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Monday, May 2, 2011
विकास के नाम पर तोड़-फ़ोड़ और पेड़ काटना क्या जायज है?आखिर कब तक़ चलेगा ऐसा?
एक छोटा सा सवाल जो हमारे शहर रायपुर के लिये बड़ा महत्व रखता है। हमारा शहर राज्य बनने के बाद राजधानी बन गया,और अब उसे राजधानी के अनुरुप बनाने के नाम पर जम कर तोड़फ़ोड़ हो रही है चौड़ी करण के नाम पर पेड़ काटे जा रहे हैं,क्या ऐसा कर्ने के पहले कोई ठोस और दीर्घकालिक योजना बना कर काम करना ज़रुरी नही?ये आज बनाओ कल तोड़ो,फ़िर बनाओ,फ़िर तोड़ो,आखिर कब तक़ चलेगा ऐसा?
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Friday, April 2, 2010
आमीर खान को तो हमारे शहर के कुली तक़ टक्कर दे रहे हैं!
आमीर खान को तो हमारे शहर के कुली तक़ टक्कर दे रहे हैं!जी हां बिल्कुल सच कह रहा हूं।क्या?कल की पोस्ट है ये।नही भई अप्रेल फ़ूल वाली पोस्ट नही है ये।मैं श्त-प्रतिशत सच कह रहा हूं।आमीर खान को मेरे शहर मे न केवल कुली बल्कि कोई भी ऐरा-गैरा नत्थू खैरा टक्कर दे रहा है।विश्वास नही हो रहा है ना।मुझे भी नही हुआ था लेकिन जब मैने अपनी आंखों से देखा तो मुझे विश्वास हुआ।आप भी देख लिजिये तब तो विश्वास करेंगे ना।याद है ना आमीर खान की फ़िल्म गुलाम।उसमे आमीर ने रेल को टक्कर दी थी और अब देखिये हमारे शहर के जांबाज़ो?को।



हैं ना जांबाज़ और दे रहे हैं ना टक्कर आमीर खान को।दो दो तस्वीर इसलिये कि रेल और जाबांज़ो के बीच का अन्तर कम होना बताता है कि रेल चल रही थी खड़ी नही थी।समय मूल्यवान है किन्तु जीवन उससे अधिक।सड़क वालों का ये पसंदीदा नारा है और सालों से इसे हाईवे पर लिखा हुआ देखता आ रहा हूं।उसका असर सड़क पर चलने वालों पर कितना हुआ ये तो पता नही लेकिन राजधानी रायपुर के रेल्वे स्टेशन का हाल देख कर लग रहा है कि इस नारे को अब सड़कों से ज्यादा रेल की पटरियों के पास लिखा जाना चाहिये।आदरणीय गुरूजी ज्ञान जी से भी इस बारे मे थोड़ा सा ज्ञान चाहूंगा कि क्या सच मे हमारे पास समय इतना कम बचा है कि हम जान भी दांव पर लगा दें?जान है तो जहान है जैसे मुहावरों को शायद अब विलोपित करने का समय आ गया है लगता है।सबसे हैरानी की बात तो ये है कि रेल प्रशासन करता क्या है?नेशनल लुक के फ़ोटोग्राफ़र दिनेश यदु ने ये तस्वीरे मुझे दिखाई और सवाल किया था कि इन लोगों को क्या मौत का ड़र नही है?उसके सवाल के बाद एक और सवाल मेरे दिमाग मे उथल-पुथल मचाने लगा कि क्या इन लोगों को ज़िंदगी से प्यार नही है?आप सभी ज्ञानी लोगों से मेरा यही सवाल है,जवाब ज़रूर दिजियेगा.
पोस्ट पब्लिश होने के बाद देखा तो तस्वीरे क्रम से नही आ पाई है।पहली तस्वीर की जगह दूसरी और दूसरी के स्थान पर पहली तस्वीर प्रकाशित हो गई है।कृपया इसे उसी क्रम मे देखें।
पोस्ट पब्लिश होने के बाद देखा तो तस्वीरे क्रम से नही आ पाई है।पहली तस्वीर की जगह दूसरी और दूसरी के स्थान पर पहली तस्वीर प्रकाशित हो गई है।कृपया इसे उसी क्रम मे देखें।
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Wednesday, February 10, 2010
भ्रष्टाचार,अव्यवस्था और अधर्म की त्रिवेणी पर हर साल होने वाले नकली कुम्भ को असली साबित करने मे लगी है सरकार!कमाल तो ये है कि इस पाखण्ड का कोई विरोध भ
हर साल कुम्भ! कभी सुना है?नही ना!तो आईये छत्तीसगढ और राजधानी के करीब होने कुम्भ में पवित्र स्नान कर के पु
ण्य कमाईये।आपको सिर्फ़ पुण्य के बारे मे सोचना है बाकी करोड़ों की हेराफ़ेरी के लिये शासन-प्रशासन का संगठित तंत्र मौज़ूद है यंहा।न कोई धार्मिक महत्व और ना ही कोई पौराणिक मान्यता!बस जो जी मे आया किये जा रहे हैं।अफ़सोस तो इस बात का है कि इस अधार्मिक और नकली आयोजन का कोई विरोध भी नही करता।कमाल तो ये है कि बात-बात पर भाजपा को धर्म के नाम पर कोसने वाली कांग्रेस यंहा विपक्ष मे है और खामोश है।जबकि इसी कुम्भ मे पिछली बार भाजपाई नेताओं को खुश करने के चक्कर मे एक भाड़े के भोंपू संत ने सोनिया गांधी के खिलाफ़ आपत्तिजनक टिपण्णी कर दी थी और नतीजन इलाके मे तनाव फ़ैल गया था।
सोनिया के नाम पर कांग्रेस कुम्भकर्णी नींद से जागी थी मगर पाखण्ड,झूठ और फ़रेब के नकली कुम्भ पर वो खामोश ही है।शायद चोर-चोर मौसेरे भाई कहावत का असली उदाहरण बन कर्।इस आयोजन मे आने वाले एक भी संत और साधू महात्मा?ने ये सवाल आज तक़ नही उठाया कि कुम्भ हर साल कैसे हो सकता है?क्या यंहा कुम्भ के आयोजन के लिये कोई धार्मिक आधार है?सिर्फ़ पांच साल हुये हैं इस कुम्भ को?इतना ताज़ा कुम्भ कैसे अस्तित्व मे आया?क्यों आया?किसके लिये आया?जैसे सवाल वंहा महानदी की रेत के नीचे दबे पड़े हुयें है।
राजधानी रायपुर से मात्र
45 किलोमीटर दूर है छत्तीसगढ का तीर्थराज राजिम।यंहा महानदी,पैरी और सोंढूर नदियों का पवित्र त्रिवेणी संगम है और फ़सल कटाई के बाद उत्सव मनाने के लिये पूर्णीमा को हर साल मेला लगा करता था जिसे हम लोग बचपन से पुन्नी मेला के नाम से जानते थे।पुन्नी याने पूनम का मेला।छोटे-मोटे मीनाबाज़ार और खाने-पीने वालों की फ़ौज़ यंहा जमा होती थी और आसपास के लोग इसका आनंद लिया करते थे।सदियों से चले आ रहे इस मेले को भाजपा ने सत्ता मे आते ही हाईजैक कर लिया और सीधे इसीके जरिये हिन्दू कार्ड खेलना शुरु कर दिया।ये खेल आज भी बदस्तूर जारी है।
यंहा देश के चार कुम्भों की तरह साधू-संतो की भीड़ खूद नही खिंची चली आती,बल्कि उन्हे निमंत्रण देकर बुलाया जाता है।निमंत्रण भी सूखा नही बल्कि आने-जाने के खर्च के अलावा मोटी दक्षिणा की गारंटी के साथ्।यंहा दर्शनार्थी,श्रद्धालू भी आये नही बुलाये जाते हैं।इसके लिये पब्लिसिटी कैम्पेन चलता है।सरकारी खजाने का मुंह खोल कर आलोचकों के मुंह बंद कर दिये जाते हैं।धर्म के नाम पर हो रहे अधर्म के खिलाह खुल सकने वाले मुंह मे पहले ही दक्षिणा ठूंस दी जाती है।भ्रष्टाचार का कुम्भ नही महाकुम्भ साबित होता जा रहा है ये नकली राजिम कुम्भ्।घोषणा के बावज़ूद आज तक़ मेला प्राधिकरण नही बनाया गया शायद हिस्सेदार बढाना नही चाहते भाई लोग।
सबसे दुखःद तो कुम्भ के बाद त्रिवेणी संगम की स्थिति होती है।महानदी का सीना चीर कर जगह-जगह सड़के बना दी जाती है जो बाद मे अपने मुरूम और गिट्टी की वजह से रूई जैसी नरम मखमली रेत मे फ़ोड़े-फ़ुंसियो की तरह नजर आती है।अव्यवस्था का तो ये आलम है कि लोग जंहा मौका मिलता है वंही शौचादि से निवृत हो लेते हैं।पता नही ऐसे समय मे पर्यावरणवादी कंहा होते हैं।शायद इसमे उनकी रूची भी बहुत ज्यादा नही होती।पोलिथीन,बचा-खुचा खाना,पकवान और मल-मूत्र की दुर्गंध कई दिनों तक़ नकली कुम्भ के पाप का सबूत देती रहती है।पता नही कब तक़ चलेगा ये अनास्था और अधर्म का मिलाजुला खेल्।जय हिंद,जय छत्तीसगढ्।
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Tuesday, February 9, 2010
दर्द के बारे मे सवाल किया था मिथिलेश ने और जवाब मेरे सामने खड़ा था!
कल दोपहर को मिथिलेश दुबे का एसएमएस आया और उसमे उन्होने एक सवाल किया था सबसे ज्यादा दर्द किससे होता है।10 आप्शन थे और साथ ही मे ज्वाब ज़रूर देने का आग्रह भी।मिथिलेश को अक्सर पढता रहा हूं और उसके बारे मे मेरी राय अच्छे इंसान की है।उसके सवाल ने मुझे बेचैन कर दिया क्योंकि हाल ही मे सिर्फ़ मोहतरमा लिख देने से उन्हे बेवजह विवाद मे घसीट दिया गया और उस दर्द से बेचैन होकर उन्होने ब्लागिंग को ही नमस्ते करने की घोषणा कर दी थी।मुझे लगा कि कंही उसीसे जुड़ा सवाल तो नही है,मैं उस सवाल का जवाब एसएमएस से नही फ़ोन करके देना चाहता था मगर उसी समय उस सवाल का जवाब मेरे सामने आ खड़ा हुआ।मेरे लिये बात करना बहुत कठीन हो रहा था,सो मैने मिथिलेश को फ़ोन करने के बजाय एसएमएस किया और जवाब दिया "गरीबी"।
कल दोपहर मैं प्रेस क्लब मे बैठा था और उसी समय वरिष्ठ फ़ोटोग्राफ़र शारदा दत्त त्रिपाठी,महासचिव गोकुल सोनी,नरेन्द्र बंगाले दीपक पाण्डे आ गये और चर्चा शुरू हुई यंहा हर साल लगने वाले सरकारी कुम्भ मे आये नागा बाबाओं की।तभी एक मरियल, दुबली-पतली लड़की अंदर आई और डरते-डरते सामने रखी कुर्सी पर बैठ गई।डर के साथ-साथ दर्द उसके चेहरे पर फ़ैला हुआ था।उस समय मैं सरकारी कुम्भ के खिलाफ़ गुस्से से ज़हर उगल रहा था।मैने उस लड़की से पूछा किससे मिलना है?तो उसने आफ़िस असिस्टेंट पवन साहू का नाम लिया।मैने ईशारे से उसे बैठने के लिये कहा और हम लोग फ़िर से चर्चा मे जुट गये।
तब तक़ पवन लगभग दौडते हुये आया और उस लड़की को अलग ले गया और कुछ फ़ोटोग्राफ़रों से मिलवा दिया।हम लोग सरकारी रूपये का नकली कुम्भ के नाम पर दुरूपयोग का रोना रो ही रहे थे कि पवन उस लड़की को लेकर आया और बोला भैया इसकी समस्या है आप मदद कर दोगे तो भला हो जायेगा बेचारी का।मैने घूर कर पवन को देखा तो उसेए समझ आ गया कि एक तो मैं लड़कियों से बात करने से कतराता हूं और दूसरे जब किसी मुद्दे पर चर्चा होती है तो व्यवधान पसंद नही करता।पवन तत्काल खिसक लिया लेकिन वो मासूम लड़की वंही खड़ी रही।उसे भी समझ मे आ गया था कि मामला गड़बड़ है।उसके मुंह से आवाज़ चाह कर भी नही निकल पा रही थी।वो थूक निगलती खड़ी थी।आखिर मैने उससे पूछा क्या बात है?
पता नही उसे मेरी एकदम कर्कश और बेरूखी से लटपट आवाज़ मे कौन सी सहानुभूति महसूस हुई,वो रेडियो कि तरह एकदम से शुरू हो गई।और उसने जब बोलना शुरू किया तो खतम होने तक़ न मुझमे और न शारदादत्त,गोकुल या नरेन्द्र और जो भी वंहा बैठा था,उनमे से किसी की हिम्मत हुई टोका-टोकी करने की।उसकी बात पूरी होते-होते मिथिलेश का एसएमएस आ गया।उसकी बात पूरी सुनने के बाद मिथिलेश को पढा तो लगा कि जवाब पहले आ गया और सवाल उसके बाद आ रहा है।
लड़की की बातों से मेरे सोचने-समझने की ताक़त दम तोड़ने लगी थी और बची-खुची कसर मिथिलेश ने निकाल दी।मिथिलेश के सवाल सबसे ज्यादा दर्द किससे होता है के जवाब के लिये दस आप्शन इस प्रकार थे।1 ख्वाब,2 लव,3 जुदाई,4 गरीबी,5 बेबसी,6 धोखा,7 झूठ,8ज़ख्म,9 मौत,10 बेवफ़ाई।मैं उन आप्शनो पर विचार करने के पहले ही चौथे आप्शन गरीबी से आगे बढ नही पाया और फ़ुरसत मे बात करने के बहाने के साथ उसे जवाब दे दिया गरीबी।बाकी आप्शन मैंने बाद मे पढे।क्योंकि उस समय मेरे सामने खड़ी लड़की की कहानी यही जवाब बता रही थी।
उस लड़की के पिता को तीन-चार दिन पहले ही अज्ञात वाहन ने कुचल कर मौत की नींद सुला दिया था।दुर्घटना के कुछ देर बाद हम लोग भी उस ओर से गुज़रे थे।भीड़ लगी थी वंहा और पुलिस भी आ गई थी।सड़क पर एक शख्स आराम से लेटा हुआ था।शांत निश्चिंत।शायद उसे पता चल गया था कि अब वो दुनिया की भागमभाग से मुक्त हो चुका है।वो उस अभिशाप से भी मुक्त हो चुका था जिसे गरीबी,बेबसी या इस जैसी कोई चीज़ समझा जाता है।उसका शरीर सही सलामत था बस सिर नही था।वो किसी कमीने,(माफ़ करेंगे इसे अगर कोई भद्रजन गाली समझें तो)तेजरफ़्तार वाहन चालक ने सड़क पर चलने के लिये नरियल समझ कर फ़ोड़ दिया था।वो पता नही किधर से आया और किधर निकल गया।हम जैसे पत्थर दिल भी उस दृश्य को देख नही सके और तत्काल वंहा से हट लिये।
वो दृश्य मेरी आंखों के सामने फ़िर से घूम गया।वो अस्पताल मे भर्ती अपने बड़े बेटे को दवा पहुंचाने के लिये घर से निकला था।उसका बेटा अस्पताल मे उसका इंतज़ार ही करता रह गया।उसकी दोनो किड़नी खराब है।उसे बचाने के लिये उसका पिता किसी प्राईवेट कम्पनी मे कमरतोड़ मेहनत करने के बाद रात को उसे दवा देने के लिये निकला था।
मेरी आवाज़ पता नही भीगने लगी।थोड़ी देर पहले जो हालत उस लड़की की थी वैसी अब मेरी थी।मुझे थूक निगलना पड़ रहा था।मुझे आवाज़ निकालने के लिये पूरी ताक़त लगानी पड़ी और बड़ी मुश्किल से मेरे मुंह से पहला शब्द निकला "बेटा"।पता नही वो तल्खी कंहा गुम हो गई थी।वो गरज़ मिमियाने मे बदल चुकी थी वो भी एक डर और भय से दुबकी एक भीगी बिल्ली के सामने।मैने हिम्मत करके उससे पूछा कि बेटा आप पढते है क्या?वो बोली हां सर मैं एम काम प्रिवीयस कर रही हूं।मुझे लगा था कि वो स्कूल मे होगी।उसने बोलना जारी रखा था।उसने बताया कि पापा प्राईवेट कम्पनी मे नौकरी करते थे और भैया की दोनो किड़नी खराब है।उसके इलाज के लिये पैसे पुरे नही होते थे तो मै घर पर सुबह टिफ़िन बना कर देने जाती हूं और उसके बाद कालेज और लौट कर जितना समय मिलता है उतने मे घर पर ही ब्यूटी पार्लर का काम कर लेती हूं।
शायद ज़िम्मेदारी के बोझ ने उसकी बाढ के रोक दिया था।उसके चेहरे पर डर ज़रूर था मगर उसके पीछे छीपा आत्मविश्वास बदली भरा डिन ढलने के बाद शाम को छंटते बादलों के पीछे से झांकती सूर्य की किरणों की तरह फ़ैलने लगा था।उसे पता चल गया था अब भैया की दवा पापा नही लायेंगे और ये ज़िम्मेदारी भी उसे ही उठानी पड़ेगी।वो निकल पड़ी थी ज़िम्मेदारियों का पहाड़ सिर पर ढोते हुये।प्रेस क्लब आने की वजह थी अगर किसी फ़ोटोग्राफ़र को उस अज्ञात वाहन का नम्बर पता हो तो वो उसे बता दे ताकि वो उन पर हर्ज़ाना ठोक सके।
उसने कहा सर कुछ किजिये ना।मुझे कुछ समझ मे नही आ रहा था।इतना बेबस और लाचार मैंने खुद को कभी नही पाया था।मै इस निकम्मी व्यव्स्था मे कंहा से ढूंढता उस कमीने को जो पता नही कंहा किसी और कुचलने के लिये फ़िर से सड़कों का सीना रौंद रहा होगा।मुझे कुछ सूझ नही रहा था।मैं उस बेबस लड़की की भीगी आंखों से आंख मिलाने की हिम्मत नही कर पा रहा था और शायद उससे भी ज्यादा बेबस हो गया था।मैने उससे कहा बेटा मेरा नम्बर नोट कर लो और मुझ पर भरोसा करना मुझसे जो बन पड़ेगा ज़रूर करूंगा।पता नही उसे विश्वास हुआ या नही मगर उसने नम्बर नोट किया और धीरे से कहा सर देखिये ना सरकार भी कुछ नही करती।मैने कहा बेटा आप सरकार के पास गई हो?वो बोली नही।तो मैने कहा सरकार से भी बात कर लेंगे।आप जाओ।मुझसे जो बनेगा मैं करूंगा।
आप जाओ!मैने ज़ोर देकर कहा था।मैं उसकी उपस्थिति से घबरा रहा था।शायद वो समझ गई थी उसे जाना चाहिये। हो सकता है इन्हे उससे भी ज्यादा ज़रूरी काम हो।दिन भर उस लड़की की पलकों का बांध तोड़ कर बहने को बेताब आंसूओं से भरी आंखे मुझे बेचैन करती रही।रह रह कर उसकी आवाज़ मेरे कानों मे पिघला हुआ लोहा उंडेलती रही।शाम को मैने मिथिलेश को फ़ोन लगाया और उससे काफ़ी देर तक़ बात की।उसके सवाल ने भी मेरी बेचैनी बढाने मे कोई कसर नही छोड़ी थी।उसने तत्काल उस लड़की की मदद करने की बात कही जो साबित करने के लिये काफ़ी है कि वो एक अच्छा इंसान है।पता नही मैने उसके सवाल का सही जवाब दिया या नही लेकिन मुझे असली सवाल तो उस लड़की की मदद करके हल करना है।पता नही कंहा तक़ सफ़ल हो पाऊंगा?
कल दोपहर मैं प्रेस क्लब मे बैठा था और उसी समय वरिष्ठ फ़ोटोग्राफ़र शारदा दत्त त्रिपाठी,महासचिव गोकुल सोनी,नरेन्द्र बंगाले दीपक पाण्डे आ गये और चर्चा शुरू हुई यंहा हर साल लगने वाले सरकारी कुम्भ मे आये नागा बाबाओं की।तभी एक मरियल, दुबली-पतली लड़की अंदर आई और डरते-डरते सामने रखी कुर्सी पर बैठ गई।डर के साथ-साथ दर्द उसके चेहरे पर फ़ैला हुआ था।उस समय मैं सरकारी कुम्भ के खिलाफ़ गुस्से से ज़हर उगल रहा था।मैने उस लड़की से पूछा किससे मिलना है?तो उसने आफ़िस असिस्टेंट पवन साहू का नाम लिया।मैने ईशारे से उसे बैठने के लिये कहा और हम लोग फ़िर से चर्चा मे जुट गये।
तब तक़ पवन लगभग दौडते हुये आया और उस लड़की को अलग ले गया और कुछ फ़ोटोग्राफ़रों से मिलवा दिया।हम लोग सरकारी रूपये का नकली कुम्भ के नाम पर दुरूपयोग का रोना रो ही रहे थे कि पवन उस लड़की को लेकर आया और बोला भैया इसकी समस्या है आप मदद कर दोगे तो भला हो जायेगा बेचारी का।मैने घूर कर पवन को देखा तो उसेए समझ आ गया कि एक तो मैं लड़कियों से बात करने से कतराता हूं और दूसरे जब किसी मुद्दे पर चर्चा होती है तो व्यवधान पसंद नही करता।पवन तत्काल खिसक लिया लेकिन वो मासूम लड़की वंही खड़ी रही।उसे भी समझ मे आ गया था कि मामला गड़बड़ है।उसके मुंह से आवाज़ चाह कर भी नही निकल पा रही थी।वो थूक निगलती खड़ी थी।आखिर मैने उससे पूछा क्या बात है?
पता नही उसे मेरी एकदम कर्कश और बेरूखी से लटपट आवाज़ मे कौन सी सहानुभूति महसूस हुई,वो रेडियो कि तरह एकदम से शुरू हो गई।और उसने जब बोलना शुरू किया तो खतम होने तक़ न मुझमे और न शारदादत्त,गोकुल या नरेन्द्र और जो भी वंहा बैठा था,उनमे से किसी की हिम्मत हुई टोका-टोकी करने की।उसकी बात पूरी होते-होते मिथिलेश का एसएमएस आ गया।उसकी बात पूरी सुनने के बाद मिथिलेश को पढा तो लगा कि जवाब पहले आ गया और सवाल उसके बाद आ रहा है।
लड़की की बातों से मेरे सोचने-समझने की ताक़त दम तोड़ने लगी थी और बची-खुची कसर मिथिलेश ने निकाल दी।मिथिलेश के सवाल सबसे ज्यादा दर्द किससे होता है के जवाब के लिये दस आप्शन इस प्रकार थे।1 ख्वाब,2 लव,3 जुदाई,4 गरीबी,5 बेबसी,6 धोखा,7 झूठ,8ज़ख्म,9 मौत,10 बेवफ़ाई।मैं उन आप्शनो पर विचार करने के पहले ही चौथे आप्शन गरीबी से आगे बढ नही पाया और फ़ुरसत मे बात करने के बहाने के साथ उसे जवाब दे दिया गरीबी।बाकी आप्शन मैंने बाद मे पढे।क्योंकि उस समय मेरे सामने खड़ी लड़की की कहानी यही जवाब बता रही थी।
उस लड़की के पिता को तीन-चार दिन पहले ही अज्ञात वाहन ने कुचल कर मौत की नींद सुला दिया था।दुर्घटना के कुछ देर बाद हम लोग भी उस ओर से गुज़रे थे।भीड़ लगी थी वंहा और पुलिस भी आ गई थी।सड़क पर एक शख्स आराम से लेटा हुआ था।शांत निश्चिंत।शायद उसे पता चल गया था कि अब वो दुनिया की भागमभाग से मुक्त हो चुका है।वो उस अभिशाप से भी मुक्त हो चुका था जिसे गरीबी,बेबसी या इस जैसी कोई चीज़ समझा जाता है।उसका शरीर सही सलामत था बस सिर नही था।वो किसी कमीने,(माफ़ करेंगे इसे अगर कोई भद्रजन गाली समझें तो)तेजरफ़्तार वाहन चालक ने सड़क पर चलने के लिये नरियल समझ कर फ़ोड़ दिया था।वो पता नही किधर से आया और किधर निकल गया।हम जैसे पत्थर दिल भी उस दृश्य को देख नही सके और तत्काल वंहा से हट लिये।
वो दृश्य मेरी आंखों के सामने फ़िर से घूम गया।वो अस्पताल मे भर्ती अपने बड़े बेटे को दवा पहुंचाने के लिये घर से निकला था।उसका बेटा अस्पताल मे उसका इंतज़ार ही करता रह गया।उसकी दोनो किड़नी खराब है।उसे बचाने के लिये उसका पिता किसी प्राईवेट कम्पनी मे कमरतोड़ मेहनत करने के बाद रात को उसे दवा देने के लिये निकला था।
मेरी आवाज़ पता नही भीगने लगी।थोड़ी देर पहले जो हालत उस लड़की की थी वैसी अब मेरी थी।मुझे थूक निगलना पड़ रहा था।मुझे आवाज़ निकालने के लिये पूरी ताक़त लगानी पड़ी और बड़ी मुश्किल से मेरे मुंह से पहला शब्द निकला "बेटा"।पता नही वो तल्खी कंहा गुम हो गई थी।वो गरज़ मिमियाने मे बदल चुकी थी वो भी एक डर और भय से दुबकी एक भीगी बिल्ली के सामने।मैने हिम्मत करके उससे पूछा कि बेटा आप पढते है क्या?वो बोली हां सर मैं एम काम प्रिवीयस कर रही हूं।मुझे लगा था कि वो स्कूल मे होगी।उसने बोलना जारी रखा था।उसने बताया कि पापा प्राईवेट कम्पनी मे नौकरी करते थे और भैया की दोनो किड़नी खराब है।उसके इलाज के लिये पैसे पुरे नही होते थे तो मै घर पर सुबह टिफ़िन बना कर देने जाती हूं और उसके बाद कालेज और लौट कर जितना समय मिलता है उतने मे घर पर ही ब्यूटी पार्लर का काम कर लेती हूं।
शायद ज़िम्मेदारी के बोझ ने उसकी बाढ के रोक दिया था।उसके चेहरे पर डर ज़रूर था मगर उसके पीछे छीपा आत्मविश्वास बदली भरा डिन ढलने के बाद शाम को छंटते बादलों के पीछे से झांकती सूर्य की किरणों की तरह फ़ैलने लगा था।उसे पता चल गया था अब भैया की दवा पापा नही लायेंगे और ये ज़िम्मेदारी भी उसे ही उठानी पड़ेगी।वो निकल पड़ी थी ज़िम्मेदारियों का पहाड़ सिर पर ढोते हुये।प्रेस क्लब आने की वजह थी अगर किसी फ़ोटोग्राफ़र को उस अज्ञात वाहन का नम्बर पता हो तो वो उसे बता दे ताकि वो उन पर हर्ज़ाना ठोक सके।
उसने कहा सर कुछ किजिये ना।मुझे कुछ समझ मे नही आ रहा था।इतना बेबस और लाचार मैंने खुद को कभी नही पाया था।मै इस निकम्मी व्यव्स्था मे कंहा से ढूंढता उस कमीने को जो पता नही कंहा किसी और कुचलने के लिये फ़िर से सड़कों का सीना रौंद रहा होगा।मुझे कुछ सूझ नही रहा था।मैं उस बेबस लड़की की भीगी आंखों से आंख मिलाने की हिम्मत नही कर पा रहा था और शायद उससे भी ज्यादा बेबस हो गया था।मैने उससे कहा बेटा मेरा नम्बर नोट कर लो और मुझ पर भरोसा करना मुझसे जो बन पड़ेगा ज़रूर करूंगा।पता नही उसे विश्वास हुआ या नही मगर उसने नम्बर नोट किया और धीरे से कहा सर देखिये ना सरकार भी कुछ नही करती।मैने कहा बेटा आप सरकार के पास गई हो?वो बोली नही।तो मैने कहा सरकार से भी बात कर लेंगे।आप जाओ।मुझसे जो बनेगा मैं करूंगा।
आप जाओ!मैने ज़ोर देकर कहा था।मैं उसकी उपस्थिति से घबरा रहा था।शायद वो समझ गई थी उसे जाना चाहिये। हो सकता है इन्हे उससे भी ज्यादा ज़रूरी काम हो।दिन भर उस लड़की की पलकों का बांध तोड़ कर बहने को बेताब आंसूओं से भरी आंखे मुझे बेचैन करती रही।रह रह कर उसकी आवाज़ मेरे कानों मे पिघला हुआ लोहा उंडेलती रही।शाम को मैने मिथिलेश को फ़ोन लगाया और उससे काफ़ी देर तक़ बात की।उसके सवाल ने भी मेरी बेचैनी बढाने मे कोई कसर नही छोड़ी थी।उसने तत्काल उस लड़की की मदद करने की बात कही जो साबित करने के लिये काफ़ी है कि वो एक अच्छा इंसान है।पता नही मैने उसके सवाल का सही जवाब दिया या नही लेकिन मुझे असली सवाल तो उस लड़की की मदद करके हल करना है।पता नही कंहा तक़ सफ़ल हो पाऊंगा?
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Monday, December 28, 2009
कभी सोचा भी ना था कि कालेज से बिछड़ने के सालों बाद कोई फ़िर मिल जायेगा!
ब्लाग जगत से किसने क्या पाया,क्या खोया ये तो वही जाने पर मुझे लगता है कि मैने खोया कुछ भी नही सिर्फ़ पाया ही पाया है।बहुत से ऐसे लोग मिले जो सगे रिश्तेदारों से अच्छे लगे।मैं उन्हे कभी खोना नही चाहूंगा और कुछ ऐसे लोग मिले जिनके मिलने की कल्पना भी मैंने नही की थी।खासकर सालों पहले कालेज के दिनो बिछुड़े साथी से मिलना।जी हां सच कह रहा हूं,लगभग 25 साल बाद ब्लाग ने मुझे कालेज के अपने एक जूनियर से मिला दिया।
पच्चीस साल!जी हां!पूरे पच्चीस साल बाद!इन पच्चीस सालों मे उससे कंही कोई बात नही,मुलाकात नहीं!सच कहूं तो उसकी शकल तक़ याद नही रही।ऐसे जूनियर से मिलना,खुशी से दीवाना कर गया मुझे। सिर्फ़ एक साल ही कालेज मे साथ रहा,वो भी कालेज के दिनों के विरोधी गुट में।हम लोग एम एस सी फ़ायनल मे थे और वो शायद फ़र्स्ट ईयर मे था।चुनाव के समय हम लोगों का झगड़ा हुआ और उसी झगड़े का रेफ़रेंस देते हुये उसने मेल कर मुझे अपनी याद दिलाने की कोशिश की।
उल्हास नाम है उसका।उल्हास उसे ऐसा ज़रूर लगा होगा कि इतने सालों तक़ कौन किसे याद रखता है!मगर कालेज के दिनो की बातें तो हमारा सबसे बड़ा खज़ाना होता है।और उस खज़ाने मे सिर्फ़ मीठी ही नही खट्टी यादों का भी ज़खीरा रहता है।जब वो इस बात को याद रख सकता है।अपने एक सीनीयर को सिर्फ़ नाम से सालों तक़ याद रख सकता है तो भला मैं कैसे भूल सकता था।
उल्हास!उल्हास कर्नावर!सच मे उल्हास ने मुझमे उल्हास भर दिया।उसके मेल ने मुझे पच्चीस साल पीछे कालेज के दिनों मे धकेल दिया।वो कालेज के दिन,वो मौज-मस्ती,सब कुछ तरोताज़ा हो गई।वैसे ही जैसे तुम्हे मेरे ब्लाग ने धकेला।
उल्हास अब बहरीन मे है।छत्तीसगढ या कहे भारत उसने 90 मे छोड़ा था।आज वो बहरीन मे ज़िम्मेदार पद पर है और सबसे खास बात ये कि वो वंहा की भारतियों के क्लब का जनरल सेक्रेटरी है।वो भी तीसरी बार चुना गया है।दो लाख सत्तर हज़ार भारतियों का प्रतिनिधित्व करने वाला क्लब 94 साल पुराना है।ये उपलब्धी साधारण नही है।बकौल उल्हास लोस्ट रायपुरियन मे नेतागिरी का कीड़ा अभी भी ज़िंदा है।बहुत सही शुक्ल बंधुओं की नगरी की हवा मे ही नेतागिरी का कीड़ा रहा है शायद।उल्हास से दोबारा कभी बात हो पायेगी,मुलाकात हो पायेगी ये तो पता नही लेकिन उससे सम्पर्क तो फ़िर से स्थापित हो ही गया है।पच्चीस साल बाद सम्पर्क स्थापित होना किसी चमत्कार से कम नही है और जब ये हुआ है तो मुलाकात भी ज़रूर होगी।और ऐसा संभव हो सका सिर्फ़ और सिर्फ़ ब्लाग के कारण्।वो घुमते-फ़िरते मेरे ब्लाग पर आया और उसने मुझे मेल कर अपनी याद दिलानी चाही।अब बताईये ऐसा सुखद एहसास तो सिर्फ़ ब्लाग के कारण ही संभव हो पाया है ना।वरना मैने तो कभी सोचा भी ना था कि कालेज से बिछड़ने के सालों बाद कोई फ़िर मिल जायेगा!खूब तरक्की करो उल्हास!रायपुर का नाम रौशन कर दिया है तुमने और तमाम रायपुरिया लोगों को तुम जैसे रायपुरियाओं पर नाज़ है।तुम लोस्ट रायपुरियन नही अभी रायपुरियन हो।तुम्हारे उज्जवल भविष्य की कामनाओं के साथ,ढेर सारी शुभाशिष।ऐसे ही प्यार बनाये रखना।
पच्चीस साल!जी हां!पूरे पच्चीस साल बाद!इन पच्चीस सालों मे उससे कंही कोई बात नही,मुलाकात नहीं!सच कहूं तो उसकी शकल तक़ याद नही रही।ऐसे जूनियर से मिलना,खुशी से दीवाना कर गया मुझे। सिर्फ़ एक साल ही कालेज मे साथ रहा,वो भी कालेज के दिनों के विरोधी गुट में।हम लोग एम एस सी फ़ायनल मे थे और वो शायद फ़र्स्ट ईयर मे था।चुनाव के समय हम लोगों का झगड़ा हुआ और उसी झगड़े का रेफ़रेंस देते हुये उसने मेल कर मुझे अपनी याद दिलाने की कोशिश की।
उल्हास नाम है उसका।उल्हास उसे ऐसा ज़रूर लगा होगा कि इतने सालों तक़ कौन किसे याद रखता है!मगर कालेज के दिनो की बातें तो हमारा सबसे बड़ा खज़ाना होता है।और उस खज़ाने मे सिर्फ़ मीठी ही नही खट्टी यादों का भी ज़खीरा रहता है।जब वो इस बात को याद रख सकता है।अपने एक सीनीयर को सिर्फ़ नाम से सालों तक़ याद रख सकता है तो भला मैं कैसे भूल सकता था।
उल्हास!उल्हास कर्नावर!सच मे उल्हास ने मुझमे उल्हास भर दिया।उसके मेल ने मुझे पच्चीस साल पीछे कालेज के दिनों मे धकेल दिया।वो कालेज के दिन,वो मौज-मस्ती,सब कुछ तरोताज़ा हो गई।वैसे ही जैसे तुम्हे मेरे ब्लाग ने धकेला।
उल्हास अब बहरीन मे है।छत्तीसगढ या कहे भारत उसने 90 मे छोड़ा था।आज वो बहरीन मे ज़िम्मेदार पद पर है और सबसे खास बात ये कि वो वंहा की भारतियों के क्लब का जनरल सेक्रेटरी है।वो भी तीसरी बार चुना गया है।दो लाख सत्तर हज़ार भारतियों का प्रतिनिधित्व करने वाला क्लब 94 साल पुराना है।ये उपलब्धी साधारण नही है।बकौल उल्हास लोस्ट रायपुरियन मे नेतागिरी का कीड़ा अभी भी ज़िंदा है।बहुत सही शुक्ल बंधुओं की नगरी की हवा मे ही नेतागिरी का कीड़ा रहा है शायद।उल्हास से दोबारा कभी बात हो पायेगी,मुलाकात हो पायेगी ये तो पता नही लेकिन उससे सम्पर्क तो फ़िर से स्थापित हो ही गया है।पच्चीस साल बाद सम्पर्क स्थापित होना किसी चमत्कार से कम नही है और जब ये हुआ है तो मुलाकात भी ज़रूर होगी।और ऐसा संभव हो सका सिर्फ़ और सिर्फ़ ब्लाग के कारण्।वो घुमते-फ़िरते मेरे ब्लाग पर आया और उसने मुझे मेल कर अपनी याद दिलानी चाही।अब बताईये ऐसा सुखद एहसास तो सिर्फ़ ब्लाग के कारण ही संभव हो पाया है ना।वरना मैने तो कभी सोचा भी ना था कि कालेज से बिछड़ने के सालों बाद कोई फ़िर मिल जायेगा!खूब तरक्की करो उल्हास!रायपुर का नाम रौशन कर दिया है तुमने और तमाम रायपुरिया लोगों को तुम जैसे रायपुरियाओं पर नाज़ है।तुम लोस्ट रायपुरियन नही अभी रायपुरियन हो।तुम्हारे उज्जवल भविष्य की कामनाओं के साथ,ढेर सारी शुभाशिष।ऐसे ही प्यार बनाये रखना।
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Saturday, November 21, 2009
बाबा! पप्पा ना, यंही छुपा के अंडा खिलाते हैं मुझे!
बहुत दिनों बाद कांकेर रोड़वेज़ के दफ़्तर गया।वंहा राज्य के सबसे बड़े ट्रांसपोर्टर प्रीतम सिग गरचा से मिला और इसी बीच उनका पुत्र नैबी आ गया।नैबी हाय हलो के बाद अपने काम मे लग गया और मुझे याद दिला गया अपने भतीजे हर्षू और उसके साथ हुआ एक बेहद मज़ेदार किस्सा।
कुछ दिनो पहले मै जब रात को घर से निकला तो मेरा भतीजा हर्षू उर्फ़ ओम साथ मे लटक लिया।बहुत समझाने के बाद भी जब वो नही माना तो मै उसे साथ लेकर घूमने लगा।तभी कांकेर रोड़वेज़ के प्रीतम सिंग जी का फ़ोन आया।उन्होने पूछा कंहा हो और मैने जवाब मे उनके दफ़्तर आने की बात कही। मै वंहा पहुंचा और काम की बात करके वापस जाने के लिये निकला ओ उनका छोटा पुत्र नैबी वंहा आ गया।वो कैनेड़ा से पढाई करके लौटा है और गाड़ियों का बहुत शौकिन है।वो टाटा की एक नई गाड़ी मे आया था। मैने इससे पहले वो माडल देखा नही था।
ज़ेनन नाम की गाड़ी बहुत बढिया लग रही थी।मैने उससे पूछा चलने मे कैसी है। इतना सुनते ही उसने चाबी मेरी ओर बढाई और कहा आप खुद चला कर देख लिजिये।मैने कहा कि फ़िर कभी तो हर्षू मचल गया।वो बोला चलो ना बाबा मस्त गाड़ी है।मेरा साढे तीन साल का भतीजा हर्षू गाडियों का दीवाना है और खिलौने भी उसे गाड़ियां ही चाहिये।अब ये दूसरी बात है कि दूसरे ही दिन वो गाड़ी सिर्फ़ कबाड़ी के लायक ही बचती है।
हर्षू की ज़िद के कारण मैने गाड़ी की चाबी ली और टेस्ट ड्राईव पर निकल गये मै हर्षू और नैबी।इधर-उधर घूमने के बाद एक सड़क से जब गुज़रे तो अचानक़ हर्षू बोला,बाबा,बाबा।मेरे पप्पा ना मुझे यंही छुपा के अंडा खिलाते हैं।मैने कहा बेटा गंदी बात नही करते।अपन लोग अंडा नही खाते।हर्षू तो फ़िर हर्षू ठहरा।वो बोला नई बाबा मैं झूठ नही बोल रहा हूं।आजी(दादी)मना करती है ना इसलिये पप्पा यंहा छुपा के अंडा खिलाते हैं।मेरी हालत खराब हो रही थी।मैने आखिरी ट्राई मारा और कहा बेटा पप्पा ने मज़ाक किया होगा।वो कंहा मानने वाला था।वो पूरी ताकत से बोला नई बाबा मज़ाक मे नई सच मे मुझे यंहा अंडा खिलाते हैं।अब तक़ नैबी सब समझ चुका था।वो हंसते हुये बोला जाने दो भैया बच्चों को क्या कहना है पहले से बताना पड़ता है वरना पोजिशन खराब हो ही जाती है।और वो ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगा।फ़िर मुझसे बोला फ़िकर मत करो मै किससे कहने लगा कि आपका भतीजा अंडा खाता है।
अब मै भी हंसा और उसे बताने लगा कि हर्षू अस्थमैटिक है और सर्दियों मे डाक्टर ने उसे अंडा खिलाने के लिये कहा था।अब घर मे तो अंडा खाना मना है।सुशील(छोटा भाई)ने आई(माता जी)से पूछा था तो उन्होने साफ़-साफ़ कह दिया था तुम लोग बाहर खाना खाने जाते ही हो तो वंहा खिला देना घर मे अंडा नही आयेगा,बस्।तभी हर्षू बोला इसिलिये तो पप्पा मुझे छुपा के अंडा खिलाते हैं और बोले भी है कि आजी(दादी) को मत बताना।अब ये बात नैबी को तो पता चल गई है,वो तो हंस दिया मगर मै सोचता हूं कि जब आई को पता लगेगी तब क्या होगा?
कुछ दिनो पहले मै जब रात को घर से निकला तो मेरा भतीजा हर्षू उर्फ़ ओम साथ मे लटक लिया।बहुत समझाने के बाद भी जब वो नही माना तो मै उसे साथ लेकर घूमने लगा।तभी कांकेर रोड़वेज़ के प्रीतम सिंग जी का फ़ोन आया।उन्होने पूछा कंहा हो और मैने जवाब मे उनके दफ़्तर आने की बात कही। मै वंहा पहुंचा और काम की बात करके वापस जाने के लिये निकला ओ उनका छोटा पुत्र नैबी वंहा आ गया।वो कैनेड़ा से पढाई करके लौटा है और गाड़ियों का बहुत शौकिन है।वो टाटा की एक नई गाड़ी मे आया था। मैने इससे पहले वो माडल देखा नही था।
ज़ेनन नाम की गाड़ी बहुत बढिया लग रही थी।मैने उससे पूछा चलने मे कैसी है। इतना सुनते ही उसने चाबी मेरी ओर बढाई और कहा आप खुद चला कर देख लिजिये।मैने कहा कि फ़िर कभी तो हर्षू मचल गया।वो बोला चलो ना बाबा मस्त गाड़ी है।मेरा साढे तीन साल का भतीजा हर्षू गाडियों का दीवाना है और खिलौने भी उसे गाड़ियां ही चाहिये।अब ये दूसरी बात है कि दूसरे ही दिन वो गाड़ी सिर्फ़ कबाड़ी के लायक ही बचती है।
हर्षू की ज़िद के कारण मैने गाड़ी की चाबी ली और टेस्ट ड्राईव पर निकल गये मै हर्षू और नैबी।इधर-उधर घूमने के बाद एक सड़क से जब गुज़रे तो अचानक़ हर्षू बोला,बाबा,बाबा।मेरे पप्पा ना मुझे यंही छुपा के अंडा खिलाते हैं।मैने कहा बेटा गंदी बात नही करते।अपन लोग अंडा नही खाते।हर्षू तो फ़िर हर्षू ठहरा।वो बोला नई बाबा मैं झूठ नही बोल रहा हूं।आजी(दादी)मना करती है ना इसलिये पप्पा यंहा छुपा के अंडा खिलाते हैं।मेरी हालत खराब हो रही थी।मैने आखिरी ट्राई मारा और कहा बेटा पप्पा ने मज़ाक किया होगा।वो कंहा मानने वाला था।वो पूरी ताकत से बोला नई बाबा मज़ाक मे नई सच मे मुझे यंहा अंडा खिलाते हैं।अब तक़ नैबी सब समझ चुका था।वो हंसते हुये बोला जाने दो भैया बच्चों को क्या कहना है पहले से बताना पड़ता है वरना पोजिशन खराब हो ही जाती है।और वो ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगा।फ़िर मुझसे बोला फ़िकर मत करो मै किससे कहने लगा कि आपका भतीजा अंडा खाता है।
अब मै भी हंसा और उसे बताने लगा कि हर्षू अस्थमैटिक है और सर्दियों मे डाक्टर ने उसे अंडा खिलाने के लिये कहा था।अब घर मे तो अंडा खाना मना है।सुशील(छोटा भाई)ने आई(माता जी)से पूछा था तो उन्होने साफ़-साफ़ कह दिया था तुम लोग बाहर खाना खाने जाते ही हो तो वंहा खिला देना घर मे अंडा नही आयेगा,बस्।तभी हर्षू बोला इसिलिये तो पप्पा मुझे छुपा के अंडा खिलाते हैं और बोले भी है कि आजी(दादी) को मत बताना।अब ये बात नैबी को तो पता चल गई है,वो तो हंस दिया मगर मै सोचता हूं कि जब आई को पता लगेगी तब क्या होगा?
Friday, November 13, 2009
पता है ये फ़यान मुम्बई क्यों नही आया?
एक माईक्रोपोस्ट पेश है।रात्रिकालीन सत्संग़ मे कल अचानक़ राजकुमार ने सवाल किया कि पता है फ़यान मुम्बई क्यों नही आया?अब इस सवाल का जवाब तो किसी के पास था ही नही तो उसे जवाब क्या देते?मैने कहा जाने दे यार दिमाग मत खा ये फ़यान का पर्सनल मामला है वो जाने उसका काम।गोपाल बोला हो सकता है उसे दुबाई जाने का खयाल आ गया हो और वो उधर निकल गया हो।डाक्टर भी आड़े तिरछे सवाल से खासा नाराज़ नज़र आया।उसने भी राजकुमार की खिंचाई की और कहा सवाल तो ऐसे कर रहा है जैसे फ़यान से इंटरव्यूह लेकर आ रहा है।अब सब राजकुमार पर भड़क गये तेरा येई लफ़ड़ा रहता है।जब देखो अंट शंट बात करता है।वो भी उख़ड़ गया और बोला जब तुम लोग मेरे से सवाल करते हो तब?मैं बोला चल तू जीता हम लोगों को नही पता फ़यान मुम्बई क्यों नही आया?अब तू ही बता दे भैया कि वो मुम्बई क्यों नही आया?सिंपल सा जवाब है,पता नही तुम लोग कैसे नही समझ पाये?बड़े इंटलैक्चुअल बने फ़िरते हो।हम लोग बोले अबे होशियारी मत दिखा जवाब दे।तो वो हंस कर बोला भाई फ़यान को मराठी नही आती है ना इसलिये वो वापस चला गया।उसको अबू आज़मी वाला लफ़ड़ा पता चल गया था।इतना सुनते ही सबका दिमाग खराब हो गया और सबके मुंह से एक साथ निकला साले!और तब तक़ राजकुमार की हंसी रफ़्तार पकड़ चुकी थी।हम लोगो के पास भी सिवाय खिसियानी हंसी हंसने के कोई चारा नही था।दोस्तों के बीच फ़ुरसत के पलो को हंसी-मज़ाक मे जीने के दौरानछुई ये हल्कि-फ़ुल्की चर्चा है।इसका मुम्बई विवाद या मनसे से कोई लेना-देना नही है और कोई भी विद्वान इसे मुझसे जोड़कर ना देखें।राजकुमार एक पीने से लेकर खाने मे पूरे ग्रूप मे एक नम्बर है और उसे गंभीर विषय सख्त नापसंद है।उसका कहना है कि बड़ी मुश्किल से मनुष्य योनी मिली है,इसका पूरा-पूरा उपभोग किया जाना चाहिये पता नही अगले जनम मे कीड़े बनते हैं या मकौड़े?इसी मानसिकता के तहत उसका सवाल था।
Saturday, November 7, 2009
आसमानी करतबों को देख थम सी गई थी ज़मीनी हलचल!
राज्योत्सव मे वायुसेना
की एक्रोबेटिक टीम सूर्यकिरण के जाबांज़ लड़ाको ने आज शाम छतीसगढ मे ऐतिहासिक प्रदर्शन किया।छत्तीसगढ के आसमान पर हैरतअंगेज़ कारनामों का ये पहला मौका था।छत्तीसगढ ने भी अपनी वायुसेना के जाबांज़ लड़ाको का दिल खोल कर स्वागत किया और जब आसमान पर सूर्यकिरण के जाबांज़ लड़ाके अपने करतब दिखा रहे थे उस समय राजधानी की जैसे नब्ज़ थम सी गई थी।सब स्तब्ध होकर अपने बहादुर देशरक्षको का कमाल देख रहे थे।आसमान पर कलाबाजियों और सांस को थमने पर मज़
बूर कर देने वाले कारनामो का दौर ठीक बीस मिनट चला।इस दौरान सेना के जेट विमानों की गरज़ से आसमान कांपता रहा और उनके करतबों को देख कर ज़मीन पर लाखों लोगो के मुंह से सिर्फ़ और सिर्फ़ वाह के सिवाय कुछ ना निकला और हाथ बरबस तालियां बजाने पर मज़बूर होते रहे और सलाम करते रहे देश की वायुसेना के जाबांज़ लड़ाको को।सलाम,सलाम,सलाम।रणबांकुरो तुम्हे सलाम।इस आयोजन ने जंहा वायुसेना जनता का दिल जीतने मे कामयाब रही वंही जनता के करीब लाने का श्रेय प्रदेश के मुख्यमंत्री डा रमन्सिंह के खाते मे गया।पहली बार एयरशो देख रही ज
नता खासी रोमांचित रही,लोगों की भीड़ उमड़ पडी थी शो देखने के लिये और आसपास के शहरों से भी लोग यंहा आये देखने के लिये।ट्रेफ़िक पूरी तरह अस्त-व्यस्त रहा।इसके बावज़ूद लोग खुश मज़र आये।राज्योत्सव के दौरान हुआ ये पहला कार्यक्रम था जिसने तमाम अव्यवस्थाओं के बावज़ूद भी घोर आलोचको को खामोश रहने पर मज़बूर कर दिया।शायद आसमान पर हैरतअंगेज़ कारनामे देख कर उन्होने दांतो तले उंगली दबा ली थी।
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Friday, October 16, 2009
क्या सोच के पकड़ा था चोरों को सरकार खुश होगी,शाबासी देगी?सरकार मैने आपका नमक खाया है,ले अब धक्के खा
छत्तीसगढ आजकल स्वाईन फ़्लू से भी ज्यादा घातक आई-फ़्लू की चपेट मे हैं।इस रोग से पीड़ीत व्यक्ति न केवल खुद परेशान होता है बल्कि उसका परिवार इस बीमारी से प्रभावित हो जाता है।इसका तोड़ अभी तक़ नही मिल पाया है लेकिन इसका संक्रमण अब तेजी से फ़ैलता नज़र आ रहा है।
अभी हाल ही मे आई-फ़्लू यानी ईमानदारी से ग्रसित आई ए एस अफ़सर अमित कटारिया को नगर निगम से धक्के खाने पड़े थे।वो केस अभी ठंड़ा भी नही हुआ है कि आई-फ़्लू का दूसरा केस सामने आ गया है।इस बार मरीज़ प्रशासनिक सेवा का न होकर पुलिस सेवा का है जंहा इसके बैक्टिरिया का मिलना लगभग नामुमकिन माना जा रहा था।इससे पहले ये गंभीर बीमारी पुलिस महकमे मे फ़ैलती तत्काल आई-फ़्लू से पीड़ित ए एस पी शशिमोहन के ईलाज की तैयारियां शुरू हो गई है।शशिमोहन ने इस मामले मे डाकटरो के सरदार को भी अपनी बात बताई तो मगर सरदार ने शोले वाले गब्बर का डायलाग मार दिया, क्या सोच के पकड़ा था चोरों को सरकार खुश होगी,शाबासी देगी?सरकार मैने आपका नमक खाया है,ले अब धक्के खा!
अब शशिमोहन को भी तो सावधानी बरतनी चाहिये थी।देख रहा है कि इस लाईलाज बीमारी से पीड़ित लोगो को धक्के खाने पड़ रहे हैं तो खामोश रहता।क्या ज़रूरत थी अपनी बीमारी का ढिंढोरा पीटने की।पहले से ही लोगों को डाऊट था कि ये पुलिस वाला नार्मल नही है,फ़िर सावधान रहना चाहिये था ना।फ़िर सारे शहर मे अकेला वही था क्या चोरों को पकडने के लिये।एक बार पहले भी इसी बीमारी के कारण अपना घुटना तुड़वा चुका था शशिमोहन्।उसके बाद भी अकल नही आई। अरे फ़िर जब अमित कटारिया का विकेट गिरते देखा तब तो संभल जाना था सामने वाले अब पूरी ताक़त से निपटने मे लग गये है आई-फ़्लू से।
ये शशिमोहन जैसे लोग ना दीवाली खराब कर देंगे पूरे महकमे की।खुद तो परेशान हो रहे हैं,घर वालों को परेशान कर रहे हैं और उनका हाल देख कर आई-फ़्लू के कीड़े का शिकार हो चुके लोग और परेशान है।कुछ तो सोचते शशिमोहन दीवाली का समय है खुद को मिठाई नही खानी थी ना खाते,अरे नकली खोये की मिठाई खाकर लोग मर तो नही जाते ना,और मर भी जाते तो क्या जिस का टाईम आ गया वो तो जायेगा ही इसमे उस मिलावट खोर का क्या दोष्।वो बेचारा पूरे सिस्टम को सेट करके कंहा-कंहा से नकली खोआ मंगा रहा था।थोड़ा बहुत कमाता तभी तो मंत्री-संत्री पर खर्च करता।अब ऐसे मे वो कंहा खर्च करेगा?वो खर्च नही करेगा तो नेता-मंत्री कार्यकर्ताओं,अफ़सरों और हम जैसे पत्रकारो के यंहा ड्राई-फ़्रूट से भरी टोकरियां कंहा से भेजेंगे?ये लोग खुश नही रहेंगे तो राजनिती कैसे चलेगी?बस शशिमोहन तुमने भी वही गलती की जो आईफ़्लू का मरीज़ करता है।अब मंत्री जी तुमसे नाराज़ नही होम्गे तो क्या खुश होंगे,शाबासी देंगे।क्या कर दिया शशिमोहन अपनी दीवाली खराब की,अपने घर वालो की,अपने शुभचिंतको की,मंत्री जी की और उनके चमचों के साथ-साथ पत्रकारो की भी दीवाली खराब कर दी।लो और दिखाओ ईमानदारी और खाओ धक्के।
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