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Tuesday, February 9, 2010

दर्द के बारे मे सवाल किया था मिथिलेश ने और जवाब मेरे सामने खड़ा था!

कल दोपहर को मिथिलेश दुबे का एसएमएस आया और उसमे उन्होने एक सवाल किया था सबसे ज्यादा दर्द किससे होता है।10 आप्शन थे और साथ ही मे ज्वाब ज़रूर देने का आग्रह भी।मिथिलेश को अक्सर पढता रहा हूं और उसके बारे मे मेरी राय अच्छे इंसान की है।उसके सवाल ने मुझे बेचैन कर दिया क्योंकि हाल ही मे सिर्फ़ मोहतरमा लिख देने से उन्हे बेवजह विवाद मे घसीट दिया गया और उस दर्द से बेचैन होकर उन्होने ब्लागिंग को ही नमस्ते करने की घोषणा कर दी थी।मुझे लगा कि कंही उसीसे जुड़ा सवाल तो नही है,मैं उस सवाल का जवाब एसएमएस से नही फ़ोन करके देना चाहता था मगर उसी समय उस सवाल का जवाब मेरे सामने आ खड़ा हुआ।मेरे लिये बात करना बहुत कठीन हो रहा था,सो मैने मिथिलेश को फ़ोन करने के बजाय एसएमएस किया और जवाब दिया "गरीबी"।

कल दोपहर मैं प्रेस क्लब मे बैठा था और उसी समय वरिष्ठ फ़ोटोग्राफ़र शारदा दत्त त्रिपाठी,महासचिव गोकुल सोनी,नरेन्द्र बंगाले दीपक पाण्डे आ गये और चर्चा शुरू हुई यंहा हर साल लगने वाले सरकारी कुम्भ मे आये नागा बाबाओं की।तभी एक मरियल, दुबली-पतली लड़की अंदर आई और डरते-डरते सामने रखी कुर्सी पर बैठ गई।डर के साथ-साथ दर्द उसके चेहरे पर फ़ैला हुआ था।उस समय मैं सरकारी कुम्भ के खिलाफ़ गुस्से से ज़हर उगल रहा था।मैने उस लड़की से पूछा किससे मिलना है?तो उसने आफ़िस असिस्टेंट पवन साहू का नाम लिया।मैने ईशारे से उसे बैठने के लिये कहा और हम लोग फ़िर से चर्चा मे जुट गये।

तब तक़ पवन लगभग दौडते हुये आया और उस लड़की को अलग ले गया और कुछ फ़ोटोग्राफ़रों से मिलवा दिया।हम लोग सरकारी रूपये का नकली कुम्भ के नाम पर दुरूपयोग का रोना रो ही रहे थे कि पवन उस लड़की को लेकर आया और बोला भैया इसकी समस्या है आप मदद कर दोगे तो भला हो जायेगा बेचारी का।मैने घूर कर पवन को देखा तो उसेए समझ आ गया कि एक तो मैं लड़कियों से बात करने से कतराता हूं और दूसरे जब किसी मुद्दे पर चर्चा होती है तो व्यवधान पसंद नही करता।पवन तत्काल खिसक लिया लेकिन वो मासूम लड़की वंही खड़ी रही।उसे भी समझ मे आ गया था कि मामला गड़बड़ है।उसके मुंह से आवाज़ चाह कर भी नही निकल पा रही थी।वो थूक निगलती खड़ी थी।आखिर मैने उससे पूछा क्या बात है?

पता नही उसे मेरी एकदम कर्कश और बेरूखी से लटपट आवाज़ मे कौन सी सहानुभूति महसूस हुई,वो रेडियो कि तरह एकदम से शुरू हो गई।और उसने जब बोलना शुरू किया तो खतम होने तक़ न मुझमे और न शारदादत्त,गोकुल या नरेन्द्र और जो भी वंहा बैठा था,उनमे से किसी की हिम्मत हुई टोका-टोकी करने की।उसकी बात पूरी होते-होते मिथिलेश का एसएमएस आ गया।उसकी बात पूरी सुनने के बाद मिथिलेश को पढा तो लगा कि जवाब पहले आ गया और सवाल उसके बाद आ रहा है।

लड़की की बातों से मेरे सोचने-समझने की ताक़त दम तोड़ने लगी थी और बची-खुची कसर मिथिलेश ने निकाल दी।मिथिलेश के सवाल सबसे ज्यादा दर्द किससे होता है के जवाब के लिये दस आप्शन इस प्रकार थे।1 ख्वाब,2 लव,3 जुदाई,4 गरीबी,5 बेबसी,6 धोखा,7 झूठ,8ज़ख्म,9 मौत,10 बेवफ़ाई।मैं उन आप्शनो पर विचार करने के पहले ही चौथे आप्शन गरीबी से आगे बढ नही पाया और फ़ुरसत मे बात करने के बहाने के साथ उसे जवाब दे दिया गरीबी।बाकी आप्शन मैंने बाद मे पढे।क्योंकि उस समय मेरे सामने खड़ी लड़की की कहानी यही जवाब बता रही थी।

उस लड़की के पिता को तीन-चार दिन पहले ही अज्ञात वाहन ने कुचल कर मौत की नींद सुला दिया था।दुर्घटना के कुछ देर बाद हम लोग भी उस ओर से गुज़रे थे।भीड़ लगी थी वंहा और पुलिस भी आ गई थी।सड़क पर एक शख्स आराम से लेटा हुआ था।शांत निश्चिंत।शायद उसे पता चल गया था कि अब वो दुनिया की भागमभाग से मुक्त हो चुका है।वो उस अभिशाप से भी मुक्त हो चुका था जिसे गरीबी,बेबसी या इस जैसी कोई चीज़ समझा जाता है।उसका शरीर सही सलामत था बस सिर नही था।वो किसी कमीने,(माफ़ करेंगे इसे अगर कोई भद्रजन गाली समझें तो)तेजरफ़्तार वाहन चालक ने सड़क पर चलने के लिये नरियल समझ कर फ़ोड़ दिया था।वो पता नही किधर से आया और किधर निकल गया।हम जैसे पत्थर दिल भी उस दृश्य को देख नही सके और तत्काल वंहा से हट लिये।

वो दृश्य मेरी आंखों के सामने फ़िर से घूम गया।वो अस्पताल मे भर्ती अपने बड़े बेटे को दवा पहुंचाने के लिये घर से निकला था।उसका बेटा अस्पताल मे उसका इंतज़ार ही करता रह गया।उसकी दोनो किड़नी खराब है।उसे बचाने के लिये उसका पिता किसी प्राईवेट कम्पनी मे कमरतोड़ मेहनत करने के बाद रात को उसे दवा देने के लिये निकला था।

मेरी आवाज़ पता नही भीगने लगी।थोड़ी देर पहले जो हालत उस लड़की की थी वैसी अब मेरी थी।मुझे थूक निगलना पड़ रहा था।मुझे आवाज़ निकालने के लिये पूरी ताक़त लगानी पड़ी और बड़ी मुश्किल से मेरे मुंह से पहला शब्द निकला "बेटा"।पता नही वो तल्खी कंहा गुम हो गई थी।वो गरज़ मिमियाने मे बदल चुकी थी वो भी एक डर और भय से दुबकी एक भीगी बिल्ली के सामने।मैने हिम्मत करके उससे पूछा कि बेटा आप पढते है क्या?वो बोली हां सर मैं एम काम प्रिवीयस कर रही हूं।मुझे लगा था कि वो स्कूल मे होगी।उसने बोलना जारी रखा था।उसने बताया कि पापा प्राईवेट कम्पनी मे नौकरी करते थे और भैया की दोनो किड़नी खराब है।उसके इलाज के लिये पैसे पुरे नही होते थे तो मै घर पर सुबह टिफ़िन बना कर देने जाती हूं और उसके बाद कालेज और लौट कर जितना समय मिलता है उतने मे घर पर ही ब्यूटी पार्लर का काम कर लेती हूं।

शायद ज़िम्मेदारी के बोझ ने उसकी बाढ के रोक दिया था।उसके चेहरे पर डर ज़रूर था मगर उसके पीछे छीपा आत्मविश्वास बदली भरा डिन ढलने के बाद शाम को छंटते बादलों के पीछे से झांकती सूर्य की किरणों की तरह फ़ैलने लगा था।उसे पता चल गया था अब भैया की दवा पापा नही लायेंगे और ये ज़िम्मेदारी भी उसे ही उठानी पड़ेगी।वो निकल पड़ी थी ज़िम्मेदारियों का पहाड़ सिर पर ढोते हुये।प्रेस क्लब आने की वजह थी अगर किसी फ़ोटोग्राफ़र को उस अज्ञात वाहन का नम्बर पता हो तो वो उसे बता दे ताकि वो उन पर हर्ज़ाना ठोक सके।

उसने कहा सर कुछ किजिये ना।मुझे कुछ समझ मे नही आ रहा था।इतना बेबस और लाचार मैंने खुद को कभी नही पाया था।मै इस निकम्मी व्यव्स्था मे कंहा से ढूंढता उस कमीने को जो पता नही कंहा किसी और कुचलने के लिये फ़िर से सड़कों का सीना रौंद रहा होगा।मुझे कुछ सूझ नही रहा था।मैं उस बेबस लड़की की भीगी आंखों से आंख मिलाने की हिम्मत नही कर पा रहा था और शायद उससे भी ज्यादा बेबस हो गया था।मैने उससे कहा बेटा मेरा नम्बर नोट कर लो और मुझ पर भरोसा करना मुझसे जो बन पड़ेगा ज़रूर करूंगा।पता नही उसे विश्वास हुआ या नही मगर उसने नम्बर नोट किया और धीरे से कहा सर देखिये ना सरकार भी कुछ नही करती।मैने कहा बेटा आप सरकार के पास गई हो?वो बोली नही।तो मैने कहा सरकार से भी बात कर लेंगे।आप जाओ।मुझसे जो बनेगा मैं करूंगा।

आप जाओ!मैने ज़ोर देकर कहा था।मैं उसकी उपस्थिति से घबरा रहा था।शायद वो समझ गई थी उसे जाना चाहिये। हो सकता है इन्हे उससे भी ज्यादा ज़रूरी काम हो।दिन भर उस लड़की की पलकों का बांध तोड़ कर बहने को बेताब आंसूओं से भरी आंखे मुझे बेचैन करती रही।रह रह कर उसकी आवाज़ मेरे कानों मे पिघला हुआ लोहा उंडेलती रही।शाम को मैने मिथिलेश को फ़ोन लगाया और उससे काफ़ी देर तक़ बात की।उसके सवाल ने भी मेरी बेचैनी बढाने मे कोई कसर नही छोड़ी थी।उसने तत्काल उस लड़की की मदद करने की बात कही जो साबित करने के लिये काफ़ी है कि वो एक अच्छा इंसान है।पता नही मैने उसके सवाल का सही जवाब दिया या नही लेकिन मुझे असली सवाल तो उस लड़की की मदद करके हल करना है।पता नही कंहा तक़ सफ़ल हो पाऊंगा?

Saturday, September 26, 2009

चिदंबरम साब आपके जाते ही नक्सलियों ने आपके साथी सांसद के बेटे को मार डाला?क्या अब भी यही कहोगे नक्सली हमले बर्दाश्त नही किये जायेंगे।

केंद्रीय गृहमंत्री चिदंबरम कल यंहा आये थे नक्सल विरोधी अभियान की उन्होने जानकारी ली और रटे-रटाये डायलाग मार कर चले गये।उनके जाते ही नक्सलियों ने उनकी चेतावनी का जवाब दे डाला,बस्तर के तेजतर्रार सांसद बलिराम कश्यप के बेटों पर गोलियां बरसा कर्।एक बेटा तानसेन तो अब इस दुनिया मे नही है और दुसरा दिनेश घायल है।नक्सलियों की ओर से जवाबी कार्रवाही की आशंका तो थी मगर वे सांसद के बेटे को मार डालेंगे ये किसी ने सोचा भी नही था।इन दिनो राज्य सरकार नक्सलियों के खिलाफ़ कार्रवाई तेज कर चुकी है और लगातार बढते दबाव के जवाब मे कार्रवाई होना तय माना जा रहा था।पुलिस के पास गुप्त सूचनायें भी थी कि नेताओं को निशाने पर ले सकते हैं नक्सली।

खैर पुलिस लाश गिनने का काम ही नही करेगी इस बयान का भी लगता है नक्सलियों पर कोई खास असर नही हुआ और पुलिस फ़िर एक बार लाश ही गिनने मे लगी है।बस्तर मे नक्स्लियों के खिलाफ़ बलिराम कश्यप काफ़ी खुलकर बोलते थे।वे सही मायने मे नक्सल विरोधी थे वर्ना बाकी तो सब ड्ब्ल्यू डब्ल्यू एफ़ के पहलवानो की तरह कुश्ती लडते नज़र आते थे उनमे पुलिस के कुछ आला अफ़सर भी शामिल है।एक अफ़सर तो हो सकता है इस वारदात पर कोई किताब या कविता लिख मारे,क्योंकि उनका मानना है क्रांतिकारी परिवर्तन साहित्य से ही हो सकते हैं।

ये पहली बार नही है जब नक्सलियों ने किसी बयान का पलट कर जवाब दिया हो।वे हमेशा से बडबोले नेताओं के जुबान का जवाब बंदूक का मुंह खोल कर देते रहे हैं।अब चिदंबरम साब भी नक्सलियों को छोडा नही जायेगा,उन पर चौतरफ़ा हमले होंगे।ज़रा महाराष्ट्र का चुनाव तो निपट जाने दो देख लेंगे नकसलियों को।पता नही कब चुनाव निपटेंगे?मगर तब तक़ यंहा कई निपट जायेंगे।

Sunday, August 9, 2009

भगवान इससे अच्छा तो तू मुझे मुख्यमंत्री का कुत्ता बना देता!

सुबह-सुबह अख़बार् पर नज़र डाली तो ये पढ कर सन्न रह गया कि शहर के जाने-माने इंस्टिट्यूट मे एक घायल की डाक्टर के आने तक़ वंहा बैठे-बैठे जान चली गई।ब्लाग जगत मे आने पर पता चला कि मध्यप्रदेश के सीएम के कुत्ते को इलाज के लिये भोपाल से जबलपुर भेजा गया है।भाई रविंद्र कैलासिया ने बखूबी इस खबर को खबर की तरह पेश कर वो सब कुछ कह दिया जो एक पत्रकार को कहना चाहिये।उनकी जितनी तारीफ़ की जाय कम है।

लेकिन इन दोनो खबरों ने मुझे हिला कर रख दिया।यंहा मरीज को सीटी स्कैन कराने के लिये डाक्टरो का घण्टो इंतज़ार करना पडा और इस कारण वो इलाज के बिना ही दुनिया छोड गया। और दूसरी तरफ़ वो कुत्ता है जिसे अब राजधानी के डाक्टरो के बाद जानवरो के अस्पताल के विशेषज्ञ डाक्टर देख रहे हैं।कई बार गरीबो को अस्पताल की बैंच पर बैठे डाक्टरों का इंतज़ार करते देखा है।उस समय डाक्टर अंदर अपने,हम जैसे दोस्तो से गप्प लड़ाने मे व्यस्त हों।खैर यंहा रोना सरकारी अस्पताल का नही है।मोटी रकम लेकर सीटी स्कैन करने वाले नोट छापने की मशीन चलाने वाले कारखानो का है।उस मरीज के साथ गये लोगो से पहले ही साडे तीन हज़ार की रसीद काट दी गई,ये देखे बिना की डाक्टर है या नही। अफ़सोस की बात तो ये है कि इसी संस्थान मे पिछले सप्ताह ही एक महिला मरीज के कपडे बदलते समय मोबाईल फ़ोन मे कैमरे से रिकार्डिंग की शिकायत सामने आई थी।एक वार्ड ब्याव को गिरफ़्तार कर मामला रफ़ा-दफ़ा कर दिया गया था।
पहले जो हुआ वो शैतानियत का नंगा नाच था और जो कल हुआ वो भी हैवानियत का नंगा नाच ही है।एक मरीज मौत से जूझ रहा था और स्टाफ़ ने घण्टो तक़ डाक्टर को बुलाया तक़ नही।मै ये नही कहता कि वो बच ही जाता लेकिन बिना इलाज के तडप-तडप कर मर जाना वो भी किसी गांव मे नही,बल्कि राजधानी मे,शर्म से डूब मरने वाली बात है।जवान लडका था वो।दूध लेने निकला था।परिवार मे एक अबोध बच्चा भी है जिस पर अनाथ होने का ठप्पा लगाने का ज़िम्मेदार कौन है समझ नही पा रहा हूं।वो तेज रफ़्तार स्कोर्पियो वाला जिसने उसे ठोकर मारी,या वो अस्पताल वाला जिसने इलाज से पहले सीटीस्कैन करवाने भेज दिया,या फ़िर सीटी स्कैन मशीन चलाने वाले मशीन नुमा इंसान जो खुद को डाक्टर भी कहते हैं।मेरे बहुत से दोस्त डाक्टर हैं और उनसे भी इस बात पर मेरी बहस होगी लेकिन क्या इससे वो जवान लडका वापस ज़िंदा हो जायेगा।

उसकी तडप को मै महसूस कर रहा हूं और मुझे ऐसा लग रहा है कि कंही कभी ऐसा मेरे साथ न हो जाये।उस दर्द की कल्पना करके ही मैं कांप रहा हूं। ऐसा किसी के भी साथ हो सकता है सो मेरे साथ भी। ऐसे मे मुझे रविंद्र भाई की पोस्ट ने हिला कर रख दिया।मुझे ऐसा लगा कि इंसान से तो मुख्यमंत्री का कुत्ता होना अच्छा है।फ़ाईव स्टार स्टैण्डर्ड आफ़ लिविंग।बडे -बडे लोगो पर खुलकर भौंकने की आज़ादी।किसी भी छोटे-मोटे नौकरों को काट लेने की छूट।बीमार होने पर हाई प्रोफ़ाईल डाक्टरों से ईलाज॥एसी मे रहना,एसी कार मे घूमना-फ़िरना।तीन चार नौकर सेवा करने वाले।बडे-बड़े लोगो की जबरिया तारीफ़ और क्या चाहिये जीवन मे। बहुत सोच कर ऐसा लगा कि भगवान ने मेरे साथ अन्याय किया है।इससे अच्छा तो वो मुझे कुत्ता बना देता,तो लाईफ़ का मज़ा आ जाता।