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Monday, December 28, 2009

कभी सोचा भी ना था कि कालेज से बिछड़ने के सालों बाद कोई फ़िर मिल जायेगा!

ब्लाग जगत से किसने क्या पाया,क्या खोया ये तो वही जाने पर मुझे लगता है कि मैने खोया कुछ भी नही सिर्फ़ पाया ही पाया है।बहुत से ऐसे लोग मिले जो सगे रिश्तेदारों से अच्छे लगे।मैं उन्हे कभी खोना नही चाहूंगा और कुछ ऐसे लोग मिले जिनके मिलने की कल्पना भी मैंने नही की थी।खासकर सालों पहले कालेज के दिनो बिछुड़े साथी से मिलना।जी हां सच कह रहा हूं,लगभग 25 साल बाद ब्लाग ने मुझे कालेज के अपने एक जूनियर से मिला दिया।
पच्चीस साल!जी हां!पूरे पच्चीस साल बाद!इन पच्चीस सालों मे उससे कंही कोई बात नही,मुलाकात नहीं!सच कहूं तो उसकी शकल तक़ याद नही रही।ऐसे जूनियर से मिलना,खुशी से दीवाना कर गया मुझे। सिर्फ़ एक साल ही कालेज मे साथ रहा,वो भी कालेज के दिनों के विरोधी गुट में।हम लोग एम एस सी फ़ायनल मे थे और वो शायद फ़र्स्ट ईयर मे था।चुनाव के समय हम लोगों का झगड़ा हुआ और उसी झगड़े का रेफ़रेंस देते हुये उसने मेल कर मुझे अपनी याद दिलाने की कोशिश की।

उल्हास नाम है उसका।उल्हास उसे ऐसा ज़रूर लगा होगा कि इतने सालों तक़ कौन किसे याद रखता है!मगर कालेज के दिनो की बातें तो हमारा सबसे बड़ा खज़ाना होता है।और उस खज़ाने मे सिर्फ़ मीठी ही नही खट्टी यादों का भी ज़खीरा रहता है।जब वो इस बात को याद रख सकता है।अपने एक सीनीयर को सिर्फ़ नाम से सालों तक़ याद रख सकता है तो भला मैं कैसे भूल सकता था।

उल्हास!उल्हास कर्नावर!सच मे उल्हास ने मुझमे उल्हास भर दिया।उसके मेल ने मुझे पच्चीस साल पीछे कालेज के दिनों मे धकेल दिया।वो कालेज के दिन,वो मौज-मस्ती,सब कुछ तरोताज़ा हो गई।वैसे ही जैसे तुम्हे मेरे ब्लाग ने धकेला।

उल्हास अब बहरीन मे है।छत्तीसगढ या कहे भारत उसने 90 मे छोड़ा था।आज वो बहरीन मे ज़िम्मेदार पद पर है और सबसे खास बात ये कि वो वंहा की भारतियों के क्लब का जनरल सेक्रेटरी है।वो भी तीसरी बार चुना गया है।दो लाख सत्तर हज़ार भारतियों का प्रतिनिधित्व करने वाला क्लब 94 साल पुराना है।ये उपलब्धी साधारण नही है।बकौल उल्हास लोस्ट रायपुरियन मे नेतागिरी का कीड़ा अभी भी ज़िंदा है।बहुत सही शुक्ल बंधुओं की नगरी की हवा मे ही नेतागिरी का कीड़ा रहा है शायद।उल्हास से दोबारा कभी बात हो पायेगी,मुलाकात हो पायेगी ये तो पता नही लेकिन उससे सम्पर्क तो फ़िर से स्थापित हो ही गया है।पच्चीस साल बाद सम्पर्क स्थापित होना किसी चमत्कार से कम नही है और जब ये हुआ है तो मुलाकात भी ज़रूर होगी।और ऐसा संभव हो सका सिर्फ़ और सिर्फ़ ब्लाग के कारण्।वो घुमते-फ़िरते मेरे ब्लाग पर आया और उसने मुझे मेल कर अपनी याद दिलानी चाही।अब बताईये ऐसा सुखद एहसास तो सिर्फ़ ब्लाग के कारण ही संभव हो पाया है ना।वरना मैने तो कभी सोचा भी ना था कि कालेज से बिछड़ने के सालों बाद कोई फ़िर मिल जायेगा!खूब तरक्की करो उल्हास!रायपुर का नाम रौशन कर दिया है तुमने और तमाम रायपुरिया लोगों को तुम जैसे रायपुरियाओं पर नाज़ है।तुम लोस्ट रायपुरियन नही अभी रायपुरियन हो।तुम्हारे उज्जवल भविष्य की कामनाओं के साथ,ढेर सारी शुभाशिष।ऐसे ही प्यार बनाये रखना।

Sunday, December 13, 2009

लेटअस प्लान एन मीट सम डे।

समय के बदलते मिज़ाज़ पर एक और छोटी सी पोस्ट जिसमे बात बहुत बड़ी छुपी हुई है।कालेज मे साथ पढे और अब आईएफ़एस अफ़सर मित्र ने समय मे आये इस बदलाव को खुद तो महसूस किया ही,साथ ही उसने सभी दोस्तो को इस बात को बताने के लिये एसएमएस भी किया।

उसका एसएसएस था,
Remember the time when freinds used to say"lets meet n plan something".

Now a days freinds says"lets plan n meet somaday".

freinds r same but time has changed.

दोस्तो के मिलने-जुलने मे आई कमी और सबके अपनी-अपनी दुनिया मे मस्त रहने से कभी-कभी पुराने दोस्तों के साथ गुज़रे दिन याद बनकर टीस मारते हैं।एक ही शहर मे रहकर कई-कई महीने नही मिल पाने की तक़लीफ़ तो मै भी महसूस कर रहा हूं।आप को क्या लगता है बताईयेगा ज़रूर्।

Wednesday, November 18, 2009

इट इज़ सैड बट ट्रू

एक बहुत छोटी सी बात जिसके मायने बहुत -बहुत-बहुत ज्यादा बड़े हैं।पता नही ये सच है या नही?लेकिन ये लगता तो बहुत कड़ुवा सच है।रत्ना,कालेज की मेरी जूनियर और अब एक सरकारी कालेज मे प्राध्यापक ने ज़माने बाद मुझे आज एक एस एम एस भेजा।पता नही उसके मन मे क्या था?उसका एस एम एस जस का तस आपके सामने रख रहा हूं।

The hard reality is that,

When you need advice,every one is ready to help you,

But,When you realy need help,every one is ready to advice you..

its sad but true.

क्या लगता है?क्या ये सच है?मुझे तो लगता है कि ये सच है!आपको क्या लगता है बताईयेगा ज़रूर।

Friday, October 23, 2009

दिखा-दिखा!अरे यार,छा गया तू तो, पक्का ये किसी लड़की की राईटिंग है!

एक पुराना मगर दिलचस्प किस्सा सुना रहा हूं।हम दोस्तों के बीच होने वाले हंसी- मज़ाक और आपस की छेड़खानी का नमूना है।सब के सब उस समय काम धंदे से लगना शुरु हुये थे लेकिन बेरोज़गारी के दौर के मीटिंग पाईंट रूपकला(कपड़े की दुकान) के सामने खड़ा होना बंद नही हुआ था।शाम होते ही मंडली जमा हो जाती थी और फ़िर शुरू हो जाता था हा-हा,ही-ही का ना थमने वाला दौर।रोज़ मिलना,रोज़ जी भर कर हंसना,चिंता किस चिड़िया का नाम है कोई जानता ही नही था।

ऐसा कोई नही था हमारे ग्रुप मे जिसे घर मे सड़क पर खड़े होकर मस्ती करने पर डांट ना पड़ी हो। हमारे मित्र और परिवार के सदस्य दिलीप क्षत्रे की वो दुकान है। उसके पिता (अब स्व)उस समय कभी-कभार कह दिया करते थे अंदर वाला आफ़िस खाली पड़ा है उसका उपयोग कर लिया करो।पर सड़क पर आते जारे लोगों को गिनने का मज़ा भला अंदर बैठ कर कंहा आता सो कोई अंदर कभी बैठा ही नही,रोड़ इंस्पेक्टरी करते रहे।

एक शाम ऐसे ही मस्ती का दौर चल रहा था कि उस समय का महान खबरी बाबा (प्यार का नाम) आ टपका।वो मेरे साथ कालेज मे पढने के अलावा उस समय दैनिक भास्कर मे काम भी करता था।उसे वाईल्ड कार्ड एंट्री मिली हुई थी और उसका पूरा ध्यान उस समय किसका चक्कर किसके साथ चल रहा है और शहर की खूबसुरत लड़कियों की अपनी डायरेक्ट्री को समृद्ध करने मे लगा रह्ता था।अच्छे भले टापिक पर चल रही बकर(बहस) को वो अबे ये कंहा रह्ती है?अबे उसका नाम क्या है?अबे इसका चक्कर उससे है क्या जैसे टिपिकल सवालो से निपटा देता था।इस बात से दीलिप और बल्लू यानी बलबीर खासे नाराज़ रहते थे।उसे कई बार वार्निंग भी दे चुके थे और उसके बहाने मुझे भी टारगेट कर चुके थे।मैने भी एक दिन उनसे कह दिया,दम है तो निपटा दो उसको।मुझसे क्यों कहते हो।मामला उलझता देख दोनो उस समय खामोश रह गये और बात आई गई हो गई।

एक दिन शाम को बाबा हांफ़ते हुये वंहा पंहुचा और पंहुचते ही मुझसे बोला देख तो बे ये साला गुमनाम लैटर आज घर आया है।गनिमत है कि घर मे किसी के हाथ नही लग गया वरना बाज़ा बज़ जाता।इससे पहले कि वो लैटर बाबा के हाथो से मेरे हाथ पंहुचता बीच मे ही एलन नाट और रोड मार्श से भी ज्यादा तेज़ी दिखाते हुये दीलिप और बल्लू ने वो लैटर बीच मे ही लपक लिया और दोनो एक साथ शेयर कर उसे पढने लगे।पल-दो-पल नही गुज़रे होंगे दीलिप ने बाबा का हाथ पकड़ कर बधाई देना शुरू किया।छा गया भाई तू तो।ग्रुप का पहला मेम्बर है जिसे किसी लड़की ने लैटर लिखा है।देख बल्लू है न किसी लड़की की राईटिंग्।सेम भाई सेम।हर बात पर मेरी मुर्गी की एक टांग भी नही,बोल कर अड़ने वाले बल्लू को बिना शर्त दीलिप को समर्थन देख मेरा माथा ठनका।मैने कहा दिखा तो।तब तक़ दोनो भाई बाबा यार पार्टी बनती है,कह कर उसे दूर ले जाने लगे।वो बोला अबे उसको तो दिखाने दे।अबे छोड़ न साले बजरंगी को।वो क्या जानेगा लडकी की राईटिंग कैसी होती है?जबरन उसमे खोट निकालेगा।अब मेरी समझ मे आ गया था कि दोनो उसको निपटाने मे लग गये हैं।मैने एक बार फ़िर ट्राई किया बाबा सुन तो बे।उसने पलट कर कहा चल रहा है क्या?कुछ खा पी के आते हैं।मैने अपना सिर पकड़ लिया और प्रेस की प्र निकल लिया।

अब रोज़ शाम को बाबा आता और उसके आते ही दीलिप बल्लू और वो तीनो कंही निकल जाते।बाकी लोगो से मै पूछता तो जवाब मिलता पता नही किसी लफ़ड़े मे है लगता है,ये जवाब मिल जाता।एक दिन दफ़्तर मे मेरे हरीराम यानी शोले के केश्टो ने मुझसे कहा भैया ये आपका दोस्त बीमार है लगता है।मैने पूछा तुझे कैसे पता चला।वो बोला कि ये हर आधा घंटे मे बाथरूम जाता है और बहुत देर तक़ घुसा रहता है।मैने हरीराम से कहा साले तेरा दिमाग तो सही है ना।वो बोला आप खुद चेक कर लो।जैसे वो जायेगा मै आपको बता दूंगा।उस उसकी बात सही निकली।

मै चिंता मे पड़ गया।दूसरे दिन भी वही हुआ तो मै बाबा को साथ लेकर बाहर निकला और उससे बार-बार बाथरूम जाने का राज़ पूछा।शुरू मे वो भड़का मगर जैसे ही स्बको बताने की मैने उसे धमकी दी तो उसने सरेंडर कर दिया।उसने बताया कि वो लैटर पढने बाथरूम जाता है।मैने हैरान होकर पूछा कैसा लैटर्।तो उसने बताया एक लड़की ने मुझे लिखा है। अब मेरी खोपड़ी मे बात घुस गई।मैने उससे कहा तुझे कैसे पता कि वो लड़की ने ही लिखा है।तो वो बोला उस दिन तेरे सामने बल्लू और दीलिप ने नही बताया था कि वो किसी लडकी की राईटिंग का है।इससे पहले मै उसे कुछ कह पाता वो शूरू हो गया।क्या बताऊं भाई रे जब से लैटर मिला है ज़िंदगी संवर गई है।दिन मे सौ बार उसे पढ ना लूं तो चैन नही मिलता।रात को ऊठ ऊठ कर उस पढता हूं।प्रेस मे भी चैन नही मिलता तो बाथरूम मे छिप कर पढता हूं।क्या बताऊ भाई दो बार मेरा एक्सिडेंट होते होते बचा है। हैं,मैने आश्च्र्य व्यक्त किया तो उसने बताया कि लैटर मे तेरी भाभी ने लिखा है कि वो मेरे घर और प्रेस के बीच मे कंही रह्ती है और बाल्कनी मे खड़ी होकर मुझे प्रेस जाते ह्ये देखकर ही अंदर जाती है।उसे डांट भी पडती है बे।मैने उसासे पूछा तुझे कैसे पता।तेरी भाभी ने सब डिटेल मे लिखा है बे।भाभी कौन भाभी बे।अबे आज नही तो कल तो होगी ना।गुस्से से मेरा दिमाग खराब हो रहा था मगर बाबा की हालत देख कर मुझे डर भी लग रहा था।

दुसरे दिन शाम को मै रूपकला पंहुचा और सीधे दीलिप और बल्लू को बोला तुम लोग साले मरवाओगे।दोनो ने एक साथ् पूछा क्या हो गया?मैने दोनो को बाबा की स्थिति बता दी।दोनो सन्न रह गय्रे।दोनो बोले यार हम तो मज़ाक कर रहे थे,तू एक दिन गुस्से मे बोला था निपटा दो उसको तो………मै बोला मै तो उसी दिन समझ गया था जिस दिन तू राईटिंद एक्स्पर्ट बन गया था और तू बिना बोले इसक सपोर्ट कर रहा था।तब दोनो बोले यार ये मज़ाक तो साला महंगा पड़ जायेगा लगता है।मैने कहा हां लग तो रहा है।तब दोनो ने मुझसे कहा तू बाबा को सच बता दे।मैने कहा तुम लोगों का आईडिया था तुम लोग बताओ।उन लोगो ने कहा कि वो अब हमारी बात पर विश्वास करेगा या नही ये भी समस्या है,इसलिये तू भी साथ मे रहना और बात को संभाल लेना।मैने कहा ठीक है।उतने मे बाबा आ गया।मैने ईशारा करना शूरू किया और ले देकर दीलिप ने हिम्मत दिखाई और कहा बाबा वो लैटर फ़र्ज़ी था,वो हम लोगो ने लिखवा कर तुझे पोस्ट किया था।बाबा के मुंह से निकला क्या बकवास कर रहे हो बे।नही भाई सच कह रहे हैं सारी यार्।अब बाबा का गुस्सा देखने लाय्क था।अनाप-शनाप गालियां बक कर जब वो थक गया और उसके बाद ये कह कर कि आज के बाद साले तुम लोगों की सूरत नही देखूंगा कह कर चला गया।उसे समझाने की बहुत कोशिश की गई मगर उसका गुस्सा साल भर तक़ ठंडा नही हुआ।साल भर वो रुपकला के सामने से भी नही गुज़रा दफ़्तर मे भी वो मुझे देख कर मुंह मोड लेता था।मेरे लाख सम्झाने पर भी वो मुझे भी षड़यंत्र मे शामिल मानता था।साल भर बाद जब उसका गुस्सा ठंडा हुआ तो उसने फ़िर आना शुरू किया और फ़िर उसके साथ दीलिप और बल्लू ने मज़ाक क दिया।क्या किया बताऊंगा किसी दिन फ़ुरस्त में।

Wednesday, August 12, 2009

मार्टिनी और माक्टेल मे वो मज़ा कंहा जो सड़क के किनारे की गुमटी या ठेले की चाय मे था!

कालेज के बाहर तिवारी के ठेले मे एक प्लेट समोसा खाने मे जो मज़ा आता था आज शहर के जाने-माने होटलो मे लज़ीज़ से लज़ीज़ डिश खाने मे नही आता।रसिक की हाफ़ चाय पीने के बाद जो सुरूर आता था वो मार्टिनी या माक्टेल मे कंहा से आ पायेगा मै तिवारी या रसिक को यूंही नही याद कर रहा हूं,ये मुझे आज बरबस याद आ रहे हैं।दरअसल आज मुझे एक एस एम एस मिला जो मेरे सबसे प्रिय ने भेजा।उस एस एम एस मे कालेज की सुकून और चैन की ज़िंदगी से एक प्रोफ़ेशनल की ज़िंदगी के सफ़र तक़ मे आये बदलाव का उल्लेख था।

एस एम एस शुरू हुआ ही इस बात से कि कैसे कालेज की बिंदास ज़िंदगी परफ़ेक्ट प्रोफ़ेशनल लाईफ़ मे बदल गई।छोटी सी पाकेट मनी अब मोटी तन्ख्वाह मे बदल चुकी है मगर उससे उतनी खुशी नही मिलती।दो जोड़ी लोकल जीन्स की आल्मारी अब ब्रान्डेड कपड़ो से अटी पड़ी है मगर उन्हे पहने के खास मौके ही नही आते।कैसे एक प्लेट समोसा खाने के लिये मारामारी के दिन लद गये मगर अब बढिया स बढिया होटल मे बढिया से बढिया डिश खाते समय भी न मुंह मे पानी आता है और न खाने के बाद तृप्ति मिलती है।

हमेशा रिज़र्व मे रहने वाली फ़टिचर या खटारा स्कूटर अब हमेशा फ़ुल टैंक वाली शानदार लक्ज़री कार मे बदल गई है मगर उस पर सवार होकर जाने के लिये कोई जगह ही नही है।सड़क किनारे गुम्टियों या ठेले पर चाय कि चुस्कियों का मज़ा सी सी डी या आलिशान काफ़ी शाप मे कभी नही मिल सकता।लिमिटेड प्रिपेड कार्ड वाला मोबाईल अब पोस्टपेड पैकेज मे बदल चुका है मगर अब उससे बात किससे करे ये समझ नही आता।

लोकल ट्रेन मे या सेकेण्ड क्लास का रेल का सफ़र अब भुली बिसरी याद भर बस है मगर शानदार कार से लेकर हवाई जहाज तक़ के सफ़र की व्यवस्था होने के बाद भी समझ मे नही आता कंहा जायें।

शायद यही तरक्की के सफ़र का सच है जिसका नाम ज़िंदगी है।एस एम एस अक्सर बक़वास ही होते हैं पर पता नही क्यों इस एस एम एस ने सोचने पर मज़बूर कर दिया।बहुत सी बातें तो ज़िंदगी के सफ़र मे हमने भी वही देखी है जो इस एस एम एस मे बताई गई है।

Thursday, June 18, 2009

प्रभू हिट रहेगा अपना इंटरनेशनल स्कूल आफ़ करप्शन और ओपन यूनिर्वसिटी तो हंगामा मचा देगी

क्यों बे कुछ सुझा या मसाज सेंटर के खयाली आईटमो की मसाज से मस्त हो कर मुस्कुरा रहा हैं। नही प्रभू इस बार बडा ही धांसू आईडिया लाया हूं। आप भी इस बार रिजेक्ट नही कर पाओगे। अपन स्कूल की चेन डाल देते है और एक यूनिर्वसिटी भी खोल देते हैं।प्रभू हिट रहेगा अपना इंटरनेशनल स्कूल आफ़ करप्शन और ओपन यूनिर्वसिटी तो हंगामा मचा देगी।चल बे!साले देखा नही तेरे सड़ेले प्रदेश मे क्या हाल हुआ यूनिर्वसिटियों का।दर्जनो मे से दो की ही दुकान चल पाई है।

येई तो आपका नेगेटिव एप्रोच जमता नही है।सुनते हो नही और फ़ैसला दे देते हो। अपन को कौन सा सड़ेला एकेडेमिक यूनिर्वसिटी खोलना है।अपन का यूनिर्वसिटी तो एकदम प्रोफ़ेशनल होगा।यूनिवर्सिटी आफ़ करप्शन। ऐसा ही स्कूल भी खोलने का, देश के सारे बड़े शहरों मे।बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाने का एड्मिशन ओपन इंटरनैशनल स्कुल आफ़ करप्शन मे पढाईये और बच्चे का भविष्य सेंट-पर्सेंट सुरक्षित किजिये।टूट पड़ेगी पब्लिक,प्रभू टूट पड़ेगी।भीड़ के मामले मे पहले ही दिन शोले फ़िल्म का रिकार्ड तोड़ देंगे प्रभू।उधर से कोई प्रतिक्रिया नही देख मैने पूछा क्या हुआ प्रभू?कोई प्राब्लम?

अबे श्याणे।तू ही है ना वो जिसने सबसे पहले हाय तौबा मचाई थी प्राईवेट यूनिर्वसिटी खुलने पर्।क्या दिखाया था तूने।यदी आपके पास एक मकान है या एक अच्छी सी दुकान है तो चले आईये छत्तीसगढ,खोल लिजिये यूनिर्वसिटी।क्यों याद,आया।दिखाया था ना स्कूटर पर कुलपति की प्लेट लगाये लोगों को।बंद करवा दी थी ना पांच दर्ज़न से ज्यादा दुकान खुलने से पहले ही।वो मामला दूसरों का था न महाराज। अब आप बताईये भला कोई अपने घर के गंदे कपड़े सड़क पर तो धोता नही है ना।मीडिया भी दूसरो के फ़टे मे खुशी-खुशी टांग अड़ाता है मगर अपने मामले मे कभी कुछ बोलता है क्या?कितने अख़बारो मे वेतनमान और पेंशन के लिये लड़ाई चल रही है कंही दिखती है कोई खबर्।मस्टर रोल मे ज्यादा पर अंगूठा लगाकर कम अनपढ मज़दूरों को कम रोजी देने की खबर छापने वाले पढे लिखे मज़दूर/पत्रकारो ने कभी लिखा है कि उन्हे तयशुदा वेतनमान से कम वेतन दिया जा रहा है।

अबे ये सब फ़ाल्तू की बाते हैं।मै किसी कन्ट्रोवर्सी मे फ़ंसना नही चाह्ता।सवाल ही नही उठता महाराज्।सब सेट है आजकल।फ़ुल पेज के दर्जन भर विज्ञापन मुंह बंद अक्र देते है आजकल अच्छे-अच्छे अख़बार का।वो तो ठीक है मगर्।महाराज ये अगर मगर छोड़ो।थिंक पाज़ीटिव महाराज्।सोचो महाराज सोचो! इंटरनेशनल स्कूल आफ़ करप्शन,नाम ही खिंच लायेगा जैसे कभी मल्लिका सड़ी हुई फ़िल्म मे भीड खींच लेती थी।फ़िर वो आईटम वाला आईड़िया यंहा भी चलेगा महाराज्।स्कूल जाओ तो ऐसा लगता ही नही किसी मास्टरनी से मिल रहे हैं।सुर्ख लिपिस्टिक से पूते ओंठो को देखो तो ऐसा लगता है की अभी जूस की बजाय ताज़ा-ताज़ा खून का गिलास एक ही सांस मे मार के आई हो।लो कट ब्लाऊज,स्लीवलैस टाप और नीचे से नीचे खिसक कर कमर की हड्डियो पर अटकी साडी!हय-हय-हय महाराज ऐसा लगता है किसी फ़ैशन परेड मे आ गये हों।

क्यों बे पाखंडी।बड़ा बजरंगबली का भक़्त बना फ़िरता है।साले इतना माईन्यूट आब्ज़र्वेशन। अरे महाराज हूं नही था,था।अब तो आपके पद चिनहो पर चलना चाह्ता हूं।ऊब गया हूं महाराज,यंही छत्तीसगढ मे सडते-सड़ते।मै भी हांग-कांग,बैंकाक और मकाऊ के मसाज सेंटरे और कसिनो देखना चाह्ता हूं।पेरिस मे शाम रंगीन करना चाहता हूं और वेगास मे किस्मत आजमाना चाहता हूं।साले मुझे पहले ही डाऊट था,तू अंदर से कुछ और है और बाहर से कुछ और। वो तो महाराज हर आदमी होता है।कौन चोरी छीपे शाईनी आहूजा की तरह झाड़ू-पोछा लगाती नौकरानी के आसपास नही मंडराता।कौन ट्राई नही करता साथ मे काम करने वाली खूबसूरत जुनियर से मीठा-मीठा बोलकर्।कभी देखा है किसी को खराब गाड़ी धकेलते हुये आदमी से रूक कर प्राब्लम पूछ्ते या लिफ़्ट देने की पेशकश करते हुये।कोई खूबसूरत लड़की खड़ी दिखी नही लाईन लग जाती है।

अबे ये तू मेरे को ही उपदेश देगा क्या?साले ज़रा सा पर्सनल टच क्या दिया जल कर राख हो गई। नही महाराज वैसी कोई बात नही मै तो जनरल टेंडेंसी बता रहा था। अबे तू प्रोजेक्ट पर बात कर समझा। हां तो महाराज अभी एकदम सही सीज़न है एडमिशन का।इस समय खोल लिये तो ठीक नही तो एक साल इंतज़ार करना पड़ेगा।सभी स्कूलों और कालेजो मे भारी भीड़ है।अपन अपनी यूनिर्वसिटी और स्कूल एक साथ लांच कर देते हैं।ये इंटरनेशनल स्कूल क्या बला है बे।खोलेंगे तो अपने देश मे तो फ़िर ये इंटरनेशनल कैसे हो जायेगा?लोग पूछेंगे नही? अरे महाराज आप भी ना।खुद को कहते हो भ्रष्टाचार का देवता और इस बारे मे तो लगता है ए बी सी डी भी नही जानते। अबे चुप। अपनी बात कर्।वही तो कह रहा हूं महाराज। अब देखिये ये पब्लिक स्कूल सुना है ना।हां,सुना है।तो बताईये भला इसमे पब्लिक के बच्चे पढ सकते है क्या?इनकी मोटी फ़ीस तो सिर्फ़ बड़े-बड़े खास लोग ही दे सकते है आम लोग तो सपने भी नही देखते उन स्कूलो के।

बात तो सही कर रहा है बे।मगर देशी स्कूल का इंटरनेशनल नाम समझ मे नही आया। अरे महाराज अपना स्कूल और यूनिर्वसिटी जब खुलेगी तो सारे देश के अलावा दूसरे देश के बच्चे भी तो यंहा आकर पढेंगे।फ़िर आस्ट्रेलिया के लफ़ड़े से परेशान होकर लौट रहे बच्चो को अगर अपन ने इम्प्रेस कर लिया तो प्रभू आप अपने आप इंटरनेशनल फ़िगर हो जायेंगे।चल बे,वो तो हम पहले से हैं।साले मुझे बता रहा है इंटरनेशनल और नेशनल का फ़र्क़्।चल बता तो किस देश मे मेरे फ़ालोअर नही है।किस देश मे मेरा डंका नही बचता।मै समझ रहा हूं साले मेरी आड़ मे तो टीचर लोगों को भांपेगा। है ना।राम-राम,अरे नही महाराज।मै सब समझ रहा हूं बे।स्कूल खोलने मे लफ़ड़े ही लफ़ड़े हैं।घर से खुन्नस खाकर आई कोई टीचर किसी बच्चे को पीटेगी और फ़ोटो छपेगा मेरा।वो तेरी जात वाले माईक मेरे मूंह मे ठूंस कर अंट-शंट सवाल पूछेंगे और बतायेंगे मिलिये एक कसाई से।मुझे नही करवानी अपनी ऐसी की तैसी।तेरे पास कोई ठीक-ठाक आईडिया है तो बता वर्ना तेरे बारे मे भी सोचना पड़ेगा।