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Wednesday, August 12, 2009

मार्टिनी और माक्टेल मे वो मज़ा कंहा जो सड़क के किनारे की गुमटी या ठेले की चाय मे था!

कालेज के बाहर तिवारी के ठेले मे एक प्लेट समोसा खाने मे जो मज़ा आता था आज शहर के जाने-माने होटलो मे लज़ीज़ से लज़ीज़ डिश खाने मे नही आता।रसिक की हाफ़ चाय पीने के बाद जो सुरूर आता था वो मार्टिनी या माक्टेल मे कंहा से आ पायेगा मै तिवारी या रसिक को यूंही नही याद कर रहा हूं,ये मुझे आज बरबस याद आ रहे हैं।दरअसल आज मुझे एक एस एम एस मिला जो मेरे सबसे प्रिय ने भेजा।उस एस एम एस मे कालेज की सुकून और चैन की ज़िंदगी से एक प्रोफ़ेशनल की ज़िंदगी के सफ़र तक़ मे आये बदलाव का उल्लेख था।

एस एम एस शुरू हुआ ही इस बात से कि कैसे कालेज की बिंदास ज़िंदगी परफ़ेक्ट प्रोफ़ेशनल लाईफ़ मे बदल गई।छोटी सी पाकेट मनी अब मोटी तन्ख्वाह मे बदल चुकी है मगर उससे उतनी खुशी नही मिलती।दो जोड़ी लोकल जीन्स की आल्मारी अब ब्रान्डेड कपड़ो से अटी पड़ी है मगर उन्हे पहने के खास मौके ही नही आते।कैसे एक प्लेट समोसा खाने के लिये मारामारी के दिन लद गये मगर अब बढिया स बढिया होटल मे बढिया से बढिया डिश खाते समय भी न मुंह मे पानी आता है और न खाने के बाद तृप्ति मिलती है।

हमेशा रिज़र्व मे रहने वाली फ़टिचर या खटारा स्कूटर अब हमेशा फ़ुल टैंक वाली शानदार लक्ज़री कार मे बदल गई है मगर उस पर सवार होकर जाने के लिये कोई जगह ही नही है।सड़क किनारे गुम्टियों या ठेले पर चाय कि चुस्कियों का मज़ा सी सी डी या आलिशान काफ़ी शाप मे कभी नही मिल सकता।लिमिटेड प्रिपेड कार्ड वाला मोबाईल अब पोस्टपेड पैकेज मे बदल चुका है मगर अब उससे बात किससे करे ये समझ नही आता।

लोकल ट्रेन मे या सेकेण्ड क्लास का रेल का सफ़र अब भुली बिसरी याद भर बस है मगर शानदार कार से लेकर हवाई जहाज तक़ के सफ़र की व्यवस्था होने के बाद भी समझ मे नही आता कंहा जायें।

शायद यही तरक्की के सफ़र का सच है जिसका नाम ज़िंदगी है।एस एम एस अक्सर बक़वास ही होते हैं पर पता नही क्यों इस एस एम एस ने सोचने पर मज़बूर कर दिया।बहुत सी बातें तो ज़िंदगी के सफ़र मे हमने भी वही देखी है जो इस एस एम एस मे बताई गई है।