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Tuesday, January 11, 2011

अगर सरकार भी यही सब करने लगी तो देश का बंटाधार तय ही है!

एक माईक्रोपोस्ट है जिसमे बहुत बड़ा विषय छिपा हुआ है।बेहद अफ़सोस के साथ ये कहना माफ़ करियेगा लिखना पड़ रहा है कि सरकार या कहें कि सरकारी कंपनिया भी व्यापार की अंधी दौड़ मे पागल हो गयी है तो गलत ना होगा।बात बहुत छोटी सी है मगर है बहुत खतरनाक।एक एसएमएस मोबाईल पर लोगों को मिल रहा है जिसमे लोगों को लड़कियों से दोस्ती करने या उन्हे दोस्त बनाने के लिये एक नम्बर पर एसएमएस करने के लिये कहा जा रहा है।नम्बर के बाद एफ़ लिखा है और लड़कों को दोस्त बनाने के लिये उसी नम्बर के साथ एम लिख कर एसएमएस करने को कहा गया है।अब बताईये भला सरकारी मोबाईल कंपनिया अगर लड़कियों से दोस्ती के नाम पर एसएमएस मंगाये और उन्हे 5 लड़कियों से दोस्ती और जी भर कर बातें करने का लालच दे तो क्या कहा जाये?यही ना कि देश का बंटाधार तय है! क्या लगता है आपको बताईयेगा ज़रूर।

Friday, August 27, 2010

क्या खाओगे?क्या खिलाओगी?जो आप कहें वो बना दूं!

शादी के लिये कुछ दोस्त फ़ार्मेलिटी के लिये कभी-कभार फ़ोर्स करते है मगर कुछ दोस्त हमेशा ही शादी करने की बजाय मुझे  खुशनसीब होने की गलतफ़हमी बनाये रखने मे मदद करते आये हैं।ऐसे ही एक दोस्त ने मुझे एसएमएस के जरिये बताया कि शादीशुदा का दर्द्।

उसने बताया कि दिन भर मेहनत कर रात को थक-हार कर घर लौटने के बाद पति से पत्नी पूछती है खाना खाकर आये हो खाओगे?नही खाकर नही आया हूं!तो क्या खाओगे?क्या खिलाओगी?जो आप कहे वो बना दूं।इतना प्यार भरा जवाब सुनकर कोई भी शादी-शुदा खुशी से ही मर जाये मगर आप आगे का भी किस्सा पूरा सुन लिजिये।बिना पूरा किस्सा जाने किसी भी निष्कर्ष पर पंहुचना सरासर गलत होगा।

तो,जो आप कहे बना दूं के बाद पति का डायलाग  खिचड़ी  ही खिला दो।अरे कल ही तो खाई थी खिचड़ी!तो दाल-चावल खिला दो।बच्चे नही खाते दाल-चावल!तो कोई सब्ज़ी बना दो।अब रात को कौन सब्ज़ी काटेगा।तो फ़िर कीमा बना लो।मुझे एलर्जी है।तो पराठें सेक दो।रात को कोई पराठे खाता है।तो कढी बना दो।दही नही है।अच्छा ऐसा करो अण्डे बना दो।पागल हो क्या?आज गुरुवार है?तो फ़िर क्या बनाओगी?अरे कैसी बातें करते हैं आप?आप जो कहो वो बनाकर खिला दूंगी! सुरेन्द्र छाबड़ा ने ये एसएमएस मुझे भेजा है।शायद वो ये बताना चाहता है कि मैं उन लोगों से ज्यादा खुशनसीब हूं।थोड़ा-थोड़ा तो मुझे भी लगता है कि वो सच कह रहा है,आप लोगों को क्या लगता है बताइयेगा ज़रूर्।

Thursday, April 8, 2010

विवाह के समय पत्नी बायीं तरफ़ और पति दायीं तरफ़ क्यों बैठते हैं?

आज छोटी सी पोस्ट।हल्कि-फ़ुल्की,निर्मल आनंद के लिये।सभी से निवेदन है कि इसे उसी रूप मे ले।एक सवाल उठाया गया था दोस्तों के सत्संग में।सवाल ऐसा था जिससे मेरा दूर-दूर तक़ कोई वास्ता नही था,लेकिन बाकी सब उस सवाल से परिचित थे।काफ़ी देर तक़ जब सवाल का जवाब सामने नही आ पाया तो पूछने वाले भाई बलबीर ने ही जवाब भी दे दिया।सबने उसको अकल आने की बधाई दी तो उसने सरदार से असरदार होने का राज़ भी बता दिया।सवाल ये था कि विवाह के समय पत्नी बायीं तरफ़ और पति दायीं तरफ़ क्यों बैठते हैं?अब जवाब भी सुन लिजिये क्योंकि बैलेंस शीट के अनुसार तमाम असेटस दायीं तरफ़ और लायबिलिटीज़ बायीं तरफ़ होती है।अब सरदार के असरदार हो जाने का राज़ भी अरे भाई मुझे किसी ने एसएमएस भेजा था वही तुम लोगों को बता रहा हूं,और उसी बात को मैं आप लोगों को बता रहा हूं।आप लोग भी बताईयेगा सही क्या है गलत क्या है?क्योंकि अपुन तो आज तक़ बैलेंस शीट पर आया ही नही।

Sunday, December 13, 2009

लेटअस प्लान एन मीट सम डे।

समय के बदलते मिज़ाज़ पर एक और छोटी सी पोस्ट जिसमे बात बहुत बड़ी छुपी हुई है।कालेज मे साथ पढे और अब आईएफ़एस अफ़सर मित्र ने समय मे आये इस बदलाव को खुद तो महसूस किया ही,साथ ही उसने सभी दोस्तो को इस बात को बताने के लिये एसएमएस भी किया।

उसका एसएसएस था,
Remember the time when freinds used to say"lets meet n plan something".

Now a days freinds says"lets plan n meet somaday".

freinds r same but time has changed.

दोस्तो के मिलने-जुलने मे आई कमी और सबके अपनी-अपनी दुनिया मे मस्त रहने से कभी-कभी पुराने दोस्तों के साथ गुज़रे दिन याद बनकर टीस मारते हैं।एक ही शहर मे रहकर कई-कई महीने नही मिल पाने की तक़लीफ़ तो मै भी महसूस कर रहा हूं।आप को क्या लगता है बताईयेगा ज़रूर्।

Wednesday, August 12, 2009

मार्टिनी और माक्टेल मे वो मज़ा कंहा जो सड़क के किनारे की गुमटी या ठेले की चाय मे था!

कालेज के बाहर तिवारी के ठेले मे एक प्लेट समोसा खाने मे जो मज़ा आता था आज शहर के जाने-माने होटलो मे लज़ीज़ से लज़ीज़ डिश खाने मे नही आता।रसिक की हाफ़ चाय पीने के बाद जो सुरूर आता था वो मार्टिनी या माक्टेल मे कंहा से आ पायेगा मै तिवारी या रसिक को यूंही नही याद कर रहा हूं,ये मुझे आज बरबस याद आ रहे हैं।दरअसल आज मुझे एक एस एम एस मिला जो मेरे सबसे प्रिय ने भेजा।उस एस एम एस मे कालेज की सुकून और चैन की ज़िंदगी से एक प्रोफ़ेशनल की ज़िंदगी के सफ़र तक़ मे आये बदलाव का उल्लेख था।

एस एम एस शुरू हुआ ही इस बात से कि कैसे कालेज की बिंदास ज़िंदगी परफ़ेक्ट प्रोफ़ेशनल लाईफ़ मे बदल गई।छोटी सी पाकेट मनी अब मोटी तन्ख्वाह मे बदल चुकी है मगर उससे उतनी खुशी नही मिलती।दो जोड़ी लोकल जीन्स की आल्मारी अब ब्रान्डेड कपड़ो से अटी पड़ी है मगर उन्हे पहने के खास मौके ही नही आते।कैसे एक प्लेट समोसा खाने के लिये मारामारी के दिन लद गये मगर अब बढिया स बढिया होटल मे बढिया से बढिया डिश खाते समय भी न मुंह मे पानी आता है और न खाने के बाद तृप्ति मिलती है।

हमेशा रिज़र्व मे रहने वाली फ़टिचर या खटारा स्कूटर अब हमेशा फ़ुल टैंक वाली शानदार लक्ज़री कार मे बदल गई है मगर उस पर सवार होकर जाने के लिये कोई जगह ही नही है।सड़क किनारे गुम्टियों या ठेले पर चाय कि चुस्कियों का मज़ा सी सी डी या आलिशान काफ़ी शाप मे कभी नही मिल सकता।लिमिटेड प्रिपेड कार्ड वाला मोबाईल अब पोस्टपेड पैकेज मे बदल चुका है मगर अब उससे बात किससे करे ये समझ नही आता।

लोकल ट्रेन मे या सेकेण्ड क्लास का रेल का सफ़र अब भुली बिसरी याद भर बस है मगर शानदार कार से लेकर हवाई जहाज तक़ के सफ़र की व्यवस्था होने के बाद भी समझ मे नही आता कंहा जायें।

शायद यही तरक्की के सफ़र का सच है जिसका नाम ज़िंदगी है।एस एम एस अक्सर बक़वास ही होते हैं पर पता नही क्यों इस एस एम एस ने सोचने पर मज़बूर कर दिया।बहुत सी बातें तो ज़िंदगी के सफ़र मे हमने भी वही देखी है जो इस एस एम एस मे बताई गई है।