विश्वरंजन के हटने के एक सप्ताह के भीतर ही नक्सलियों ने कांग्रेस नेताओं के काफ़िले पर हमला कर दिया।दरअसल जिस इलाके में हमला किया गया है उस इलाके में हीरे और एलेक्ज़ेंड्राईट की खदाने हैं और नक्सली उस इलाके मे किसी की भी आमद पसंद नही करते।वे उस इलाके पर अपना एकाधिकार चाहते हैं,अन्य कमाऊ और उपजाऊ इलाकों की तरह।उनका ना कोई धर्म है और ना कोई मक्सद्।उनकी ना कोई विचारधारा है और ना ही कोई उद्देश्य्।बस भटका हुआ एक गिरोह है जो अब लूट-पाट पर विश्वास करता है।
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Friday, March 18, 2011
राष्ट्रभाषा हिंदी का विरोध करना क्या राज्द्रोह नही है?
राष्ट्रभाषा हिंदी का नक्सली विरोध करने लगे हैं!उनका कहना है कि बस्तर के वनांचलों मे गोंडी बोली का ही इस्तेमाल किया जाना चाहिये।ऐसा करके पता नही वे क्या साबित करना चाह रहे हैं?ठीक है गोंडी बोली के प्रचार-प्रसार पर दिया जाता है तो समझ में आता है मगर उसके साथ-साथ हिंदी का विरोध?ये समझ से परे है।मेरा सवाल ये है कि क्या राष्ट्रभाषा हिंदी का विरोध राष्ट्रद्रोह की श्रेंणी में नही आता? नक्सलियों ने बाकायदा पोस्टर और बैनर लगा कर हिंदी के विरोध में मोर्चा खोल दिया है।उनका गोंडी से कथित मोह का दिखावा तो समझ में आता है।ऐसा करके वे स्थानीय लोगों को अपने से जोड़े रखने की कोशिश तेज़ कर रहे हैं,जो धीरे-धीरे उनसे दूर खिसक रहे हैं।मगर हिंदी का विरोध,उसके खिलाफ़ वातावरण बना कर क्या करेंगे?क्या ये कोई नये अलगाववादी अभियान की साजिश है? सड़क का विरोध करना,स्कूलों और अस्पताल भवनों को उड़ाना,विकास नही होने के नाम पर विकास के रास्ते पर रोड़े खड़े करना,ये उनकी अब तक़ की रणनीति रही है।वे इस तरीके से उन्हे अलग-थलग रखने की कोशिश कर रहे थे और अब हिंदी का विरोध?ये तो एक खतरनाक साजिश का हिस्सा नज़र आता है।इस बारे में उन लोगों को भी सोचना चाहिये जो नक्सलियों के समर्थकों को जेल से छुड़ाने में लगे रहते हैं।ज़रा-ज़रा सी बात पर उन्हे कानून और मानवाधिकारों का हनन नज़र आता है।क्या उन्हे अब राष्ट्रभाषा हिंदी के विरोध में कोई बुराई नज़र आयेगी या भी उन्हे सही ही नज़र आयेगा?मुझे लगता है कि समय आ गया कि उन्हे अब अपनी आंखों पर से विदेशी धन से चल रहे एनजीओ के चढाये गये चश्मे उतार फ़ेंकना चाहिये।
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Sunday, February 27, 2011
सच बताना!क्या आपको पता है कि कोलकाता से मुम्बई(व्हाया नागपुर) के लिये आज भी रात की रेल सुबह छोड़ी जाती हैं?
एक छोटी सी पोस्ट,एक छोटा सा सवाल,जो ये साबित करने के लिये काफ़ी है कि हमारी सरकारें निकम्मी और नाकारा हैं।उन्हे सिर्फ़ और सिर्फ़ वोटों की राजनीति करना आता है या लफ़्फ़ाज़ी।बस इसके अलावा कोई कुछ नही जानता।अब बताईये रेल मंत्री ममता ने रेल बजट में नक्सल क्षेत्र चन्द्रपुर(महाराष्ट्र)मे नई रेल चलाने की घोषणा की है!बताईये मेन लाईन पे छोटे से नक्सल पैच से तो रात को रेल चला नही पा रही है और नई रेल चलाने की घोषणा की जा रही।ईमानदारी से पूछूं तो बजट के दौरान तालियां बज़ाने वालों से लेकर गालियां बकने वालों तक़ को ये नही पता होगा कि पिछले नौ महिने से ज्यादा समय से कोलकाता से रात को मुम्बई(व्हाया नागपुर)के लिये रात को छुटने वाली रेलों को सुबह होने पर ही रवाना किया जाता है,चाहे कुछ भी हो जाये?टाईम टेबल में चाहे कोई भी समय लिखा हो वो रेलें सुबह होने के बाद ही छोड़ी जाती है,क्या ये नक्सलियों के सामने हथियार डालने जैसा नही है? आप ही बताना!क्या आपको पता है कि कोलकाता से मुम्बई(व्हाया नागपुर) के लिये आज भी रात की रेल सुबह छोड़ी जाती हैं?ऐसा महिनो से हो रहा है और कब तक़ चलेगा? किसी को भी पता नही?
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Friday, February 25, 2011
सलाम एनडीटीवी सलाम!बेबाक रिपोर्ट के लिये!नक्सलियों के खिलाफ़ इतनी दमदार रिपोर्ट पहली बार देखी है!
रात आठ बज़ने का इंतज़ार किया और आठ बज़ते ही टीवी पर नज़रे गड़ा दी।आमतौर पर टीवी के समाचारों से तौबा ही कर ली है मगर एनडीटीवी के उस बुलेटीन का इंतज़ार था मुझे और सच बताऊं मेरा इंतज़ार करना बेकार नही गया।नक्सलवाद पर इतनी बढिया रिपोर्ट मैने आज तक़ नही देखी थी।विनोद दुआ ने बाकी कसर पूरी कर दी जब उन्होने मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नौलखा को अपने सवालो के निशाने पर लिया। ये पहला मौका था जब किसी नेशनल न्यूज़ चैनल पर नक्सलियों के सच को जस का तस सामने रखते देखा।नक्सलियों का हज़ार करोड़ के सलाना बजट से लेकर उन्के बीड़ी पत्ते और माईनिंग के कारोबारियों से वसूली के अलावा गांव के किराना दुकानदार से लेकर ठेकेदारों और दूसरे व्यापारियों से वसूली का ज़िक्र डंके की चोट पे किया और ये साहस लगता है कि और किसी न्यूज़ चैनल मे है ही नही। फ़िर शुरू हुई मानवाधिकारवादी कार्यकर्ता गौतम नौलखा से बात-चीत।विनोद दुआ के तीखे सवालो के सामने गौतम कंही भी टीक नही पाये।उनकी स्थिती तूफ़ान में फ़ंसे सूखे पत्ते सी थी।खिसीया कर कुछ कहना भी चाह्ते थे लेकिन विनोद दुआ के सटीक सवाल उन्हे लाजवाब कर देते थे। नक्सलियों के खिलाफ़ इतनी तल्ख रिपोर्ट देख कर एकबारगी फ़िर मीडिया पर विश्वास जागा है,और इस देश में सिर्फ़ और सिर्फ़ मीड़िया ही है जो एक मज़बूत विपक्ष की भूमिका निभा रहा है।खैर जो भी हो,जब हम मीड़िया को गाली देने के लिये स्वतंत्र है तो हमे उसकी अच्छे कामों के लिये सराहना भी करनी चाहिये।और इसीलिये एनडीटीवी और उसकी पूरी टीम को मैं सलाम करता हूं,सैल्यूट करता हूं उसको प्रणाम करता हूं।जय हिंद,जय छतीसगढ ,जय भारत्।
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Monday, February 21, 2011
नक्सली विधायक के चाचा को फ़ांसी पर लटका रहे है और सरकारें हार्डकोर नक्सलियों को छोड़ रही है!वाह क्या स्ट्रेटजी है?
नक्सलियों ने नक्सल प्रभावित बस्तर के गदापाल में सत्तारूढ विधायक भीमा मंडावी के चाचा को फ़ांसी पर लटका कर एक बार फ़िर सरकार को चुनौती दी है?हाल ही मे उन्होने अगवा किये गये पांच जवानो को रिहा किया था।अपहरण का वो मामला अभी ठंडा भी नही हुआ था कि नक्सलियों ने ओडिशा के डीएम का अपहरण कर सनसनी फ़ैला दी थी।अभी डीएम की रिहाई के लिये चर्चाओं का दौर चल ही रहा है कि उन्होने विधायक के चाचा को फ़ांसी पर लटका कर इलाके मे दहशत का साम्राज्य कायम कर लिया है। इधर सरकारें नक्सलियों से चर्चा कर रही है और उधर वे आतंक फ़ैला रहे हैं।एक डीएम का अपहरण करके उन्होने सीधे-सीधे ओडिशा की सत्ताको चुनौती दी है।पुलिस वालों को तो वे कई बार उठा कर ले जा चुके हैं मगर डीएम स्तर के अफ़सर का अपहरण पहली बार हुआ है। वे लगातार वारदात करके सत्ता को चुनौती पर चुनौती दे रहे हैं और सरकारे सिर्फ़ चिरौरी ही कर पा रही है।सबसे हैरानी की बात तो ये है कि उन्होने डीएम की रिहाई के बदले जेल में बंद अपने एक एक हार्डकोर नक्सली कमांडर प्रसादम को रिहा करा लिया है।दुर्भाग्य देखिये,कई जघन्य अपराधों का आरोपी अब सरकार के साथ होने वाली चर्चा मे मध्यस्थ के रूप मे शामिल होगा।क्या हालत होगी उसे अपनी जान पर खेलकर पकडने वालों की।अगर ऐसे ही धमकी-चमकी पर सरकार नक्सलियों को छोड़ने लगी तो फ़िर अपनी ज़िंदगी दांव पर लगाकर उन्हे पकड़ने का रिस्क कौन लेना चाहेगा।ठीक है डीएक की रिहाई ज़रुरी है लेकिन अगर सरकारें एक डीएम की रिहाई खुद आपरेशन करके नही करा पाती है और सरेंडर कर देती है तो क्या गारंटी है इस अपहरण को वे अपना हथियार नही बनायेंगे।फ़िर क्या बार-बार झुकेगी,झुकेगी क्या लेटेगी सरकार,नक्सलियों के सामने? राज्य सरकारों और केंद्र के नर्म रवैये का ही दुष्परिणाम है डीएम का अपहरण।उनके बढते हौसले का सबूत है दन्तेवाड़ा के भाजपा विधायक भीमा मंडावी के चाचा को फ़ांसी पर चढाना।सवाल ये उठता है कि क्या किसी को भी इस तरह बिना न्यायिक प्रक्रिया के फ़ांसी पर लटकाने का अधिकार किसी को है?और फ़िर बात-बात पर नक्सलियों की पैरवी करने और उन्हे जेल में बंद करने पर मानवाधिकार का पिटारा खोल कर भीड़ इकट्ठा करने वालों को फ़ांसी पर लटकाना मानवाधिकार का उल्लंघन नही दिखता?कंहा है नक्सलियों की दलाली करने वाले समाज के हाईप्रोफ़ाईल लोग?एक आदमी को खुले आम पर फ़ांसी पर लटका दिया गया और सब खामोश है?इनमें से कुछ तो फ़ांसी की सज़ा को अमानवीय ठहरा कर उसे बहस का मुद्दा बना चुके हैं।अब क्यों बोलती बंद है उनकी। केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों को एक बार फ़िर सोचना होगा कि इस तरह किसी को भी बंधक बनाकर नक्सली अपने दुर्दांत साथियों को रिहा कराने में सफ़ल होते रहेंगे तो उनकी फ़ोर्स के मनोबल पर इसका विप्रित प्रभाव पड़ेगा।और फ़िर जो लोग बातचीत के लिये हामी भरकर भी हिंसा किये जा रहे हैं उनकी बातों पर भरोसा कैसे किया जा सकता है?सराकारों को इस मामले मे गंभीरता से सोचना चाहिये वर्ना अपहरण नक्सलियों का अचूक हथियार साबित होगा और फ़िर उन इलाकों मे कोई भी इसका शिकार हो जायेगा?। ।
Sunday, October 10, 2010
बच्चों को तक मार रहें हैं,महिलाओं को जीन्स पहनने से मना कर रहे हैं,क्या इसे ही कहते हैं अन्याय के खिलाफ़ संघर्ष?
बच्चों तक को मार रहें हैं,महिलाओं को जीन्स पहनने से मना कर रहे हैं,क्या इसे ही कहते हैं अन्याय के खिलाफ़ संघर्ष?जीं हां इस इलाके मे नक्सली यही सब कर रहे हैं और इसे वे अन्याय और व्यव्स्था के खिलाफ़ विचारधारा या सशस्त्र संघर्ष कहते हैं।अफ़सोस की बात तो ये है कि उनके इस सुर मे एक नही अनेकों बेसुरे बिना जाने-बूझे सुर मिला रहे हैं।छत्तीसगढ के नक्सल प्रभावित इलाकों से लगे महाराष्ट्र के गढचिरोली मे नक्सलियों ने चार स्कूली छात्रों को मार डाला और पडोसी राज्य उड़ीसा के मल्कानगिरी इलाके मे पोस्टर लगाकर महिलाओं को जीन्स और अन्य कथित उत्तेजक पोशाक पहने पर प्रतिबंध की घोषणा थोप दी।
अब सवाल ये उठता है कि उनके सुर मे सुर मिलाने वालों में सबसे आगे रहने वाली अरुंधती राय को महिलाओं को जीन्स पहनने से रोकने वाला ये नक्सली फ़रमान क्या महिलाओं की स्वतंत्रता का हनन नज़र नही आता?ऐसा करके नक्सली किस अन्याय के खिलाफ़ संघर्ष कर रहे हैं?ज़रा सी बात पर महिलाओं के अधिकारों का रोना रोने वाली महिला अधिकारवादी भी पता नही क्यों खामोश हैं?क्या अब नक्सलियों को कोई पिंक चड्डी पहनाने की हिम्मत दिखयेंगी?
खैर जाने दिजीये,अरूंधति को तो जीन्स पहनने से नही रोका है ना नक्सलियों ने?उन्हे तो लगता है बस खुद से मतलब है इसलिये नक्सली अब चाहे तो मल्कानगिरी की महिलाओं को जीन्स पहनने से रोके या फ़िर लोकतंत्र की शिक्षा देने वाली पढाई से रोके उन्हे कोई फ़र्क़ नही पड़ने वाला।फ़िर जो नक्सली लोकतंत्र के महाकुम्भ चुनाओं का बहिष्कार करने की बात करते हैं,उससे तक़ अरुंधति को परहेज़ नही है तो बाकी सब किस खेत की मूली है।
हैरानी की बात तो ये है ज़रा-ज़रा सी बात पर मानवाधिकारों का उल्लंघन कहकर बवाल मचाने वाले भी खामोश हैं।एक नही चार-चार स्कूली बच्चे मारे गये और वे खामोश ही हैं।पहले तो ज़रा-ज़रा सी बात पर दिल्ली में बैठे कथित अधिकारवादी लोग दौड़े चले आते थे और कमाल की बात देखिये चंद घंटों मे ही वे प्रदेश मे सरकार के नही होने की घोषणा कर देते थे।चंद घंटे इसलिये कह रहा हूं कि हवाई जहाज से उतरने और फ़्रेश-वेश होकर सड़क मार्ग से बस्तर जाकर वापस रायपुर लौटकर हवाई जहाज मे चढने के बीच बड़ी मुश्किल से कुछ घण्टे ही मिल पाते हैं।और इतने कम समय पहले से ही सब कुछ रट-रूटाकर आये मिट्ठू वो सब देख डालते हैं जिसे देखने के लिये एक नही कई दिन भी काफ़ी नही है।
अब नही आ रहे हैं वो पेड़ मिट्ठूओं के झुंड्।मिट्ठू की जगह कुछ समय तक मैनाओं को भी भेजा गया मगर वे भी अब खामोश है।पता नही क्यों ?हो सकता है कुछ लोग इसे सद्बुद्धी आना समझे या लौट के बु…… ना ना ना।गलतफ़हमी मे मत रहिये।हो सकता है रूदलियां पेमेंट बढाने के नाम पर खामोश हो।या फ़िर पहचान लिये जाने के कारण चेहरा बदले में लगी हों?चाहे जो भी हो,मेरा तो उनसे बस यही सवाल है कि क्या स्कूली बच्चों को ढाल बनाना?क्या स्कूली बच्चों की मौत? क्या महिलाओं को जीन्स पहनने से रोकना?मानवाधिकारों का हनन नही है?या ऐसा करना किस अन्याय और शोषण के खिलाफ़ संघर्ष है?मेरे हिसाब से तो अब ऐसे संघर्ष को विचारधारा कहना भी गलत होगा,ऐसा मैं मानता हूं।आपको क्या लगता है,बताईयेगा ज़रूर्।
अब सवाल ये उठता है कि उनके सुर मे सुर मिलाने वालों में सबसे आगे रहने वाली अरुंधती राय को महिलाओं को जीन्स पहनने से रोकने वाला ये नक्सली फ़रमान क्या महिलाओं की स्वतंत्रता का हनन नज़र नही आता?ऐसा करके नक्सली किस अन्याय के खिलाफ़ संघर्ष कर रहे हैं?ज़रा सी बात पर महिलाओं के अधिकारों का रोना रोने वाली महिला अधिकारवादी भी पता नही क्यों खामोश हैं?क्या अब नक्सलियों को कोई पिंक चड्डी पहनाने की हिम्मत दिखयेंगी?
खैर जाने दिजीये,अरूंधति को तो जीन्स पहनने से नही रोका है ना नक्सलियों ने?उन्हे तो लगता है बस खुद से मतलब है इसलिये नक्सली अब चाहे तो मल्कानगिरी की महिलाओं को जीन्स पहनने से रोके या फ़िर लोकतंत्र की शिक्षा देने वाली पढाई से रोके उन्हे कोई फ़र्क़ नही पड़ने वाला।फ़िर जो नक्सली लोकतंत्र के महाकुम्भ चुनाओं का बहिष्कार करने की बात करते हैं,उससे तक़ अरुंधति को परहेज़ नही है तो बाकी सब किस खेत की मूली है।
हैरानी की बात तो ये है ज़रा-ज़रा सी बात पर मानवाधिकारों का उल्लंघन कहकर बवाल मचाने वाले भी खामोश हैं।एक नही चार-चार स्कूली बच्चे मारे गये और वे खामोश ही हैं।पहले तो ज़रा-ज़रा सी बात पर दिल्ली में बैठे कथित अधिकारवादी लोग दौड़े चले आते थे और कमाल की बात देखिये चंद घंटों मे ही वे प्रदेश मे सरकार के नही होने की घोषणा कर देते थे।चंद घंटे इसलिये कह रहा हूं कि हवाई जहाज से उतरने और फ़्रेश-वेश होकर सड़क मार्ग से बस्तर जाकर वापस रायपुर लौटकर हवाई जहाज मे चढने के बीच बड़ी मुश्किल से कुछ घण्टे ही मिल पाते हैं।और इतने कम समय पहले से ही सब कुछ रट-रूटाकर आये मिट्ठू वो सब देख डालते हैं जिसे देखने के लिये एक नही कई दिन भी काफ़ी नही है।
अब नही आ रहे हैं वो पेड़ मिट्ठूओं के झुंड्।मिट्ठू की जगह कुछ समय तक मैनाओं को भी भेजा गया मगर वे भी अब खामोश है।पता नही क्यों ?हो सकता है कुछ लोग इसे सद्बुद्धी आना समझे या लौट के बु…… ना ना ना।गलतफ़हमी मे मत रहिये।हो सकता है रूदलियां पेमेंट बढाने के नाम पर खामोश हो।या फ़िर पहचान लिये जाने के कारण चेहरा बदले में लगी हों?चाहे जो भी हो,मेरा तो उनसे बस यही सवाल है कि क्या स्कूली बच्चों को ढाल बनाना?क्या स्कूली बच्चों की मौत? क्या महिलाओं को जीन्स पहनने से रोकना?मानवाधिकारों का हनन नही है?या ऐसा करना किस अन्याय और शोषण के खिलाफ़ संघर्ष है?मेरे हिसाब से तो अब ऐसे संघर्ष को विचारधारा कहना भी गलत होगा,ऐसा मैं मानता हूं।आपको क्या लगता है,बताईयेगा ज़रूर्।
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Saturday, September 26, 2009
चिदंबरम साब आपके जाते ही नक्सलियों ने आपके साथी सांसद के बेटे को मार डाला?क्या अब भी यही कहोगे नक्सली हमले बर्दाश्त नही किये जायेंगे।
केंद्रीय गृहमंत्री चिदंबरम कल यंहा आये थे नक्सल विरोधी अभियान की उन्होने जानकारी ली और रटे-रटाये डायलाग मार कर चले गये।उनके जाते ही नक्सलियों ने उनकी चेतावनी का जवाब दे डाला,बस्तर के तेजतर्रार सांसद बलिराम कश्यप के बेटों पर गोलियां बरसा कर्।एक बेटा तानसेन तो अब इस दुनिया मे नही है और दुसरा दिनेश घायल है।नक्सलियों की ओर से जवाबी कार्रवाही की आशंका तो थी मगर वे सांसद के बेटे को मार डालेंगे ये किसी ने सोचा भी नही था।इन दिनो राज्य सरकार नक्सलियों के खिलाफ़ कार्रवाई तेज कर चुकी है और लगातार बढते दबाव के जवाब मे कार्रवाई होना तय माना जा रहा था।पुलिस के पास गुप्त सूचनायें भी थी कि नेताओं को निशाने पर ले सकते हैं नक्सली।
खैर पुलिस लाश गिनने का काम ही नही करेगी इस बयान का भी लगता है नक्सलियों पर कोई खास असर नही हुआ और पुलिस फ़िर एक बार लाश ही गिनने मे लगी है।बस्तर मे नक्स्लियों के खिलाफ़ बलिराम कश्यप काफ़ी खुलकर बोलते थे।वे सही मायने मे नक्सल विरोधी थे वर्ना बाकी तो सब ड्ब्ल्यू डब्ल्यू एफ़ के पहलवानो की तरह कुश्ती लडते नज़र आते थे उनमे पुलिस के कुछ आला अफ़सर भी शामिल है।एक अफ़सर तो हो सकता है इस वारदात पर कोई किताब या कविता लिख मारे,क्योंकि उनका मानना है क्रांतिकारी परिवर्तन साहित्य से ही हो सकते हैं।
ये पहली बार नही है जब नक्सलियों ने किसी बयान का पलट कर जवाब दिया हो।वे हमेशा से बडबोले नेताओं के जुबान का जवाब बंदूक का मुंह खोल कर देते रहे हैं।अब चिदंबरम साब भी नक्सलियों को छोडा नही जायेगा,उन पर चौतरफ़ा हमले होंगे।ज़रा महाराष्ट्र का चुनाव तो निपट जाने दो देख लेंगे नकसलियों को।पता नही कब चुनाव निपटेंगे?मगर तब तक़ यंहा कई निपट जायेंगे।
खैर पुलिस लाश गिनने का काम ही नही करेगी इस बयान का भी लगता है नक्सलियों पर कोई खास असर नही हुआ और पुलिस फ़िर एक बार लाश ही गिनने मे लगी है।बस्तर मे नक्स्लियों के खिलाफ़ बलिराम कश्यप काफ़ी खुलकर बोलते थे।वे सही मायने मे नक्सल विरोधी थे वर्ना बाकी तो सब ड्ब्ल्यू डब्ल्यू एफ़ के पहलवानो की तरह कुश्ती लडते नज़र आते थे उनमे पुलिस के कुछ आला अफ़सर भी शामिल है।एक अफ़सर तो हो सकता है इस वारदात पर कोई किताब या कविता लिख मारे,क्योंकि उनका मानना है क्रांतिकारी परिवर्तन साहित्य से ही हो सकते हैं।
ये पहली बार नही है जब नक्सलियों ने किसी बयान का पलट कर जवाब दिया हो।वे हमेशा से बडबोले नेताओं के जुबान का जवाब बंदूक का मुंह खोल कर देते रहे हैं।अब चिदंबरम साब भी नक्सलियों को छोडा नही जायेगा,उन पर चौतरफ़ा हमले होंगे।ज़रा महाराष्ट्र का चुनाव तो निपट जाने दो देख लेंगे नकसलियों को।पता नही कब चुनाव निपटेंगे?मगर तब तक़ यंहा कई निपट जायेंगे।
Wednesday, May 13, 2009
नक्सली अब राजधानी से बस कुछ ही किलोमीटर दूर!
सिहावा-नगरी इलाके मे नक्सलियो ने धमाका कर तेरह जवानो को शहीद कर दिया।इस वारदात ने सरकार के होश उड़ा दिये।वही सरकारी टाईप्ड बयान की फ़ोटो कापी जारी हो गई कि शहीदो का बलिदान व्यर्थ नही जायेगा। होम मिनिस्टर से लेकर विपक्ष यानी कांग्रेस के नेता तक़ घटनास्थल का मुआयना कर आये।महामहिम राज्यपाल ने भी अफ़सरो को तलब कर जानकारी ले ली मगर इस सबसे क्या उन तेरह जवानो की जान वापस आ सकती है।अख़बारो मे छपे एक बयान पर भी नज़र पड़ी है कि नक्सलियो से संबंधो के आरोप मे छ्त्तीसगढ की जेल मे बंद डा बिनायक सेन की रिहाई की मांग के लिये देश और विदेश के कई बड़े शहरो मे प्रदर्शन होंगे।पता नही क्यों इन गिरोहबाज़ मानवाधिकारवादियों को असमय शहीद कर दिये गये पुलिस वालो और उनके परिवार वालो का अधिकार और दर्द नज़र नही आता।
हो सकता है मेरा ये लिखना किसी जनवादी भाई को मेरे बिनायक सेन का विरोधी होना लगे?मगर मै ये बात साफ़ कर देना चाहता हूं कि अकेला मैं नही छत्तीसगढ मे कोई भी उनका व्यक्तिगत रूप से विरोधी नही होगा लेकिन जिस आरोप के तहत वे बंद है और जिनसे संबंधो के आरोप मे वे बंद है उन लोगो का आये दिन छतीसगढ की शांत धरा पर धमाके करना और खून की नदिया बहाना किसी को भी पसंद नही आता सिवाय एक विचारधारा के समर्थको के। हमारा विरोध उनसे भी नही वे अपनी विचारधारा को मानने के लिये स्वतंत्र है मगर उस स्वतंत्रता का मतलब क्या किसी को भी कभी भी मौत के घाट उतार देना होता है।
मुझे ये बात भी आज तक़ समझ नही आई कि जितने भी बड़े-बड़े इंसानी हक़ के पैरोकार है क्या उन्हे छत्तीसगढ मे सिर्फ़ एक आदमी के साथ ही अन्याय होता नज़र आता है?क्या एक साथ तेरह लोगो की अकाल मौत उनके और उनके परिवार के अधिकारो का हनन नही है।घटनास्थल पर जा चुके लोगो के अनुसार वंहा पडा एक मोबाईल उस समय भी बज़ रहा था।लम्बी घण्टी इस बात का सबूत थी कि उसके परिवार वाले उससे ज़रूरी बात करना चाह रहे थे। हो सकता है फ़ोन का न ऊठना उनके मन मे अनिष्ठ की आशंका जगा रहा हो? हो सकता है कोई अबोध बच्ची अपने पापा से गर्मियो की छुट्टियां लग गई है कह कर ज़ल्दी घर आने की रोज़ाना की जाने वाली बाल-सुलभ मनुहार दोहराने वाली हो?हो सकता है ब्याह के बाद पहली बार छुट्टियो मे मायके जाने के छटपटा रही नव्ब्याहता अपने पति से काम-धाम छोड कर घर आने लिये प्यार भरी तक़रार करने वाली हो?हो सकता है बुढे मां-बाप बीमारी के इलाज या दवा के लिये रूपये ज़ल्द भेजने के लिये सुबह-सुबह उसे याद दिलाना चाह रहे हो?होने को तो बहुत कुछ हो सकता है मगर एक बात जो नही हो सकती वो ये है कि वो अब कभी भी फ़ोन उठाकर अपनी लाडली को झुठे बहाने बना बहला नही सकता।थोड़ी तक़रार के बाद ज़ल्द आने का झूटा दिलासा देकर बीबी को टाल नही सकता,रूपये भेज चुका हूं कहकर बुढे मां-बाप के ओंठों पर मुस्कान नही लौटा सकता।
मगर ये सब शायद कुछ संगठन के पदाधिकारियों को नज़र नही आता या फ़िर वे देखना ही नही चाह्ते।दूसरी वाली बात ही सही होगी क्योंकि लगता है वे नक्सली वारदातो मे मर रहे पुलिस वालो को शहीद ही नही मानते होंगे।उनके लिये तो वे ही शहीद होंगे जिन्हे नक्सली शहीद करार दे। आखिर नक्सली भी तो शहीदी सप्ताह मनाते है और उनसे संबंध के आरोपो मे जेल मे बंद आरोपी को छ्डाने मे जीतनी ताक़त ये लोग लगा रहे है उससे तो यही लगता है कि जेल मे बंद आरोपियों के साथियो की वे मदद ही करना चाह रहे हैं।
खैर छतीसगढ मे रायपुर से लगे धमतरी ज़िले मे नक्सलियो का धमाका अच्छा संकेत नही है।वैसे तो उनका राजधानी आना-जाना और यंहा रहना नई बात नही लेकिन माईन्स बिछा कर तेरह जवानो को उड़ा देना उनके बढते हौसले का सबूत है। और साथ ही नक्सलियो को समर्थन के आरोप मे जेल मे बंद पीयूसीएल के एक नेता के की रिहाई के लिये लंदन,इटली,एडिनबर्ग,समेत यूरोप और अमेरिका के बड़े शहरो मे धरना प्रदर्शन होना भी इस बात को सोचने पर मज़बूर कर देता है कि इनके चाहने वालो की जड़े कहां तक़ फ़ैली है। आखिर लंदन मे भारतीय उच्चायोग के साम्ने धरना देकर वे साबित क्या करना चाह्ते हैं?अफ़सोस की बात तो ये है अपनी मानवाधिकारवादी आंखो से ये लोग सिर्फ़ एक ही तरफ़ देख पाते है दूसरी ओर शायद नही देखना उनकी विदेशो से कंट्रोल होने वाली फ़ंडिंग की मज़बूरी है।
हो सकता है मेरा ये लिखना किसी जनवादी भाई को मेरे बिनायक सेन का विरोधी होना लगे?मगर मै ये बात साफ़ कर देना चाहता हूं कि अकेला मैं नही छत्तीसगढ मे कोई भी उनका व्यक्तिगत रूप से विरोधी नही होगा लेकिन जिस आरोप के तहत वे बंद है और जिनसे संबंधो के आरोप मे वे बंद है उन लोगो का आये दिन छतीसगढ की शांत धरा पर धमाके करना और खून की नदिया बहाना किसी को भी पसंद नही आता सिवाय एक विचारधारा के समर्थको के। हमारा विरोध उनसे भी नही वे अपनी विचारधारा को मानने के लिये स्वतंत्र है मगर उस स्वतंत्रता का मतलब क्या किसी को भी कभी भी मौत के घाट उतार देना होता है।
मुझे ये बात भी आज तक़ समझ नही आई कि जितने भी बड़े-बड़े इंसानी हक़ के पैरोकार है क्या उन्हे छत्तीसगढ मे सिर्फ़ एक आदमी के साथ ही अन्याय होता नज़र आता है?क्या एक साथ तेरह लोगो की अकाल मौत उनके और उनके परिवार के अधिकारो का हनन नही है।घटनास्थल पर जा चुके लोगो के अनुसार वंहा पडा एक मोबाईल उस समय भी बज़ रहा था।लम्बी घण्टी इस बात का सबूत थी कि उसके परिवार वाले उससे ज़रूरी बात करना चाह रहे थे। हो सकता है फ़ोन का न ऊठना उनके मन मे अनिष्ठ की आशंका जगा रहा हो? हो सकता है कोई अबोध बच्ची अपने पापा से गर्मियो की छुट्टियां लग गई है कह कर ज़ल्दी घर आने की रोज़ाना की जाने वाली बाल-सुलभ मनुहार दोहराने वाली हो?हो सकता है ब्याह के बाद पहली बार छुट्टियो मे मायके जाने के छटपटा रही नव्ब्याहता अपने पति से काम-धाम छोड कर घर आने लिये प्यार भरी तक़रार करने वाली हो?हो सकता है बुढे मां-बाप बीमारी के इलाज या दवा के लिये रूपये ज़ल्द भेजने के लिये सुबह-सुबह उसे याद दिलाना चाह रहे हो?होने को तो बहुत कुछ हो सकता है मगर एक बात जो नही हो सकती वो ये है कि वो अब कभी भी फ़ोन उठाकर अपनी लाडली को झुठे बहाने बना बहला नही सकता।थोड़ी तक़रार के बाद ज़ल्द आने का झूटा दिलासा देकर बीबी को टाल नही सकता,रूपये भेज चुका हूं कहकर बुढे मां-बाप के ओंठों पर मुस्कान नही लौटा सकता।
मगर ये सब शायद कुछ संगठन के पदाधिकारियों को नज़र नही आता या फ़िर वे देखना ही नही चाह्ते।दूसरी वाली बात ही सही होगी क्योंकि लगता है वे नक्सली वारदातो मे मर रहे पुलिस वालो को शहीद ही नही मानते होंगे।उनके लिये तो वे ही शहीद होंगे जिन्हे नक्सली शहीद करार दे। आखिर नक्सली भी तो शहीदी सप्ताह मनाते है और उनसे संबंध के आरोपो मे जेल मे बंद आरोपी को छ्डाने मे जीतनी ताक़त ये लोग लगा रहे है उससे तो यही लगता है कि जेल मे बंद आरोपियों के साथियो की वे मदद ही करना चाह रहे हैं।
खैर छतीसगढ मे रायपुर से लगे धमतरी ज़िले मे नक्सलियो का धमाका अच्छा संकेत नही है।वैसे तो उनका राजधानी आना-जाना और यंहा रहना नई बात नही लेकिन माईन्स बिछा कर तेरह जवानो को उड़ा देना उनके बढते हौसले का सबूत है। और साथ ही नक्सलियो को समर्थन के आरोप मे जेल मे बंद पीयूसीएल के एक नेता के की रिहाई के लिये लंदन,इटली,एडिनबर्ग,समेत यूरोप और अमेरिका के बड़े शहरो मे धरना प्रदर्शन होना भी इस बात को सोचने पर मज़बूर कर देता है कि इनके चाहने वालो की जड़े कहां तक़ फ़ैली है। आखिर लंदन मे भारतीय उच्चायोग के साम्ने धरना देकर वे साबित क्या करना चाह्ते हैं?अफ़सोस की बात तो ये है अपनी मानवाधिकारवादी आंखो से ये लोग सिर्फ़ एक ही तरफ़ देख पाते है दूसरी ओर शायद नही देखना उनकी विदेशो से कंट्रोल होने वाली फ़ंडिंग की मज़बूरी है।
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