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Friday, August 7, 2015
घुसखोरी की सजा में सरकार का बमफाड छूट का एलान
छूट,छूट,छूट!लूट सके तो लूट!छत्तीसगढ सरकार ने घूसखोरी के रेट में आई भारी गिरावट को देखते हुये इसकी सज़ा में छूट देने का एलान नही उस पर अमल करना शुरु कर दिया है.यंहा आईएएस अफसर रणवीर शर्मा को घूसखोरी करते हुये रंगे हाथो गिरफ्तार पकडाने के बाद भी गिरफ्तार न कर सिर्फ मंत्रालय में अटैच भर किया है.इस मामले में घूसखोरी की शिकायत करने वाले पटवारी के संघ ने भारी नाराज़गी ज़ाहिर की है.उनका कहना है कि पटवारियों को भी घूस लेने में ये सुविधा मिलनी चाहिये,उन्हे गिरफ्तार कर लिया जाता है जो उनकी घूसखोरी की प्रतिभा के साथ अन्याय है.इधर प्रशिक्षु आईएएस अफसर रणवीर शर्मा के संघ ने भी उसकी निंदा की है.उनका ये मानना है मात्र 30 हज़ार रुपये घूस लेकर उन्होने देश में अप्रत्यक्ष रुप से सरकार चलाने का दंभ भरने वाले आईएएस अफसरों की शान में गुस्ताखी की है.इतनी कम रकम घूस में लेने से उनकी साख में गिरावट आई है और इसका सीधा असर टर्न ओव्हर पर पडेगा.संघ ने सभी प्रशिक्षुओं से अपिल की है वे सब्र से काम ले और किसी भी कीमत पर घूस पेटी,खोखे से कम न ले.वैसे संघ ने सरकार की दरियादिली पर आभार प्रकट किया है और सरकार को आश्वस्त किया है इस छूट का लाभ लेकर वे प्रदेश को घूसखोरी में भी नम्बर वन बनाकर ही दम लेंगे.सरकार की इस छूट की खबर सुनकर अन्य प्रदेशों के अफसरों में खलबली मच गई है और वे यंहा डेपुटेशन पर आने के लिये घूस देन को तैयार हो गये है.वैसे अन्य प्रदेशों में इस तरह की छूट देने की मांग उठने की भी खबर आ रही है.सरकार अपने इस अभूतपूर्व फैसले पर इतराने भी लगि है कि उसका ये माडल भी देशव्यापी होने जा रहा है.
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Thursday, August 6, 2015
लो मुन्ना भाई के बाद मुन्नी बहन आ गई
छत्तीसगढ के शिक्षा मंत्री बहुत ही भोले है,उनकी पत्नी क्या करती है ये तक उन्हे खबर नही होती.है ना कमाल की बात.और ये कमाल सिर्फ और सिर्फ छत्तीसगढ मे ही हो सकता है.यंहा के शिक्षा मंत्री की पत्नी की जगह कोई और परीक्षा दे रही थी और मंत्री महोदय की सादगी तो देखिये उन्हे खबर तक नही थी कि पत्नी क्या गुल खिला रहि है.मुन्ना भाई तो सुने थे अब मुन्नी बहने भी इस फिल्ड में आ गई है.आखिर वे क्यों पीछे रहे.पीछे रहे तो रहे ईमानदार छात्र.फिर मंत्री जी को तो ये भी नही पता था कि उनकी सासुमां भी उसी केन्द्र से परीक्षा दे रही थी.बुरा हो पत्रकारो का जो वंहा पहुंच गये.उनको देख नकली पत्नी यानी मुन्नी बहन भाग गई.हो गया ना लफडा,अब जांच करना पडेगा ना?कौन करेगा अपने ही मंत्री के खिलाफ जांच?मरना है क्या?ट्रांसफर से लेकर सस्पेंशन तक याद आ गया होगा.खैर बेचारे शिक्षा मंत्री केदार कश्यप का क्या दोष गलती तो उनकी पत्नी ने भी नही कि,गलती तो मुन्नी बहन ने की थी सो उसके खिलाफ कार्रवाई हो जायेगी.ये कहना है छत्तीसगढ की भोली भाली सरकार का.सो सारे देश के भोले भाले मुन्ना भाईयो और मुन्नी बहनो मौका मिलते ही चले आईये,यंहा आपको कोई कुछ नही कहेगा.
Sunday, January 4, 2015
किन्नर का जीतना,राजनितिक पुरुषार्थ के मुंह पर करारा तमाचा!
भाजपा का गढ बन चुके छत्तीसगढ में नगरीय निकाय चुनाव के नतीजों ने सरकार को चेतावनी दे दी है,तीन बार सरकार जरुर बनवा दी पर अगर परफारमेंस ठीक नही रहा तो मान लेना कि वे सत्त्ता पर किसी को भी बिठा सकते है.रायगढ में एक किन्नर का निर्दलीय जीतना इस बात का ही स्पष्ट संकेत है कि जनता सब जानती है और क्या करना है वो तो और अच्छी तरह से जानती है.एक किन्नर पर विश्वास जता कर जनता ने राजनितिक पुरुषार्थ के मुंह पर करारा तमाचा जद दिया है.कांग्रेस को भी जनता ने संदेश दिया कि अच्छा काम किजीये तो दिल्ली दूर नही पर अगर लडते झगडते रहे तो इतने अच्छे मौके पर भी भाजपा का सफाया नही कर पाने का गम हमेशा सालता रहेगा.बहरहाल पब्लिक ने कांग्रेस/भाजपा दोनो के संकेत दे दिये है,अब देखना है कौन समझदारी से काम लेता है.
Thursday, December 8, 2011
जितना आतंकियों ने उत्पात नहीं मचाया होगा, उससे कही ज्यादा कोहराम नक्सलियों ने मचा रखा है
रायपुर।देश में जहां एक ओर आतंकी हमले की आशंका हमेशा बनी रहती है, वहीं नक्सलियों के हमले के बारे में अक्सर सुनने व पढ़ने को मिलते हैं। इस साल नक्सली हमले जितने हुए उससे एक बात तो कही जा सकती है कि जितना आतंकियों ने उत्पात नहीं मचाया होगा, उससे कही ज्यादा कोहराम नक्सलियों ने मचा रखा है। इस साल नवम्बर तक नक्सलियों ने देश के 6 मुख्य नक्सल प्रभावित राज्य़ों में कुल 1,476 हमले किए, जिसमें 500 से अधिक लोग मारे गए।
उल्लेखनीय है कि 2010 में भी माओवादियों ने लगभग 626 आम नागरिकों की हत्या की थी। जिसमें संघर्ष के दौरान 277 सुरक्षा जवान मारे गए। इस साल नक्सलियों द्वारा किए गए हमलों से संबंधित आंकड़ों पर एक नजर:
2011 में नक्सली हमले में अब तक मारे गए- 513 ( मारे गए)
छत्तीसगढ़ से 182 ( सर्वाधिक) ( मारे गए)
झारखंड से 137 ( मारे गए)
महाराष्ट्र से 50 ( मारे गए)
बिहार और उड़ीसा से 49 ( मारे गए)
पश्चिम बंगाल से 40 ( मारे गए)
अन्य- 5( मारे गए)
नक्सली हमले से प्रभावित वर्ग
आम नागरिक 389 ( मारे गए)
सुरक्षाकर्मी 124 ( मारे गए)
वहीं इंडस्ट्रीज, रेल्वे, टेलीफोन एक्सचेंज टावर, पावर प्लांट, माइनिंग, पंचायत भवन और स्कूल बिल्डिंग को नुकसान पहुंचाने के मकसद से नक्सलियों ने 219 बार हमला किया।
इन आंकड़ों पर गौर फरमाने के बाद एक बात ये भी सामने आती है कि सुरक्षाकर्मियों ने भी इन नक्सलियों से टक्कर लेने में कोई कोताही नहीं बरती है। सुरक्षाकर्मियों ने इस साल अब तक 1,728 नक्सलियों की गिरफ्तारी की है, जबकि 546 हथियार इन नक्सलियों के पास से जब्त हुए हैं। साथ ही बीते 11 माह में 344 नक्सलियों ने सरेंडर किया है। साभार दैनिक भास्कर्।
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Monday, May 2, 2011
विकास के नाम पर तोड़-फ़ोड़ और पेड़ काटना क्या जायज है?आखिर कब तक़ चलेगा ऐसा?
एक छोटा सा सवाल जो हमारे शहर रायपुर के लिये बड़ा महत्व रखता है। हमारा शहर राज्य बनने के बाद राजधानी बन गया,और अब उसे राजधानी के अनुरुप बनाने के नाम पर जम कर तोड़फ़ोड़ हो रही है चौड़ी करण के नाम पर पेड़ काटे जा रहे हैं,क्या ऐसा कर्ने के पहले कोई ठोस और दीर्घकालिक योजना बना कर काम करना ज़रुरी नही?ये आज बनाओ कल तोड़ो,फ़िर बनाओ,फ़िर तोड़ो,आखिर कब तक़ चलेगा ऐसा?
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Monday, May 17, 2010
चिदंबरम जी नक्सली यात्री बस उडाने लगे हैं,तीस लोग मरे हैं,क्या अब भी आप कहेंगे कि सेना नही भेजेंगे!
बस्तर के लिये आज काला दिन है!बस्तर क्या सारे छत्तीसगढ के लिये काला दिन है.नक्सलियों ने पहली बार यात्री बस यात्री बस को बारुदी सुरंग से उडा दिया.बस मे यात्रियों के साथ कुछ जवान भी सवार थे.अभी कल ही नक्सलियों ने आधा दर्जन नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया था.तब भी मुख्यमंत्री डा रमन सिंह ने कहा था कि ये कायराना हरकत है और आज भी संभवतः यही कहेंगे!इसके अलावा और कर भी क्या सकते हैं.आपने तो पहले ही अपनी और अपनी नेता और उनकी सरकार की अंतर्राष्ट्रीय इमेज बनाये रखने के लिये दिल्ली मे चिल्ला चिल्ला कर कहा था कि हम नक्सलियों से निपटने के लिये सेना का इस्तेमाल नही करेंगे.आप की उस बयानबाज़ी से क्या असर पडा देख लिजिये.कल आधा दर्जन निरीह और निर्दोष नागरिक और आज तो पता नही कितने?पहली सूचना के अनुसार तीस और भी बढ सकते हैं.क्या आपको अब भी लगता है कि नक्सलियों से बात होनी चाहिये?क्या उनके खिलाफ़ सेना का इस्तेमाल आपको अब भी गलत लगता है?
तो फ़िर बताईये चिदंबरम जी कि और कितना खून बहान पडेगा बस्तर में.और कितने बच्चों को असमय अनाथ होना पडेगा?और कितनी बहनों का सुहाग उजडवागे?और कितने बुढों की लाठियां तोडोगे?कुछ तो शर्म आनी चाहिये केन्द्र सरकार को और उसके चमचों को.आखिर कब तक चलेगा बस्तर ,छत्तीसगढ और अन्य नक्सल प्रभावित इलाकों मे खूनी खेल.सब रुकना चाहिये और तत्काल रुकना चाहिये,कैसे रुकेगा ये आप जानिये?
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Friday, March 12, 2010
थानेदारों को भ्रष्ट कहना आपकी ईमानदारी नही बेबसी का सबूत है गृहमंत्री जी!
छत्तीसगढ के ग़ृहमंत्री ने विधानसभा में ये कह कर सब को चौंका दिया कि थानेदारों को दस हज़ार रूपया महिना बंधा है।वे अवैध शराब की बिक्री को संरक्षण दे रहे हैं।अब बताईये भला ये बयान क्या काफ़ी है।बात तो होती जब गृह मंत्री भ्रष्ट थानेदारों की सूची या एकाध नाम सामने रखते और उनहे सज़ा देकर बाकी लोगों को सुधरने की चेतावनी देते।
अफ़सोस ऐसा नही किया मंत्री ने।वे तो बस बोले चले गये और बात-बात पे हंगामा करने वाला विपक्ष भी उनकी बात को सुनता रहा और सब मिलकर तालियां बज़ाते रहे।किसलिये कि प्रदेश में भ्रष्टाचरियों का बोलबाला है?किसलिये,कि गृहमंत्री भी भ्रष्ट थानेदारों तक़ का कुछ नही बिगाड़ सकती?
अपने क्षेत्र मे अवैध शराब की बिक्री न होने की घोषणा मंत्री ने बड़े गर्व से की।तो क्या वे सिर्फ़ अपने विधानसभा क्षेत्र के ही मंत्री हैं?क्या प्रदेश के अन्य हिस्सों से उन्हे कोई लेना-देना नही है?मेरा ये सवाल है कि अगर आप अपने क्षेत्र को सुधार सकते हो तो दूसरे क्षेत्र को भी ठीक कर सकते हैं।अगर आप ऐसा नही कर रहे हैं तो ये आपकी अक्षमता ही मानी जायेगी ना कि ईमानदारी।
मंत्री जी अगर आप ये मान रहे हैं कि थानेदारों का महिना बंधा है और अगर उनके खिलाफ़ कोई कार्रवाई नही हो रही है तो ये भी अपने आप मान लिया जायेगा कि वे भी कंही न कंही महिना दे रहे हैं।लेने वाला कोई भी हो सकता है?अगर आप कहें कि मैं नही लेता,अगर लेता तो उन्हे गालियां कैसे देता?तो मान भी लेंगे कि आप नही लेते।मगर कार्रवाई क्यों नही करते ये सवाल तो खड़ा ही है ना?आप नही लेते होंगे? तो भाई-भतीज़े लेते होंगे? नही तो दूसरे मंत्री लेते होंगे?,नही तो बड़े अफ़सर लेते होंगे?कोई ना कोई तो लेता ही होगा वर्ना मंत्री को पता होने के बाद भी कार्रवाई क्यों नही हो रही है?
खैर आप और आपके साथी तो सरकार में है उनकी खामोशी समझ मे आती है मगर विपक्ष का इतने बड़े मामले मे ख्जामोश रहना समझ से परे है?सड़ियल रिपोर्टों के आधार पर सरकार पर भ्रष्टाचार का आये दिन आरोप लगाने वाले विपक्ष यानी कांग्रेस का खामोश रहना इस बात का संकेत तो देता है कि मंत्री के अनुसार महिना लेने वाले थानेदार कुर्सी पर बने रहने के लिये न केवल सत्तापक्ष और अफ़सरों को बल्कि विपक्ष को भी सेट करके रखे हैं।
वैसे थानेदारों के अलावा आपको कोई और भ्रष्ट क्यों नज़र नही आया ये भी समझ मे नही आया मुझ नासमझ के?आप तो सहकारिता और जेल मंत्री भी हैं।सहकारिता मे तो इंस्पेक्टर राज ही चलता है।फ़िर एक सहकारिता निरीक्षक को रंगे हाथों रिश्वत लेते पकड़ाने के बाद भी क्यों फ़िल्ड़ मे पोस्टिंग दी गई?चलिये व्यक्तिगत सवाल नही।क्या जेल मे सब ठीक चल रहा है।आपको वंहा जैमर तक़ लगवाने पड़े।वंहा से आज भी अपराधी अपना कारोबार मोबाईल पर चला रहे हैं।वंहा औरत छोड़ कर सारी सुविधायें बिकती है।बैरकों की नीलामी होती है?अस्पताल के बहाने बाहर की हवा खाने की कीमत अलग तय है।सब तो जान्ते हैं आप्।फ़िर उन मामलों मे वही बेबाकी क्यों नही?वही स्वीकारोक्ति क्यों नही?
खैर जाने दीजिये कहने को बहुत कुछ है वो फ़िर किसी दिन मगर मेरा ये मानना ह कि अगर आप विपक्ष मे होते और आपकी पार्टी भी तो क्या दूसरी पार्टी के मंत्री के ऐसे बयान पर खामोश रहते?क्या आप उससे नैतिकता की दुहाई देकर इस्तीफ़ा नही मांगलेते?वैसे नैतिकता की बात अगर राजनीति सिर्फ़ बयानबाज़ी के अलावा सच मे ज़िंदा है तो इसका थोड़ा बहुत असर तो होना चाहियें।इस्तीफ़ा ना सही कम से कम भ्रष्ट अफ़सरों को ठीक करने का एलान तो हो जाना चाहिये।फ़िर ये तो छत्तीसगढ है जंहा नकसल प्रभावित बस्तर का नाम ही अच्छे-अच्छे सुधर जाते हैं।आप मंत्री है चाहे तो सुधार सकते है और अगर नही तो किसी को भ्रष्ट कहने से पहले सोचियेगा कि कार्रवाई नही करने के सवाल पर आपकी ईमानदार बनने की कोशिश औंधे मुंह गिरेगी।
अफ़सोस ऐसा नही किया मंत्री ने।वे तो बस बोले चले गये और बात-बात पे हंगामा करने वाला विपक्ष भी उनकी बात को सुनता रहा और सब मिलकर तालियां बज़ाते रहे।किसलिये कि प्रदेश में भ्रष्टाचरियों का बोलबाला है?किसलिये,कि गृहमंत्री भी भ्रष्ट थानेदारों तक़ का कुछ नही बिगाड़ सकती?
अपने क्षेत्र मे अवैध शराब की बिक्री न होने की घोषणा मंत्री ने बड़े गर्व से की।तो क्या वे सिर्फ़ अपने विधानसभा क्षेत्र के ही मंत्री हैं?क्या प्रदेश के अन्य हिस्सों से उन्हे कोई लेना-देना नही है?मेरा ये सवाल है कि अगर आप अपने क्षेत्र को सुधार सकते हो तो दूसरे क्षेत्र को भी ठीक कर सकते हैं।अगर आप ऐसा नही कर रहे हैं तो ये आपकी अक्षमता ही मानी जायेगी ना कि ईमानदारी।
मंत्री जी अगर आप ये मान रहे हैं कि थानेदारों का महिना बंधा है और अगर उनके खिलाफ़ कोई कार्रवाई नही हो रही है तो ये भी अपने आप मान लिया जायेगा कि वे भी कंही न कंही महिना दे रहे हैं।लेने वाला कोई भी हो सकता है?अगर आप कहें कि मैं नही लेता,अगर लेता तो उन्हे गालियां कैसे देता?तो मान भी लेंगे कि आप नही लेते।मगर कार्रवाई क्यों नही करते ये सवाल तो खड़ा ही है ना?आप नही लेते होंगे? तो भाई-भतीज़े लेते होंगे? नही तो दूसरे मंत्री लेते होंगे?,नही तो बड़े अफ़सर लेते होंगे?कोई ना कोई तो लेता ही होगा वर्ना मंत्री को पता होने के बाद भी कार्रवाई क्यों नही हो रही है?
खैर आप और आपके साथी तो सरकार में है उनकी खामोशी समझ मे आती है मगर विपक्ष का इतने बड़े मामले मे ख्जामोश रहना समझ से परे है?सड़ियल रिपोर्टों के आधार पर सरकार पर भ्रष्टाचार का आये दिन आरोप लगाने वाले विपक्ष यानी कांग्रेस का खामोश रहना इस बात का संकेत तो देता है कि मंत्री के अनुसार महिना लेने वाले थानेदार कुर्सी पर बने रहने के लिये न केवल सत्तापक्ष और अफ़सरों को बल्कि विपक्ष को भी सेट करके रखे हैं।
वैसे थानेदारों के अलावा आपको कोई और भ्रष्ट क्यों नज़र नही आया ये भी समझ मे नही आया मुझ नासमझ के?आप तो सहकारिता और जेल मंत्री भी हैं।सहकारिता मे तो इंस्पेक्टर राज ही चलता है।फ़िर एक सहकारिता निरीक्षक को रंगे हाथों रिश्वत लेते पकड़ाने के बाद भी क्यों फ़िल्ड़ मे पोस्टिंग दी गई?चलिये व्यक्तिगत सवाल नही।क्या जेल मे सब ठीक चल रहा है।आपको वंहा जैमर तक़ लगवाने पड़े।वंहा से आज भी अपराधी अपना कारोबार मोबाईल पर चला रहे हैं।वंहा औरत छोड़ कर सारी सुविधायें बिकती है।बैरकों की नीलामी होती है?अस्पताल के बहाने बाहर की हवा खाने की कीमत अलग तय है।सब तो जान्ते हैं आप्।फ़िर उन मामलों मे वही बेबाकी क्यों नही?वही स्वीकारोक्ति क्यों नही?
खैर जाने दीजिये कहने को बहुत कुछ है वो फ़िर किसी दिन मगर मेरा ये मानना ह कि अगर आप विपक्ष मे होते और आपकी पार्टी भी तो क्या दूसरी पार्टी के मंत्री के ऐसे बयान पर खामोश रहते?क्या आप उससे नैतिकता की दुहाई देकर इस्तीफ़ा नही मांगलेते?वैसे नैतिकता की बात अगर राजनीति सिर्फ़ बयानबाज़ी के अलावा सच मे ज़िंदा है तो इसका थोड़ा बहुत असर तो होना चाहियें।इस्तीफ़ा ना सही कम से कम भ्रष्ट अफ़सरों को ठीक करने का एलान तो हो जाना चाहिये।फ़िर ये तो छत्तीसगढ है जंहा नकसल प्रभावित बस्तर का नाम ही अच्छे-अच्छे सुधर जाते हैं।आप मंत्री है चाहे तो सुधार सकते है और अगर नही तो किसी को भ्रष्ट कहने से पहले सोचियेगा कि कार्रवाई नही करने के सवाल पर आपकी ईमानदार बनने की कोशिश औंधे मुंह गिरेगी।
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Wednesday, February 10, 2010
भ्रष्टाचार,अव्यवस्था और अधर्म की त्रिवेणी पर हर साल होने वाले नकली कुम्भ को असली साबित करने मे लगी है सरकार!कमाल तो ये है कि इस पाखण्ड का कोई विरोध भ
हर साल कुम्भ! कभी सुना है?नही ना!तो आईये छत्तीसगढ और राजधानी के करीब होने कुम्भ में पवित्र स्नान कर के पु
ण्य कमाईये।आपको सिर्फ़ पुण्य के बारे मे सोचना है बाकी करोड़ों की हेराफ़ेरी के लिये शासन-प्रशासन का संगठित तंत्र मौज़ूद है यंहा।न कोई धार्मिक महत्व और ना ही कोई पौराणिक मान्यता!बस जो जी मे आया किये जा रहे हैं।अफ़सोस तो इस बात का है कि इस अधार्मिक और नकली आयोजन का कोई विरोध भी नही करता।कमाल तो ये है कि बात-बात पर भाजपा को धर्म के नाम पर कोसने वाली कांग्रेस यंहा विपक्ष मे है और खामोश है।जबकि इसी कुम्भ मे पिछली बार भाजपाई नेताओं को खुश करने के चक्कर मे एक भाड़े के भोंपू संत ने सोनिया गांधी के खिलाफ़ आपत्तिजनक टिपण्णी कर दी थी और नतीजन इलाके मे तनाव फ़ैल गया था।
सोनिया के नाम पर कांग्रेस कुम्भकर्णी नींद से जागी थी मगर पाखण्ड,झूठ और फ़रेब के नकली कुम्भ पर वो खामोश ही है।शायद चोर-चोर मौसेरे भाई कहावत का असली उदाहरण बन कर्।इस आयोजन मे आने वाले एक भी संत और साधू महात्मा?ने ये सवाल आज तक़ नही उठाया कि कुम्भ हर साल कैसे हो सकता है?क्या यंहा कुम्भ के आयोजन के लिये कोई धार्मिक आधार है?सिर्फ़ पांच साल हुये हैं इस कुम्भ को?इतना ताज़ा कुम्भ कैसे अस्तित्व मे आया?क्यों आया?किसके लिये आया?जैसे सवाल वंहा महानदी की रेत के नीचे दबे पड़े हुयें है।
राजधानी रायपुर से मात्र
45 किलोमीटर दूर है छत्तीसगढ का तीर्थराज राजिम।यंहा महानदी,पैरी और सोंढूर नदियों का पवित्र त्रिवेणी संगम है और फ़सल कटाई के बाद उत्सव मनाने के लिये पूर्णीमा को हर साल मेला लगा करता था जिसे हम लोग बचपन से पुन्नी मेला के नाम से जानते थे।पुन्नी याने पूनम का मेला।छोटे-मोटे मीनाबाज़ार और खाने-पीने वालों की फ़ौज़ यंहा जमा होती थी और आसपास के लोग इसका आनंद लिया करते थे।सदियों से चले आ रहे इस मेले को भाजपा ने सत्ता मे आते ही हाईजैक कर लिया और सीधे इसीके जरिये हिन्दू कार्ड खेलना शुरु कर दिया।ये खेल आज भी बदस्तूर जारी है।
यंहा देश के चार कुम्भों की तरह साधू-संतो की भीड़ खूद नही खिंची चली आती,बल्कि उन्हे निमंत्रण देकर बुलाया जाता है।निमंत्रण भी सूखा नही बल्कि आने-जाने के खर्च के अलावा मोटी दक्षिणा की गारंटी के साथ्।यंहा दर्शनार्थी,श्रद्धालू भी आये नही बुलाये जाते हैं।इसके लिये पब्लिसिटी कैम्पेन चलता है।सरकारी खजाने का मुंह खोल कर आलोचकों के मुंह बंद कर दिये जाते हैं।धर्म के नाम पर हो रहे अधर्म के खिलाह खुल सकने वाले मुंह मे पहले ही दक्षिणा ठूंस दी जाती है।भ्रष्टाचार का कुम्भ नही महाकुम्भ साबित होता जा रहा है ये नकली राजिम कुम्भ्।घोषणा के बावज़ूद आज तक़ मेला प्राधिकरण नही बनाया गया शायद हिस्सेदार बढाना नही चाहते भाई लोग।
सबसे दुखःद तो कुम्भ के बाद त्रिवेणी संगम की स्थिति होती है।महानदी का सीना चीर कर जगह-जगह सड़के बना दी जाती है जो बाद मे अपने मुरूम और गिट्टी की वजह से रूई जैसी नरम मखमली रेत मे फ़ोड़े-फ़ुंसियो की तरह नजर आती है।अव्यवस्था का तो ये आलम है कि लोग जंहा मौका मिलता है वंही शौचादि से निवृत हो लेते हैं।पता नही ऐसे समय मे पर्यावरणवादी कंहा होते हैं।शायद इसमे उनकी रूची भी बहुत ज्यादा नही होती।पोलिथीन,बचा-खुचा खाना,पकवान और मल-मूत्र की दुर्गंध कई दिनों तक़ नकली कुम्भ के पाप का सबूत देती रहती है।पता नही कब तक़ चलेगा ये अनास्था और अधर्म का मिलाजुला खेल्।जय हिंद,जय छत्तीसगढ्।
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Sunday, November 1, 2009
बधाई,बधाई,बधाई!
कहने को बह्त कुछ है मगर आज शुभदिन है इसलिये गिले शिकवे आज नही कल।आज तो बस सिर्फ़ इतना ही,बधाई,बधाई,बधाई!आज ही के दिन एक बहुत ही महत्वपूर्ण फ़ैसले के कारण हम सब तरक्की की राह पर चल पड़े थे।तरक्की की रफ़्तार से शिकायत हो सकती है और दूसरी भी बहुत सी शिकायतें है लेकिन आज तो उत्सव का दिन है।राज्योत्सव का दिन है,आज ही दिन मेरा राज्य छ्त्तीसगढ अस्तित्व मे आया था और आज उसकी नवम वर्षगांठ है।एक बार फ़िर राज्य की 2 करोड़ दस लाख जनता को बधाई और सारे देशवासियों को हमारे प्रदेश के खुशहाली के रास्ते मे बढने की बधाई।बधाई,बधाई,बधाई।और हां ,आज ही के दिन मेरे राज्य के दो और भाईयों का भी जन्म हुआ था।उत्तरांचल और झारखण्ड्।वंहा के निवासी भाईयों की भी खुशहाली की शुभकामनाओं के साथ उन्हे भी बहुत बहुत बधाई।
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वर्षगांठ्।
Thursday, October 15, 2009
ईमानदारी पाप है,ट्रांसफ़र इसका श्राप है,क्योंकी इस सड़ेले सिस्टम मे जनता नही,नेता जनता का बाप है
जी हां सही कह रहा हूं।यंहा एक ईमानदार अफ़सर फ़िर निपट गया।गलती सिर्फ़ इतनी थी कि वो आंखे बंद करके ठेकेदारों के बिल पास नही करता था।बिना वेतन नही लिये नौकरी कर रहे आई ए एस अफ़सर अमित कटारिया को नगर निगम के कमिश्नर पद से जाना ही पड़ा।वेसे ये कटारिया को ईमानदारी के भूत ने बुरी तरह जकडा हुआ है और इससे पहले भी इसी बीमारी की वज़ह से चर्चा मे रहे हैं।पदोन्नति मे रिश्वतखोरी का आरोप लगाकर सारे सीनियर आई ए एस को वैसे ही नाराज़ कर चुके थे और अब महापौर से भी भीड़ गये थे।खैर उनका कहना है कि मुझे फ़र्क़ नही पडता,काम कंही न कंही तो करना ही है।वैसे छत्तीसगढ मे ये पहला मौका नही है।इससे पहले एक सीनियर आई ए एस अफ़सर चीफ़ सेक्रेटरी बनने का सपना लिये हुये ही रिटायर हो गये और एक नही दो-दो बार उनसे जुनियर को उस पद पर पदोन्नति दे दी गई।
खैर कई शापिंग माल के मालिक युवा अमित कटारिया को आई ए एस अफ़सर बनते समय शायद ये सब पता नही होगा।यंहा तो माते 26 दिन मे चार करोड रूपये से भी ज्यादा और एक महीने मे ढाई करोड् से भी ज्यादा रकम का बिल बिना काम किये,कर दिये जाने का रिकार्ड बना रहे है अफ़सर।ऐसे मे नगर निगम जंहा अगले महीने चुनाव होने वाले हैं,वंहा ठेकेदारों के बिल अटके रहेंगे तो मनचाहे ईलाके मे सड़क़-बिजली-पानी के काम कैसे करवा पायेंगे चुनाव लडैया लोग्।बस फ़िर क्या था किसी न किसी बात पे उलझो और विवाद का पटाक्षेप अफ़सर की बलि सारी ट्रांसफ़र से हो ही जाता है,और हुआ भी।ईमानदार अमित कटारिया ईमानदारी की लडाई लड़ते-लड़ते खेत रहे।
नगर निगम से हर आदमी जुड़ा होता है इसलिये अमित का ट्रांसफ़र सारे शहर मे चर्चा का विषय हो गया है।जिसे देखो वो हैरान,परेशान होकर सिस्टम को गाली बक़ रहा है मगर नगर निगम के अधिकांश कर्मचारी-अधिकारी और ठ्केदार खुशियां मना रहे हैं।एक का कहना था,वो तो ठीक है ईमानदार है,लेकिन काम कंहा हो पा रहे है।ईमानदारी की वजह से करोड़ों के बिल अटके पड़े है और जब तक़ बिल क्लियर नही होते तब तक़ ठेकेदार काम नही कर रहे थे और काम नही होगा तो चुनाव क्या खाकर लड़ेंगे।वाह क्या लाजिक है।इस मामले मे विपक्ष यानी कांग्रेस के भी इक्का-दुक्का नेताओं ने अख़बारों मे बयान देकर विरोध की खानापूर्ती कर ली और निगम मे मिलिजुली कुश्ति चल रही है इस बात का एक बार और सबूत दे दिया।
हां जनता ज़रूर नाराज़ है मगर उसकी नाराज़गी की परवाह किसे है। चुन कर आ गये हैं सत्ता मे अब पांच साल सरकार उनकी रहेगी इसलिये परवाह है नही नगर निगम मे किसे वोट देती है जनता।विकास चाहिये तो रूलिंग पार्टी को वोट देना मज़बूरी है वरना काम चलेगा सरकारी स्पीड से।पब्लिक अब कर भी क्या सकती है।ये तो उस कटारिया को सोचना चाहिये था कि काहे ईमानदारी का ब्रांड एम्बेसेडर बना फ़िर रहा है।अब ईमानदार बने ही रहना है तो झेलो ट्रांसफ़र पे ट्रांसफ़र्।वैसे गनीमत है मुख्यंत्री डा रमन सिंह और रायपुर के एक युवा मंत्री राजेश मूणत जानते हैं कि अमित ईमानदार है इसलिये बहुत दूर कंही बस्तर या सरगुजा जैसे नक्सल प्रभावित अविकसित ईलाके मे नही फ़ेंका वरना गाते रहते चौबीसों घण्टे, ईमानदारी पाप है,ट्रांसफ़र इसका श्राप है,क्योंकी इस सड़ेले सिस्टम मे जनता नही,नेता जनता का बाप है !
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Wednesday, September 9, 2009
पाक का झंडा फ़हराते न दिखाना हो तो मत दिखाओ,मगर पाक मे छपे लाखो रूपये के नकली पकड़ाने की खबर तो दिखाओ देश के असली ठेकेदारों
कोल्हापुर के मिरज़ मे पाकिस्तान का झंड़ा फ़हराने की खबरो को मीड़िया ने दबा दिया।कोई बात नही हो सकता है कि इससे उनके हिसाब से तनाव फ़ैल जाता मगर छत्तीसगढ मे पाक मे छपे दो लाख के नकली नोट पकडाने की खबर किस लिये नही दिखाई जा रही है समझ के परे है।
पाक सीमा के आसपास नही देश के हृदयस्थल छतीसगढ तक़ पाक मे छपे नकली नोटो का पंहुच जाना इस बात का सबूत है कि उन लोगो की पकड़ कितनी गहरी है।नकली नोट यंहा सालो से चलाये जा रहे हैं।हाल मे पकड़ाये नकली नोट स्कैन किये हुये मिले मगर इस बार पकड़ाये नोट छापे हुये हैं।ये बात चिंताजनक है और तारीफ़ करनी होगी पुलिस की बंगाल के माल्दा इलाके से आये मात्र उन्नीस साल के एक युवक शेख बोरजंहा को उसने कुछ ही घण्टो मे पकड लिया।उसका एक साथी फ़रार होने मे सफ़ल हो गया है।एस पी अमित कुमार और उनकी टीम इस मामले की जांच मे भीड़ी हुई है।
अब सवाल ये उठता है कि क्या ये खबर बड़ी नही है।एक न्यूज़ चैनल कल से दहाड़ मार-मार कर रो रहा है कि गुजरात मे हुआ एनकाऊंटर फ़र्ज़ी था।उसका रोना जारी है और अब उसने एक नया राग आलापना शुरू कर दिया है।उसका कहना है कि मामले का सच साम्ने आना आधा न्याय है ,पूरा न्याय तब कहलायेगा जब आरोपियों को सज़ा मिलेगी।उन्होने बाक़ायदा सवाल भी पूछने शुरू कर दिये हैं।ठीक है सही कर रहे है दोषियों को सज़ा मिलनी ही चाहिये लेकिन क्या ये नियम सिर्फ़ गुजरात के लिये लागू है?क्या महाराष्ट्र के कोल्हापुर मे गणेश जी की मुर्तियों को तोड़ने की घटना को नही दिखया गया?क्या सिर्फ़ इस्लिये कि इससे दंगे भड़क सकते थे?क्यो वंहा पुलिस की जीप पर चढ कर पाकिस्तान का झंड़ा लहराने की घट्ना को नही दिखाया गया?क्या इससे हिंदू भड़क़ जाते?क्या इस देश मे पाकिस्तान का झंडा ,वो भी दंगा करके,पुलिस की जीप पर चढ कर लहराने की एक वर्ग विशेष को छूट दे दी गई है?और भी बहुत से सवाल है,जो इस देश मे मीडिया की भूमिका पर सवाल खड़े करता है।
लाखो रूपये के नकली नोट पकड़ा रहे है,वो दिखाने का टाईम नही है।और किसी के भी बेडरूम तक़ मे घूसे जा रहे है भाई लोग्।एक भाजपा नेत्री को अश्लील एम एम एस मे घसीट दिया पता नही किसका था,बस अनुमान लगाया और कर दिया खड़ा बखेड़ा।एक अफ़सर की अपनी पत्नी के साथ अतरंग क्षणो की फ़िल्म मिली,तड़ से दिखा दिया,न तो उसकी बीबी ने शिकायत की थी और न ही उसके परिवार मे किसी ने।बस कुछ ठेकेदारो ने भुगतान रोकने वाले अफ़सर को ब्लैकमेल करना चाहा और सफ़ल नही होने पर मिडिया को फ़िल्म मुहैया करा दी और मामला समाज-सुधार का हो गया,ब्लैकमेलिंग का नही।
ऐसे एक नही सैकडो उदाहरण है मगर क्या करें,मीडिया को तो पिलीया हो चुका हैउसे तो पीला ही नज़र आयेगा।आज सुबह से मै नेशनल न्यूज़ चैनलो पर नकली नोटो की खबर ढूंढ रहा हुं,जंहा से शेख नकली नोत लेकर आया है उस जगह माल्दा की खबर आ गई मगर रायपुर की नही।गुस्सा तो था ही सुरेश चिपलुणकर की पोस्ट पढ कर गुस्सा और बढ गया तो मै भी लिख बैठा।मुझे लिंक देना आता नही इसलिये क्षमा चाहता हूं,मगर आपसे अनुरोध ज़रूर करूंगा कि सुरेश जी के ब्लाग पर ज़रूर जाकर उनकी पोस्ट को पढे।
Monday, August 31, 2009
सलीम भाई हिंदुओं के जागने का मतलब सिर्फ़ अयोध्या या गुजरात ही नही होता,लोग बछ्ड़े की मुंडी और टांग मंदिर मे फ़ेंक रहे हैं तो भी क्या खामोश रहना चाहिये
मेरी एक पोस्ट पर सलीम भाईजान ने टिपण्णी की क्या हिंदूओं के जागने का मतलब अयोध्या और गुजरात जैसा होता है?मै अमूमन टिपण्णी पर प्रति टिपण्णी करना गैरवाज़िब समझता हूं लेकिन यंहा एक मंदिर मे बछ्डे की मुंडी काटकर फ़ेंक दी गई है।मै इस विषय पर लिखना नही चाह्ता था मगर सलीम भाई की टिपण्णी ने मुझे इस पर लिखने के लिये मज़बूर कर दिया।
एक ज़िम्मेदार पत्रकार होने के नाते मुझे मालूम है क्या लिखना चाहिये और क्या लिखने से बचना चाहिये।जिस अयोध्या को लेकर उन्होने टिपण्णी की है उस समय मै दैनिक भास्कर मे महत्वपू्र्ण स्थान पर था और उस समय हम लोगो ने ऐसा कुछ भी नही लिखा जिससे रायपुर कानपुर बन जाता। हमे ये कहने मे गर्व होता है कि उस समय फ़िज़ा मे ज़हर को घुलने से पहले ही रोकने की तमाम कोशिशो मे हम लोग शामिल थे,और उअ समय भी छत्तीसगढ अमन और चैन का टापू बना रहा।
सलीम भाई मै आपको बता दूं की मेरा बचपन से लेकर जवानी तक़ का समय रायपुर के मौदहापारा नामक मुहल्ले मे बीता है,जो आपके यूपी के बांदा ज़िले के मौदहा इलाके के नाम पर है।यंहा सारे लोग मौधईया कहलाते हैं और वंहा रहने के कारण मुझे भी मौधईया कहा जाता था।मैने कभी इस बात पर ऐतराज़ नही किया ।मेरा बचपन का मित्र सत्तार खान आज भी वंहा रहता है उसे मै राजेन्द्र कह कर बुलाता था,बुलाता हूं और रहूंगा।उसे कोई ऐतराज़ नही है उसके घर वालो को कोई ऐतराज़ नही है,पूरे मुहल्ले वालो को कोई ऐतराज़ नही है।वो मेरे परिवार का सदस्य है और मै उसके परिवार का।
ये सब बताने की ज़रूरत नही है और मुझे धर्मनिरपेक्षता का सर्टिफ़िकेट किसी की मुहर लगा हुआ चाहिये भी नही।सारा ईलाका मुझे जानता है कि मै कैसा इंसान हूं।रहा सवाल गणेश जी की मूर्तियों के उपहास का तो इस पर टोकना ज़रूरी हो गया था।सलीम भाईजान ने फ़िर कुछ फ़िल्मो के उदाहरण देकर टिपण्णी की है कि अमिताभ ने ये किया,फ़लाने ने वो किया,इस फ़िल्म मे वो हुआ,उस फ़िल्म मे वो हुआ?तो मेरा सलीम भाई से ये सवाल है कि जो कूछ् गलत हुआ तो उस गलती को जारी रखने की इज़ाज़त दिया जाना सही है या उस गलती को सुधारने की कोशिश करना?दुसरा सवाल ये है कि क्या एक फ़िल्म के गाने के बोल को लेकर मुसलमानो ने उस गीत को इस्लाम के खिलाफ़ करार देकर बोल बदलवाये थे,तो क्या वो सही था?अगर वो सही था तो मै क्यों गलत हूं?
अब सवाल ये उठता है कि आखिर क्या वज़ह थी कि मैने ऐसे विषय प लिखना ज़रूरी समझा जो किसी विवाद को जन्म दे सकती है?मुझे इस ब्लाग की दुनिया मे आये ज्यादा नही डेढ साल तो हो ही गये हैं।मैने इस दौरान कभी विवाद मे पडने की बजाय,चुपचाप अपनी बात सामने रखना ज़रूरी समझा और अभी तक़ वही करता आ रहा हूं।गंणेश जी को ग़ज़नी के आमिर खान का रुप देना उतना महत्व्पूर्ण सवाल नही था जितना उसकी आड़ मे आग लगाने वालो के मंसूबों को रोकने का था।
छत्तीसग़ढ मूल रूप से शांति का टापू कहलाता है और यंहा की शांति भंग करने की कई बार कोशिश हूई है।हर बार असफ़ल रहने के बावज़ूद विघ्नसंतोषी लोग फ़िर सक्रिय हैं और इस बार भी काफ़ी समय से यंहा की साम्प्रदायिक सद्भाव की हवा को ज़हरीली करने की साजिश रची जा रही है।कुछ समय पहले एक थियेटर के पास तालाब के किनारे बेंच के नीचे सुतली बम फ़ोडकर हवा खराब करने की कोशिश हुई थी।अभी इसी सप्ताह भाजपा कार्यालय के पास खड़ी एक बस मे सुतली बम फ़ोड़कर फ़िर कोशिश की गई।उसके बाद गणेश जी निशाने पर थे और उनकी आड लेकर फ़साद फ़ैलाने की कोशिश हुई।और अब टाटीबंध ईलाके के काशी विश्वनाथ मंदिर मे एक बछ्ड़े का सिर और टांग काट कर फ़ेका गया।ये भी उसी साजिश का हिस्सा है सलीम भाई।
अगर मेरे शहर मे आग लगेगी तो जलूंगा मै और मेरे भाई लोग्।सबकी चिता की राख पर रोने वाले रूदाली लोग उसकी आंच पर अपनी राजनैतिक रोटी सेकेंगे।उस समय किसी को बचाने के लिये कथित धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदार और कथित मानवाधिकारवादी नही होंगे।बाद मे हम अपने हाथ देखेंगे तो उस पर लगे खून के निशान हम तमाम उम्र जीने नही देंगे।तब मुझे सत्तार उर्फ़ रज़्ज़ू जो हमारे लिये राजेन्द्र है माफ़ नही करेगा?उसकी बहन मेरी कलाई पर राखी बांधने से पहले मेरा हाथ काट लेने को सोचेगी।मै ये सब कहानी किस्से नही गढ रहा हूं।कभी भी आना रायपुर की मौधापारा मस्ज़िद के ठीक सामने रहता है आप लोगो का सत्तार।उसके घर जाकर आवाज़ लगाना राजेन्द्र ,राजेन्द्र। अगर अम्मा घर पर हुई तो अन्दर से ही कहेगी नही है बेटा राजेन्द्र घर पर्।सभी पाठको से क्षमा चाह्ते हुये कि इस घटिया मामले पर मैने पोस्ट क्यो लिख दी।दरअसल लिखना ज़रूरी था।सलीम भाई,उस मंदिर की तस्वीरे भी मेरे पास है लेकिन मै पोस्ट पर नही लगा रहा हूं,आपको विश्वास न आये तो कमेण्ट कर देना मै आपको मेल कर दूंगा।फ़िर से एक बार मुझको यारो माफ़ करना,मै गुस्से मे हूं।
Saturday, August 29, 2009
भगवान गणेश को गज़नी बना डाला तो भी लोग खामोश है फ़िर भी कुछ लोग हिंदुओं को कट्टरवादी कहने से नही चुकते
यंहा राजधानी रायपुर मे सार्वजनिक गणेशोत्सव मे भगवान श्रीगणेश की जो प्रतिमा स्थापित की गई है वो आमिर खान के गज़नी स्टाईल की है।सिक्स एब्स वाले जीन्स मे गणेश जी का दर्शन करने के बाद भी कोई बहुत ज्यादा बवाल नही हुआ मगर बवाल होने की आशंका मे गणेशोत्सव समिति के लोगो ने गणेश जी को जीन्स के ऊपर ही पितांबर पहना कर मामला निपटाने की कोशिश की है मगर लम्बोदर को सिक्स एब्स वाले पीठ से चिपके पेट मे देखो तो ऐसा लगता है जितना मज़ाक हिंदू देवी-देवताओ का इस देश मे उडाया जाता है उतना और कंही किसी धर्म का नही उडाया जाता होगा।हैरानी की बात तो ये है कि इसके बावज़ूद स्थापित किया जा रहा है कि इस देश मे हिंदू कट्टरवाद हावी हो रहा है।
लोकमान्य तिलक जी ने सपने मे नही सोचा होगा कि आज़ादी के मतवालों को इकट्ठा करने के उद्देश्य
से शुरू किये गये सार्वजनिक गणेशोत्सवो मे गणेश जी की ये दुर्गति होगी।कंही गणेश जी गज़नी बने है तो कंही गिटार बज़ा रहे हैं।इससे पहले उन्हे क्रिकेटर बना कर बल्ला तक़ पकडा दिया गया था।कंही उन्हे साईं बाबा के रूप मे दिखाया जा रहा है तो कंही कुछ बना दिया गया है।कहने का मतलब ये है गणेश जी गणेश न होकर मज़ाक बन गये हैं।इतना सब होने के बाद भी,वो भी खुले आम,सार्वजनिक तौर पर,मगर शांति बनी हुई है।यदी किसी अन्य धर्म का कोई शब्द भी आपत्तिजनक लगता है तो उस पर बवाल मच जाता है।फ़िल्मो के प्रदर्शन तक़ रुकवा दिये जाते है।गाने के बोल तक़ बदले गये हैं।मेरा उद्देश्य उन लोगो को धर्मांध बताना नही है बल्कि ये बताना है कि हिंदू धर्म के लोग कितने सहिष्णु है और इस्लिये उन पर सांप्रदायिकता का या कट्टरवाद का इल्ज़ाम कतई नही लगाया जाना चाहिये।
से शुरू किये गये सार्वजनिक गणेशोत्सवो मे गणेश जी की ये दुर्गति होगी।कंही गणेश जी गज़नी बने है तो कंही गिटार बज़ा रहे हैं।इससे पहले उन्हे क्रिकेटर बना कर बल्ला तक़ पकडा दिया गया था।कंही उन्हे साईं बाबा के रूप मे दिखाया जा रहा है तो कंही कुछ बना दिया गया है।कहने का मतलब ये है गणेश जी गणेश न होकर मज़ाक बन गये हैं।इतना सब होने के बाद भी,वो भी खुले आम,सार्वजनिक तौर पर,मगर शांति बनी हुई है।यदी किसी अन्य धर्म का कोई शब्द भी आपत्तिजनक लगता है तो उस पर बवाल मच जाता है।फ़िल्मो के प्रदर्शन तक़ रुकवा दिये जाते है।गाने के बोल तक़ बदले गये हैं।मेरा उद्देश्य उन लोगो को धर्मांध बताना नही है बल्कि ये बताना है कि हिंदू धर्म के लोग कितने सहिष्णु है और इस्लिये उन पर सांप्रदायिकता का या कट्टरवाद का इल्ज़ाम कतई नही लगाया जाना चाहिये।न केवल गणेशोत्सव मे बल्कि टी वी पर नन्हे-नन्हे कलाकार जिस तरीके से द्रौपदी के चीरहरण के द्रष्य का माखौल उडाते है या जिस तरीके से बजरंगबली के चुटकुले बनाये जाते है वे कंही से धर्म का सम्मान नही करते।मगर ऐसा हो रहा है और शायद चलता रहेगा।इसके बावज़ूद कुछ लोगो का हिंदुओं पर कट्टरवादी होने के आरोप लगाने का सिलसिला एक राजनैतिक षड़यंत्र के अलावा कुछ और नज़र नही आता।
हो सकता है कि भगवान श्री गणेश जी को गज़नी बना कर उनका मज़ाक उडाने वाले लोगो ने उद्देश्यपूर्ण ढंग से ऐसा नही किया हो मगर ऐसा हुआ तो है।इसके बावज़ूद किसी ने उसका व इरोध नही किया और धीरे-धीरे इस बात का प्रसार शहर भर मे होता देख उन्होने गणेश जी की प्रतिमा को पितांबर पहना दिया।क्या सार्वजनिक गणेशोत्सवो मे प्रतिमाओ मे इस तरह की छेडछाड जायज है?क्या ये सिलसिला जारी रहना चाहिये?क्या इस तरह के अपमानजनक कार्य का विरोध करना कट्टरवाद कहलायेगा?क्या इसका विरोध करना सांप्रदायिकता की श्रेणी मे आयेगा ?अगर आता है तो आये।जिसे जो कहना है कहे।इसका विरोध होना ही चाहिये।किसी भी धर्म का मज़ाक उड़ाने की इज़ाजत किसी को नही दी जानी चाहिये।धर्म सभी समान है और उनका सम्मान ही होना चाहिये।
Thursday, August 27, 2009
मीडिया की लक्ष्मण रेखा ?
पिछ्मीले दो दिन भारी गहमा-गहमी के रहे।यंहा एक रिज़नल न्यूज़ चैनल के रिपोर्टरो के खिलाफ़ अश्लील प्रसारण और ब्लैकमेलिंग का जुर्म दर्ज़ कर लिया गया था।उन्होने गेंद प्रेस क्लब के पाले मे डाल दी और फ़िर दो दिनो तक़ चला मीटिंग-सिटिंग का दौर।भारी बहस के दौरान ये पहला मामला था जिसमे छूटते ही धरना-प्रदर्शन का फ़ैसला नही हुआ।बार-बार एक ही बात सामने आई की आखिर मीडिया की आज़ादी का मतलब दूसरों की आज़ादी की धज़्ज़ियां उडाना तो नही है?आखिर मीडिया की भी तो एक लक्ष्मण रेखा तय होनी चाहिये?
विचार-विमर्श के दौरान प्रेस क्लब के सदस्य दो हिस्सों मे बटे नज़र आये। एक सीधे-सीधे पुराने ढर्रे यानी हडताल-धरना-प्रदर्शन-ज्ञापन पर उतर आया।उसका ये तर्क़ था गलत सही की बात बाद मे हो पहले ये देखना चाहिये कि पुलिस इस तरह से पत्रकारो को निपटाती रही तो काम करना ही मुश्किल हो जायेगा।दुसरा हिस्सा इस मामले से प्रेस क्लब को अलग रखने पर तुला हुआ था।उसका तर्क़ था ,पूरा समाज प्रेस क्लब की ओर देख रहा है।इस मामले मे प्रेस क्लब की भूमिका पर सारे लोग नज़र रखे हुये हैं।प्रेस क्लब का कदम ये तय कर देगा कि उसे सिर्फ़ अपने सदस्य से मतलब है समाज के प्रति वो कतई ज़िम्मेदार नही है।
मामला भी दरअसल बड़ा ही संवेदनशील था।एक ईमानदार वरीष्ठ अफ़सर की ठेकेदारो और विभाग के ही भ्रष्ट अफ़सरों की लडाई मे मीडिया हथियार बन गया।अफ़सर और उसकी पत्नि की ब्ल्यू फ़िल्म पता नही कैसे बनी? कैसे वो बंद कमरे से बाहर निकली?कैसे वो मीडिया तक़ पंहुची ये पुलिस के लिये अनुसंधान का विषय है।लेकिन जैसे ही एक चैनल प इसका प्रसारण हुआ उसने कुछ पत्रकारो के खिलाफ़ पुलिस मे रिपोर्ट लिखा दी।ईंजीनियरो के संघ ने भी इस मामले दबाव बनाया और ज़ुर्म दर्ज़ हो गया।
इस मामले के प्रेस क्लब मे पहुंचने पर सदस्य को राहत कैसे मिले ये विषय गौण हो गया और ये विषय सामने आ गया कि किसी की निजि ज़िंदगी मे झांकने का हक़ हमको किसने दिया?हमे किसी की नितांत निज़ी बातो को सार्वजनिक करने का कितना हक़ है?क्या यही पत्रकारिता है?इससे समाज मे मीडिया की साख पर पड रहे प्रभाव पर भी राय सामने आने लगी?पीआरबी एक्ट से लेकर आईपीसी और सीआरपीसी की धाराओं की व्याख्या भी हुई।पुलिस और सरकार की भुमिका को भी अपने-अपने हिसाब से लोगो ने निशाने पर रखा।पहले दिन घण्टो चली बैठक मे नतीजा नही निकलता देख और बहस को दुसरा रूख लेता देख मैने उसे दूसरे दिन संपादको को आमंत्रित कर उनके और कुछ वकीलों की मौज़ूदगी मे विचार करने का फ़ैसला किया।
दुसरे दिन सिर्फ़ तीन संपादक आये।वकील तो मित्रता के नाते काम-धाम छोड़ के आ गयें।बहस दूसरे दिन भी बार-बार उसी मुद्दे पर उलझ जाती।बैठक मे व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा से लेकर तमाम वर्किंग हैज़ार्ड्स सामने आये,लेकिन कुछ सदस्य बार-बार नैतिकता की बात सामने लाते रहे।बैठक मे मुझे बार-बार कहना पडा सारी बाते लम्बी बहस का विषय हो सकती है और इस पर जो हो सकेगा वो किया जायेगा मगर बैठक सदस्य को राह्त देने के लिये बुलाई गई है सो इस विषय से भटके नही।
बैठक को फ़िर बेनतीज़ा बहस मे उलझते देख आखिर मुझे ही बीच का रास्ता निकालना पड़ा।मैने कहा ठीक है पुलिस ने गलत किया लेकिन हम लोग भी जो कर रहे हैं क्या वो ठीक है?इस पर भी विचार होना चाहिये?सेल्फ़ रेग्यूलेशन की जब बात आती है तो फ़िर ये खुद ही तय करना चाहिये क्या सही है?क्या गलत?और फ़िर समाज सुधार का ठेका भी हमको अपने आप नही ले लेना चाहिये?दो हिस्सो मे जब इस मामले को बांट ही दिया गया है तो फ़ैसला भी मै दो हिस्सों मे कर देता हूं।पहला इस मामले से मैं प्रेस क्लब को अलग कर रहा हुं। आप क्या दिखा रहे है ये आपने तय किया है तो उसके फ़ायदे के साथ-साथ नुकसान के भी भागीदार आप ही हैं।ज़ुर्म दर्ज़ होने का तो उस मामले मे पुलिस प्रशासन से लेकर मंत्री-संत्री तक़ सारे साथी मिलकर दबाव बनायेंगे की जांच सही तथ्यो पर हो और उसे इस साजिश से बचाने के लिये जो भी संभव हो वो मदद की जाये।रहा सवाल किसी के बेडरूम मे झांकने तक़ की मीडिया की आज़ादी पर बहस का तो मै उस विषय पर एक खुली बहस करवा देता हूं,जो बंद कमरे मे ना होकर सड़क पर एक पंडाल लगा कर होगी और उसमे कथित समाज-सुधारक ही नही आम आदमी भी शामिल हो सकेगा क्योंकि ये सवाल हमारा नही आम आदमी का है?
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Sunday, August 9, 2009
चलिये एक पहेली मै भी पूछ लेता हूं!बताओ देश के किस ज़िले मे एक भी गैस एजेंसी नही है और जंहा एक सिलेण्डर 550 रूपये मे मिलता है?
है कोई जो बता सके।ये सवाल हवा-हवाई नही बल्कि हक़ीक़त है।आज भी लोगों को दूसरे ज़िले से गैस सिलेण्डर मंगवाना पडता है।कलेक्टर का इस मामले मासूम सा जवाब है कि ज़ल्द ही कोई उपाय ढूंढ लेंगे। क्या कहा पहेली कठीन है?हिंत दे देता हूं।ये विचित्र किंतु सत्य गरीब लोगों की अमीर धरती का ही है।छत्तीसगढ का एक ज़िला ऐसा भी है जंहा एक भी गैस एजेंसी नही हैं।मुझे भी आज ही पता चला इस कडुवी सच्चाई का।क्या तरक़्क़ी का दावा करेंगे।ज़िला मुख्यालय का ये हाल है तो तहसिलो का आलम क्या होगा।भुक्तभोगियों के अलावा और शायद ही किसी को पता होगा,ऐसा मेरा अनुमान है। हो सकता है मैं गलत साबित हो जाऊ क्योंकी आजकल छत्तीसगढ सुर्खिया काफ़ी बटोर रहा है।चलिये जाने दिजिये मै ही बता देता हूं।वो ज़िला है बस्तर संभाग का नक्सल प्रभावित ज़िला बीजापुर्।ये हाल है । मगर मेरी हिम्मत देखिये मै फ़िर भी कहने से नही चूकूंगा्।
न धनिया न धान,
चुल्हे मे गया जनकल्यांण,
रोज़ मर रहे हैं जवान,
पलायन कर रहा किसान,
नेता हो रहे धनवान,
नशे मे द्युत नौजवान,
फ़िर भी मेरा छत्तीसगढ महान्।
Monday, July 27, 2009
राजधानी मे बड़े बड़े विद्वान नक्सलवाद पर बहस कर रहे थे और बारसूर के जंगल मे जवान मौत से लड़ रहे थे!
राजधानी के सबसे बड़े होटल मे आज देश के जाने विद्वान कड़ी सुरक्षा मे नक्सलवाद पर बहस कर रहे थे।यंही बगल की धरमशाला मे कल ही शहीद एस पी विनोद चौबे को तेरहवी पर श्रद्धांजलि दी गई और शाम होते-होते खबर आई कि बारसूर के जंगल मे जवान मौत से लड़ रहे थे।नक्सलियो की बिछाई मौत ने उन्हे अपनी चपेट मे ले लिया था।सारे जवान ज़िंदा रहने के लिये ज़रूरी रोजमर्रा का सामान खरीद कर वापस लौट रहे थे।वो सामान जो अब उनके किसी काम नही आने वाला था।दो दर्जन से ज्यादा जवान नक्स्लियो के फ़ंदे मे फ़ंसे थे।
अब तो लगता है कि बस हम सब लाश गिनने वाले चीरघर के चौकीदार हो गये हैं।संजीत ने फ़ोन कर कहा कि भैया कुछ लिख रहे हो क्या?मैने कहा कि आखिर क्या होगा लिख कर भी?मुझे कल ,अब तो आज कहेंगे जबलपुर जाना है।संजीत ने ज़िद पकड़ ली कुछ तो लिखो।मैने कहा ठीक है,और इतना कहते ही बिजली गिल हो गई।बरसात शुरू थी।बेहद मनहूस और डरावना मौसम हो चला था।मैने फ़िर सजीत से फ़ोन कर कहा कि बिजली नही है।उसने कहा ठीक है जब आये तब लिख देना,मै सुबह पढ लूंगाऽब राके डेढ बजे बिजली आई है और मै लिखने बैठा हूं।सुबह ज़ल्दि उठना है और जबलपुर जाना है।घूमने का मज़ा अब कसैला सा हो गया है।
लिखने को बहुत कुछ है मगर हाथ कांप रहे है।अभी तेरह दिन पहले ही तो नक्सलियों ने तीन दर्ज़न से ज्यादा जवानो का शिकार किया थ।आज फ़िर दो दर्ज़न को निशाना बनाया है।गश्त करने वाले जवानो को पता ही नही चलता कब किस पेड की ओट से निकल कर मौत आ जाती है और उनका काम तमाम कर जाती है।हम रह जाते है स्तब्ध्।शहीद जवानो के लाश के लोथड़े बिनते और शहीदो की संख्या गिनते हुये श्रद्धांजलि सभा मे काले चश्मे के भीतर रोती हुई आंखो का नाटक करते हुये शहीदो की कुर्बानी व्यर्थ नही जाने देने का रटा रटाया डायलाग बोलने वाले मंझे हुये एक्टर की तरह।
क्या इस खून खराबे का कोई अंत है या किसी प्रधानमंत्री जैसे बड़े आदमी की शहादत के बाद आतंकवाद से निपटने का रिकार्ड दोहराने का इंतज़ार हो रहा है।रोज़ कोई मर रहा है किसी न किसी का बेटा खो रहा है तो किसी का सुहाग उजड रहा है,क्या ये सब उन नकसलियो को समझ मे नही आता या फ़िर उनके सीने मे दिल ही नही होता।आखिर किस अन्याय और शोषण की बात करते है वे।वे लोग जो कर रहे है क्या न्याय है?क्या ऐसे ही खून खराबे से बस्तर का विकास हो सकता है?पता नही आज बड़े बड़े नामधारी विद्वानो ने क्या -क्या कहा?मुझे भी जाना था लेकिन सुरक्षित कमरो मे बेसिरपैर की बक़वास सुनकर सिर्फ़ खून ही खौलता है,इस्लिये आज वंहा गया भी नही।सारे विद्वान अपने अपने विचार उंडेल कर शाम को और सुबह के हवाई जहाज से अपने शहर के लिये उड़ गये होंगे। अगले सेमिनार के लिये कुछ नये पाईंटस भी उन्हे यंहा मिल गय होंगे।उन्हे तो शहीद जवानो के घर ले जाना चाहिये।अंतिम यात्रा पर रवाना होने वाले जवानो का करूण क्रंदन उन्हे सुनाना चाहिये तब शायद वे अपना पक्ष ईमानदारी से रख सकें।पता नही सड़ी सड़ी बात पर मानवाधिकार के हनन का हल्ला मचाने वाले कंहा सो रहे हैं।शायद उनकी नींद किसी अल्पसख्यक या कश्मीर या फ़िर किसी पेज थ्री के प्रोटोकाल को मेंटेन कर रही है।बहुत रात हो रही है।लिखने को बहुत कुछ है।फ़िर कभी ,क्योंकि ये सिलसिला तो लगता है थमने वाला है नहीए प्रभू ण शहीदो को अपनी शरण मे लेना।उनके परिवार को इस असीम दुखः को सहने की शक्ति देना!
Thursday, July 23, 2009
छोटी-मोटी नही डाक्टर बनाने वाली परीक्षा यानी पीएमटी का ये हाल है,परिक्षा दी नही और टाप पर चमक रहा नाम है!
यंहा छत्तीसगढ मे जो न हो वो कम है।अभी बोर्ड परीक्षा मे मेरिट मे आने वाली पोरा बाई के फ़र्ज़ीवाड़ा पर लिपापोती हो भी नही पाई थी कि पीएमटी के आरक्षित वर्ग की टाप लिस्ट मे दूसरे स्थान पर घोषित छात्र सुनिल के पिता ने शपथ पत्र देकर कहा कि उसका पुत्र तो परीक्षा मे शामिल ही नही हुआ है।इस सनसनीखेज खुलासे ने पुरी व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है।ये खुलासा करने वाले पिता-पुत्र दोनो घर छोड़ कर कंही जा चुके है और अपने पीछे छोड चुके है अनेको सवाल जो डाक्टर बनाने वाली सरकारी दुकान यानी पीएमटी की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रहे हैं।इससे पहले बोर्ड परीक्षा और स्टेट पीएससी की परिक्षाओं पर भी आरोप लगते रहे हैं।पता नही क्या होगा इस प्रदेश के छात्रों का।ज्यादा लिखने से कोई खास फ़र्क पडने वाला नही है,मै तो बस ये चमत्कार आप लोगो के सामने ला रहा हूं।
Monday, July 13, 2009
चिदंबरम के चश्मे का फ़र्क!लालगढ लाल दिखाई दिया मगर छतीसगढ नही?हां अगर ममता यंहा की होती तो और बात थी?
आये दिन छतीसगढ मे नक्सली हमले कर रहें है और पुलिस के जवान असमय काल के गाल मे समा कर शहीद हो रहे हैं।यही हाल उडीसा का भी है।मगर केन्द्र की यूपीए सरकार को ये सब नज़र नही आ रहा है।कल यंहा एस पी विनोद कुमार चौबे समेत 30 जवान नक्सली हमले मे शहीद हो गये तब चिदंबरम ने अपने चश्मे पर एसी कमरे से बाहर आने पर जमी नमी को थोडा साफ़ किया और उन्हे धुंदला सा कुछ नज़र आया और अब वे सीआरपीएफ़ के 600 जवान भेज रहे हैं हैं?क्या ये जवान विनोद चौबे और उनके साथ शहीद हुये तीस जवानो के परिवार का दुःख कम कर सकेंगे?क्या उनकी खुशियां लौटा सकेंगे?कया यंहा लालगढ की तरह कोई बडा आपरेशन नही चलाया जा सकता?क्या इसके लिये प्रदेश मे कांग्रेस या कांग्रेस के समर्थक दल की सरकार या उसका प्रभाव होना ज़रूरी है?
यूपीये कहिये या कांग्रेस उसकी नीयत पर तो सवाल उठना वाजिब है?जिस तरीके से लालगढ मे नक्सलियों के सफ़ाये के लिये अभियान चलाया गया,वो प्रशंसनीय है मगर जिस तरीके से भाजपा शासित छत्तीसगढ की नक्सली उत्पात के बावज़ूद उपेक्षा की गई वो भी सामने है।आम चुनावो मे ममता के साथ मिली ज़बरदस्त सफ़लता और आने वाले विधानसभा चुनाव मे सरकार बनाने की अपार संभावनाओं ने लालगढ के नक्सली गढ को ढहाने मे पूरी ताक़त झोंक दी और नतीज़ा भी शानदार सफ़लता के रूप मे सामने आया।
केन्द्र सरकार जब लालगढ का नक्सली आतंक खतम कर सकती है तो छ्त्तीसगढ का भी कर सकती है अगर वो चाहे तो?शायद इसिलिये कहा जाता है नक्सलवाद एक राजनैतिक समस्या है?जिसका हल राजनैतिक इच्छा शक्ति के बिना संभव ही नही है।यंहा भी अगर किसी चीज़ की कमी नज़र आती है तो सिर्फ़ राजनैतिक इच्छा शक्ति की।इतने बडे हमले और हादसे के बाद भी यंहा सिर्फ़ 600 जवान भेजना कोई ठोस हल नही है।इसके लिये टुकडो मे नही पूरा ईलाज़ ज़रूरी है।ईलाका बडा और दुर्गम होने के कारण एक साथ नही सही मगर एक के बाद एक लगातार अलग अलग हिस्सों मे अभियान चला कर छतीसगढ को भी लालगढ जैसे ही मुक्त कराया जा सकता है।
सवाल फ़िर उसी बात का आता है कि छत्तीसगढ किस चश्मे से कैसा नज़र आता है?भाजपा के चश्मे से और कांग्रेस या चिदंबरम के चश्मे से जिस दिन एक जैसा नज़र आयेगा उस दिन ही छतीसगढ से नक्स्ल समस्या के अंत की शुरूआत हो जायेगी ?
Sunday, July 12, 2009
अब तो बर्दाश्त से बाहर हो गया नक्सलियों का उत्पात!एस पी समेत 30 को मार डाला!क्या अब भी खामोश रहेंगे मानवाधिकारवादी?
सुबह राजनांदगांव के मदनवाड़ा इलाके मे नक्सलियों ने पुलिस पार्टी पर हमला किया और घिरे हुये जवानो की मदद के लिये एसपी विनोद चौबे खुद वंहा जाने के निकले मगर वे अपने मातहत जवानो की मदद नही कर पाये और शहीद हो गये।ये पहला नक्सल हमला है जिसमे एस पी रैंक का अफ़सर शहीद हुआ है।इसके पहले एडीशनल एस पी भास्कर दीवान शहीद हुये थे।इस हमले मे नक्सलियो ने उस इलाके मे दह्शत के अपने साम्राज्य को और बढा लिया है।एक नही तीस-तीस पुलिस वाले शहीद हुयें है।क्या इस पिछडे इलाके मे आये दिन आकर नक्सलियो की मदद के आरोप मे जेल मे बंद एक डाक्टर की रिहाई के लिये आंदोलन चलाने वाले मानवाधिकारवादी इस मामले मे मुंह खोलेंगे या उनके लिये शहीद का मतलब सिर्फ़ पुलिस के हाथों मरने वाले नक्सली ही हैं।उनकी खामोशी अब तो बर्दाश्त से बाहर हो रही है साथ ही नक्सलियों का उत्पात भी !एस पी समेत 30 को मार डाला गया !क्या अब भी खामोश रहेंगे मानवाधिकारवादी?एस पी विनोद चौबे पिछले ढाई साल से राजनांदगांव ज़िले के एस पी थे।वे काफ़ी समय तक़ रायपुर मे भी पदस्थ रहे हैं।इससे पहले सरगुजा ईलाके मे भी नक्स्लियों के खिलाफ़ उन्होने बढिया काम किया था।राजनांदगांव मे भी उन्हे आम आदमी का पुलिस वाला समझा जाता था।बेहद सरल स्वभाव के इस अफ़सर को बहुत से लोग पुलिस अफ़सर से ज्यादा विचारक और समाज सुधारक मानते हैं।ईमानदारी के मामले मे उनका नाम पुलिस की लिस्ट मे शीर्ष पर था और सच पूछा जाये तो उनमे वर्तमान पुलिसिया गुण तो नाम मात्र को नही थे।उनकी शहादत की खबर की पुष्टी से इलाके मे शोक की लहर दौड़ गई। शहीद विनोद चौबे समेत सारे शहीद जवानो को आखिरी सलाम्।
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Saturday, June 20, 2009
बोये पेड़ काजू के खाने को मिलेंगे आम!है ना चमत्कार?
बचपने से सुनते आ रहे हैं जैसा बोओगे वैसा काटोगे।मगर इस कहावत को झुटला दिया है छत्तीसगढ के महान जादूगरों ने।उन्होने लगभग पौन करोड़ रूपये के काजू के पेड़ लगवाये थे जिनसे हमारी आने वाली पीढी को आम के फ़ल मिलेंगे।मैं मज़ाक नही कर रहा हुं,सच कह रहा हूं।और इस जादू को आम जनता ने नही खुद सरकार की बनाई विधायकों की टीम ने देखा है।है ना चमत्कार।
ये चमत्कार कर दिखाया है छत्तीसगढ के उद्यानिकी विभाग के कलाकारो ने।उन्होने पिछले साल बस्तर मे लाखो रूपये के काजू के पौधे लगवाये थे।एक तो बस्तर उसपर से जंगल विभाग,शिकायत तो होनी ही थी।जांच के लिये विधायको की टीम बना दी गई और जब टीम ने उस ईलाके का दौरा किया तो कुदरत को मात देने वाला चमत्कार उन्हे दिखाई दिया।जंहा काजू के पौधे लगाये गये थे वंहा आम के पौधे मिले।कुछ जगह तो खाली गड्ढो ने कुदरत की तरफ़दारी करते हुये वंहा काजू के पौधे लगे होने का झूठा सबूत देने की कोशिश भी की,मगर विधायकों को न समझते हुये भी सब समझ मे आ गया।
बस्तर घने जंगलो का राजा और वंहा काजू का पेड़ किस लिये लगा रहे थे उद्यानिकी विभाग वाले ये तो वे ही बता पायेंगे।और जंगल विभाग वंहा अगर कुछ भी ना लगाये सिर्फ़ अवैध कटाई ही रोक ले तो भी बस्तर के साल के जंगल दुनिया के सबसे घने और खूबसुरत जंगल साबित होंगे।मगर काम नही करेंगे तो कमिशन कैसे खायेंगे?काम ही भ्रष्टाचार की जननी है।ये तो सरकारी दिग्गज़ो का मूलमंत्र है।सो किसी टकले के चिकनी हो चुकी खोपड़ी के समान मैदान मे पौधारोपण छोड़ घने जंगलो मे काम कर रहे हैं।जंहा न कोई जा सके न कोई देख सके और ना ही पौधे नही उगने पर उसका पता ही चल सके।
ऐसा ही एक चमत्कार हो सकता है आने वाले सालों मे और देखने मे।कोरिया,न न न न,वो परमाणु बम वाला नही भई,हमारे छत्तीसग़ढ का एक आदिवासी बहुल ज़िला है कोरिया।यंहा भी प्रकृति ने धरा पर खुद अपने हाथों से चित्रकारी की है।बेहद मनोरम और कंही से भी बस्तर से कम खूबसुरत नही है ये इलाका।जंगल विभाग ने अब इस ईलाके को चंदन की खूश्बू से महकाने का ठेका ले लिया है। चार लाख से ज्यादा चंदन के पौधे तैयार कर लिए गये हैं और अब कोरिया को चंदन ज़िला बनाने की तैयारी है,जैसे पहले की सरकार ने इसे हर्बल स्टेट बनाने की घोषणा की थी।सफ़ेद मूसली लगाने वाले सैकडो किसान बरबाद हो गये थे।खैर इस छोटे से राज्य मे जो ना हो वो कम है।बीड़ी पत्ते के चक्कर मे सबसे पहले नक्सलियों ने यंहा कदम रखा था और अब चंदन का पेड़ कंही किसी नये वीरप्पन को ना सामने ला दे।वैसे भी हाथियों का यंहा आना शुरू है ही,चंदन के साथ हाथी दांत भी मिल जायेंगे उसको।मगर इस्मे एक डाऊट है।कंही कोरिया मे भी बस्तर जैसा चमत्कार हो गया और काजू की जगह आम वाली स्टाईल मे चंदन की जगह बबूल निकल गये तो…………………।
ये चमत्कार कर दिखाया है छत्तीसगढ के उद्यानिकी विभाग के कलाकारो ने।उन्होने पिछले साल बस्तर मे लाखो रूपये के काजू के पौधे लगवाये थे।एक तो बस्तर उसपर से जंगल विभाग,शिकायत तो होनी ही थी।जांच के लिये विधायको की टीम बना दी गई और जब टीम ने उस ईलाके का दौरा किया तो कुदरत को मात देने वाला चमत्कार उन्हे दिखाई दिया।जंहा काजू के पौधे लगाये गये थे वंहा आम के पौधे मिले।कुछ जगह तो खाली गड्ढो ने कुदरत की तरफ़दारी करते हुये वंहा काजू के पौधे लगे होने का झूठा सबूत देने की कोशिश भी की,मगर विधायकों को न समझते हुये भी सब समझ मे आ गया।
बस्तर घने जंगलो का राजा और वंहा काजू का पेड़ किस लिये लगा रहे थे उद्यानिकी विभाग वाले ये तो वे ही बता पायेंगे।और जंगल विभाग वंहा अगर कुछ भी ना लगाये सिर्फ़ अवैध कटाई ही रोक ले तो भी बस्तर के साल के जंगल दुनिया के सबसे घने और खूबसुरत जंगल साबित होंगे।मगर काम नही करेंगे तो कमिशन कैसे खायेंगे?काम ही भ्रष्टाचार की जननी है।ये तो सरकारी दिग्गज़ो का मूलमंत्र है।सो किसी टकले के चिकनी हो चुकी खोपड़ी के समान मैदान मे पौधारोपण छोड़ घने जंगलो मे काम कर रहे हैं।जंहा न कोई जा सके न कोई देख सके और ना ही पौधे नही उगने पर उसका पता ही चल सके।
ऐसा ही एक चमत्कार हो सकता है आने वाले सालों मे और देखने मे।कोरिया,न न न न,वो परमाणु बम वाला नही भई,हमारे छत्तीसग़ढ का एक आदिवासी बहुल ज़िला है कोरिया।यंहा भी प्रकृति ने धरा पर खुद अपने हाथों से चित्रकारी की है।बेहद मनोरम और कंही से भी बस्तर से कम खूबसुरत नही है ये इलाका।जंगल विभाग ने अब इस ईलाके को चंदन की खूश्बू से महकाने का ठेका ले लिया है। चार लाख से ज्यादा चंदन के पौधे तैयार कर लिए गये हैं और अब कोरिया को चंदन ज़िला बनाने की तैयारी है,जैसे पहले की सरकार ने इसे हर्बल स्टेट बनाने की घोषणा की थी।सफ़ेद मूसली लगाने वाले सैकडो किसान बरबाद हो गये थे।खैर इस छोटे से राज्य मे जो ना हो वो कम है।बीड़ी पत्ते के चक्कर मे सबसे पहले नक्सलियों ने यंहा कदम रखा था और अब चंदन का पेड़ कंही किसी नये वीरप्पन को ना सामने ला दे।वैसे भी हाथियों का यंहा आना शुरू है ही,चंदन के साथ हाथी दांत भी मिल जायेंगे उसको।मगर इस्मे एक डाऊट है।कंही कोरिया मे भी बस्तर जैसा चमत्कार हो गया और काजू की जगह आम वाली स्टाईल मे चंदन की जगह बबूल निकल गये तो…………………।
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