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Monday, December 28, 2009

कभी सोचा भी ना था कि कालेज से बिछड़ने के सालों बाद कोई फ़िर मिल जायेगा!

ब्लाग जगत से किसने क्या पाया,क्या खोया ये तो वही जाने पर मुझे लगता है कि मैने खोया कुछ भी नही सिर्फ़ पाया ही पाया है।बहुत से ऐसे लोग मिले जो सगे रिश्तेदारों से अच्छे लगे।मैं उन्हे कभी खोना नही चाहूंगा और कुछ ऐसे लोग मिले जिनके मिलने की कल्पना भी मैंने नही की थी।खासकर सालों पहले कालेज के दिनो बिछुड़े साथी से मिलना।जी हां सच कह रहा हूं,लगभग 25 साल बाद ब्लाग ने मुझे कालेज के अपने एक जूनियर से मिला दिया।
पच्चीस साल!जी हां!पूरे पच्चीस साल बाद!इन पच्चीस सालों मे उससे कंही कोई बात नही,मुलाकात नहीं!सच कहूं तो उसकी शकल तक़ याद नही रही।ऐसे जूनियर से मिलना,खुशी से दीवाना कर गया मुझे। सिर्फ़ एक साल ही कालेज मे साथ रहा,वो भी कालेज के दिनों के विरोधी गुट में।हम लोग एम एस सी फ़ायनल मे थे और वो शायद फ़र्स्ट ईयर मे था।चुनाव के समय हम लोगों का झगड़ा हुआ और उसी झगड़े का रेफ़रेंस देते हुये उसने मेल कर मुझे अपनी याद दिलाने की कोशिश की।

उल्हास नाम है उसका।उल्हास उसे ऐसा ज़रूर लगा होगा कि इतने सालों तक़ कौन किसे याद रखता है!मगर कालेज के दिनो की बातें तो हमारा सबसे बड़ा खज़ाना होता है।और उस खज़ाने मे सिर्फ़ मीठी ही नही खट्टी यादों का भी ज़खीरा रहता है।जब वो इस बात को याद रख सकता है।अपने एक सीनीयर को सिर्फ़ नाम से सालों तक़ याद रख सकता है तो भला मैं कैसे भूल सकता था।

उल्हास!उल्हास कर्नावर!सच मे उल्हास ने मुझमे उल्हास भर दिया।उसके मेल ने मुझे पच्चीस साल पीछे कालेज के दिनों मे धकेल दिया।वो कालेज के दिन,वो मौज-मस्ती,सब कुछ तरोताज़ा हो गई।वैसे ही जैसे तुम्हे मेरे ब्लाग ने धकेला।

उल्हास अब बहरीन मे है।छत्तीसगढ या कहे भारत उसने 90 मे छोड़ा था।आज वो बहरीन मे ज़िम्मेदार पद पर है और सबसे खास बात ये कि वो वंहा की भारतियों के क्लब का जनरल सेक्रेटरी है।वो भी तीसरी बार चुना गया है।दो लाख सत्तर हज़ार भारतियों का प्रतिनिधित्व करने वाला क्लब 94 साल पुराना है।ये उपलब्धी साधारण नही है।बकौल उल्हास लोस्ट रायपुरियन मे नेतागिरी का कीड़ा अभी भी ज़िंदा है।बहुत सही शुक्ल बंधुओं की नगरी की हवा मे ही नेतागिरी का कीड़ा रहा है शायद।उल्हास से दोबारा कभी बात हो पायेगी,मुलाकात हो पायेगी ये तो पता नही लेकिन उससे सम्पर्क तो फ़िर से स्थापित हो ही गया है।पच्चीस साल बाद सम्पर्क स्थापित होना किसी चमत्कार से कम नही है और जब ये हुआ है तो मुलाकात भी ज़रूर होगी।और ऐसा संभव हो सका सिर्फ़ और सिर्फ़ ब्लाग के कारण्।वो घुमते-फ़िरते मेरे ब्लाग पर आया और उसने मुझे मेल कर अपनी याद दिलानी चाही।अब बताईये ऐसा सुखद एहसास तो सिर्फ़ ब्लाग के कारण ही संभव हो पाया है ना।वरना मैने तो कभी सोचा भी ना था कि कालेज से बिछड़ने के सालों बाद कोई फ़िर मिल जायेगा!खूब तरक्की करो उल्हास!रायपुर का नाम रौशन कर दिया है तुमने और तमाम रायपुरिया लोगों को तुम जैसे रायपुरियाओं पर नाज़ है।तुम लोस्ट रायपुरियन नही अभी रायपुरियन हो।तुम्हारे उज्जवल भविष्य की कामनाओं के साथ,ढेर सारी शुभाशिष।ऐसे ही प्यार बनाये रखना।