कल दोपहर को मिथिलेश दुबे का एसएमएस आया और उसमे उन्होने एक सवाल किया था सबसे ज्यादा दर्द किससे होता है।10 आप्शन थे और साथ ही मे ज्वाब ज़रूर देने का आग्रह भी।मिथिलेश को अक्सर पढता रहा हूं और उसके बारे मे मेरी राय अच्छे इंसान की है।उसके सवाल ने मुझे बेचैन कर दिया क्योंकि हाल ही मे सिर्फ़ मोहतरमा लिख देने से उन्हे बेवजह विवाद मे घसीट दिया गया और उस दर्द से बेचैन होकर उन्होने ब्लागिंग को ही नमस्ते करने की घोषणा कर दी थी।मुझे लगा कि कंही उसीसे जुड़ा सवाल तो नही है,मैं उस सवाल का जवाब एसएमएस से नही फ़ोन करके देना चाहता था मगर उसी समय उस सवाल का जवाब मेरे सामने आ खड़ा हुआ।मेरे लिये बात करना बहुत कठीन हो रहा था,सो मैने मिथिलेश को फ़ोन करने के बजाय एसएमएस किया और जवाब दिया "गरीबी"।
कल दोपहर मैं प्रेस क्लब मे बैठा था और उसी समय वरिष्ठ फ़ोटोग्राफ़र शारदा दत्त त्रिपाठी,महासचिव गोकुल सोनी,नरेन्द्र बंगाले दीपक पाण्डे आ गये और चर्चा शुरू हुई यंहा हर साल लगने वाले सरकारी कुम्भ मे आये नागा बाबाओं की।तभी एक मरियल, दुबली-पतली लड़की अंदर आई और डरते-डरते सामने रखी कुर्सी पर बैठ गई।डर के साथ-साथ दर्द उसके चेहरे पर फ़ैला हुआ था।उस समय मैं सरकारी कुम्भ के खिलाफ़ गुस्से से ज़हर उगल रहा था।मैने उस लड़की से पूछा किससे मिलना है?तो उसने आफ़िस असिस्टेंट पवन साहू का नाम लिया।मैने ईशारे से उसे बैठने के लिये कहा और हम लोग फ़िर से चर्चा मे जुट गये।
तब तक़ पवन लगभग दौडते हुये आया और उस लड़की को अलग ले गया और कुछ फ़ोटोग्राफ़रों से मिलवा दिया।हम लोग सरकारी रूपये का नकली कुम्भ के नाम पर दुरूपयोग का रोना रो ही रहे थे कि पवन उस लड़की को लेकर आया और बोला भैया इसकी समस्या है आप मदद कर दोगे तो भला हो जायेगा बेचारी का।मैने घूर कर पवन को देखा तो उसेए समझ आ गया कि एक तो मैं लड़कियों से बात करने से कतराता हूं और दूसरे जब किसी मुद्दे पर चर्चा होती है तो व्यवधान पसंद नही करता।पवन तत्काल खिसक लिया लेकिन वो मासूम लड़की वंही खड़ी रही।उसे भी समझ मे आ गया था कि मामला गड़बड़ है।उसके मुंह से आवाज़ चाह कर भी नही निकल पा रही थी।वो थूक निगलती खड़ी थी।आखिर मैने उससे पूछा क्या बात है?
पता नही उसे मेरी एकदम कर्कश और बेरूखी से लटपट आवाज़ मे कौन सी सहानुभूति महसूस हुई,वो रेडियो कि तरह एकदम से शुरू हो गई।और उसने जब बोलना शुरू किया तो खतम होने तक़ न मुझमे और न शारदादत्त,गोकुल या नरेन्द्र और जो भी वंहा बैठा था,उनमे से किसी की हिम्मत हुई टोका-टोकी करने की।उसकी बात पूरी होते-होते मिथिलेश का एसएमएस आ गया।उसकी बात पूरी सुनने के बाद मिथिलेश को पढा तो लगा कि जवाब पहले आ गया और सवाल उसके बाद आ रहा है।
लड़की की बातों से मेरे सोचने-समझने की ताक़त दम तोड़ने लगी थी और बची-खुची कसर मिथिलेश ने निकाल दी।मिथिलेश के सवाल सबसे ज्यादा दर्द किससे होता है के जवाब के लिये दस आप्शन इस प्रकार थे।1 ख्वाब,2 लव,3 जुदाई,4 गरीबी,5 बेबसी,6 धोखा,7 झूठ,8ज़ख्म,9 मौत,10 बेवफ़ाई।मैं उन आप्शनो पर विचार करने के पहले ही चौथे आप्शन गरीबी से आगे बढ नही पाया और फ़ुरसत मे बात करने के बहाने के साथ उसे जवाब दे दिया गरीबी।बाकी आप्शन मैंने बाद मे पढे।क्योंकि उस समय मेरे सामने खड़ी लड़की की कहानी यही जवाब बता रही थी।
उस लड़की के पिता को तीन-चार दिन पहले ही अज्ञात वाहन ने कुचल कर मौत की नींद सुला दिया था।दुर्घटना के कुछ देर बाद हम लोग भी उस ओर से गुज़रे थे।भीड़ लगी थी वंहा और पुलिस भी आ गई थी।सड़क पर एक शख्स आराम से लेटा हुआ था।शांत निश्चिंत।शायद उसे पता चल गया था कि अब वो दुनिया की भागमभाग से मुक्त हो चुका है।वो उस अभिशाप से भी मुक्त हो चुका था जिसे गरीबी,बेबसी या इस जैसी कोई चीज़ समझा जाता है।उसका शरीर सही सलामत था बस सिर नही था।वो किसी कमीने,(माफ़ करेंगे इसे अगर कोई भद्रजन गाली समझें तो)तेजरफ़्तार वाहन चालक ने सड़क पर चलने के लिये नरियल समझ कर फ़ोड़ दिया था।वो पता नही किधर से आया और किधर निकल गया।हम जैसे पत्थर दिल भी उस दृश्य को देख नही सके और तत्काल वंहा से हट लिये।
वो दृश्य मेरी आंखों के सामने फ़िर से घूम गया।वो अस्पताल मे भर्ती अपने बड़े बेटे को दवा पहुंचाने के लिये घर से निकला था।उसका बेटा अस्पताल मे उसका इंतज़ार ही करता रह गया।उसकी दोनो किड़नी खराब है।उसे बचाने के लिये उसका पिता किसी प्राईवेट कम्पनी मे कमरतोड़ मेहनत करने के बाद रात को उसे दवा देने के लिये निकला था।
मेरी आवाज़ पता नही भीगने लगी।थोड़ी देर पहले जो हालत उस लड़की की थी वैसी अब मेरी थी।मुझे थूक निगलना पड़ रहा था।मुझे आवाज़ निकालने के लिये पूरी ताक़त लगानी पड़ी और बड़ी मुश्किल से मेरे मुंह से पहला शब्द निकला "बेटा"।पता नही वो तल्खी कंहा गुम हो गई थी।वो गरज़ मिमियाने मे बदल चुकी थी वो भी एक डर और भय से दुबकी एक भीगी बिल्ली के सामने।मैने हिम्मत करके उससे पूछा कि बेटा आप पढते है क्या?वो बोली हां सर मैं एम काम प्रिवीयस कर रही हूं।मुझे लगा था कि वो स्कूल मे होगी।उसने बोलना जारी रखा था।उसने बताया कि पापा प्राईवेट कम्पनी मे नौकरी करते थे और भैया की दोनो किड़नी खराब है।उसके इलाज के लिये पैसे पुरे नही होते थे तो मै घर पर सुबह टिफ़िन बना कर देने जाती हूं और उसके बाद कालेज और लौट कर जितना समय मिलता है उतने मे घर पर ही ब्यूटी पार्लर का काम कर लेती हूं।
शायद ज़िम्मेदारी के बोझ ने उसकी बाढ के रोक दिया था।उसके चेहरे पर डर ज़रूर था मगर उसके पीछे छीपा आत्मविश्वास बदली भरा डिन ढलने के बाद शाम को छंटते बादलों के पीछे से झांकती सूर्य की किरणों की तरह फ़ैलने लगा था।उसे पता चल गया था अब भैया की दवा पापा नही लायेंगे और ये ज़िम्मेदारी भी उसे ही उठानी पड़ेगी।वो निकल पड़ी थी ज़िम्मेदारियों का पहाड़ सिर पर ढोते हुये।प्रेस क्लब आने की वजह थी अगर किसी फ़ोटोग्राफ़र को उस अज्ञात वाहन का नम्बर पता हो तो वो उसे बता दे ताकि वो उन पर हर्ज़ाना ठोक सके।
उसने कहा सर कुछ किजिये ना।मुझे कुछ समझ मे नही आ रहा था।इतना बेबस और लाचार मैंने खुद को कभी नही पाया था।मै इस निकम्मी व्यव्स्था मे कंहा से ढूंढता उस कमीने को जो पता नही कंहा किसी और कुचलने के लिये फ़िर से सड़कों का सीना रौंद रहा होगा।मुझे कुछ सूझ नही रहा था।मैं उस बेबस लड़की की भीगी आंखों से आंख मिलाने की हिम्मत नही कर पा रहा था और शायद उससे भी ज्यादा बेबस हो गया था।मैने उससे कहा बेटा मेरा नम्बर नोट कर लो और मुझ पर भरोसा करना मुझसे जो बन पड़ेगा ज़रूर करूंगा।पता नही उसे विश्वास हुआ या नही मगर उसने नम्बर नोट किया और धीरे से कहा सर देखिये ना सरकार भी कुछ नही करती।मैने कहा बेटा आप सरकार के पास गई हो?वो बोली नही।तो मैने कहा सरकार से भी बात कर लेंगे।आप जाओ।मुझसे जो बनेगा मैं करूंगा।
आप जाओ!मैने ज़ोर देकर कहा था।मैं उसकी उपस्थिति से घबरा रहा था।शायद वो समझ गई थी उसे जाना चाहिये। हो सकता है इन्हे उससे भी ज्यादा ज़रूरी काम हो।दिन भर उस लड़की की पलकों का बांध तोड़ कर बहने को बेताब आंसूओं से भरी आंखे मुझे बेचैन करती रही।रह रह कर उसकी आवाज़ मेरे कानों मे पिघला हुआ लोहा उंडेलती रही।शाम को मैने मिथिलेश को फ़ोन लगाया और उससे काफ़ी देर तक़ बात की।उसके सवाल ने भी मेरी बेचैनी बढाने मे कोई कसर नही छोड़ी थी।उसने तत्काल उस लड़की की मदद करने की बात कही जो साबित करने के लिये काफ़ी है कि वो एक अच्छा इंसान है।पता नही मैने उसके सवाल का सही जवाब दिया या नही लेकिन मुझे असली सवाल तो उस लड़की की मदद करके हल करना है।पता नही कंहा तक़ सफ़ल हो पाऊंगा?
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Tuesday, February 9, 2010
Monday, January 18, 2010
बिके हुये लोग मीडिया को बिकाऊ कह रहे हैं,हद हो गई बेशर्मी की और बर्दाश्त की भी!अब किसी ने कुछ कहा तो मुंह-तोड़ जवाब दिया जायेगा!
पिछ्ले कुछ समय से देखने मे आ रहा था कि नक्सलियों के प्रायोजित कार्यक्रम के तहत दिल्ली और अन्य महानगरों से तथाकथित समाजसेवी,मानवाधिकारवादी और पत्रकार यंहा आकर मीडिया को गैरज़िम्मेदार और बिकाऊ ठहराने पर तुले हुये हैं।वे यंहा आकर मीडिया को भी दो फ़ाड़ करने की कोशिश मे भी लगे हुये नज़र आ रहे हैं।नक्सलियों के प्रमुख हथियार प्रचार युद्ध मे भोंपू की तरह बज़ने वाले ये लोग यंहा आने-जाने की टिकट से लेकर रूकने_ठहरने की व्यवस्था तक़ उन्ही लोगों से करवाकर आते हैं तो बताईये बिकाऊ वे लोग हुये या जो लोग जान-माल और नौकरी का खतरा उठा कर बस्तर के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों मे पत्रकारिता कर रहे हैं,वे लोग बिकाऊ हैं।
बर्दाश्त की भी हद होती है।जो आता है हवाई जहाज से राजधानी मे उतरकर सीधे बस्तर चला जाता है और कमाल देखिये एक दिन मे ही उसे बस्तर नर्क जैसा नज़र आता है और इसके लिये वे ज़िम्मेदारी भी तय कर देते हैं,सरकार की।सरकार से हमको लेना देना नही है लेकिन इन लोगों के मुंह से एक लफ़्ज़ भी नक्सलियों के खिलाफ़ नही निकलता।लाखों सवाल करने पर भी उनका जवाब होता है अगर सरकार ठीक काम करे तो सब ठीक हो जायेगा।बस्तर को निर्दोष आदिवासिओं और पुलिस वालों के खून से लाल कर देने वाले नक्सलियों के मारे जाने पर तो इन्हे मानवाधिकार नज़र आता है मगर वो मानवो का अधिकार सिर्फ़ उनके मानवो के लिये ही होता है।बस्तर के निर्दोष आदिवासियों और पुलिस वालों के लिये शायद वो अधिकार नही है।
खैर ये उनका अपना विचार हो सकता है,उनकी नीति हो सकती है मगर इसका मतलब ये तो नही है जो उनके साथ है वे सही है और जो उनके साथ नही है वे सब गैरज़िम्मेदार और बिकाऊ हैं।आपको अपने धर्म का पालन करने का तो अधिकार है लेकिन इसका मतलब ये तो नही की आप दूसरे के धर्म को गालियां बकें।नक्सलियों और उनके समर्थक संस्थाओं,कथित समाजसेवी और मानवाधिकार संगठनो के साथ यंहा आकर उनके हिसाब से दौरा कर और उनके नज़रिये से बस्तर की हालत देख कर उनके हिसाब से उसका प्रचार करने वाले भाड़े के भोंपू जब यंहा चिल्लाते है कि सब बिकाऊ हैं तो उनकी बुद्धी पर तरस आता है।जो यंहा न पैदा हुआ,न पला बढा,न यंहा रहा वो बताता है कि सच क्या है?वो बताता है जिसे मोटी रकम न मिले तो कभी बस्तर की सूरत तक़ न देखे?वो बताता है जो महज़ कुछ घण्टे ही पूरा बस्तर घूम लेता है?वो बताता है जो लौट कर फ़िर कभी नही आने वाला होता है बिना फ़ीस लिये?वो बताता है जिसे छत्तीसगढ या बस्तर से ज्यादा अपनी फ़ीस और अपने रिश्तेदारों के विदेशी मदद से चलने वाले एनजीओ को यंहा काम करने के बड़े-बड़े कांट्रेक्ट मिलने की चिंता होती है।
पूरे छत्तीसगढ के बारे मे दुष्प्रचार का एक सुनियोजित षड़यंत्र रचा जा रहा है और तरक्की की असीमित संभावनाओं से भरे बस्तर और छत्तीसगढ को अशांत क्षेत्र घोषित कर यंहा आ रहे उद्योगों के राह मे अड़ंगे डाले जा रहें हैं।विकास के नाम पर खूनी संघर्ष कर रहे लोग यदी विकास के इतने ही हिमायती हैं तो वे स्कूल,अस्पताल,पंचायत भवन और सड़को को क्यों नुकसान पंहुचाते हैं?क्यों वे विकास के रास्ते खोलने वाली सड़को को बनने से रोकते हैं?क्यों उन्हे अब दिल्ली के कथित मीडिया की ज़रूरत पड़ रही है?कल तक़ तो यहीं का मीडिया उन्हे बहुत पसंद था?उनके लोग भी तो हैं यंहा के मीडिया मे?वे भी तो उनके पक्ष मे खुलकर प्रचार अभियान चलाते हैं?उन्हे तो यंहा के लोग कुछ नही कहते। हम जानते हैं कि सबको अपनी विचारधारा तय करने का हक़ है।पसंद अपनी हो सकती है लेकिन इसका मतलब ये तो नही जो नापसंद करे उसे बिकाऊ और गैरज़िम्मेदार ठहराया जाये।
बहुत दिनो से ब्लाग जगत मे भी इन लोगों ने इस तरह का दुष्प्रचार युद्ध छेड़ रखा है।एक साथी ने तो यंहा तक़ लिख मारा कि यंहा के पत्रकारों को खबर नही लिखने के पैसे मिलते हैं।ये वही सज्जन है जो कभी मोटी रकम लेकर यंहा के एक अख़बार के लिये लिखा करते थे और जब वे बेनक़ाब हुये तो उन्हे कोई यंहा पूछ्ता तक़ नही है।झूठ तो ऐसा-ऐसा लिख रहे हैं कि उन्हे माफ़ करने को कतई दिल नही करता।अरे अगर बिके हुये हो तो उनका गाना गाओ,समझ मे आता है लेकिन यंहा के किसान भूख से मर रहे जैसा न बर्दाश्त होने वाला झूठा और बेसूरा राग तो मत छेड़ो।
अब जबकी पानी सर से गुज़रने लगा तो सारे साथियों ने ऐसे लोगों का विरोध करने और उन्हे सबक सिखाने की मांग की।काफ़ी विचार विमर्श के बाद मैने कल रविवार को प्रेस क्लब मे बैठक बुलाई।इस वजह से हम ब्लागरों की मीट भी मुझे कैंसिल करनी पड़ी।बैठक मे शुरुआती उपस्थिति कुछ कम नज़र आई लेकिन लोग आते चले गये और सबने एक स्वर में ऐसे लोगों को बेनक़ाब करने के साथ ही कड़ा सबक सिखाने की बात कही।सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया कि ऐसे लोगों को और उनसे जुड़े संगठनो और संस्थाओं को प्रेस क्लब अपनी बात रखने के लिये अब अपना मंच नही देगा।ऐसे लोगों के खिलाफ़ कानूनी कार्रवाई की जायेगी और ऐसे लोगों के खिलाफ़ जमकर विरोध प्रदर्श्न किया जायेगा,उस स्तर तक़ कि वो किसी को भी गैरज़िम्मेदार कहने से पहले सौ बार सोचें।
बर्दाश्त की भी हद होती है।जो आता है हवाई जहाज से राजधानी मे उतरकर सीधे बस्तर चला जाता है और कमाल देखिये एक दिन मे ही उसे बस्तर नर्क जैसा नज़र आता है और इसके लिये वे ज़िम्मेदारी भी तय कर देते हैं,सरकार की।सरकार से हमको लेना देना नही है लेकिन इन लोगों के मुंह से एक लफ़्ज़ भी नक्सलियों के खिलाफ़ नही निकलता।लाखों सवाल करने पर भी उनका जवाब होता है अगर सरकार ठीक काम करे तो सब ठीक हो जायेगा।बस्तर को निर्दोष आदिवासिओं और पुलिस वालों के खून से लाल कर देने वाले नक्सलियों के मारे जाने पर तो इन्हे मानवाधिकार नज़र आता है मगर वो मानवो का अधिकार सिर्फ़ उनके मानवो के लिये ही होता है।बस्तर के निर्दोष आदिवासियों और पुलिस वालों के लिये शायद वो अधिकार नही है।
खैर ये उनका अपना विचार हो सकता है,उनकी नीति हो सकती है मगर इसका मतलब ये तो नही है जो उनके साथ है वे सही है और जो उनके साथ नही है वे सब गैरज़िम्मेदार और बिकाऊ हैं।आपको अपने धर्म का पालन करने का तो अधिकार है लेकिन इसका मतलब ये तो नही की आप दूसरे के धर्म को गालियां बकें।नक्सलियों और उनके समर्थक संस्थाओं,कथित समाजसेवी और मानवाधिकार संगठनो के साथ यंहा आकर उनके हिसाब से दौरा कर और उनके नज़रिये से बस्तर की हालत देख कर उनके हिसाब से उसका प्रचार करने वाले भाड़े के भोंपू जब यंहा चिल्लाते है कि सब बिकाऊ हैं तो उनकी बुद्धी पर तरस आता है।जो यंहा न पैदा हुआ,न पला बढा,न यंहा रहा वो बताता है कि सच क्या है?वो बताता है जिसे मोटी रकम न मिले तो कभी बस्तर की सूरत तक़ न देखे?वो बताता है जो महज़ कुछ घण्टे ही पूरा बस्तर घूम लेता है?वो बताता है जो लौट कर फ़िर कभी नही आने वाला होता है बिना फ़ीस लिये?वो बताता है जिसे छत्तीसगढ या बस्तर से ज्यादा अपनी फ़ीस और अपने रिश्तेदारों के विदेशी मदद से चलने वाले एनजीओ को यंहा काम करने के बड़े-बड़े कांट्रेक्ट मिलने की चिंता होती है।
पूरे छत्तीसगढ के बारे मे दुष्प्रचार का एक सुनियोजित षड़यंत्र रचा जा रहा है और तरक्की की असीमित संभावनाओं से भरे बस्तर और छत्तीसगढ को अशांत क्षेत्र घोषित कर यंहा आ रहे उद्योगों के राह मे अड़ंगे डाले जा रहें हैं।विकास के नाम पर खूनी संघर्ष कर रहे लोग यदी विकास के इतने ही हिमायती हैं तो वे स्कूल,अस्पताल,पंचायत भवन और सड़को को क्यों नुकसान पंहुचाते हैं?क्यों वे विकास के रास्ते खोलने वाली सड़को को बनने से रोकते हैं?क्यों उन्हे अब दिल्ली के कथित मीडिया की ज़रूरत पड़ रही है?कल तक़ तो यहीं का मीडिया उन्हे बहुत पसंद था?उनके लोग भी तो हैं यंहा के मीडिया मे?वे भी तो उनके पक्ष मे खुलकर प्रचार अभियान चलाते हैं?उन्हे तो यंहा के लोग कुछ नही कहते। हम जानते हैं कि सबको अपनी विचारधारा तय करने का हक़ है।पसंद अपनी हो सकती है लेकिन इसका मतलब ये तो नही जो नापसंद करे उसे बिकाऊ और गैरज़िम्मेदार ठहराया जाये।
बहुत दिनो से ब्लाग जगत मे भी इन लोगों ने इस तरह का दुष्प्रचार युद्ध छेड़ रखा है।एक साथी ने तो यंहा तक़ लिख मारा कि यंहा के पत्रकारों को खबर नही लिखने के पैसे मिलते हैं।ये वही सज्जन है जो कभी मोटी रकम लेकर यंहा के एक अख़बार के लिये लिखा करते थे और जब वे बेनक़ाब हुये तो उन्हे कोई यंहा पूछ्ता तक़ नही है।झूठ तो ऐसा-ऐसा लिख रहे हैं कि उन्हे माफ़ करने को कतई दिल नही करता।अरे अगर बिके हुये हो तो उनका गाना गाओ,समझ मे आता है लेकिन यंहा के किसान भूख से मर रहे जैसा न बर्दाश्त होने वाला झूठा और बेसूरा राग तो मत छेड़ो।
अब जबकी पानी सर से गुज़रने लगा तो सारे साथियों ने ऐसे लोगों का विरोध करने और उन्हे सबक सिखाने की मांग की।काफ़ी विचार विमर्श के बाद मैने कल रविवार को प्रेस क्लब मे बैठक बुलाई।इस वजह से हम ब्लागरों की मीट भी मुझे कैंसिल करनी पड़ी।बैठक मे शुरुआती उपस्थिति कुछ कम नज़र आई लेकिन लोग आते चले गये और सबने एक स्वर में ऐसे लोगों को बेनक़ाब करने के साथ ही कड़ा सबक सिखाने की बात कही।सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया कि ऐसे लोगों को और उनसे जुड़े संगठनो और संस्थाओं को प्रेस क्लब अपनी बात रखने के लिये अब अपना मंच नही देगा।ऐसे लोगों के खिलाफ़ कानूनी कार्रवाई की जायेगी और ऐसे लोगों के खिलाफ़ जमकर विरोध प्रदर्श्न किया जायेगा,उस स्तर तक़ कि वो किसी को भी गैरज़िम्मेदार कहने से पहले सौ बार सोचें।
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Thursday, August 27, 2009
मीडिया की लक्ष्मण रेखा ?
पिछ्मीले दो दिन भारी गहमा-गहमी के रहे।यंहा एक रिज़नल न्यूज़ चैनल के रिपोर्टरो के खिलाफ़ अश्लील प्रसारण और ब्लैकमेलिंग का जुर्म दर्ज़ कर लिया गया था।उन्होने गेंद प्रेस क्लब के पाले मे डाल दी और फ़िर दो दिनो तक़ चला मीटिंग-सिटिंग का दौर।भारी बहस के दौरान ये पहला मामला था जिसमे छूटते ही धरना-प्रदर्शन का फ़ैसला नही हुआ।बार-बार एक ही बात सामने आई की आखिर मीडिया की आज़ादी का मतलब दूसरों की आज़ादी की धज़्ज़ियां उडाना तो नही है?आखिर मीडिया की भी तो एक लक्ष्मण रेखा तय होनी चाहिये?
विचार-विमर्श के दौरान प्रेस क्लब के सदस्य दो हिस्सों मे बटे नज़र आये। एक सीधे-सीधे पुराने ढर्रे यानी हडताल-धरना-प्रदर्शन-ज्ञापन पर उतर आया।उसका ये तर्क़ था गलत सही की बात बाद मे हो पहले ये देखना चाहिये कि पुलिस इस तरह से पत्रकारो को निपटाती रही तो काम करना ही मुश्किल हो जायेगा।दुसरा हिस्सा इस मामले से प्रेस क्लब को अलग रखने पर तुला हुआ था।उसका तर्क़ था ,पूरा समाज प्रेस क्लब की ओर देख रहा है।इस मामले मे प्रेस क्लब की भूमिका पर सारे लोग नज़र रखे हुये हैं।प्रेस क्लब का कदम ये तय कर देगा कि उसे सिर्फ़ अपने सदस्य से मतलब है समाज के प्रति वो कतई ज़िम्मेदार नही है।
मामला भी दरअसल बड़ा ही संवेदनशील था।एक ईमानदार वरीष्ठ अफ़सर की ठेकेदारो और विभाग के ही भ्रष्ट अफ़सरों की लडाई मे मीडिया हथियार बन गया।अफ़सर और उसकी पत्नि की ब्ल्यू फ़िल्म पता नही कैसे बनी? कैसे वो बंद कमरे से बाहर निकली?कैसे वो मीडिया तक़ पंहुची ये पुलिस के लिये अनुसंधान का विषय है।लेकिन जैसे ही एक चैनल प इसका प्रसारण हुआ उसने कुछ पत्रकारो के खिलाफ़ पुलिस मे रिपोर्ट लिखा दी।ईंजीनियरो के संघ ने भी इस मामले दबाव बनाया और ज़ुर्म दर्ज़ हो गया।
इस मामले के प्रेस क्लब मे पहुंचने पर सदस्य को राहत कैसे मिले ये विषय गौण हो गया और ये विषय सामने आ गया कि किसी की निजि ज़िंदगी मे झांकने का हक़ हमको किसने दिया?हमे किसी की नितांत निज़ी बातो को सार्वजनिक करने का कितना हक़ है?क्या यही पत्रकारिता है?इससे समाज मे मीडिया की साख पर पड रहे प्रभाव पर भी राय सामने आने लगी?पीआरबी एक्ट से लेकर आईपीसी और सीआरपीसी की धाराओं की व्याख्या भी हुई।पुलिस और सरकार की भुमिका को भी अपने-अपने हिसाब से लोगो ने निशाने पर रखा।पहले दिन घण्टो चली बैठक मे नतीजा नही निकलता देख और बहस को दुसरा रूख लेता देख मैने उसे दूसरे दिन संपादको को आमंत्रित कर उनके और कुछ वकीलों की मौज़ूदगी मे विचार करने का फ़ैसला किया।
दुसरे दिन सिर्फ़ तीन संपादक आये।वकील तो मित्रता के नाते काम-धाम छोड़ के आ गयें।बहस दूसरे दिन भी बार-बार उसी मुद्दे पर उलझ जाती।बैठक मे व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा से लेकर तमाम वर्किंग हैज़ार्ड्स सामने आये,लेकिन कुछ सदस्य बार-बार नैतिकता की बात सामने लाते रहे।बैठक मे मुझे बार-बार कहना पडा सारी बाते लम्बी बहस का विषय हो सकती है और इस पर जो हो सकेगा वो किया जायेगा मगर बैठक सदस्य को राह्त देने के लिये बुलाई गई है सो इस विषय से भटके नही।
बैठक को फ़िर बेनतीज़ा बहस मे उलझते देख आखिर मुझे ही बीच का रास्ता निकालना पड़ा।मैने कहा ठीक है पुलिस ने गलत किया लेकिन हम लोग भी जो कर रहे हैं क्या वो ठीक है?इस पर भी विचार होना चाहिये?सेल्फ़ रेग्यूलेशन की जब बात आती है तो फ़िर ये खुद ही तय करना चाहिये क्या सही है?क्या गलत?और फ़िर समाज सुधार का ठेका भी हमको अपने आप नही ले लेना चाहिये?दो हिस्सो मे जब इस मामले को बांट ही दिया गया है तो फ़ैसला भी मै दो हिस्सों मे कर देता हूं।पहला इस मामले से मैं प्रेस क्लब को अलग कर रहा हुं। आप क्या दिखा रहे है ये आपने तय किया है तो उसके फ़ायदे के साथ-साथ नुकसान के भी भागीदार आप ही हैं।ज़ुर्म दर्ज़ होने का तो उस मामले मे पुलिस प्रशासन से लेकर मंत्री-संत्री तक़ सारे साथी मिलकर दबाव बनायेंगे की जांच सही तथ्यो पर हो और उसे इस साजिश से बचाने के लिये जो भी संभव हो वो मदद की जाये।रहा सवाल किसी के बेडरूम मे झांकने तक़ की मीडिया की आज़ादी पर बहस का तो मै उस विषय पर एक खुली बहस करवा देता हूं,जो बंद कमरे मे ना होकर सड़क पर एक पंडाल लगा कर होगी और उसमे कथित समाज-सुधारक ही नही आम आदमी भी शामिल हो सकेगा क्योंकि ये सवाल हमारा नही आम आदमी का है?
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Friday, May 29, 2009
भगवान न करे बीबी के हाथ का "वैसा" गरम पराठा खाने की नौबत आये!
पराठे तरह-तरह के होते हैं।पराठा शब्द की व्याख्या शब्दो के सफ़र के महान यात्री अजित वड़नेरकर ने भी की है।उन्होने जो बताया वो तो अलग था मै जो बताने जा रहा हूं वो एक्सक्लूसीव है।पराठे की इस किस्म का स्वाद, मेरा दावा है बहुतो ने चखा होगा मगर कोई बतायेगा नही। हां,हो सकता है ये वेरायटी कुछ लोगो के लिय नई हो,तो अब पता लगने के बाद वे कह सकते है कि भगवान न करे कभी बीबी के हाथ के वैसे गरम पराठे खाने की नौबत आये।
आज ज़रा मै जल्दी क्लब पहुंच गया था।क्लब मे काफ़ी भीड़ नज़र आई।भारी भीड़ देखकर मेरे मुंह से सालो पुराना हिट डायलाग निकला कि क्यों गिफ़्ट वाली कान्फ़्रेंस है क्या?कुछ सच्ची और कुछ कच्ची यानी खिसियानी हंसी के साथ सब ने कहा नही रोज़ जितने ही है।आज आप कुछ जल्दी आ गये ।अन्दर जाकर देखा तो गब्बर शुक्ला,शिशुपाल त्रिपाठी और प्रभुदीन गुप्ता की तिकड़ी कोने मे बैठी किसी गुंताड़े मे मगन थी।मै सीधा उनके पास पहुंचा और बिना फ़ार्मेलिटी के उनसे पूछा कि क्यों बे कमीनो किसकी वाट लगाने का इंतज़ाम कर रहे हो।तीनो एक साथ चिल्लाये आपको तो बस हरा-हरा सूझता है।यंहा सब परेशान है और आप्…………। अबे तुम लोग परेशान हो?साले तुम से तो सारा शहर परेशान है?तीनो फ़िर एक सुर मे बोले फ़िर वही बात।ये नही कि अपने छोटे भाईयो से पूछे कि क्या हाल है?सब ठीक तो है ना?तीनो मुझ पर चढने लगे थे।मैने सीधे अपने ट्रंप कार्ड़ का इस्तेमाल किया सालो सुबह-सुबह पीकर आ गये क्या?
अब क्या था तीनो दाना-पानी लेकर मुझ पर चढ दौड़े।तीनो की एकता देख कर मै थोड़ा घबराया और तत्काल उनमे फ़ूट डालने की स्कीम सोचने लगा।इधर तीनो का बड़बड़ाना जारी था।जब देखो पीकर आया है क्या बे?एक तो पिलाना-विलाना है नही और ऊपर से पिलाने वालो को गाली बकना,उनको बिदकाना और भगा देना।बस यही काम रह गया है।पूछना भी ज़रूरी नही समझते की क्या बात है भाई परेशान दिख रहा है?शिशुपाल का ये डायलाग तो मुझे अजीत अगरकर की शाटपीच बाल लगी और इस मौके को गवाये बिना ही मैने उसे हुक कर दिया।
तीनो मे फ़ूट ड़ालने का गोल्डन चांस हाथ लगा था और मैने उसे खराब होने नही दिया।मैने तत्काल सुर ढीले किये और कहा भाई शिशुपाल तू तो थोड़ा परेशान नज़र आ रहा है मगर गब्बर तो कंही से परेशान नज़र नही आ रहा है। चेहरा तो ऐसा चमक रहा जैसे बहु ने डेंटिंग-पेंटिंग करके भेजा है।वैसे इस मामले मे वो तुम दोनो से अच्छी तक़दीर वाला तो है।बस अब क्या था प्रभूदीन फ़ट पड़ा।उसका मुंह खुलते देख गब्बर बोला भी अबे ये लड़ाई करवा रहे हैं।मै बोला साले मै लडाई करवा रहा हूं, है ना?और तू उस दिन क्या बोल रहा था प्रभूदीन के बारे मे? बताऊं?
अब तो प्रभूदीन का पारा मौसम के पारे से भी ऊपर पहुंच गया।वो बोला ये क्या बतायेगा इसकी हालत जानते है हम लोग्।मै बोला लेकिन चेहरा तो चमक रहा है साले का। हूंह कहकर बुरा सा मुंह बनाया प्रभूदीन ने।मैने फ़िर से उसके नरम होते तेवर को हवा दी और कहा कि ये तो बता रहा था कि तेरे को आजकल ओव्हर टाईम भी करना पड़ रहा है।कहां?मैने कहा घर में?क्या?मै बोला ये बता रहा था काम वाली बाई तेरी हरक़तो से तंग आकर काम पर नही आ रही है तो भाभी ने उसकी ड्यूटी तेरे को दे दी है।
बस इतना सुनना था कि प्रभूदीन का ब्रेक फ़ेल हो गया।गब्बर के साथ-साथ शिशुपाल भी चिल्लाया मरवायेगा साले। आ गया ना इनके चक्कर में।पर तब-तक़ तो प्रभूदीन की गाड़ी स्पीड पकड़ चुकी थी।वो बोला आप कह रहे थे ना इसका चेहरा चमकते रह्ता है और तुम लोग फ़टीचर नज़र आते हो।तो सुनो इसके चेहरे के चमकने का राज़्।ये रोज़ सुबह गरम पराठा खाकर आता है।मैने शोले फ़िलिम का डायलाग याद करते हुये लोहा गरम देखकर चोट कर दी।मै बोला ये तो तक़दीर की बात है बे बीबी गरम-गरम पराठा खिलाये…॥मेरी बात को आधे मे ही काटते हुये वो बोला पूरा तो सुन लो गुरूजी।भगवान न करे वैसा पराठा खाने की नौबत आये।मै बोला पागल हो गया है क्या बे?एक तो बीबी गर्मागर्म पराठे खिलाये और्…वो बोला गुरूजी पूरी बात तो सुन लो।
अब प्रभूदीन गब्बर से बोला क्यों बेटा!बहुत पोक(लीक कर)रहा है आज कल।गब्बर और शिशुपाल एक साथ बोले अपन आपस मे निपट लेंगे इनके चक्कर मे मत आ।वो बोला भैया ये आज भी पराठा खाकर आया है।मै बोला क्या बड़बड़ा रहा है बे पराठा-पराठा।वही तो बता रहा हूं।ये रोज़ सुबह पराठा ही खाता है।रात को पीकर घर जाता है तो भौजी भड़क जाती और रात को खाना नही देती।सुबह रात की बची हुई सब्जी,दाल, चावल और रोटी सब को मिलाकर पराठा बनाती है और इसको देती है।बिना कुछ बोले मुंह फ़ुलाये।उसका चेहरा देखो तो समझ मे आ जाता हे जैसे कह रही हो ले खा,मर।
अब बताओ खाया है ऐसा पराठा।अब गब्बर भड़क ग़या साले सुनना है नही बस बक़-बक़ करना। अब ले,ये सारे शहर को घूम-घूम कर बतायेंगे गब्बर पराठा खाता है,गब्बर पराठा खाता है।वो बोला, तू क्यो बोला मै ओव्हरटाईम करता हूं। अबे मै नही बोला।तो शिशुपाल बोला होगा।शिशुपाल बोला भाई मै वैसे भी बहुत परेशान हूं मुझे तो बख्श दो।वो बोला अच्छा बेटा, अपना नम्बर आया तो मुझे बख्श दो।तेरे बारे मे बताऊं।मैने कहा बताओ प्रभूदीन इनसे डरने की ज़रूरत नही है।वो बोला डर और इनसे।बताऊं बे शिशुपाल्।ओरिजिनल शिशुपाल भी सौवी गलती करने के बाद इतना नर्वस नही हुआ होगा जितना ये कल्युगी नज़र आया।प्रभूदीन ने वो क्या खाता है क्या बताया, फ़िर कभी बताऊंगा।मगर आपको गब्बर के पराठे कैसे लगे बताईगा ज़रूर्।
आज ज़रा मै जल्दी क्लब पहुंच गया था।क्लब मे काफ़ी भीड़ नज़र आई।भारी भीड़ देखकर मेरे मुंह से सालो पुराना हिट डायलाग निकला कि क्यों गिफ़्ट वाली कान्फ़्रेंस है क्या?कुछ सच्ची और कुछ कच्ची यानी खिसियानी हंसी के साथ सब ने कहा नही रोज़ जितने ही है।आज आप कुछ जल्दी आ गये ।अन्दर जाकर देखा तो गब्बर शुक्ला,शिशुपाल त्रिपाठी और प्रभुदीन गुप्ता की तिकड़ी कोने मे बैठी किसी गुंताड़े मे मगन थी।मै सीधा उनके पास पहुंचा और बिना फ़ार्मेलिटी के उनसे पूछा कि क्यों बे कमीनो किसकी वाट लगाने का इंतज़ाम कर रहे हो।तीनो एक साथ चिल्लाये आपको तो बस हरा-हरा सूझता है।यंहा सब परेशान है और आप्…………। अबे तुम लोग परेशान हो?साले तुम से तो सारा शहर परेशान है?तीनो फ़िर एक सुर मे बोले फ़िर वही बात।ये नही कि अपने छोटे भाईयो से पूछे कि क्या हाल है?सब ठीक तो है ना?तीनो मुझ पर चढने लगे थे।मैने सीधे अपने ट्रंप कार्ड़ का इस्तेमाल किया सालो सुबह-सुबह पीकर आ गये क्या?
अब क्या था तीनो दाना-पानी लेकर मुझ पर चढ दौड़े।तीनो की एकता देख कर मै थोड़ा घबराया और तत्काल उनमे फ़ूट डालने की स्कीम सोचने लगा।इधर तीनो का बड़बड़ाना जारी था।जब देखो पीकर आया है क्या बे?एक तो पिलाना-विलाना है नही और ऊपर से पिलाने वालो को गाली बकना,उनको बिदकाना और भगा देना।बस यही काम रह गया है।पूछना भी ज़रूरी नही समझते की क्या बात है भाई परेशान दिख रहा है?शिशुपाल का ये डायलाग तो मुझे अजीत अगरकर की शाटपीच बाल लगी और इस मौके को गवाये बिना ही मैने उसे हुक कर दिया।
तीनो मे फ़ूट ड़ालने का गोल्डन चांस हाथ लगा था और मैने उसे खराब होने नही दिया।मैने तत्काल सुर ढीले किये और कहा भाई शिशुपाल तू तो थोड़ा परेशान नज़र आ रहा है मगर गब्बर तो कंही से परेशान नज़र नही आ रहा है। चेहरा तो ऐसा चमक रहा जैसे बहु ने डेंटिंग-पेंटिंग करके भेजा है।वैसे इस मामले मे वो तुम दोनो से अच्छी तक़दीर वाला तो है।बस अब क्या था प्रभूदीन फ़ट पड़ा।उसका मुंह खुलते देख गब्बर बोला भी अबे ये लड़ाई करवा रहे हैं।मै बोला साले मै लडाई करवा रहा हूं, है ना?और तू उस दिन क्या बोल रहा था प्रभूदीन के बारे मे? बताऊं?
अब तो प्रभूदीन का पारा मौसम के पारे से भी ऊपर पहुंच गया।वो बोला ये क्या बतायेगा इसकी हालत जानते है हम लोग्।मै बोला लेकिन चेहरा तो चमक रहा है साले का। हूंह कहकर बुरा सा मुंह बनाया प्रभूदीन ने।मैने फ़िर से उसके नरम होते तेवर को हवा दी और कहा कि ये तो बता रहा था कि तेरे को आजकल ओव्हर टाईम भी करना पड़ रहा है।कहां?मैने कहा घर में?क्या?मै बोला ये बता रहा था काम वाली बाई तेरी हरक़तो से तंग आकर काम पर नही आ रही है तो भाभी ने उसकी ड्यूटी तेरे को दे दी है।
बस इतना सुनना था कि प्रभूदीन का ब्रेक फ़ेल हो गया।गब्बर के साथ-साथ शिशुपाल भी चिल्लाया मरवायेगा साले। आ गया ना इनके चक्कर में।पर तब-तक़ तो प्रभूदीन की गाड़ी स्पीड पकड़ चुकी थी।वो बोला आप कह रहे थे ना इसका चेहरा चमकते रह्ता है और तुम लोग फ़टीचर नज़र आते हो।तो सुनो इसके चेहरे के चमकने का राज़्।ये रोज़ सुबह गरम पराठा खाकर आता है।मैने शोले फ़िलिम का डायलाग याद करते हुये लोहा गरम देखकर चोट कर दी।मै बोला ये तो तक़दीर की बात है बे बीबी गरम-गरम पराठा खिलाये…॥मेरी बात को आधे मे ही काटते हुये वो बोला पूरा तो सुन लो गुरूजी।भगवान न करे वैसा पराठा खाने की नौबत आये।मै बोला पागल हो गया है क्या बे?एक तो बीबी गर्मागर्म पराठे खिलाये और्…वो बोला गुरूजी पूरी बात तो सुन लो।
अब प्रभूदीन गब्बर से बोला क्यों बेटा!बहुत पोक(लीक कर)रहा है आज कल।गब्बर और शिशुपाल एक साथ बोले अपन आपस मे निपट लेंगे इनके चक्कर मे मत आ।वो बोला भैया ये आज भी पराठा खाकर आया है।मै बोला क्या बड़बड़ा रहा है बे पराठा-पराठा।वही तो बता रहा हूं।ये रोज़ सुबह पराठा ही खाता है।रात को पीकर घर जाता है तो भौजी भड़क जाती और रात को खाना नही देती।सुबह रात की बची हुई सब्जी,दाल, चावल और रोटी सब को मिलाकर पराठा बनाती है और इसको देती है।बिना कुछ बोले मुंह फ़ुलाये।उसका चेहरा देखो तो समझ मे आ जाता हे जैसे कह रही हो ले खा,मर।
अब बताओ खाया है ऐसा पराठा।अब गब्बर भड़क ग़या साले सुनना है नही बस बक़-बक़ करना। अब ले,ये सारे शहर को घूम-घूम कर बतायेंगे गब्बर पराठा खाता है,गब्बर पराठा खाता है।वो बोला, तू क्यो बोला मै ओव्हरटाईम करता हूं। अबे मै नही बोला।तो शिशुपाल बोला होगा।शिशुपाल बोला भाई मै वैसे भी बहुत परेशान हूं मुझे तो बख्श दो।वो बोला अच्छा बेटा, अपना नम्बर आया तो मुझे बख्श दो।तेरे बारे मे बताऊं।मैने कहा बताओ प्रभूदीन इनसे डरने की ज़रूरत नही है।वो बोला डर और इनसे।बताऊं बे शिशुपाल्।ओरिजिनल शिशुपाल भी सौवी गलती करने के बाद इतना नर्वस नही हुआ होगा जितना ये कल्युगी नज़र आया।प्रभूदीन ने वो क्या खाता है क्या बताया, फ़िर कभी बताऊंगा।मगर आपको गब्बर के पराठे कैसे लगे बताईगा ज़रूर्।
Thursday, January 15, 2009
मुझको यारो माफ़ करना, मैं थोड़ा बिज़ी हूं।
कुछ दिनो से ब्लोग की दुनिया से रिश्ता लगभग टूटा सा रहा।कुछ चाही-अनचाही परिस्थितीयां मुझे अपने इस परिवार से दूर रखने मे सफ़ल हो गयी थी। आज ही मैने ब्लोग खोला तो मुझे विवेक सिंह का कमेण्ट्स पढने को मिला कि कहाम गायब हो गये हो।मैने तय कर लिया था कि आज ब्लोग पर वापस लौटना है और वापस लौट भी रहा हूं। चाहे मेरी गल्ती हो या ना हो मुझे अब ये कहने मैं कोई परहेज़ नही है कि मुझको यारो माफ़ करना, मैं थोड़ा बिज़ी हूं।आखिर ये मेरे परिवार का मामला है और यहां माफ़ी मांगने मे कोई प्रोब्लम नही है।
दरअसल मै रविवार को ही पोस्ट लिखने वाला था,पर किसी कारणवश लिख नही पाया। आशिष कुमार अंशू से बात हुई और मैने उन्हे यंहा आई ए एस अफ़सर से एक मीडिया कर्मी की मारपीट का मामला बताया। आशिष ने सहज भाव से मुझसे सारी बाते लिखने के लिये कहा। मै लिखना भी चाहता था मगर व्यस्तता के कारण लिख नही पाया।
आज यानी बुधवार की शाम फ़िर प्रेस क्लब मे सारे लोग मिले। कामरेड रूचिर गर्ग ने मुझसे केबल नेटवर्क संशोधन बिल के विरोध के लिये कहा और मैने तत्काल लोगो को बुलवा लिया। हालांकि लखनऊ से एक्स्प्रेस समूह के अम्बरीश जी ने मुझसे मंगलवार को ही इस बारे मे बात कर ली थी।खैर प्रेस क्लब मे तत्काल लोग आ गये। आज-तक़ से सुनील नामदेव और महेंद्र नामदेव ,पी टी आई से राजेंद्र मोहंती,यु एन आई से अशोक साहू, सहारा से रुचिर गर्ग, ई टी वी से शैलेश पाण्डे,अवधेश मलिक, साधना से संजय शेखर समेत प्रेस क्लब के वरिष्ठ साथी शंकर पाण्डे।कौशल तिवारी और सारे पत्रकार साथी आये ।एन डी टी वी के रितेश ने भोपाल प्रवास से ही अपनी सहमती दी और एक्स्प्रेस के जोसेफ़ जान ने भी। पी टी आई छोड चुके प्रकाश होता और देवेंद्र कर के अलावा दर्जनो साथियो ने एकजुटता का परिचय दिया और सम्वेत स्वर मे उस बिल का विरोध किया।
प्रेस क्लब ने गुरुवार को काली पट्टी लगाकर करने का फ़ैसला लेने के साथ महामहिम राज्यपाल से मिल कर उस बिल के खिलाफ़ ग्यापन सौंपने का निर्णय भी लिया।इस दौरान कही भी प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के बीच की खिंचतान कही भी नज़र नही आई। ये पत्रकारो की एकता के लिये बहुत ही अच्छी बात सामने आई।खैर बाद मे इस बिल को रोक दिया गया मगर इस बिल की सुगबुगाहट ने सारे पत्रकारो को एक कर दिया। और हां इसने मुझे ब्लोग की दुनिया मे जल्द वापस ला दिया।
दरअसल मै रविवार को ही पोस्ट लिखने वाला था,पर किसी कारणवश लिख नही पाया। आशिष कुमार अंशू से बात हुई और मैने उन्हे यंहा आई ए एस अफ़सर से एक मीडिया कर्मी की मारपीट का मामला बताया। आशिष ने सहज भाव से मुझसे सारी बाते लिखने के लिये कहा। मै लिखना भी चाहता था मगर व्यस्तता के कारण लिख नही पाया।
आज यानी बुधवार की शाम फ़िर प्रेस क्लब मे सारे लोग मिले। कामरेड रूचिर गर्ग ने मुझसे केबल नेटवर्क संशोधन बिल के विरोध के लिये कहा और मैने तत्काल लोगो को बुलवा लिया। हालांकि लखनऊ से एक्स्प्रेस समूह के अम्बरीश जी ने मुझसे मंगलवार को ही इस बारे मे बात कर ली थी।खैर प्रेस क्लब मे तत्काल लोग आ गये। आज-तक़ से सुनील नामदेव और महेंद्र नामदेव ,पी टी आई से राजेंद्र मोहंती,यु एन आई से अशोक साहू, सहारा से रुचिर गर्ग, ई टी वी से शैलेश पाण्डे,अवधेश मलिक, साधना से संजय शेखर समेत प्रेस क्लब के वरिष्ठ साथी शंकर पाण्डे।कौशल तिवारी और सारे पत्रकार साथी आये ।एन डी टी वी के रितेश ने भोपाल प्रवास से ही अपनी सहमती दी और एक्स्प्रेस के जोसेफ़ जान ने भी। पी टी आई छोड चुके प्रकाश होता और देवेंद्र कर के अलावा दर्जनो साथियो ने एकजुटता का परिचय दिया और सम्वेत स्वर मे उस बिल का विरोध किया।
प्रेस क्लब ने गुरुवार को काली पट्टी लगाकर करने का फ़ैसला लेने के साथ महामहिम राज्यपाल से मिल कर उस बिल के खिलाफ़ ग्यापन सौंपने का निर्णय भी लिया।इस दौरान कही भी प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के बीच की खिंचतान कही भी नज़र नही आई। ये पत्रकारो की एकता के लिये बहुत ही अच्छी बात सामने आई।खैर बाद मे इस बिल को रोक दिया गया मगर इस बिल की सुगबुगाहट ने सारे पत्रकारो को एक कर दिया। और हां इसने मुझे ब्लोग की दुनिया मे जल्द वापस ला दिया।
Sunday, December 21, 2008
बहुत झूठ बोल चुका,अब सिर्फ़ सच बोलूंगा,फ़िर मत कहना सब सच-सच क्यो बक़ दिये।
कल प्रेस क्लब मे शहर मे आये शायरो का सम्मान किया गया।शायरो ने अपने कलाम पेश किये और अधिकांश समय मै झुके हुए सर को हिला कर शायरो को दाद देने की एक्टिंग करता रहा।कुछ दुष्ट टाईप के लोग इस बात को ताड़ गये और कार्यक्रम खतम होने के बाद इस बात को लेकर मेरी खटिया खड़ी करने लग गये।मै भी कंझा कर बोला ,बहुत झूठ बोल चुका,अब सिर्फ़ सच बोलूंगा,फ़िर मत कहना सब सच-सच क्यो बक़ दिये।
मुंह लगे साथियो मे मुझे सबसे प्रिय है शारदा दत्त त्रिपाठी जिसे मैं शिशुपाल कह कर पुकारता हूं।दुसरा है प्रभूदीन उर्फ़ राजेश गुप्ता जो मेरा दुर्योधन है।तिसरा है बबलू उर्फ़ संजय शुक्ला जिसे मै बुड्ढा गब्बर कहता हूं।इन तीनो दुष्टों ने कार्यक्रम खतम होते ही मुझे घेरा और सीधा सवाल ज़ड़ दिया कि मै मंच पर बैठ कर नीचे क्यो कर रहा था।मैने उन्हे टालने की भरपूर कोशिश की।मगर तीनो मुह लगे थे इसलिये टस से मस नही हुये। हार कर मुझे उनके समक्ष इस बात को स्वीकार करना पड़ा की मुझे उर्दू की समझ बहुत नही है कुछ शेर मेरे पल्ले नही पड़ रहे थे सो मै सर झुका कर हिला कर ये साबित करने की कोशिश करता था कि मै सब समझ रहा हूं।
इतना सुनना था कि शिशुपाल,दुर्योधन और बुड़ढा गब्बर मुझ पर चढ बैठे।सबने कहा कि दुनिया को उपदेश देते और खुद क्या करते हो?मैने तीनो को समझाने की कोशिश की मगर तीनो को ऐसा लगा पहली बार राक्षस फ़सा है। हिसाब-किताब पूरा कर लो।बहुत समझाने पर जब वे नही माने तो मैने उनसे कहा कि ये यही कहना चाहते हो ना कि आदमी को झूठ नही बोलना चाहिये,सच बोलना चाहिये।तीनो फ़ौरन बोले हां,और आपको भी उन शायरो को बता देना चाहिये था कि मुझे उर्दू न ही आती,थोड़ा सरल वाला शेर पढो।
तब-तक़ मेरा पारा चढ चुका था।मै उनसे बोला सच बोलना चाहिये ना?तीनो एक सुर मे बोले हां।मैने कहा कि फ़िर मै शोक-सभा मे भी सब-कछ सच-सच कहूंगा।मै भी तंग आ गया हूं झूठ कहते-कह्ते।साले तुम लोग निपटोगे तब बताऊंगा कि कहां-कहां घुसते थे तुम लोग। और हां सालो पुराना वो सड़ियल्ल रटा-रटाया डायलाग अगर कोई मारेगा तो मै चिल्ला-चिल्ला कर कहूंगा कोई अपूर्णीय क्षती नही हुई है समाज की। ये लोग…………इससे पहले की मै आगे कुछ बोल पाता,तीनो बोल पड़े अरे क्या गुरुदेव,इत्ती सी बात पे बुरा मान गये। अरे हम लोग तो मज़ाक कर रहे थे ।क्या फ़र्क पड़ता है अगर उर्दू नही आती तो? मै बोला वो सच-सच…………………एक बार फ़िर तीनो ने मेरी बात काटी और कहा शोक-सभा मे आपको झूठ बोल्ना पड़ता है ना,बस वैसे ही चलने दो।क्या फ़र्क़ पड़ता है सच बोलने से।मै बोला तुम लोग ही तो……………फ़िर मेरी बात काट कर तीनो बोले अरे गुरुदेव आप भी कहांकी बात लेकर बैठ गये। हम लोग तो मज़ाक कर रहे थे।मै भी उनसे बोला लेकिन मै मज़ाक नही कर रहा हूं,अब मै किसी भी शोक-सभा मे झूठ नही बोलूंगा चाहे मुझ पर पत्थर क्यो ना चल जाये।
मुंह लगे साथियो मे मुझे सबसे प्रिय है शारदा दत्त त्रिपाठी जिसे मैं शिशुपाल कह कर पुकारता हूं।दुसरा है प्रभूदीन उर्फ़ राजेश गुप्ता जो मेरा दुर्योधन है।तिसरा है बबलू उर्फ़ संजय शुक्ला जिसे मै बुड्ढा गब्बर कहता हूं।इन तीनो दुष्टों ने कार्यक्रम खतम होते ही मुझे घेरा और सीधा सवाल ज़ड़ दिया कि मै मंच पर बैठ कर नीचे क्यो कर रहा था।मैने उन्हे टालने की भरपूर कोशिश की।मगर तीनो मुह लगे थे इसलिये टस से मस नही हुये। हार कर मुझे उनके समक्ष इस बात को स्वीकार करना पड़ा की मुझे उर्दू की समझ बहुत नही है कुछ शेर मेरे पल्ले नही पड़ रहे थे सो मै सर झुका कर हिला कर ये साबित करने की कोशिश करता था कि मै सब समझ रहा हूं।
इतना सुनना था कि शिशुपाल,दुर्योधन और बुड़ढा गब्बर मुझ पर चढ बैठे।सबने कहा कि दुनिया को उपदेश देते और खुद क्या करते हो?मैने तीनो को समझाने की कोशिश की मगर तीनो को ऐसा लगा पहली बार राक्षस फ़सा है। हिसाब-किताब पूरा कर लो।बहुत समझाने पर जब वे नही माने तो मैने उनसे कहा कि ये यही कहना चाहते हो ना कि आदमी को झूठ नही बोलना चाहिये,सच बोलना चाहिये।तीनो फ़ौरन बोले हां,और आपको भी उन शायरो को बता देना चाहिये था कि मुझे उर्दू न ही आती,थोड़ा सरल वाला शेर पढो।
तब-तक़ मेरा पारा चढ चुका था।मै उनसे बोला सच बोलना चाहिये ना?तीनो एक सुर मे बोले हां।मैने कहा कि फ़िर मै शोक-सभा मे भी सब-कछ सच-सच कहूंगा।मै भी तंग आ गया हूं झूठ कहते-कह्ते।साले तुम लोग निपटोगे तब बताऊंगा कि कहां-कहां घुसते थे तुम लोग। और हां सालो पुराना वो सड़ियल्ल रटा-रटाया डायलाग अगर कोई मारेगा तो मै चिल्ला-चिल्ला कर कहूंगा कोई अपूर्णीय क्षती नही हुई है समाज की। ये लोग…………इससे पहले की मै आगे कुछ बोल पाता,तीनो बोल पड़े अरे क्या गुरुदेव,इत्ती सी बात पे बुरा मान गये। अरे हम लोग तो मज़ाक कर रहे थे ।क्या फ़र्क पड़ता है अगर उर्दू नही आती तो? मै बोला वो सच-सच…………………एक बार फ़िर तीनो ने मेरी बात काटी और कहा शोक-सभा मे आपको झूठ बोल्ना पड़ता है ना,बस वैसे ही चलने दो।क्या फ़र्क़ पड़ता है सच बोलने से।मै बोला तुम लोग ही तो……………फ़िर मेरी बात काट कर तीनो बोले अरे गुरुदेव आप भी कहांकी बात लेकर बैठ गये। हम लोग तो मज़ाक कर रहे थे।मै भी उनसे बोला लेकिन मै मज़ाक नही कर रहा हूं,अब मै किसी भी शोक-सभा मे झूठ नही बोलूंगा चाहे मुझ पर पत्थर क्यो ना चल जाये।
Tuesday, September 2, 2008
भैय्या ये तोगड़िया खसक गया है क्या ?

विश्व हिन्दू परिषद के डॉक्टर प्रवीण तोगड़िया और विवाद का चोली दामन का साथ है। बोलते हैं तो बवाल न हो ऐसा नहीं होता। लेकिन रायपुर में आज ऐसा कुछ नहीं हुआ। तोगड़िया न गरजे, न उलझे और न ही आंए-बांए-शाएं बोले। हेडलाइन मिलने की उम्मीद से आए पत्रकार लगभग निराश हुए और अधिकांश का यही सवाल था कि क्या तोगड़िया खसक गया है ?
बड़ी उम्मीदें लेकर पहुँचे थे पत्रकार आज प्रेस क्लब। प्रेस से मिलिए कार्यक्रम में डॉ. तोगड़िया ने जब बोलना शुरू किया तो सहसा मुझे भी कुछ वैसा ही लगा, जैसा बाकी पत्रकारों को लग रहा था। न अमरनाथ और न कंधमाल सीधे बिहार से शुरू किया। बिहार में बाढ़ की त्रासदी पर देश की जनता से सीधे बिहार की मदद के लिए गुहार लगाई। उन्होंने कहा कि क्या हो रहा है क्या नहीं ? क्या होना चाहिए ? क्या नहीं ? ये सब कांग्रेस और भाजपा के नेताओं का चिल्लाने का काम है। जनता को चाहिए कि बिहार के लोगों के लिए एकजुट होकर मदद करें।
तोगड़िया से ऐसी शुरूआत की उम्मीद शायद किसी ने नहीं की थी। सब सन्न रह गए और तोगड़िया बोलते चले गए। उन्होंने कहा अभी जो दिख रहा है, बिहार की बाढ़ का पहला हिस्सा है। दूसरा हिस्सा इससे भी भयावह होगा। आप उसकी कल्पना नहीं कर सकते। पानी के हटने के बाद जानवरों की लाश और मृत मानव देह की सड़न महामारी को जन्म देगी। महामारी से बचना बहुत ज़रूरी है वरना बाढ़ के क़हर से ले-देकर बचे लोग महामारी से मर जाएँगे। वहाँ बाढ़ ने सब कुछ तबाह कर दिया है। गाँव के गाँव मटियामेट हो गए हैं और नक्शे पर से उनका निशान तक मिट गया है। जहाँ गाँव बचे हैं वहाँ न तो अनाज है और न रहने के लिए मकान। जाएँगे वापस लोग तो भी रहेंगे कैसे ?
तोगड़िया बोले जा रहे थे और लोग बिना टोका-टाकी खामोश सुन रहे थे। तोगड़िया ने कहा कि उनकी इकाईयाँ बिहार जाकर मृत मानव देह और जानवरों का अंतिम संस्कार करेगी। ये पुण्य का काम मोक्ष के लिए कम और महामारी को फैलने से रोकने के लिए ज्यादा होगा। हम अपनी इकाईयों से बिहार के लिए मदद इकट्ठा करने का कार्य शुरू कर चुके हैं। हम आसपास के राज्यों से अनाज गुजरात और दूर के राज्यों से नए कपड़े और मुंबई से दवा इकट्ठा कर रहे हैं।
अचानक तोगड़िया जैसे सोते से जागे और उन्होंने सवाल दाग दिया। छोटी-छोटी बात के लिए सारे देश में हड़ताल हो जाती है, सारा देश इकट्ठा हो जाता है, फिर क्या वजह है जो अपने ही देश के लोग बिहार में मर रहे हैं और बाकी देश एक साथ खड़ा नहीं है। उन्होंने तत्काल सारे देश को एकजुट होकर बिहार की मदद करने की अपील की। उनका कहना था कि इस मामले में राजनीति से ऊपर उठकर सोचना चाहिए। वे भी हमारे ही भाई हैं। असम और मुंबई में ज़रूर बिहारियों के खिलाफ अभियान चल रहे थे। लेकिन ये समय बिहार की मदद का है। और मुंबई और असम के लोग भी बिहार की मदद के लिए आगे आ रहे हैं।
तोगड़िया का ये नया रूप ही देखने को मिल रहा था पत्रकारों को। बिहार पर खुलकर बोलने के बाद तोगड़िया बोले दूसरा मुद्दा अमरनाथ का है। लेकिन अमरनाथ मुद्दे पर भी तोगड़िया के तेवर तोगड़िया जैसे न थे। तीसरा मुद्दा कंधमाल का था। इस पर भी ढके छिपे शब्दों में अपनी बात संक्षेप में कही तोगड़िया ने। और पत्रकारों को न्यौता दे दिया सवालों के लिए।
पता नहीं क्या हुआ पत्रकारों को। इक्का-दुक्का सवालों के बाद ही सब खामोश हो गए।शायद तोगड़िया के बदले हुए रूप को सम्मान दे रहे थे। बहुत ज्वलंत मुद्दे अमरनाथ और कंधमाल को तोगड़िया ने बिहार की बाढ़ में बहा दिया था। आड़े-तिरछे सवालों के ज़रिए विवादास्पद हेडलाइन की तलाश में भटकने वाले पत्रकार आज खुद उलझन में नज़र आए। सबको खामोश देखकर खुद डॉ. प्रवीण तोगड़िया ने कहा आप सभी का धन्यवाद। और सब उठकर निकल लिए। उनके जाने के बाद सारे के सारे पत्रकार मुझसे पूछने लगे भैय्या क्या तोगड़िया खसक गया है ? ये सवाल मैं आप लोगों के लिए छोड़ रहा हूँ। हमेशा आग उगलने वाले तोगड़िया के मुँह से क्या बिहार का दर्द बयान होना उसके खसक जाने की निशानी है ?
बड़ी उम्मीदें लेकर पहुँचे थे पत्रकार आज प्रेस क्लब। प्रेस से मिलिए कार्यक्रम में डॉ. तोगड़िया ने जब बोलना शुरू किया तो सहसा मुझे भी कुछ वैसा ही लगा, जैसा बाकी पत्रकारों को लग रहा था। न अमरनाथ और न कंधमाल सीधे बिहार से शुरू किया। बिहार में बाढ़ की त्रासदी पर देश की जनता से सीधे बिहार की मदद के लिए गुहार लगाई। उन्होंने कहा कि क्या हो रहा है क्या नहीं ? क्या होना चाहिए ? क्या नहीं ? ये सब कांग्रेस और भाजपा के नेताओं का चिल्लाने का काम है। जनता को चाहिए कि बिहार के लोगों के लिए एकजुट होकर मदद करें।
तोगड़िया से ऐसी शुरूआत की उम्मीद शायद किसी ने नहीं की थी। सब सन्न रह गए और तोगड़िया बोलते चले गए। उन्होंने कहा अभी जो दिख रहा है, बिहार की बाढ़ का पहला हिस्सा है। दूसरा हिस्सा इससे भी भयावह होगा। आप उसकी कल्पना नहीं कर सकते। पानी के हटने के बाद जानवरों की लाश और मृत मानव देह की सड़न महामारी को जन्म देगी। महामारी से बचना बहुत ज़रूरी है वरना बाढ़ के क़हर से ले-देकर बचे लोग महामारी से मर जाएँगे। वहाँ बाढ़ ने सब कुछ तबाह कर दिया है। गाँव के गाँव मटियामेट हो गए हैं और नक्शे पर से उनका निशान तक मिट गया है। जहाँ गाँव बचे हैं वहाँ न तो अनाज है और न रहने के लिए मकान। जाएँगे वापस लोग तो भी रहेंगे कैसे ?
तोगड़िया बोले जा रहे थे और लोग बिना टोका-टाकी खामोश सुन रहे थे। तोगड़िया ने कहा कि उनकी इकाईयाँ बिहार जाकर मृत मानव देह और जानवरों का अंतिम संस्कार करेगी। ये पुण्य का काम मोक्ष के लिए कम और महामारी को फैलने से रोकने के लिए ज्यादा होगा। हम अपनी इकाईयों से बिहार के लिए मदद इकट्ठा करने का कार्य शुरू कर चुके हैं। हम आसपास के राज्यों से अनाज गुजरात और दूर के राज्यों से नए कपड़े और मुंबई से दवा इकट्ठा कर रहे हैं।
अचानक तोगड़िया जैसे सोते से जागे और उन्होंने सवाल दाग दिया। छोटी-छोटी बात के लिए सारे देश में हड़ताल हो जाती है, सारा देश इकट्ठा हो जाता है, फिर क्या वजह है जो अपने ही देश के लोग बिहार में मर रहे हैं और बाकी देश एक साथ खड़ा नहीं है। उन्होंने तत्काल सारे देश को एकजुट होकर बिहार की मदद करने की अपील की। उनका कहना था कि इस मामले में राजनीति से ऊपर उठकर सोचना चाहिए। वे भी हमारे ही भाई हैं। असम और मुंबई में ज़रूर बिहारियों के खिलाफ अभियान चल रहे थे। लेकिन ये समय बिहार की मदद का है। और मुंबई और असम के लोग भी बिहार की मदद के लिए आगे आ रहे हैं।
तोगड़िया का ये नया रूप ही देखने को मिल रहा था पत्रकारों को। बिहार पर खुलकर बोलने के बाद तोगड़िया बोले दूसरा मुद्दा अमरनाथ का है। लेकिन अमरनाथ मुद्दे पर भी तोगड़िया के तेवर तोगड़िया जैसे न थे। तीसरा मुद्दा कंधमाल का था। इस पर भी ढके छिपे शब्दों में अपनी बात संक्षेप में कही तोगड़िया ने। और पत्रकारों को न्यौता दे दिया सवालों के लिए।
पता नहीं क्या हुआ पत्रकारों को। इक्का-दुक्का सवालों के बाद ही सब खामोश हो गए।शायद तोगड़िया के बदले हुए रूप को सम्मान दे रहे थे। बहुत ज्वलंत मुद्दे अमरनाथ और कंधमाल को तोगड़िया ने बिहार की बाढ़ में बहा दिया था। आड़े-तिरछे सवालों के ज़रिए विवादास्पद हेडलाइन की तलाश में भटकने वाले पत्रकार आज खुद उलझन में नज़र आए। सबको खामोश देखकर खुद डॉ. प्रवीण तोगड़िया ने कहा आप सभी का धन्यवाद। और सब उठकर निकल लिए। उनके जाने के बाद सारे के सारे पत्रकार मुझसे पूछने लगे भैय्या क्या तोगड़िया खसक गया है ? ये सवाल मैं आप लोगों के लिए छोड़ रहा हूँ। हमेशा आग उगलने वाले तोगड़िया के मुँह से क्या बिहार का दर्द बयान होना उसके खसक जाने की निशानी है ?
Thursday, August 21, 2008
हत्यारों का गिरोह है बस्तर के नक्सली : डॉ. रमन सिंह
सीधे-सादे, शाँत और राजनीतिक तिकड़म बाजी से दूर रहने वाले डॉ. रमन सिंह ने बस्तर के नक्सलियों को सीधे हत्यारों का गिरोह ठहरा दिया। उनके भीतर उबल रहा आक्रोश का ज्वालामुखी जैसे फट पड़ा था। उन्होंने नक्सलवाद के पक्ष में देश और विदेश के बुध्दिजीवियों पर कटाक्ष किया और उल्टे सवाल किया कि क्या उन्हें बस्तर की हज़ारों विधवाओं और अनाथ बच्चों के ऑंसू दिखाई नहीं पड़ते।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का नया रूप देख रहे थे राजधानी के पत्रकार। अमुमन रोज उनसे मुलाकात होती रही है पत्रकारों की लेकिन उन्हें इस तरह से बोलते कभी किसी ने नहीं सुना था। मुख्यमंत्री , कहीं से मुख्यमंत्री नहीं लगे। ऐसा लगा कि बस्तर के नक्सलवाद का कोई भुक्तभोगी अपनी व्यथा सुना रहा है। उन्होंने सलवा जुडूम को समर्थन देने के सवाल उठाने वालों को आड़े हाथों लिया और कहा कि उनकी बुध्दि पर उन्हें तरस आता है। कथित बुध्दिजीवियों को भी उन्होंने नहीं छोड़ा। जेल में बंद नक्सलियों से संबंधित होने के आरोपी डॉ. विनायक सेन का नाम न लेते हुए भी उनके पक्ष में चलाई जा रही मुहिम की धज्जियाँ उड़ा दी। रमन सिंह ने कहा कि बड़ी दाढ़ी वाले के लिए विदेशों से चिंता जाहिर हो रही है। उन्होंने सवाल किया कि एक आदमी की चिंता करने वालों ने कभी सोचा भी है कि बस्तर में असमय हज़ारों माँ-बहन विधवा हो गई, हज़ारों बच्चे असमय अनाथ हो गए। उनके लिए कौन रोएगा ? उनके ऑंसू कौन पोछेगा ? कैसे रह रहे हैं वे लोग ? कैसे पढ़ रहे हैं वे बच्चे ? ये नहीं पूछेंगे ? 21 देशों से और दूतावासों से फोन आ रहे हैं कथित बुध्दिजीवियों के लिए।
प्रेस क्लब में भाजपा, कांग्रेस और माक्र्सवादी पार्टी के विचारों का अद्भुत त्रिवेणी संगम नज़र आ रहा था। तीन-तीन विचारधाराओं के मंथन से जो निकल कर आ रहा था वो था सिर्फ और सिर्फ नक्सलवाद का विरोध। व्याख्यानमाला की शुरूआत कोई माकपा नेता सुरेन्द्र महापात्र के जोश से जिससे तैश में आ गए कांग्रेस के नेता महेन्द्र कर्मा मगर जोश और तैश का रत्ती भर भी असर नज़र नहीं आया रमन सिंह पर। हाँ उनकी जुबान से जो शब्द निकल रहे थे वे आग और बर्फ का बेमिसाल संगम थे। चीरपरिचित अंदाज में शाँत स्वरों में रमन सिंह सब कुछ कहते चले गए। उन्होंने माकपा नेता और वामपंथी विचारधारा को आड़े हाथ लिया। उन्होंने कहा बंगाल और चीन की बात करने वाले ज़रा अपने प्रदेश को ठीक से देख ले। दूसरे देश की किताब पढ़ने के बजाय अपने यहाँ की किताबों के पन्ने भी पलट लें। उन्होंने बताया कि वे 10 दिन के लिए चीन गए थे। वहाँ उन्होंने कम्यून देखने की इच्छा जाहिर की थी। कम्यून यानि सर्व सुविधायुक्त आत्मनिर्भर गाँव। चीन के लोगों से वो लगातार कहते रहे कि एक कम्यून दिखा दो, जिसे देखकर छत्तीसगढ़ में भी वैसा कम्यून बनाया जा सके। अफसोस की बात है कि आखिर तक उन्हें कम्यून नहीं दिखाया गया। एक बार ज़रूर एक कॉलोनी के बाहर दो-चार चक्कर लगाए गए और वहाँ से वापस आने के बाद बताया गया कि वो कम्यून था। उन्हाेंने कहा कि दुनिया में सबसे ज्यादा खराब हालत चीन के किसानों की है। उन्होंने वामपंथ की बखिया उधेड़ दी । उन्होंने पूछा की रशिया का क्या हुआ ? कभी महाशक्ति हुआ करता था वहा भी क्रांति की बात हुई थी । टुकड़े-टुकड़े हो गए है उसके । वहा की करेंसी जला कर चाय बना रहे है लोग। बंगाल की तारीफ करने वालों को बंगाल जाकर देखना चाहिए सारा सिस्टम ही बैठ गया है। विकास के आकड़ों में बंगाल कहीं गुम हो चुका है। क्या बात करते हैं ये लोग विकास की और शोषण की ?
डॉ. रमन सिंह ने कहा कि सिर्फ छत्तीसगढ़ ही इस समस्या से नहीं जूझ रहा है। दुनिया के बहुत से देश भी आतंकवाद के अलग-अलग चेहरों से लड़ रहे हैं। आतंकवाद का एक स्थानीय चेहरा है नक्सलवाद। उससे निपटने के लिए दुनिया में आज जितना खर्च हो रहा है वो शायद विकास पर खर्च होता तो दुनिया चमन हो जाती। माओवाद के नाम पर जो हो रहा है उसका माओवाद से कोई लेना देना नहीं है। नक्सलवाद के जरिए हिंसा हो रही है। बुलेट से बैलेट को प्रभावित किया जा रहा है। हिंसा से प्रजातंत्र को धमकाया जा रहा है। भारत जैसे देश में हिंसा की तो कहीं कोई जगह है ही नहीं। नेपाल के प्रधानमंत्री प्रचंड ने भी अपने पहले सार्वजनिक वक्तव्य में कहा है कि नक्सली बुलेट का रास्ता छोड़कर बैलेट का रास्ता अपना लें।
उन्होंने कहा कि नक्सली बुलेट से नहीं डरते। बैलेट से डरते हैं, इसीलिए वे प्रजातांत्रिक प्रणाली से भागते हैं। बुलेट हमारे पास भी है लेकिन बुलेट से कोई समस्या का हल नहीं निकल सकता। नक्सली संगठित गिरोह है जो वसूली करने में जुटा है। वो प्राकृतिक संसाधनों, खनिज खदानों से भरपूर इलाकों पर कब्ज़ा करना चाहता है, चाहे वो बस्तर हो, उड़ीसा हो, झारखंड हो या आंध्रप्रदेश। डॉ. रमन सिंह ने कहा कि नक्सलियों से पुलिस नहीं निपट सकती, क्योंकि उनको जंगल वारफेयर की ट्रेनिंग नहीं है। नक्सली जंगल में लड़ने की ट्रेनिंग लेकर आता है और उसके पास कोई नियम नहीं है, कानून नहीं है, सिध्दांत नहीं है इसलिए गोलियां चला देता है। पुलिस ऐसा नहीं कर सकती वरना कब से इस समस्या का हल निकल आता।
सलवा जुडूम को तो मुख्यमंत्री ने जैसे अपनी प्रतिष्ठा का ही सवाल बना लिया है। उन्होंने कहा कि सलवा जुडूम शाँतिपूर्ण ऑंदोलन है। वहां के आदिवासियों ने नक्सलियों की एके-47 की गोलियों का सामना करने की फौलादी हिम्मत है। उनमें हिम्मत है नक्सलियों की बारूदी सुरंगों को मौत का डर लिए बिना पार करने की। उनकी हिम्मत और हौसले का ऑंदोलन सलवा जुडूम कभी हार नहीं सकता। उसे हमारी सरकार की, दिल्ली की सरकार की मदद मिले या न मिले। देश-विदेश से उसे समर्थन मिले या न मिले वो चलता रहेगा। उसे लोगों की कैद बताने वाले की बुध्दि पर तरस आता है। हमने वहाँ कोई घेरेबंदी नहीं की, ताले नहीं लगाए हैं, किसी को बेड़ियों में जकड़कर नहीं रखा है। सब स्वतंत्र है जिसको जाना है जा सकता है लेकिन कोई जाता नहीं है। इसी से पता चलता है कि वो उनका खुद का फैसला है। कोई जबरदस्ती इतना बड़ा जन ऑंदोलन खड़ा नहीं कर सकता।
बिजली की सप्लाई ठप करना ये कहाँ की बहादुरी है। 8 दिन बस्तर अंधेरे में रहा। ये कौन सा सिध्दांत है लोगों को परेषान करना। सड़क काट देते हैं, पंचायत भवन, स्कूल और अस्पताल उड़ा रहे हैं। क्या मिल रहा है इन सबसे ? राहत शिविरों में रात के अंधेरे में गोलियां चलाते हैं। ये कौन सी बहादुरी है ? 2 साल की बच्ची और 60 साल की वृध्दा की हत्या कर देते हैं ? ये कौन सी बहादुरी है ? ये कायरता की पराकाष्ठा है। हत्यारों का गिरोह बंदूक की नोक पर प्रजातंत्र पर कब्ज़ा करना चाह रहा है। उनका विरोध करना, हिंसा का विरोध करना सलवा जुडूम है। सारे देश को सलाम करना चाहिए बस्तर के सीधे-सादे आदिवासियों का, जो खुल्ला सीना लिए निकल पड़े हैं नक्सलियों की गोलियों का सामना करने। मैं सलाम करता हूँ आदिवासियों की हिम्मत को, उनके हौसले को, उनकी सोच को और उनके जोश को। पता ही नहीं चला कब रमन सिंह नक्सलवाद को खत्म करने के लिए सभी से मिल-जुलकर काम करने की अपील कर अपनी बात खत्म कर गए। जितनी तालियाँ पत्रकारों ने उनके लिए बजाई वो राजनीति से हटकर एक ईमानदार अभिव्यक्ति को शानदार सलामी थी। कैसी लगी आपको प्रेस क्लब में नक्सलवाद पर हुई व्याख्यान माला। प्रतिक्रिया ज़रूर दीजिएगा चाहे अच्छी हो या बुरी। लगभग 20 मिनट बोले रमन सिंह। पूरा भाषण यहाँ देना संभव नहीं है। वैसे तीनों नेताओं के भाषण की सीडी जो चाहे उसे उपलब्ध करवाने की कोशिश ज़रूर करूँगा।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का नया रूप देख रहे थे राजधानी के पत्रकार। अमुमन रोज उनसे मुलाकात होती रही है पत्रकारों की लेकिन उन्हें इस तरह से बोलते कभी किसी ने नहीं सुना था। मुख्यमंत्री , कहीं से मुख्यमंत्री नहीं लगे। ऐसा लगा कि बस्तर के नक्सलवाद का कोई भुक्तभोगी अपनी व्यथा सुना रहा है। उन्होंने सलवा जुडूम को समर्थन देने के सवाल उठाने वालों को आड़े हाथों लिया और कहा कि उनकी बुध्दि पर उन्हें तरस आता है। कथित बुध्दिजीवियों को भी उन्होंने नहीं छोड़ा। जेल में बंद नक्सलियों से संबंधित होने के आरोपी डॉ. विनायक सेन का नाम न लेते हुए भी उनके पक्ष में चलाई जा रही मुहिम की धज्जियाँ उड़ा दी। रमन सिंह ने कहा कि बड़ी दाढ़ी वाले के लिए विदेशों से चिंता जाहिर हो रही है। उन्होंने सवाल किया कि एक आदमी की चिंता करने वालों ने कभी सोचा भी है कि बस्तर में असमय हज़ारों माँ-बहन विधवा हो गई, हज़ारों बच्चे असमय अनाथ हो गए। उनके लिए कौन रोएगा ? उनके ऑंसू कौन पोछेगा ? कैसे रह रहे हैं वे लोग ? कैसे पढ़ रहे हैं वे बच्चे ? ये नहीं पूछेंगे ? 21 देशों से और दूतावासों से फोन आ रहे हैं कथित बुध्दिजीवियों के लिए।
प्रेस क्लब में भाजपा, कांग्रेस और माक्र्सवादी पार्टी के विचारों का अद्भुत त्रिवेणी संगम नज़र आ रहा था। तीन-तीन विचारधाराओं के मंथन से जो निकल कर आ रहा था वो था सिर्फ और सिर्फ नक्सलवाद का विरोध। व्याख्यानमाला की शुरूआत कोई माकपा नेता सुरेन्द्र महापात्र के जोश से जिससे तैश में आ गए कांग्रेस के नेता महेन्द्र कर्मा मगर जोश और तैश का रत्ती भर भी असर नज़र नहीं आया रमन सिंह पर। हाँ उनकी जुबान से जो शब्द निकल रहे थे वे आग और बर्फ का बेमिसाल संगम थे। चीरपरिचित अंदाज में शाँत स्वरों में रमन सिंह सब कुछ कहते चले गए। उन्होंने माकपा नेता और वामपंथी विचारधारा को आड़े हाथ लिया। उन्होंने कहा बंगाल और चीन की बात करने वाले ज़रा अपने प्रदेश को ठीक से देख ले। दूसरे देश की किताब पढ़ने के बजाय अपने यहाँ की किताबों के पन्ने भी पलट लें। उन्होंने बताया कि वे 10 दिन के लिए चीन गए थे। वहाँ उन्होंने कम्यून देखने की इच्छा जाहिर की थी। कम्यून यानि सर्व सुविधायुक्त आत्मनिर्भर गाँव। चीन के लोगों से वो लगातार कहते रहे कि एक कम्यून दिखा दो, जिसे देखकर छत्तीसगढ़ में भी वैसा कम्यून बनाया जा सके। अफसोस की बात है कि आखिर तक उन्हें कम्यून नहीं दिखाया गया। एक बार ज़रूर एक कॉलोनी के बाहर दो-चार चक्कर लगाए गए और वहाँ से वापस आने के बाद बताया गया कि वो कम्यून था। उन्हाेंने कहा कि दुनिया में सबसे ज्यादा खराब हालत चीन के किसानों की है। उन्होंने वामपंथ की बखिया उधेड़ दी । उन्होंने पूछा की रशिया का क्या हुआ ? कभी महाशक्ति हुआ करता था वहा भी क्रांति की बात हुई थी । टुकड़े-टुकड़े हो गए है उसके । वहा की करेंसी जला कर चाय बना रहे है लोग। बंगाल की तारीफ करने वालों को बंगाल जाकर देखना चाहिए सारा सिस्टम ही बैठ गया है। विकास के आकड़ों में बंगाल कहीं गुम हो चुका है। क्या बात करते हैं ये लोग विकास की और शोषण की ?
डॉ. रमन सिंह ने कहा कि सिर्फ छत्तीसगढ़ ही इस समस्या से नहीं जूझ रहा है। दुनिया के बहुत से देश भी आतंकवाद के अलग-अलग चेहरों से लड़ रहे हैं। आतंकवाद का एक स्थानीय चेहरा है नक्सलवाद। उससे निपटने के लिए दुनिया में आज जितना खर्च हो रहा है वो शायद विकास पर खर्च होता तो दुनिया चमन हो जाती। माओवाद के नाम पर जो हो रहा है उसका माओवाद से कोई लेना देना नहीं है। नक्सलवाद के जरिए हिंसा हो रही है। बुलेट से बैलेट को प्रभावित किया जा रहा है। हिंसा से प्रजातंत्र को धमकाया जा रहा है। भारत जैसे देश में हिंसा की तो कहीं कोई जगह है ही नहीं। नेपाल के प्रधानमंत्री प्रचंड ने भी अपने पहले सार्वजनिक वक्तव्य में कहा है कि नक्सली बुलेट का रास्ता छोड़कर बैलेट का रास्ता अपना लें।
उन्होंने कहा कि नक्सली बुलेट से नहीं डरते। बैलेट से डरते हैं, इसीलिए वे प्रजातांत्रिक प्रणाली से भागते हैं। बुलेट हमारे पास भी है लेकिन बुलेट से कोई समस्या का हल नहीं निकल सकता। नक्सली संगठित गिरोह है जो वसूली करने में जुटा है। वो प्राकृतिक संसाधनों, खनिज खदानों से भरपूर इलाकों पर कब्ज़ा करना चाहता है, चाहे वो बस्तर हो, उड़ीसा हो, झारखंड हो या आंध्रप्रदेश। डॉ. रमन सिंह ने कहा कि नक्सलियों से पुलिस नहीं निपट सकती, क्योंकि उनको जंगल वारफेयर की ट्रेनिंग नहीं है। नक्सली जंगल में लड़ने की ट्रेनिंग लेकर आता है और उसके पास कोई नियम नहीं है, कानून नहीं है, सिध्दांत नहीं है इसलिए गोलियां चला देता है। पुलिस ऐसा नहीं कर सकती वरना कब से इस समस्या का हल निकल आता।
सलवा जुडूम को तो मुख्यमंत्री ने जैसे अपनी प्रतिष्ठा का ही सवाल बना लिया है। उन्होंने कहा कि सलवा जुडूम शाँतिपूर्ण ऑंदोलन है। वहां के आदिवासियों ने नक्सलियों की एके-47 की गोलियों का सामना करने की फौलादी हिम्मत है। उनमें हिम्मत है नक्सलियों की बारूदी सुरंगों को मौत का डर लिए बिना पार करने की। उनकी हिम्मत और हौसले का ऑंदोलन सलवा जुडूम कभी हार नहीं सकता। उसे हमारी सरकार की, दिल्ली की सरकार की मदद मिले या न मिले। देश-विदेश से उसे समर्थन मिले या न मिले वो चलता रहेगा। उसे लोगों की कैद बताने वाले की बुध्दि पर तरस आता है। हमने वहाँ कोई घेरेबंदी नहीं की, ताले नहीं लगाए हैं, किसी को बेड़ियों में जकड़कर नहीं रखा है। सब स्वतंत्र है जिसको जाना है जा सकता है लेकिन कोई जाता नहीं है। इसी से पता चलता है कि वो उनका खुद का फैसला है। कोई जबरदस्ती इतना बड़ा जन ऑंदोलन खड़ा नहीं कर सकता।
बिजली की सप्लाई ठप करना ये कहाँ की बहादुरी है। 8 दिन बस्तर अंधेरे में रहा। ये कौन सा सिध्दांत है लोगों को परेषान करना। सड़क काट देते हैं, पंचायत भवन, स्कूल और अस्पताल उड़ा रहे हैं। क्या मिल रहा है इन सबसे ? राहत शिविरों में रात के अंधेरे में गोलियां चलाते हैं। ये कौन सी बहादुरी है ? 2 साल की बच्ची और 60 साल की वृध्दा की हत्या कर देते हैं ? ये कौन सी बहादुरी है ? ये कायरता की पराकाष्ठा है। हत्यारों का गिरोह बंदूक की नोक पर प्रजातंत्र पर कब्ज़ा करना चाह रहा है। उनका विरोध करना, हिंसा का विरोध करना सलवा जुडूम है। सारे देश को सलाम करना चाहिए बस्तर के सीधे-सादे आदिवासियों का, जो खुल्ला सीना लिए निकल पड़े हैं नक्सलियों की गोलियों का सामना करने। मैं सलाम करता हूँ आदिवासियों की हिम्मत को, उनके हौसले को, उनकी सोच को और उनके जोश को। पता ही नहीं चला कब रमन सिंह नक्सलवाद को खत्म करने के लिए सभी से मिल-जुलकर काम करने की अपील कर अपनी बात खत्म कर गए। जितनी तालियाँ पत्रकारों ने उनके लिए बजाई वो राजनीति से हटकर एक ईमानदार अभिव्यक्ति को शानदार सलामी थी। कैसी लगी आपको प्रेस क्लब में नक्सलवाद पर हुई व्याख्यान माला। प्रतिक्रिया ज़रूर दीजिएगा चाहे अच्छी हो या बुरी। लगभग 20 मिनट बोले रमन सिंह। पूरा भाषण यहाँ देना संभव नहीं है। वैसे तीनों नेताओं के भाषण की सीडी जो चाहे उसे उपलब्ध करवाने की कोशिश ज़रूर करूँगा।
आदिवासी कह रहे हैं बहुत हो चुका हमें हमारे हाल पर छोड़ दो
नक्सलियों की हिट लिस्ट में टॉप पर हैं वरिष्ठ कांग्रेसी नेता महेन्द्र कर्मा। वे जब नक्सल समस्या पर बोलने लगे तो एक नेता के साथ-साथ एक आदिवासी का दर्द भी उनकी जुबान से निकल रहा था। उन्होंने कहा कि बस्तर का आदिवासी कह रहा है कि बहुत हो चुका है हमें हमारे हाल पर छोड़ दो।
महेन्द्र कर्मा छत्तीसगढ़ विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष है। जवानी में महेन्द्र कर्मा भी कामरेड ही थे लेकिन समय के साथ उनके विचार बदले और अब वे कांग्रेस के दिग्गज नेता हैं और सलवा जुडूम के घोर समर्थक। प्रेस क्लब में माकपा नेता धर्मराज महापात्र के जोशीले भाषण ने श्रोताओं की जितनी तालियाँ बटोरी उतना ही कर्मा को गुस्से से भर दिया। स्वभाव से तेज़तर्रार महेन्द्र कर्मा व्याख्यान शुरू करते ही तैश में आ गए। उनका गुस्सा स्वाभाविक था। उन्होंने कहा कि लोगों ने बस्तर देखा तक नहीं, वे जानते तक नहीं हैं सलवा जुडूम क्या है ? वे आदिवासी को पहचानते तक नहीं हैं और ऐसे लोग बात करते हैं बस्तर की नक्सल समस्या पर। उन्होंने कहा बस्तर का आदिवासी त्रस्त हो चुका है और वो कह रहा है नक्सलियों से कि बहुत हो चुका चले जाईए, हमें हमारे हाल पर छोड़ दीजिए।
कर्मा की आवाज़ में जितनी गर्मी थी उससे ज्यादा उसमें आदिवासियों के दर्द की नमी थी। पसीने से तर हो गए महेन्द्र कर्मा बोलते-बोलते। उन्हाेंने जमकर लताड़ा शहर में रहकर जंगल की समस्याओं पर करने वालों को। उन्होंने कहा कि सलवा जुडूम आदिवासियों की अपनी मर्जी से जीने की अपील है। छोटा-मोटा आंदोलन होता है तो सारे देश और दुनिया में हंगामा होता है लेकिन इतना बड़ा आंदोलन आदिवासियों का चल रहा है और वे अकेले हैं। देश क्यों नहीं खड़ा होता उनके साथ। आखिर क्या गलत कर रहे हैं वो। हिंसा के खिलाफ बस्तर का अनपढ़ आदिवासी तनकर खड़ा है तो वो अपने दम पर। उसे किसी की मदद मिले या न मिले वो लड़ता रहेगा नक्सलियों से। आखिर ये उनके अस्तित्व की लड़ाई है। अगर वो हार गए तो हिंसा के सामने अहिंसा हार जाएगी, सारा देश हार जाएगा।
उन्होंने कहा कि नक्सली 40 साल से बस्तर में ऑंदोलन कर रहे हैं। वे क्या कहते हैं पता नहीं लेकिन करते क्या हैं ये सब जानते हैं ? उन्होंने कहा कि इन 40 सालों में क्या किया है नक्सलियों ने बस्तर में ? एक भी कोई विकास का काम किया है ? किसी भी सरकार को कभी कोई फेहरिस्त सौंपी है ? क्या कभी कोई बात की है किसी से ? क्या बात करेंगे ये लोग आदिवासियों के हितों की ? इन्हें तो अपने हित साधने से ही फुर्सत नहीं है। कभी तेंदूपत्ता के दाम बढ़ाने के लिए धमकी-चमकी दी थी और सरकार के दाम बढ़ाते ही तत्काल बढ़े हुए दामों में से अपना हिस्सा ठेकेदारों से तय कर लिया। ये लुटेरे हैं। कहीं भी बेरियर लगा देते हैं और वसूली करने बैठ जाते हैं।
बोलते-बोलते अचानक अपनी ही पार्टी के नेता की खिंचाई कर दी महेन्द्र कर्मा ने। साफ-साफ बोलने के कारण बार-बार विवादों में घिरने वाले कर्मा इस बार भी घबराए नहीं। हालाकि उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी का नाम नहीं लिया लेकिन जो कहा उसे सारे लोग समझ गए। उन्होंने कहा कि यदि मैं सलवा जुडूम के मामले में रमन सिंह का समर्थन करता हूँ तो इसे पोलिटिकल एलाइनमेंट कहते हैं। तरस आता है ऐसे लोगों पर। अरे सरकार तो आती-जाती रहती है। सरकार के अलावा भी कोई चीज होती है सोचने के लिए। जहाँ मौत नाचती हो वहाँ राजनीति नहीं करना चाहिए। लाषों पर राजनीति करने वालों को शर्म आनी चाहिए। यहाँ उन्होंने नक्सलवाद के मामले में अपने अभियान के पार्टनर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की खिंचाई करने से भी परहेज नहीं किया। उन्होंने कहा कि डॉ. ने बीच में सलवा जुडूम की मदद करने में थोड़ी ढील दे दी और उसी का नतीजा है कि ऑंदोलन थम गया है।
उन्होंने कहा कि नक्सलवाद आतंकवाद का दूसरा चेहरा है। आप इसे सामाजिक-आर्थिक शोषण के नज़रिए से नहीं बल्कि प्रजातंत्र के खिलाफ हिंसा के नज़रिए से देखिए। इसे तत्काल राष्ट्रीय समस्या घोषित किया जाना चाहिए। ये रमन सिंह या महेन्द्र कर्मा के अकेले के बस की समस्या नहीं है। नक्सलवाद के नाम पर लूट-खसौट और हिंसा का दौर समाप्त होना चाहिए। इसके लिए सबको राजनीतिक संकीर्णता को छोड़ एक साथ खड़ा होना होगा और जिस दिन सब एक साथ खड़े हो गए नक्सलवाद घंटों में नहीं मिनटों में मिट जाएगा। जब तक महेन्द्र कर्मा बोलते रहे तब तक हवा में अजीब-सी सनसनी फैली रही। ऐसा लग रहा था कि बस्तर के आदिवासियों के दर्द के साथ-साथ एक नेता के गुस्से का ज्वालामुखी रह-रहकर फट रहा हो। सब स्तब्ध होकर सुन रहे थे, वे लोग जो शहर में बैठकर बस्तर में सरकार और प्रजातंत्र के फेल होने और नक्सलियों का साम्राज्य होने की चर्चा एसी रूम में बैठकर करते हैं। पता ही नहीं चला कि कब 20 मिनट पूरे हो गए और महेन्द्र कर्मा का भाषण खत्म हुआ। उसके बाद तो अचानक सन्न पड़ा प्रेस क्लब का हॉल जाग गया और तालियों की गड़गड़ाहट ये बताने लगी कि हमें बस्तर का सच अब पता चल रहा है। मुख्यमंत्री क्या बोले नक्सल समस्या पर ये अगली पोस्ट मे _
महेन्द्र कर्मा छत्तीसगढ़ विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष है। जवानी में महेन्द्र कर्मा भी कामरेड ही थे लेकिन समय के साथ उनके विचार बदले और अब वे कांग्रेस के दिग्गज नेता हैं और सलवा जुडूम के घोर समर्थक। प्रेस क्लब में माकपा नेता धर्मराज महापात्र के जोशीले भाषण ने श्रोताओं की जितनी तालियाँ बटोरी उतना ही कर्मा को गुस्से से भर दिया। स्वभाव से तेज़तर्रार महेन्द्र कर्मा व्याख्यान शुरू करते ही तैश में आ गए। उनका गुस्सा स्वाभाविक था। उन्होंने कहा कि लोगों ने बस्तर देखा तक नहीं, वे जानते तक नहीं हैं सलवा जुडूम क्या है ? वे आदिवासी को पहचानते तक नहीं हैं और ऐसे लोग बात करते हैं बस्तर की नक्सल समस्या पर। उन्होंने कहा बस्तर का आदिवासी त्रस्त हो चुका है और वो कह रहा है नक्सलियों से कि बहुत हो चुका चले जाईए, हमें हमारे हाल पर छोड़ दीजिए।
कर्मा की आवाज़ में जितनी गर्मी थी उससे ज्यादा उसमें आदिवासियों के दर्द की नमी थी। पसीने से तर हो गए महेन्द्र कर्मा बोलते-बोलते। उन्हाेंने जमकर लताड़ा शहर में रहकर जंगल की समस्याओं पर करने वालों को। उन्होंने कहा कि सलवा जुडूम आदिवासियों की अपनी मर्जी से जीने की अपील है। छोटा-मोटा आंदोलन होता है तो सारे देश और दुनिया में हंगामा होता है लेकिन इतना बड़ा आंदोलन आदिवासियों का चल रहा है और वे अकेले हैं। देश क्यों नहीं खड़ा होता उनके साथ। आखिर क्या गलत कर रहे हैं वो। हिंसा के खिलाफ बस्तर का अनपढ़ आदिवासी तनकर खड़ा है तो वो अपने दम पर। उसे किसी की मदद मिले या न मिले वो लड़ता रहेगा नक्सलियों से। आखिर ये उनके अस्तित्व की लड़ाई है। अगर वो हार गए तो हिंसा के सामने अहिंसा हार जाएगी, सारा देश हार जाएगा।
उन्होंने कहा कि नक्सली 40 साल से बस्तर में ऑंदोलन कर रहे हैं। वे क्या कहते हैं पता नहीं लेकिन करते क्या हैं ये सब जानते हैं ? उन्होंने कहा कि इन 40 सालों में क्या किया है नक्सलियों ने बस्तर में ? एक भी कोई विकास का काम किया है ? किसी भी सरकार को कभी कोई फेहरिस्त सौंपी है ? क्या कभी कोई बात की है किसी से ? क्या बात करेंगे ये लोग आदिवासियों के हितों की ? इन्हें तो अपने हित साधने से ही फुर्सत नहीं है। कभी तेंदूपत्ता के दाम बढ़ाने के लिए धमकी-चमकी दी थी और सरकार के दाम बढ़ाते ही तत्काल बढ़े हुए दामों में से अपना हिस्सा ठेकेदारों से तय कर लिया। ये लुटेरे हैं। कहीं भी बेरियर लगा देते हैं और वसूली करने बैठ जाते हैं।
बोलते-बोलते अचानक अपनी ही पार्टी के नेता की खिंचाई कर दी महेन्द्र कर्मा ने। साफ-साफ बोलने के कारण बार-बार विवादों में घिरने वाले कर्मा इस बार भी घबराए नहीं। हालाकि उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी का नाम नहीं लिया लेकिन जो कहा उसे सारे लोग समझ गए। उन्होंने कहा कि यदि मैं सलवा जुडूम के मामले में रमन सिंह का समर्थन करता हूँ तो इसे पोलिटिकल एलाइनमेंट कहते हैं। तरस आता है ऐसे लोगों पर। अरे सरकार तो आती-जाती रहती है। सरकार के अलावा भी कोई चीज होती है सोचने के लिए। जहाँ मौत नाचती हो वहाँ राजनीति नहीं करना चाहिए। लाषों पर राजनीति करने वालों को शर्म आनी चाहिए। यहाँ उन्होंने नक्सलवाद के मामले में अपने अभियान के पार्टनर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की खिंचाई करने से भी परहेज नहीं किया। उन्होंने कहा कि डॉ. ने बीच में सलवा जुडूम की मदद करने में थोड़ी ढील दे दी और उसी का नतीजा है कि ऑंदोलन थम गया है।
उन्होंने कहा कि नक्सलवाद आतंकवाद का दूसरा चेहरा है। आप इसे सामाजिक-आर्थिक शोषण के नज़रिए से नहीं बल्कि प्रजातंत्र के खिलाफ हिंसा के नज़रिए से देखिए। इसे तत्काल राष्ट्रीय समस्या घोषित किया जाना चाहिए। ये रमन सिंह या महेन्द्र कर्मा के अकेले के बस की समस्या नहीं है। नक्सलवाद के नाम पर लूट-खसौट और हिंसा का दौर समाप्त होना चाहिए। इसके लिए सबको राजनीतिक संकीर्णता को छोड़ एक साथ खड़ा होना होगा और जिस दिन सब एक साथ खड़े हो गए नक्सलवाद घंटों में नहीं मिनटों में मिट जाएगा। जब तक महेन्द्र कर्मा बोलते रहे तब तक हवा में अजीब-सी सनसनी फैली रही। ऐसा लग रहा था कि बस्तर के आदिवासियों के दर्द के साथ-साथ एक नेता के गुस्से का ज्वालामुखी रह-रहकर फट रहा हो। सब स्तब्ध होकर सुन रहे थे, वे लोग जो शहर में बैठकर बस्तर में सरकार और प्रजातंत्र के फेल होने और नक्सलियों का साम्राज्य होने की चर्चा एसी रूम में बैठकर करते हैं। पता ही नहीं चला कि कब 20 मिनट पूरे हो गए और महेन्द्र कर्मा का भाषण खत्म हुआ। उसके बाद तो अचानक सन्न पड़ा प्रेस क्लब का हॉल जाग गया और तालियों की गड़गड़ाहट ये बताने लगी कि हमें बस्तर का सच अब पता चल रहा है। मुख्यमंत्री क्या बोले नक्सल समस्या पर ये अगली पोस्ट मे _
Wednesday, August 20, 2008
पता ही नहीं चला कब धरमू, धर्मराज हो गया
मैं उसे सालों से धरमू कहकर ही पुकारता आ रहा था और मेरे लिए वो धरमू ही था। पर आज जब उसने मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष की उपस्थिति में बोलना शुरू किया तो मुझे ऐसा लगा कि बहुत कुछ बदल चुका है। और कुछ ही क्षणों में समझा में आ गया कि मेरा धरमू अब धरमू नहीं रह गया, धर्मराज हो गया।
मौका था नक्सल समस्या पर व्याख्यान का। प्रेस क्लब के इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम के लिए दो वक्ता मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और नेता प्रतिपक्ष महेन्द्र कर्मा तय हो चुके थे, तीसरे वक्ता के लिए वामपंथी नेताओं के नामों पर विचार हो रहा था। मैंने अपने पत्रकार साथी रूचिर गर्ग से सलाह माँगी, तो दो-तीन नामों पर हमने विचार किया। फिर अचानक रूचिर बोला कि धर्मराज...... वे अपना वाक्य पूरा कर भी नहीं पाए थे कि मेरे मुँह से एकाएक निकला धरमू को ? रूचिर ने कहा कि वो अपना धरमू ज़रूर है लेकिन वो पार्टी के सचिव मंडल का सदस्य भी है। मैंने कहा ठीक है! फिर मैं अपने ही फैसले पर शक करता रहा। मैंने इससे पहले कभी धरमू को बोलते सुना ही नहीं था।
कार्यक्रम जब शुरू हुआ तब भी कुछ लोगों ने शंका जाहिर की, कि तीसरा वक्ता हल्का न पड़ जाए। खैर कार्यक्रम शुरू हुआ और मेरा धरमू यानि माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से धर्मराज महापात्र ने बोलना शुरू किया। कुछ ही क्षणों में उसने माहौल में अजीब सी गर्मी ला दी। उसने विनम्रता से कहा कि मुझे झिझक हो रही थी कि इतने बड़े लोगों के बीच मैं छोटा सा कार्यकर्ता क्या बोलूँगा और कैसे बोल पाऊँगा ? उसकी विनम्रता और उसकी वाणी में छिपा आक्रोश आग और बर्फ का अद्भुत संगम नज़र आ रहा था।
धरमू, सॉरी धर्मराज महापात्र बोलता चला गया और सारे संपादक, पत्रकार और बुध्दिजीवी शाँत बैठे उसे सुनते रहे। बड़ी बेबाकी से धर्मराज ने मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष की उपस्थिति को जैसे खारिज ही कर दिया। नक्सलवाद की पैरवी न करते हुए भी धर्मराज ने सरकार को बस्तर और सरगुजा के आदिवासी अंचलों में पसरी आर्थिक और सामाजिक असमानता, शोषण, अराजकता के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया। सलवा जुडूम की भी महापात्र ने जमकर खिलाफत की, ये जानते हुए भी कि इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष एक हैं। उन्होंने साफ-साफ कहा कि बिना समस्या का मूल कारण जाने नक्सलवाद से निपटा नहीं जा सकता। उनका कहना था कि किसी समस्या को देखने का नज़रिया महत्वपूर्ण होता है। बातों ही बातों में उन्होंने मुख्यमंत्री की ओर इशारा कर कहा कि नक्सली तो पकड़ में आते नहीं उनकी आड़ में माकपा के कार्यकर्ताओं को जेल में ठूँसा जा रहा है। ऐसे में सिर्फ और सिर्फ असंतोष ही बढ़ेगा और जब तक असंतोष रहेगा नक्सलवाद खत्म नहीं हो सकता।
धरमू ने नक्सलवाद पर वार करने में कहीं कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन साथ ही वो सरकार को भी लपेटता चला गया। उसने कहा हमारी पार्टी का नज़रिया साफ है कि माओवाद और नक्सलवाद का कहीं कोई मेल नहीं है। माओ के नाम पे अगर कोई कुछ भी करता है तो उसे जायज नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन सरकार को ये ज़रूर सोचना चाहिए कि आखिर लोग उनसे जुड़ क्यों रहे हैं। सरकार और पुलिस को उसने अपने ही अंदाज में नक्सलियों से डरने वाला करार दे दिया। उसने कहा कि 15 दिनों में एक हेलिकॉप्टर तक नहीं ढूँढ पाई पुलिस ? उसने दावा किया कि पुलिस अपनी पोस्ट के आसपास ही सर्च करती है। जंगल में घुसने की उसकी हिम्मत ही नहीं है।
सलवा जुडूम मुख्यमंत्री के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न है, इस बात की परवाह किए बिना उसने सलवा जुडूम को बंद करने की माँग कर दी। 15 मिनट के अपने संबोधन में धरमू पूरी लय में नज़र आया। जब उसने बस्तर के बारे में अपनी पार्टी का नज़रिया रखा, तो ऐसा लगा कि वो परिपक्व नेताओं को मात दे रहा है। नक्सलवाद के हम समर्थक नहीं है लेकिन जिस तरीके से सरकार काम कर रही है, उससे नक्सलवाद खत्म नहीं होगा। बल्कि उसे पुष्पित और पल्लवित होने का मौका मिलेगा। कई बार लगा कि तालियाँ बजा दूँ, लेकिन स्टेज पर बैठे होने की मजबूरी ने मुझे रोक लिया। हालाकि कुर्सी का हत्था मैंने कई बार थपथपाया। भाषण समाप्त होते ही पूरे प्रेस क्लब और मंच पर बैठे सभी अतिथियों की तालियों ने धरमू के धर्मराज होने का प्रमाण दे दिया। मैंने उसे प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित किया और कार्यक्रम की समाप्ति के बाद कहा कि धरमू अब तुम्हें धरमू नहीं धर्मराज कहना पड़ेगा। वो हंस पड़ा हमेशा की तरह और कहने लगा आपके लिए तो मैं वही धरमू ही रहूँगा। वहीं रूचिर भी मिल गया, उसने मुझसे पूछा कैसा लगा धरमू ? मेरा जवाब था पता ही नहीं चला कब धरमू धर्मराज हो गया। कांग्रेस वरिष्ठ नेता महेन्द्र कर्मा और मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह क्या बोले ? ये बताऊँगा अगली पोस्ट में।
मौका था नक्सल समस्या पर व्याख्यान का। प्रेस क्लब के इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम के लिए दो वक्ता मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और नेता प्रतिपक्ष महेन्द्र कर्मा तय हो चुके थे, तीसरे वक्ता के लिए वामपंथी नेताओं के नामों पर विचार हो रहा था। मैंने अपने पत्रकार साथी रूचिर गर्ग से सलाह माँगी, तो दो-तीन नामों पर हमने विचार किया। फिर अचानक रूचिर बोला कि धर्मराज...... वे अपना वाक्य पूरा कर भी नहीं पाए थे कि मेरे मुँह से एकाएक निकला धरमू को ? रूचिर ने कहा कि वो अपना धरमू ज़रूर है लेकिन वो पार्टी के सचिव मंडल का सदस्य भी है। मैंने कहा ठीक है! फिर मैं अपने ही फैसले पर शक करता रहा। मैंने इससे पहले कभी धरमू को बोलते सुना ही नहीं था।
कार्यक्रम जब शुरू हुआ तब भी कुछ लोगों ने शंका जाहिर की, कि तीसरा वक्ता हल्का न पड़ जाए। खैर कार्यक्रम शुरू हुआ और मेरा धरमू यानि माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से धर्मराज महापात्र ने बोलना शुरू किया। कुछ ही क्षणों में उसने माहौल में अजीब सी गर्मी ला दी। उसने विनम्रता से कहा कि मुझे झिझक हो रही थी कि इतने बड़े लोगों के बीच मैं छोटा सा कार्यकर्ता क्या बोलूँगा और कैसे बोल पाऊँगा ? उसकी विनम्रता और उसकी वाणी में छिपा आक्रोश आग और बर्फ का अद्भुत संगम नज़र आ रहा था।
धरमू, सॉरी धर्मराज महापात्र बोलता चला गया और सारे संपादक, पत्रकार और बुध्दिजीवी शाँत बैठे उसे सुनते रहे। बड़ी बेबाकी से धर्मराज ने मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष की उपस्थिति को जैसे खारिज ही कर दिया। नक्सलवाद की पैरवी न करते हुए भी धर्मराज ने सरकार को बस्तर और सरगुजा के आदिवासी अंचलों में पसरी आर्थिक और सामाजिक असमानता, शोषण, अराजकता के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया। सलवा जुडूम की भी महापात्र ने जमकर खिलाफत की, ये जानते हुए भी कि इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष एक हैं। उन्होंने साफ-साफ कहा कि बिना समस्या का मूल कारण जाने नक्सलवाद से निपटा नहीं जा सकता। उनका कहना था कि किसी समस्या को देखने का नज़रिया महत्वपूर्ण होता है। बातों ही बातों में उन्होंने मुख्यमंत्री की ओर इशारा कर कहा कि नक्सली तो पकड़ में आते नहीं उनकी आड़ में माकपा के कार्यकर्ताओं को जेल में ठूँसा जा रहा है। ऐसे में सिर्फ और सिर्फ असंतोष ही बढ़ेगा और जब तक असंतोष रहेगा नक्सलवाद खत्म नहीं हो सकता।
धरमू ने नक्सलवाद पर वार करने में कहीं कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन साथ ही वो सरकार को भी लपेटता चला गया। उसने कहा हमारी पार्टी का नज़रिया साफ है कि माओवाद और नक्सलवाद का कहीं कोई मेल नहीं है। माओ के नाम पे अगर कोई कुछ भी करता है तो उसे जायज नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन सरकार को ये ज़रूर सोचना चाहिए कि आखिर लोग उनसे जुड़ क्यों रहे हैं। सरकार और पुलिस को उसने अपने ही अंदाज में नक्सलियों से डरने वाला करार दे दिया। उसने कहा कि 15 दिनों में एक हेलिकॉप्टर तक नहीं ढूँढ पाई पुलिस ? उसने दावा किया कि पुलिस अपनी पोस्ट के आसपास ही सर्च करती है। जंगल में घुसने की उसकी हिम्मत ही नहीं है।
सलवा जुडूम मुख्यमंत्री के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न है, इस बात की परवाह किए बिना उसने सलवा जुडूम को बंद करने की माँग कर दी। 15 मिनट के अपने संबोधन में धरमू पूरी लय में नज़र आया। जब उसने बस्तर के बारे में अपनी पार्टी का नज़रिया रखा, तो ऐसा लगा कि वो परिपक्व नेताओं को मात दे रहा है। नक्सलवाद के हम समर्थक नहीं है लेकिन जिस तरीके से सरकार काम कर रही है, उससे नक्सलवाद खत्म नहीं होगा। बल्कि उसे पुष्पित और पल्लवित होने का मौका मिलेगा। कई बार लगा कि तालियाँ बजा दूँ, लेकिन स्टेज पर बैठे होने की मजबूरी ने मुझे रोक लिया। हालाकि कुर्सी का हत्था मैंने कई बार थपथपाया। भाषण समाप्त होते ही पूरे प्रेस क्लब और मंच पर बैठे सभी अतिथियों की तालियों ने धरमू के धर्मराज होने का प्रमाण दे दिया। मैंने उसे प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित किया और कार्यक्रम की समाप्ति के बाद कहा कि धरमू अब तुम्हें धरमू नहीं धर्मराज कहना पड़ेगा। वो हंस पड़ा हमेशा की तरह और कहने लगा आपके लिए तो मैं वही धरमू ही रहूँगा। वहीं रूचिर भी मिल गया, उसने मुझसे पूछा कैसा लगा धरमू ? मेरा जवाब था पता ही नहीं चला कब धरमू धर्मराज हो गया। कांग्रेस वरिष्ठ नेता महेन्द्र कर्मा और मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह क्या बोले ? ये बताऊँगा अगली पोस्ट में।
Sunday, June 22, 2008
लोकतंत्र के चारों खंभे हिल रहें है- डॉ.नामवर सिंह
डॉ नामवर सिंह ने जब बोलना शुरू किया तो व बोलते चले गये। सब बुत बनकर सुनते रहे लोकतंत्र की दुर्दशा पर बेहद सादगी और संजीदगी से डॉ.नामवर सिंह सब कुछ साफ-साफ कह गए। उन्होने कहा कि लोकतंत्र के चारों खंभे हिल रहें है। इत्तेफाक से लोकतंत्र के तीन खंभे तो वहां मौजूद थे और खामोशी से सारी बातें सुनना उनकी मौन स्वीकृति से कम नहीं था।
मौका था 18 जून 2008 को छत्तीसगढ़ के जाने माने पत्रकार दिवाकार मुक्तिबोध की पहली किताब 'इस राह से गुजरते हुए' के विमोचन का । डॉ नामवर सिंह ने उनकी किताब का विमोचन करने के बाद कहा कि उगते पौधे को नापा नहीं जाता । उन्होंने कहा कि वे बेहद खुश है कि गजानन माधव मुक्तिबोध के एक पुत्र ने तो कम से कम पत्रकारिता को चुना। हालांकि गजानन माधव मुक्तिबोध के कनिष्ठ पुत्र गिरीश भी पत्रकार है और ये बात शायद डॉ सिंह को पता नहीं थी। खैर जब डॉ नामवर सिंह को व्यावसायिक दबाव और पक्षधर पत्रकारिता पर बोलने के लिए कहा गया तो अपने स्वभाव ओर ख्याति के अनुरूप उन्होने विषय की जमकर आलोचना की और उसे सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा दबाव जैसे भ्रामक शब्द का इस्तेमाल करने की बजाय यहां प्रलोभन शब्द का इस्तेमाल होना था। उन्होंने साफ साफ कहा कि पत्रकारिता पर दबाव का नहीं प्रलोभन का खतरा ज्यादा है ।
पत्रकारों,अफसरों, नेताओं और साहित्यकारों से खचाखच भरे रायपुर प्रेस क्लब के हाल में डॉ . सिंह, सिंह की तरह बोलते चले गये। सब खामोश सुनते रहे । सुनने वालों में प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ।रमन सिंह समेत सारे दिग्गज आईएएस अफसर, जानेमाने पत्रकार और साहित्यकार शामिल थे। डॉ नामवर सिंह ने जो लय पकड़ी तो लगभग घंटे भर तक उन्होंने मुस्कुरा-मुस्कुरा कर देश के मौजुदा हालात का पोस्टमार्टम कर दिया। हाँ उन्होंने अपने व्याख्यान के दौरान निष्पक्ष शब्द की एक नई परिभाषा रखी। उन्होंने अपने ठेठ बनारसी अंदाज में कहा कि निष्पक्ष के मायने बिकाउ होता है। उन्होंने कहा कि जो ये कहे कि वो निष्पक्ष है आप समझ लीजिये वो कह रहा है कि वो बिकाऊ है जो दाम लगाए उसे खरीद सकता है। उन्होंने उदाहारण दिया कर्नाटक का और कहा कि वहां सरकार गिराई निष्पक्ष लोगों ने और बनाई भी उन्हीं लोगों ने। लोकतंत्र के चारों खंभे को हिलने की बात कहते हुए उन्होेंने न्यायपालिका की तो सीधे आलोचना नहीं की मगर विधायिका, कार्यपालिका और प्रेस की खिंचाई करने में तो उन्होंने रत्ती भर कसर नहीं छोड़ी। बेहद चुटीले अंदाज में उन्होंने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को आश्वस्त किया कि उनको प्रेस से डरने की जरूरत नहीं है क्योंकि यहां पूरा प्रेस जगत डरा हुआ है। उन्होंने कहा कि वो जमाना गया जब सरकार प्रेस से डरती थी। अब तो विज्ञापन का जमाना है। उनकी इस बात पर मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह मुस्कुराकर रह गए और प्रेस क्लब अध्यक्ष होने के नाते मंच पर उनके साथ बैठा मैं भी उस कड़वे सच से कसमसा कर रह गया। सिर्फ प्रेस को ही नहीं कार्यपालिका और विधायिका की भी बखिया उधेड़ने में डॉ.सिह ने कोई कसर नहीं छोड़ी। इलेक्ट्रानिक मीडिया को प्रिंट मीडिया के लिये खतरा नहीं माना डॉ. नामवर सिंह ने। उन्होंने कहा कि भाषाई पत्रकारिता आज भी असरकारक है बशर्तें उसे अपनी बोलचाल की भाषा और चालू मुहावरों की कीमत पता रहें। इस अवसर पर उन्होंने बनारस के ही पराड़कर को भी याद किया और कहा कि अब हिन्दी अखबारों में पाठकों की चिट्ठी का महत्व वैसा नहीं रह गया। राष्ट्रभाषा हिन्दी पर भी बोलने से नहीं चूके डॉ नामवर सिंह। उन्होंने कहा कि राष्ट्रभाषा का उपयोग नेता ही कर रहें है। वो फाइलों पर हिन्दी लिख रहें है क्या लिखते है उन्हें ही समझा नहीं आता और पढ़ने वाले अफसर भी नहीं समझ पाते है। दिवाकर मुक्तिबोध की पहली पुस्तक 'इस राह से गुजरते हुए' पर तो उन्होंने कुछ नहीं कहा क्योंकि किताब वे पढ़ नहीं पाये। लेकिन उन्होंने यह कहकर सबको हसने पर मजबूर कर दिया कि असली मास्टर वहीं है जो बिना किताब देखे एक पीरियड ले ले। उन्होने कहा ये झांसा मै भी दे सकता हूँ और बिना लाग-लपेटे के डॉ. नामवर सिंह ने वो सब कुछ कह दिया जिसे सिर्फ सुनना नहीं उस पर अमल करना भी जरूरी है।
मौका था 18 जून 2008 को छत्तीसगढ़ के जाने माने पत्रकार दिवाकार मुक्तिबोध की पहली किताब 'इस राह से गुजरते हुए' के विमोचन का । डॉ नामवर सिंह ने उनकी किताब का विमोचन करने के बाद कहा कि उगते पौधे को नापा नहीं जाता । उन्होंने कहा कि वे बेहद खुश है कि गजानन माधव मुक्तिबोध के एक पुत्र ने तो कम से कम पत्रकारिता को चुना। हालांकि गजानन माधव मुक्तिबोध के कनिष्ठ पुत्र गिरीश भी पत्रकार है और ये बात शायद डॉ सिंह को पता नहीं थी। खैर जब डॉ नामवर सिंह को व्यावसायिक दबाव और पक्षधर पत्रकारिता पर बोलने के लिए कहा गया तो अपने स्वभाव ओर ख्याति के अनुरूप उन्होने विषय की जमकर आलोचना की और उसे सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा दबाव जैसे भ्रामक शब्द का इस्तेमाल करने की बजाय यहां प्रलोभन शब्द का इस्तेमाल होना था। उन्होंने साफ साफ कहा कि पत्रकारिता पर दबाव का नहीं प्रलोभन का खतरा ज्यादा है ।
पत्रकारों,अफसरों, नेताओं और साहित्यकारों से खचाखच भरे रायपुर प्रेस क्लब के हाल में डॉ . सिंह, सिंह की तरह बोलते चले गये। सब खामोश सुनते रहे । सुनने वालों में प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ।रमन सिंह समेत सारे दिग्गज आईएएस अफसर, जानेमाने पत्रकार और साहित्यकार शामिल थे। डॉ नामवर सिंह ने जो लय पकड़ी तो लगभग घंटे भर तक उन्होंने मुस्कुरा-मुस्कुरा कर देश के मौजुदा हालात का पोस्टमार्टम कर दिया। हाँ उन्होंने अपने व्याख्यान के दौरान निष्पक्ष शब्द की एक नई परिभाषा रखी। उन्होंने अपने ठेठ बनारसी अंदाज में कहा कि निष्पक्ष के मायने बिकाउ होता है। उन्होंने कहा कि जो ये कहे कि वो निष्पक्ष है आप समझ लीजिये वो कह रहा है कि वो बिकाऊ है जो दाम लगाए उसे खरीद सकता है। उन्होंने उदाहारण दिया कर्नाटक का और कहा कि वहां सरकार गिराई निष्पक्ष लोगों ने और बनाई भी उन्हीं लोगों ने। लोकतंत्र के चारों खंभे को हिलने की बात कहते हुए उन्होेंने न्यायपालिका की तो सीधे आलोचना नहीं की मगर विधायिका, कार्यपालिका और प्रेस की खिंचाई करने में तो उन्होंने रत्ती भर कसर नहीं छोड़ी। बेहद चुटीले अंदाज में उन्होंने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को आश्वस्त किया कि उनको प्रेस से डरने की जरूरत नहीं है क्योंकि यहां पूरा प्रेस जगत डरा हुआ है। उन्होंने कहा कि वो जमाना गया जब सरकार प्रेस से डरती थी। अब तो विज्ञापन का जमाना है। उनकी इस बात पर मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह मुस्कुराकर रह गए और प्रेस क्लब अध्यक्ष होने के नाते मंच पर उनके साथ बैठा मैं भी उस कड़वे सच से कसमसा कर रह गया। सिर्फ प्रेस को ही नहीं कार्यपालिका और विधायिका की भी बखिया उधेड़ने में डॉ.सिह ने कोई कसर नहीं छोड़ी। इलेक्ट्रानिक मीडिया को प्रिंट मीडिया के लिये खतरा नहीं माना डॉ. नामवर सिंह ने। उन्होंने कहा कि भाषाई पत्रकारिता आज भी असरकारक है बशर्तें उसे अपनी बोलचाल की भाषा और चालू मुहावरों की कीमत पता रहें। इस अवसर पर उन्होंने बनारस के ही पराड़कर को भी याद किया और कहा कि अब हिन्दी अखबारों में पाठकों की चिट्ठी का महत्व वैसा नहीं रह गया। राष्ट्रभाषा हिन्दी पर भी बोलने से नहीं चूके डॉ नामवर सिंह। उन्होंने कहा कि राष्ट्रभाषा का उपयोग नेता ही कर रहें है। वो फाइलों पर हिन्दी लिख रहें है क्या लिखते है उन्हें ही समझा नहीं आता और पढ़ने वाले अफसर भी नहीं समझ पाते है। दिवाकर मुक्तिबोध की पहली पुस्तक 'इस राह से गुजरते हुए' पर तो उन्होंने कुछ नहीं कहा क्योंकि किताब वे पढ़ नहीं पाये। लेकिन उन्होंने यह कहकर सबको हसने पर मजबूर कर दिया कि असली मास्टर वहीं है जो बिना किताब देखे एक पीरियड ले ले। उन्होने कहा ये झांसा मै भी दे सकता हूँ और बिना लाग-लपेटे के डॉ. नामवर सिंह ने वो सब कुछ कह दिया जिसे सिर्फ सुनना नहीं उस पर अमल करना भी जरूरी है।
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