Showing posts with label Raipur Chhattisagarh.. Show all posts
Showing posts with label Raipur Chhattisagarh.. Show all posts
Monday, May 2, 2011
विकास के नाम पर तोड़-फ़ोड़ और पेड़ काटना क्या जायज है?आखिर कब तक़ चलेगा ऐसा?
एक छोटा सा सवाल जो हमारे शहर रायपुर के लिये बड़ा महत्व रखता है। हमारा शहर राज्य बनने के बाद राजधानी बन गया,और अब उसे राजधानी के अनुरुप बनाने के नाम पर जम कर तोड़फ़ोड़ हो रही है चौड़ी करण के नाम पर पेड़ काटे जा रहे हैं,क्या ऐसा कर्ने के पहले कोई ठोस और दीर्घकालिक योजना बना कर काम करना ज़रुरी नही?ये आज बनाओ कल तोड़ो,फ़िर बनाओ,फ़िर तोड़ो,आखिर कब तक़ चलेगा ऐसा?
Labels:
Raipur Chhattisagarh.,
छत्तीसगढ,
राजधानी,
रायपुर
Thursday, April 22, 2010
शरद कोकास का भेजा हुआ संदेश सोचने पर मज़बूर करता है!
आज पृथ्वी दिवस है।कुछ लोग इसे अपने-अपने तरीके से मना लेंगे और फ़िर अगले साल तक़ के लिये शायद भूल भी जायेंगे।बहुत से तो शायद, इस बारे मे सोचें भी ना।मुझे भी इसे मनाने की औपचारिकता पूरी करना है।पृथ्वी दिवस पर आयोजित एक प्रदर्शनी का फ़ीता काटकर उद्घाटन कर देना है बस!उसके बाद प्रदर्शनी लगाने वाले जाने,देखने वाले जाने और उस पर बहस करने वाले जाने।अपना काम फ़ीता काटना,दो चार ताली बजाऊ डायलाग मारना,फ़ोटू खिंचवाना,व्यस्तता का बहाना बना कर वंहा से खिसक लेना और सब कुछ भूल जाना अगले पृथ्वी दिवस तक़।आखिर कब तक़ हम खुद,खुद को ही छलते रहेंगे?ये सब अब रोज़मर्रा मे शामिल होता जा रहा है शायद।
शायद इसी लापरवाह रवैये का नतीजा है जिसके दुष्परिणाम अब सामने नज़र आ रहे हैं।अभी तो शुरूआत है।पृथ्वी गर्म हो रही है,तापमान बढ रहा है,जलवायु मे परिवर्तन हो रहा है,ध्रुव पिघल रहे है।होंगे हम तो नही उबल रहे हैं ना,हम तो नही डूब रहे हैं ना।अभी बहुत टाइम है।साले पश्चिम वाले डराते है, बकवास करके। और भी दुनिया भर की बकवास कर लेते हैं हम,जब इस गंभीर विषय पर कोई बात करना चाहता है तो।बहुत ज्यादा हुआ तो उस पर किसी कमाऊ एन जी ओ का एजेंट होने का आरोप मढ दो और फ़िर आईपीएल के सट्टे,ललित मोदी और थरूर की जंग,चीयर गर्ल्स उपयोगिता के बहाने उनकी मांसलता और थरूर के बहाने नेताओं की रंगिनियों पर घण्टो बहस करने मे व्यस्त हो जाते हैं,मैं भी उन लोगों मे शामिल हूं।
लेकिन शायद आज ऐसा नही कर पाऊंगा।क्यों?बताया ना,शरद कोकास के भेजे संदेश ने सोचने पर मज़बूर कर दिया है।आज सुबह-सुबह शरद का संदेह मिला पृथ्वी दिवस पर।ऐसा नही है कि मुझे इसके बारे मे पता नही था।पता था,वो भी इसलिये,क्योंकि मुझे इस दिवस पर आयोजित एक प्रदर्शनी का फ़ीता काटना था।खैर वो तो मामला औपचारिकता का था जो अब शायद औपचारिक नही रहा क्योंकि शरद की ये पंक्तियां बहुत कुछ कह रही है,मुझे अंदर तक़ हिला दिया है,
स्त्री सहती है जितनी प्रसव-पीड़ा/
उतनी सहती है पृथ्वी भी/
बस पृथ्वी की चीख हमे सुनाई नही देती।
ईमानदारी से कहूं तो इससे पहले इस विषय पर इतनी गंभीरता से कभी नही सोचा मैने।भू-विज्ञान मे पोस्ट ग्रेज्यूयेट होने के कारण इस विषय की गंभीरता को समझता तो ज़रूर हूं,मगर आसपास जो घट रहा है उस पर सतही तौर पर बहस करने और दो-चार कागज़ काले करने के अलावा आज-तक़ कुछ किया ही नही और फ़िर इससे ज्यादा कर भी क्या सकता हूं मैं।अधिकांश लोग मुझे लगता है ऐसा ही कुछ करते है वरना धरती माता का इतना बुरा हाल नही होता।उसके वस्त्र जंगल रोज़ काट रहे है हम।उसे नंगा करने मे क्या कोई कसर छोड़ी है इंसानी लालच ने।पहाड़ो को फ़ोड़ कर खनिज़ लूट रहे है और नदियों की भी हत्या करने मे चूक नही रहे हैं हम।हमारे शहर की जलप्रदायनी खारुन नदी की दुर्दशा तो यही कह रही है।कहने को बहुत कुछ
है मगर पूरी राजधानी को पानी पीलाने वाली खारून नदी का हाल आपको दिखा देता हूं।आज शायद फ़ीता काटते समय हाथ कांपे,फ़ोटू खिंचवाते समय चेहरे पर थोड़ी शर्म नज़र आये और फ़िल्मी डायलाग मारते समय ज़ुबान थोड़ा लड़खड़ाये।
Labels:
Earth Day,
exhibition,
khaarun river,
Raipur Chhattisagarh.,
खारून नदी,
पृथवी दिवस,
शरद कोकास,
संदेश
Subscribe to:
Posts (Atom)