विचार-विमर्श के दौरान प्रेस क्लब के सदस्य दो हिस्सों मे बटे नज़र आये। एक सीधे-सीधे पुराने ढर्रे यानी हडताल-धरना-प्रदर्शन-ज्ञापन पर उतर आया।उसका ये तर्क़ था गलत सही की बात बाद मे हो पहले ये देखना चाहिये कि पुलिस इस तरह से पत्रकारो को निपटाती रही तो काम करना ही मुश्किल हो जायेगा।दुसरा हिस्सा इस मामले से प्रेस क्लब को अलग रखने पर तुला हुआ था।उसका तर्क़ था ,पूरा समाज प्रेस क्लब की ओर देख रहा है।इस मामले मे प्रेस क्लब की भूमिका पर सारे लोग नज़र रखे हुये हैं।प्रेस क्लब का कदम ये तय कर देगा कि उसे सिर्फ़ अपने सदस्य से मतलब है समाज के प्रति वो कतई ज़िम्मेदार नही है।
मामला भी दरअसल बड़ा ही संवेदनशील था।एक ईमानदार वरीष्ठ अफ़सर की ठेकेदारो और विभाग के ही भ्रष्ट अफ़सरों की लडाई मे मीडिया हथियार बन गया।अफ़सर और उसकी पत्नि की ब्ल्यू फ़िल्म पता नही कैसे बनी? कैसे वो बंद कमरे से बाहर निकली?कैसे वो मीडिया तक़ पंहुची ये पुलिस के लिये अनुसंधान का विषय है।लेकिन जैसे ही एक चैनल प इसका प्रसारण हुआ उसने कुछ पत्रकारो के खिलाफ़ पुलिस मे रिपोर्ट लिखा दी।ईंजीनियरो के संघ ने भी इस मामले दबाव बनाया और ज़ुर्म दर्ज़ हो गया।
इस मामले के प्रेस क्लब मे पहुंचने पर सदस्य को राहत कैसे मिले ये विषय गौण हो गया और ये विषय सामने आ गया कि किसी की निजि ज़िंदगी मे झांकने का हक़ हमको किसने दिया?हमे किसी की नितांत निज़ी बातो को सार्वजनिक करने का कितना हक़ है?क्या यही पत्रकारिता है?इससे समाज मे मीडिया की साख पर पड रहे प्रभाव पर भी राय सामने आने लगी?पीआरबी एक्ट से लेकर आईपीसी और सीआरपीसी की धाराओं की व्याख्या भी हुई।पुलिस और सरकार की भुमिका को भी अपने-अपने हिसाब से लोगो ने निशाने पर रखा।पहले दिन घण्टो चली बैठक मे नतीजा नही निकलता देख और बहस को दुसरा रूख लेता देख मैने उसे दूसरे दिन संपादको को आमंत्रित कर उनके और कुछ वकीलों की मौज़ूदगी मे विचार करने का फ़ैसला किया।
दुसरे दिन सिर्फ़ तीन संपादक आये।वकील तो मित्रता के नाते काम-धाम छोड़ के आ गयें।बहस दूसरे दिन भी बार-बार उसी मुद्दे पर उलझ जाती।बैठक मे व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा से लेकर तमाम वर्किंग हैज़ार्ड्स सामने आये,लेकिन कुछ सदस्य बार-बार नैतिकता की बात सामने लाते रहे।बैठक मे मुझे बार-बार कहना पडा सारी बाते लम्बी बहस का विषय हो सकती है और इस पर जो हो सकेगा वो किया जायेगा मगर बैठक सदस्य को राह्त देने के लिये बुलाई गई है सो इस विषय से भटके नही।
बैठक को फ़िर बेनतीज़ा बहस मे उलझते देख आखिर मुझे ही बीच का रास्ता निकालना पड़ा।मैने कहा ठीक है पुलिस ने गलत किया लेकिन हम लोग भी जो कर रहे हैं क्या वो ठीक है?इस पर भी विचार होना चाहिये?सेल्फ़ रेग्यूलेशन की जब बात आती है तो फ़िर ये खुद ही तय करना चाहिये क्या सही है?क्या गलत?और फ़िर समाज सुधार का ठेका भी हमको अपने आप नही ले लेना चाहिये?दो हिस्सो मे जब इस मामले को बांट ही दिया गया है तो फ़ैसला भी मै दो हिस्सों मे कर देता हूं।पहला इस मामले से मैं प्रेस क्लब को अलग कर रहा हुं। आप क्या दिखा रहे है ये आपने तय किया है तो उसके फ़ायदे के साथ-साथ नुकसान के भी भागीदार आप ही हैं।ज़ुर्म दर्ज़ होने का तो उस मामले मे पुलिस प्रशासन से लेकर मंत्री-संत्री तक़ सारे साथी मिलकर दबाव बनायेंगे की जांच सही तथ्यो पर हो और उसे इस साजिश से बचाने के लिये जो भी संभव हो वो मदद की जाये।रहा सवाल किसी के बेडरूम मे झांकने तक़ की मीडिया की आज़ादी पर बहस का तो मै उस विषय पर एक खुली बहस करवा देता हूं,जो बंद कमरे मे ना होकर सड़क पर एक पंडाल लगा कर होगी और उसमे कथित समाज-सुधारक ही नही आम आदमी भी शामिल हो सकेगा क्योंकि ये सवाल हमारा नही आम आदमी का है?