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Monday, July 27, 2015
मानवाधिकार के नाम पर आतंकी को फांसी न देने की अपील करने वालों देखो एक एसपी शहीद हो गया
गुरुदासपुर के एसपी आतंकी हमले में शहीद हो गये.अब इस बात पर दुनिय भर की राजनीति भी गई और तर्क कुतर्क भी.इन सब के बीच शहीद एसपी का परिवार ज़िंदगी भर न भुलाये जाने वाले गम को सहने पर मज़बूर हो जायेगा.फिर एक आतंकी की फांसी पर इंसानियत का मुलम्मा चढाने वाले मानवाधिकार के ठेकेदार और फांसी न देने की अपील के बहाने आतंकियों को अप्रत्यक्ष रुप से सपोर्ट करने वालों को शायद एक एसपी शहादत नज़र नही आयेगी?उन्हे शहीद के परिवार के मान्वाधिकार नज़र नही आयेंगे?उनकी इंसानियत कंही कोने में दुबक जायेगी?उनकी मुखरता कंही किसी कोने में मुंह छिपा लेगी.हद है बेशर्मी की.मानवाधिकार के नाम पर आतंकी की फांसी पर पुनरविचार करने वालों को भेजना चाहिये ऎसे समय पर आतंकियों से मुक़ाबला करने.हद है बेशर्मी की और इंसानियत के बहाने आतंकियों की पैरवी करने की.
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Sunday, October 10, 2010
बच्चों को तक मार रहें हैं,महिलाओं को जीन्स पहनने से मना कर रहे हैं,क्या इसे ही कहते हैं अन्याय के खिलाफ़ संघर्ष?
बच्चों तक को मार रहें हैं,महिलाओं को जीन्स पहनने से मना कर रहे हैं,क्या इसे ही कहते हैं अन्याय के खिलाफ़ संघर्ष?जीं हां इस इलाके मे नक्सली यही सब कर रहे हैं और इसे वे अन्याय और व्यव्स्था के खिलाफ़ विचारधारा या सशस्त्र संघर्ष कहते हैं।अफ़सोस की बात तो ये है कि उनके इस सुर मे एक नही अनेकों बेसुरे बिना जाने-बूझे सुर मिला रहे हैं।छत्तीसगढ के नक्सल प्रभावित इलाकों से लगे महाराष्ट्र के गढचिरोली मे नक्सलियों ने चार स्कूली छात्रों को मार डाला और पडोसी राज्य उड़ीसा के मल्कानगिरी इलाके मे पोस्टर लगाकर महिलाओं को जीन्स और अन्य कथित उत्तेजक पोशाक पहने पर प्रतिबंध की घोषणा थोप दी।
अब सवाल ये उठता है कि उनके सुर मे सुर मिलाने वालों में सबसे आगे रहने वाली अरुंधती राय को महिलाओं को जीन्स पहनने से रोकने वाला ये नक्सली फ़रमान क्या महिलाओं की स्वतंत्रता का हनन नज़र नही आता?ऐसा करके नक्सली किस अन्याय के खिलाफ़ संघर्ष कर रहे हैं?ज़रा सी बात पर महिलाओं के अधिकारों का रोना रोने वाली महिला अधिकारवादी भी पता नही क्यों खामोश हैं?क्या अब नक्सलियों को कोई पिंक चड्डी पहनाने की हिम्मत दिखयेंगी?
खैर जाने दिजीये,अरूंधति को तो जीन्स पहनने से नही रोका है ना नक्सलियों ने?उन्हे तो लगता है बस खुद से मतलब है इसलिये नक्सली अब चाहे तो मल्कानगिरी की महिलाओं को जीन्स पहनने से रोके या फ़िर लोकतंत्र की शिक्षा देने वाली पढाई से रोके उन्हे कोई फ़र्क़ नही पड़ने वाला।फ़िर जो नक्सली लोकतंत्र के महाकुम्भ चुनाओं का बहिष्कार करने की बात करते हैं,उससे तक़ अरुंधति को परहेज़ नही है तो बाकी सब किस खेत की मूली है।
हैरानी की बात तो ये है ज़रा-ज़रा सी बात पर मानवाधिकारों का उल्लंघन कहकर बवाल मचाने वाले भी खामोश हैं।एक नही चार-चार स्कूली बच्चे मारे गये और वे खामोश ही हैं।पहले तो ज़रा-ज़रा सी बात पर दिल्ली में बैठे कथित अधिकारवादी लोग दौड़े चले आते थे और कमाल की बात देखिये चंद घंटों मे ही वे प्रदेश मे सरकार के नही होने की घोषणा कर देते थे।चंद घंटे इसलिये कह रहा हूं कि हवाई जहाज से उतरने और फ़्रेश-वेश होकर सड़क मार्ग से बस्तर जाकर वापस रायपुर लौटकर हवाई जहाज मे चढने के बीच बड़ी मुश्किल से कुछ घण्टे ही मिल पाते हैं।और इतने कम समय पहले से ही सब कुछ रट-रूटाकर आये मिट्ठू वो सब देख डालते हैं जिसे देखने के लिये एक नही कई दिन भी काफ़ी नही है।
अब नही आ रहे हैं वो पेड़ मिट्ठूओं के झुंड्।मिट्ठू की जगह कुछ समय तक मैनाओं को भी भेजा गया मगर वे भी अब खामोश है।पता नही क्यों ?हो सकता है कुछ लोग इसे सद्बुद्धी आना समझे या लौट के बु…… ना ना ना।गलतफ़हमी मे मत रहिये।हो सकता है रूदलियां पेमेंट बढाने के नाम पर खामोश हो।या फ़िर पहचान लिये जाने के कारण चेहरा बदले में लगी हों?चाहे जो भी हो,मेरा तो उनसे बस यही सवाल है कि क्या स्कूली बच्चों को ढाल बनाना?क्या स्कूली बच्चों की मौत? क्या महिलाओं को जीन्स पहनने से रोकना?मानवाधिकारों का हनन नही है?या ऐसा करना किस अन्याय और शोषण के खिलाफ़ संघर्ष है?मेरे हिसाब से तो अब ऐसे संघर्ष को विचारधारा कहना भी गलत होगा,ऐसा मैं मानता हूं।आपको क्या लगता है,बताईयेगा ज़रूर्।
अब सवाल ये उठता है कि उनके सुर मे सुर मिलाने वालों में सबसे आगे रहने वाली अरुंधती राय को महिलाओं को जीन्स पहनने से रोकने वाला ये नक्सली फ़रमान क्या महिलाओं की स्वतंत्रता का हनन नज़र नही आता?ऐसा करके नक्सली किस अन्याय के खिलाफ़ संघर्ष कर रहे हैं?ज़रा सी बात पर महिलाओं के अधिकारों का रोना रोने वाली महिला अधिकारवादी भी पता नही क्यों खामोश हैं?क्या अब नक्सलियों को कोई पिंक चड्डी पहनाने की हिम्मत दिखयेंगी?
खैर जाने दिजीये,अरूंधति को तो जीन्स पहनने से नही रोका है ना नक्सलियों ने?उन्हे तो लगता है बस खुद से मतलब है इसलिये नक्सली अब चाहे तो मल्कानगिरी की महिलाओं को जीन्स पहनने से रोके या फ़िर लोकतंत्र की शिक्षा देने वाली पढाई से रोके उन्हे कोई फ़र्क़ नही पड़ने वाला।फ़िर जो नक्सली लोकतंत्र के महाकुम्भ चुनाओं का बहिष्कार करने की बात करते हैं,उससे तक़ अरुंधति को परहेज़ नही है तो बाकी सब किस खेत की मूली है।
हैरानी की बात तो ये है ज़रा-ज़रा सी बात पर मानवाधिकारों का उल्लंघन कहकर बवाल मचाने वाले भी खामोश हैं।एक नही चार-चार स्कूली बच्चे मारे गये और वे खामोश ही हैं।पहले तो ज़रा-ज़रा सी बात पर दिल्ली में बैठे कथित अधिकारवादी लोग दौड़े चले आते थे और कमाल की बात देखिये चंद घंटों मे ही वे प्रदेश मे सरकार के नही होने की घोषणा कर देते थे।चंद घंटे इसलिये कह रहा हूं कि हवाई जहाज से उतरने और फ़्रेश-वेश होकर सड़क मार्ग से बस्तर जाकर वापस रायपुर लौटकर हवाई जहाज मे चढने के बीच बड़ी मुश्किल से कुछ घण्टे ही मिल पाते हैं।और इतने कम समय पहले से ही सब कुछ रट-रूटाकर आये मिट्ठू वो सब देख डालते हैं जिसे देखने के लिये एक नही कई दिन भी काफ़ी नही है।
अब नही आ रहे हैं वो पेड़ मिट्ठूओं के झुंड्।मिट्ठू की जगह कुछ समय तक मैनाओं को भी भेजा गया मगर वे भी अब खामोश है।पता नही क्यों ?हो सकता है कुछ लोग इसे सद्बुद्धी आना समझे या लौट के बु…… ना ना ना।गलतफ़हमी मे मत रहिये।हो सकता है रूदलियां पेमेंट बढाने के नाम पर खामोश हो।या फ़िर पहचान लिये जाने के कारण चेहरा बदले में लगी हों?चाहे जो भी हो,मेरा तो उनसे बस यही सवाल है कि क्या स्कूली बच्चों को ढाल बनाना?क्या स्कूली बच्चों की मौत? क्या महिलाओं को जीन्स पहनने से रोकना?मानवाधिकारों का हनन नही है?या ऐसा करना किस अन्याय और शोषण के खिलाफ़ संघर्ष है?मेरे हिसाब से तो अब ऐसे संघर्ष को विचारधारा कहना भी गलत होगा,ऐसा मैं मानता हूं।आपको क्या लगता है,बताईयेगा ज़रूर्।
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Monday, January 18, 2010
बिके हुये लोग मीडिया को बिकाऊ कह रहे हैं,हद हो गई बेशर्मी की और बर्दाश्त की भी!अब किसी ने कुछ कहा तो मुंह-तोड़ जवाब दिया जायेगा!
पिछ्ले कुछ समय से देखने मे आ रहा था कि नक्सलियों के प्रायोजित कार्यक्रम के तहत दिल्ली और अन्य महानगरों से तथाकथित समाजसेवी,मानवाधिकारवादी और पत्रकार यंहा आकर मीडिया को गैरज़िम्मेदार और बिकाऊ ठहराने पर तुले हुये हैं।वे यंहा आकर मीडिया को भी दो फ़ाड़ करने की कोशिश मे भी लगे हुये नज़र आ रहे हैं।नक्सलियों के प्रमुख हथियार प्रचार युद्ध मे भोंपू की तरह बज़ने वाले ये लोग यंहा आने-जाने की टिकट से लेकर रूकने_ठहरने की व्यवस्था तक़ उन्ही लोगों से करवाकर आते हैं तो बताईये बिकाऊ वे लोग हुये या जो लोग जान-माल और नौकरी का खतरा उठा कर बस्तर के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों मे पत्रकारिता कर रहे हैं,वे लोग बिकाऊ हैं।
बर्दाश्त की भी हद होती है।जो आता है हवाई जहाज से राजधानी मे उतरकर सीधे बस्तर चला जाता है और कमाल देखिये एक दिन मे ही उसे बस्तर नर्क जैसा नज़र आता है और इसके लिये वे ज़िम्मेदारी भी तय कर देते हैं,सरकार की।सरकार से हमको लेना देना नही है लेकिन इन लोगों के मुंह से एक लफ़्ज़ भी नक्सलियों के खिलाफ़ नही निकलता।लाखों सवाल करने पर भी उनका जवाब होता है अगर सरकार ठीक काम करे तो सब ठीक हो जायेगा।बस्तर को निर्दोष आदिवासिओं और पुलिस वालों के खून से लाल कर देने वाले नक्सलियों के मारे जाने पर तो इन्हे मानवाधिकार नज़र आता है मगर वो मानवो का अधिकार सिर्फ़ उनके मानवो के लिये ही होता है।बस्तर के निर्दोष आदिवासियों और पुलिस वालों के लिये शायद वो अधिकार नही है।
खैर ये उनका अपना विचार हो सकता है,उनकी नीति हो सकती है मगर इसका मतलब ये तो नही है जो उनके साथ है वे सही है और जो उनके साथ नही है वे सब गैरज़िम्मेदार और बिकाऊ हैं।आपको अपने धर्म का पालन करने का तो अधिकार है लेकिन इसका मतलब ये तो नही की आप दूसरे के धर्म को गालियां बकें।नक्सलियों और उनके समर्थक संस्थाओं,कथित समाजसेवी और मानवाधिकार संगठनो के साथ यंहा आकर उनके हिसाब से दौरा कर और उनके नज़रिये से बस्तर की हालत देख कर उनके हिसाब से उसका प्रचार करने वाले भाड़े के भोंपू जब यंहा चिल्लाते है कि सब बिकाऊ हैं तो उनकी बुद्धी पर तरस आता है।जो यंहा न पैदा हुआ,न पला बढा,न यंहा रहा वो बताता है कि सच क्या है?वो बताता है जिसे मोटी रकम न मिले तो कभी बस्तर की सूरत तक़ न देखे?वो बताता है जो महज़ कुछ घण्टे ही पूरा बस्तर घूम लेता है?वो बताता है जो लौट कर फ़िर कभी नही आने वाला होता है बिना फ़ीस लिये?वो बताता है जिसे छत्तीसगढ या बस्तर से ज्यादा अपनी फ़ीस और अपने रिश्तेदारों के विदेशी मदद से चलने वाले एनजीओ को यंहा काम करने के बड़े-बड़े कांट्रेक्ट मिलने की चिंता होती है।
पूरे छत्तीसगढ के बारे मे दुष्प्रचार का एक सुनियोजित षड़यंत्र रचा जा रहा है और तरक्की की असीमित संभावनाओं से भरे बस्तर और छत्तीसगढ को अशांत क्षेत्र घोषित कर यंहा आ रहे उद्योगों के राह मे अड़ंगे डाले जा रहें हैं।विकास के नाम पर खूनी संघर्ष कर रहे लोग यदी विकास के इतने ही हिमायती हैं तो वे स्कूल,अस्पताल,पंचायत भवन और सड़को को क्यों नुकसान पंहुचाते हैं?क्यों वे विकास के रास्ते खोलने वाली सड़को को बनने से रोकते हैं?क्यों उन्हे अब दिल्ली के कथित मीडिया की ज़रूरत पड़ रही है?कल तक़ तो यहीं का मीडिया उन्हे बहुत पसंद था?उनके लोग भी तो हैं यंहा के मीडिया मे?वे भी तो उनके पक्ष मे खुलकर प्रचार अभियान चलाते हैं?उन्हे तो यंहा के लोग कुछ नही कहते। हम जानते हैं कि सबको अपनी विचारधारा तय करने का हक़ है।पसंद अपनी हो सकती है लेकिन इसका मतलब ये तो नही जो नापसंद करे उसे बिकाऊ और गैरज़िम्मेदार ठहराया जाये।
बहुत दिनो से ब्लाग जगत मे भी इन लोगों ने इस तरह का दुष्प्रचार युद्ध छेड़ रखा है।एक साथी ने तो यंहा तक़ लिख मारा कि यंहा के पत्रकारों को खबर नही लिखने के पैसे मिलते हैं।ये वही सज्जन है जो कभी मोटी रकम लेकर यंहा के एक अख़बार के लिये लिखा करते थे और जब वे बेनक़ाब हुये तो उन्हे कोई यंहा पूछ्ता तक़ नही है।झूठ तो ऐसा-ऐसा लिख रहे हैं कि उन्हे माफ़ करने को कतई दिल नही करता।अरे अगर बिके हुये हो तो उनका गाना गाओ,समझ मे आता है लेकिन यंहा के किसान भूख से मर रहे जैसा न बर्दाश्त होने वाला झूठा और बेसूरा राग तो मत छेड़ो।
अब जबकी पानी सर से गुज़रने लगा तो सारे साथियों ने ऐसे लोगों का विरोध करने और उन्हे सबक सिखाने की मांग की।काफ़ी विचार विमर्श के बाद मैने कल रविवार को प्रेस क्लब मे बैठक बुलाई।इस वजह से हम ब्लागरों की मीट भी मुझे कैंसिल करनी पड़ी।बैठक मे शुरुआती उपस्थिति कुछ कम नज़र आई लेकिन लोग आते चले गये और सबने एक स्वर में ऐसे लोगों को बेनक़ाब करने के साथ ही कड़ा सबक सिखाने की बात कही।सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया कि ऐसे लोगों को और उनसे जुड़े संगठनो और संस्थाओं को प्रेस क्लब अपनी बात रखने के लिये अब अपना मंच नही देगा।ऐसे लोगों के खिलाफ़ कानूनी कार्रवाई की जायेगी और ऐसे लोगों के खिलाफ़ जमकर विरोध प्रदर्श्न किया जायेगा,उस स्तर तक़ कि वो किसी को भी गैरज़िम्मेदार कहने से पहले सौ बार सोचें।
बर्दाश्त की भी हद होती है।जो आता है हवाई जहाज से राजधानी मे उतरकर सीधे बस्तर चला जाता है और कमाल देखिये एक दिन मे ही उसे बस्तर नर्क जैसा नज़र आता है और इसके लिये वे ज़िम्मेदारी भी तय कर देते हैं,सरकार की।सरकार से हमको लेना देना नही है लेकिन इन लोगों के मुंह से एक लफ़्ज़ भी नक्सलियों के खिलाफ़ नही निकलता।लाखों सवाल करने पर भी उनका जवाब होता है अगर सरकार ठीक काम करे तो सब ठीक हो जायेगा।बस्तर को निर्दोष आदिवासिओं और पुलिस वालों के खून से लाल कर देने वाले नक्सलियों के मारे जाने पर तो इन्हे मानवाधिकार नज़र आता है मगर वो मानवो का अधिकार सिर्फ़ उनके मानवो के लिये ही होता है।बस्तर के निर्दोष आदिवासियों और पुलिस वालों के लिये शायद वो अधिकार नही है।
खैर ये उनका अपना विचार हो सकता है,उनकी नीति हो सकती है मगर इसका मतलब ये तो नही है जो उनके साथ है वे सही है और जो उनके साथ नही है वे सब गैरज़िम्मेदार और बिकाऊ हैं।आपको अपने धर्म का पालन करने का तो अधिकार है लेकिन इसका मतलब ये तो नही की आप दूसरे के धर्म को गालियां बकें।नक्सलियों और उनके समर्थक संस्थाओं,कथित समाजसेवी और मानवाधिकार संगठनो के साथ यंहा आकर उनके हिसाब से दौरा कर और उनके नज़रिये से बस्तर की हालत देख कर उनके हिसाब से उसका प्रचार करने वाले भाड़े के भोंपू जब यंहा चिल्लाते है कि सब बिकाऊ हैं तो उनकी बुद्धी पर तरस आता है।जो यंहा न पैदा हुआ,न पला बढा,न यंहा रहा वो बताता है कि सच क्या है?वो बताता है जिसे मोटी रकम न मिले तो कभी बस्तर की सूरत तक़ न देखे?वो बताता है जो महज़ कुछ घण्टे ही पूरा बस्तर घूम लेता है?वो बताता है जो लौट कर फ़िर कभी नही आने वाला होता है बिना फ़ीस लिये?वो बताता है जिसे छत्तीसगढ या बस्तर से ज्यादा अपनी फ़ीस और अपने रिश्तेदारों के विदेशी मदद से चलने वाले एनजीओ को यंहा काम करने के बड़े-बड़े कांट्रेक्ट मिलने की चिंता होती है।
पूरे छत्तीसगढ के बारे मे दुष्प्रचार का एक सुनियोजित षड़यंत्र रचा जा रहा है और तरक्की की असीमित संभावनाओं से भरे बस्तर और छत्तीसगढ को अशांत क्षेत्र घोषित कर यंहा आ रहे उद्योगों के राह मे अड़ंगे डाले जा रहें हैं।विकास के नाम पर खूनी संघर्ष कर रहे लोग यदी विकास के इतने ही हिमायती हैं तो वे स्कूल,अस्पताल,पंचायत भवन और सड़को को क्यों नुकसान पंहुचाते हैं?क्यों वे विकास के रास्ते खोलने वाली सड़को को बनने से रोकते हैं?क्यों उन्हे अब दिल्ली के कथित मीडिया की ज़रूरत पड़ रही है?कल तक़ तो यहीं का मीडिया उन्हे बहुत पसंद था?उनके लोग भी तो हैं यंहा के मीडिया मे?वे भी तो उनके पक्ष मे खुलकर प्रचार अभियान चलाते हैं?उन्हे तो यंहा के लोग कुछ नही कहते। हम जानते हैं कि सबको अपनी विचारधारा तय करने का हक़ है।पसंद अपनी हो सकती है लेकिन इसका मतलब ये तो नही जो नापसंद करे उसे बिकाऊ और गैरज़िम्मेदार ठहराया जाये।
बहुत दिनो से ब्लाग जगत मे भी इन लोगों ने इस तरह का दुष्प्रचार युद्ध छेड़ रखा है।एक साथी ने तो यंहा तक़ लिख मारा कि यंहा के पत्रकारों को खबर नही लिखने के पैसे मिलते हैं।ये वही सज्जन है जो कभी मोटी रकम लेकर यंहा के एक अख़बार के लिये लिखा करते थे और जब वे बेनक़ाब हुये तो उन्हे कोई यंहा पूछ्ता तक़ नही है।झूठ तो ऐसा-ऐसा लिख रहे हैं कि उन्हे माफ़ करने को कतई दिल नही करता।अरे अगर बिके हुये हो तो उनका गाना गाओ,समझ मे आता है लेकिन यंहा के किसान भूख से मर रहे जैसा न बर्दाश्त होने वाला झूठा और बेसूरा राग तो मत छेड़ो।
अब जबकी पानी सर से गुज़रने लगा तो सारे साथियों ने ऐसे लोगों का विरोध करने और उन्हे सबक सिखाने की मांग की।काफ़ी विचार विमर्श के बाद मैने कल रविवार को प्रेस क्लब मे बैठक बुलाई।इस वजह से हम ब्लागरों की मीट भी मुझे कैंसिल करनी पड़ी।बैठक मे शुरुआती उपस्थिति कुछ कम नज़र आई लेकिन लोग आते चले गये और सबने एक स्वर में ऐसे लोगों को बेनक़ाब करने के साथ ही कड़ा सबक सिखाने की बात कही।सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया कि ऐसे लोगों को और उनसे जुड़े संगठनो और संस्थाओं को प्रेस क्लब अपनी बात रखने के लिये अब अपना मंच नही देगा।ऐसे लोगों के खिलाफ़ कानूनी कार्रवाई की जायेगी और ऐसे लोगों के खिलाफ़ जमकर विरोध प्रदर्श्न किया जायेगा,उस स्तर तक़ कि वो किसी को भी गैरज़िम्मेदार कहने से पहले सौ बार सोचें।
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Saturday, January 9, 2010
मेधा पाटकर समेत आधा दर्ज़न मानवाधिकारवादी पर प्रायोजित हमला हुआ और पुलिस तमाशाई की तरह खड़ी देखती रही
मेधा पाटकर समेत
आधा दर्ज़न मानवाधिकारवादी छत्तीसगढ के नक्सल प्रभावित बस्तर इलाके के दौर पर आये हुये थे।उनपर बस्तर के दन्तेवाड़ा मे अंडे फ़ेंके गये और धक्का-मुक्की भी की गई।वंहा पर मामला स्थानीय वर्सेस बाहरी पत्रकार बनाने मे पुलिस सफ़ल रही।और ऐसा ही कुछ प्रायोजित कार्यक्रम रायपुर मे भी होना था पर प्रायोजकों ने जगह गलत चुन ली।उन्होने प्रेस क्लब के सामने तमाशा खड़ा करना चाहा जिसका मुझे पहले ही अंदेशा था और इसलिये मैं घण्टे भर से ज्यादा समय वंही टिक कर बैठा रहा।पुलिस इस दौरान तमाशाई बनी खड़ी देखती रही और पुलिस का काम मुझे और मेरे साथियों को करना पड़ा।हम लोगों ने प्रदर्शनकारियों को जैसे तैसे हटाया और मानवाधिकारवादियों को उनके घेरे से निकाल कर रवाना किया।
मेधा पाटकर,संदीप पाण्डे
य और अन्य लोगों की ओर से कल से ही प्रेस कान्फ़्रेंस की अनुमती मांगी गई थी जिसे न देने का आग्रह,अनुरोध से लेकर दबाव मुझपर पहले से बनाने की कोशिश हो रही थी।इससे पहले बस्तर मे मेधा के साथ दिल्ली से आई पत्रकार का दन्तेवाड़ा के पत्रकारों से विवाद हो चुका था और मामला पुलिस थाने तक़ पहुंच गया था।मानवाधिकारवादियों से परेशान पुलिस ने इस मामले को हवा दी और मानवाधिकारवादियों पर अंडे फ़िंकवाये और उन पर हमला करवा दिया।इस मामले को और तूल देने की कोशिश की गई।
आधा दर्ज़न मानवाधिकारवादी छत्तीसगढ के नक्सल प्रभावित बस्तर इलाके के दौर पर आये हुये थे।उनपर बस्तर के दन्तेवाड़ा मे अंडे फ़ेंके गये और धक्का-मुक्की भी की गई।वंहा पर मामला स्थानीय वर्सेस बाहरी पत्रकार बनाने मे पुलिस सफ़ल रही।और ऐसा ही कुछ प्रायोजित कार्यक्रम रायपुर मे भी होना था पर प्रायोजकों ने जगह गलत चुन ली।उन्होने प्रेस क्लब के सामने तमाशा खड़ा करना चाहा जिसका मुझे पहले ही अंदेशा था और इसलिये मैं घण्टे भर से ज्यादा समय वंही टिक कर बैठा रहा।पुलिस इस दौरान तमाशाई बनी खड़ी देखती रही और पुलिस का काम मुझे और मेरे साथियों को करना पड़ा।हम लोगों ने प्रदर्शनकारियों को जैसे तैसे हटाया और मानवाधिकारवादियों को उनके घेरे से निकाल कर रवाना किया।मेधा पाटकर,संदीप पाण्डे
य और अन्य लोगों की ओर से कल से ही प्रेस कान्फ़्रेंस की अनुमती मांगी गई थी जिसे न देने का आग्रह,अनुरोध से लेकर दबाव मुझपर पहले से बनाने की कोशिश हो रही थी।इससे पहले बस्तर मे मेधा के साथ दिल्ली से आई पत्रकार का दन्तेवाड़ा के पत्रकारों से विवाद हो चुका था और मामला पुलिस थाने तक़ पहुंच गया था।मानवाधिकारवादियों से परेशान पुलिस ने इस मामले को हवा दी और मानवाधिकारवादियों पर अंडे फ़िंकवाये और उन पर हमला करवा दिया।इस मामले को और तूल देने की कोशिश की गई।इसी के तहत यंहा भी उनको बिना प्रेस कान्फ़्रेंस लिये विरोध करवा कर रवाना करने की यो
जना बनाई गई थी,जो मेरे प्रेस कान्फ़्रेंस की अनुमति देने से फ़ेल हो गई।इसके बाद प्रेस कान्फ़्रेंस लेने पहुंची मेधा पाटकर का विरोध करने के लिये प्रायोजित कार्यक्रम के तहत यंहा आश्रम मे रखे गये नक्सल वारदात मे मारे गये लोगों के बच्चों को सामने रखकर मेधा और उनके साथियों पर हमले की तैयारी थी जिसकी मुझे भनक लग गई थी।
जना बनाई गई थी,जो मेरे प्रेस कान्फ़्रेंस की अनुमति देने से फ़ेल हो गई।इसके बाद प्रेस कान्फ़्रेंस लेने पहुंची मेधा पाटकर का विरोध करने के लिये प्रायोजित कार्यक्रम के तहत यंहा आश्रम मे रखे गये नक्सल वारदात मे मारे गये लोगों के बच्चों को सामने रखकर मेधा और उनके साथियों पर हमले की तैयारी थी जिसकी मुझे भनक लग गई थी।मैं समय से पहले प्रेस क्लब मे जाकर जम गया।आधे घण्टे चलने वाली प्रेस कान्फ़्रेंस डेढ घण्टे चली और उसके बाद इलेक्ट्रानिक मीड़िया वालों का बाईट लेने का प्रोग्राम।सब खतम होने से पहले मैने संदीप पाण्डेय से बात की और उ
न्हे सारी स्थिती समझाई।गेट पर खड़ी भीड़ को देख कर वे भी सब समझ गये उसके बाद मेधा से बात कर उन्हे समझाने की कोशिश की गई।वे शुरु से लेकर आखिर तक़ यही कहती रही मैं उनसे बात करना चाह्ती हूं,लोग क्या कहेंगे मेधा बच्चों से बात किये बिना चली गई।मैने जब उनसे कहा वे बात करने आप का विरोध करने आये हैं तब जाकर वे बड़ी मुस्किल से कार मे बैठ कर सीधे रवाना होने के लिये तैयार हुई।इस बीच पुलिस को बार-बार सूचना दी गई।सबसे चौंकाने वाली बात तो ये है कि प्रेस क्लब के ठीक सामने सड़क के दूसरी ओर पुलिस की चौकी है।खैर पुलिस को नही आना था सो नही आई।
न्हे सारी स्थिती समझाई।गेट पर खड़ी भीड़ को देख कर वे भी सब समझ गये उसके बाद मेधा से बात कर उन्हे समझाने की कोशिश की गई।वे शुरु से लेकर आखिर तक़ यही कहती रही मैं उनसे बात करना चाह्ती हूं,लोग क्या कहेंगे मेधा बच्चों से बात किये बिना चली गई।मैने जब उनसे कहा वे बात करने आप का विरोध करने आये हैं तब जाकर वे बड़ी मुस्किल से कार मे बैठ कर सीधे रवाना होने के लिये तैयार हुई।इस बीच पुलिस को बार-बार सूचना दी गई।सबसे चौंकाने वाली बात तो ये है कि प्रेस क्लब के ठीक सामने सड़क के दूसरी ओर पुलिस की चौकी है।खैर पुलिस को नही आना था सो नही आई।तब मैं खुद बाहर निकला और दरवाज़े पर खड़ी भीड़ का नेतृत्व कर रहे लोगों से रास्ता छोड़ने के लिये कहा।पहले तो वे माने नही फ़िर जब मैंने ज़ोर ज़बर्दस्ती करने की बात कही तो किनारे खड़े होकर नारेबाज़ी करने पर मान गये।इस बीच मामला प्रेस क्लब और प्रदर्शनकारियों के बीच फ़ंसते देख पुलिस का थानेदार अपनी टीम के साथ वंहा आ गया मगर वो सिर्फ़ शो-पीस ही बना रहा।सब तय होने के बाद मैंने मेधा और उनके साथियों को कार मे बैठ कार रवाना होने के लिये राज़ी किया और खुद साथ सामने जाकर रास्ता साफ़ करने की एक बार फ़िर कोशिश की।इस बीच प्रायोजित प्रदर्शनकारी भी किनारे खड़े होकर मेधा का इंतज़ार करने लगे और जैसे ही मेधा का काफ़िला गेट पर पंहुचा उन्होने बच्चों को कार के सामने कर दिया और नारेबाज़ी शुरू कर दी।इस स्थिती के लिये मैं पहले से तैयार था।सो मैं और मेरे साथियों ने सीधे प्रदर्शनकारीयों को धकेलना शुरु किया और गुस्से मे मैने उन्हे गालियां भी बकी।तब तक़ स्थिती बिगड़ने की आशंका से किनारे खड़ी तमाशा देख रही पुलिस भी भीड़ मे शामिल हो गई।लेकिन उनका इंतज़ार किये बिना ही प्रेस क्लब की टीम ने सब को धकिया कर पीछे किया और मेधा के काफ़िले को वंहा से रवाना किया।उनके रवाना होने के बाद ही सबने चैन की सांस ली और क्लब आये मेहमान को एक प्रायोजित हमले का शिकार होने से बचा लिया।
Sunday, July 12, 2009
अब तो बर्दाश्त से बाहर हो गया नक्सलियों का उत्पात!एस पी समेत 30 को मार डाला!क्या अब भी खामोश रहेंगे मानवाधिकारवादी?
सुबह राजनांदगांव के मदनवाड़ा इलाके मे नक्सलियों ने पुलिस पार्टी पर हमला किया और घिरे हुये जवानो की मदद के लिये एसपी विनोद चौबे खुद वंहा जाने के निकले मगर वे अपने मातहत जवानो की मदद नही कर पाये और शहीद हो गये।ये पहला नक्सल हमला है जिसमे एस पी रैंक का अफ़सर शहीद हुआ है।इसके पहले एडीशनल एस पी भास्कर दीवान शहीद हुये थे।इस हमले मे नक्सलियो ने उस इलाके मे दह्शत के अपने साम्राज्य को और बढा लिया है।एक नही तीस-तीस पुलिस वाले शहीद हुयें है।क्या इस पिछडे इलाके मे आये दिन आकर नक्सलियो की मदद के आरोप मे जेल मे बंद एक डाक्टर की रिहाई के लिये आंदोलन चलाने वाले मानवाधिकारवादी इस मामले मे मुंह खोलेंगे या उनके लिये शहीद का मतलब सिर्फ़ पुलिस के हाथों मरने वाले नक्सली ही हैं।उनकी खामोशी अब तो बर्दाश्त से बाहर हो रही है साथ ही नक्सलियों का उत्पात भी !एस पी समेत 30 को मार डाला गया !क्या अब भी खामोश रहेंगे मानवाधिकारवादी?एस पी विनोद चौबे पिछले ढाई साल से राजनांदगांव ज़िले के एस पी थे।वे काफ़ी समय तक़ रायपुर मे भी पदस्थ रहे हैं।इससे पहले सरगुजा ईलाके मे भी नक्स्लियों के खिलाफ़ उन्होने बढिया काम किया था।राजनांदगांव मे भी उन्हे आम आदमी का पुलिस वाला समझा जाता था।बेहद सरल स्वभाव के इस अफ़सर को बहुत से लोग पुलिस अफ़सर से ज्यादा विचारक और समाज सुधारक मानते हैं।ईमानदारी के मामले मे उनका नाम पुलिस की लिस्ट मे शीर्ष पर था और सच पूछा जाये तो उनमे वर्तमान पुलिसिया गुण तो नाम मात्र को नही थे।उनकी शहादत की खबर की पुष्टी से इलाके मे शोक की लहर दौड़ गई। शहीद विनोद चौबे समेत सारे शहीद जवानो को आखिरी सलाम्।
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Thursday, May 28, 2009
डा बिनायक सेन की रिहाई पर पर्चे बांट कर खुशियां मना रहे है नक्सली!इसे क्या कहेंगे मानवाधिकारवादी!
कहने को बहुत कुछ है मगर ज्यादा नही कहुंगा।बस कुछ लाईनो मे छत्तीसगढ मे जो हो रहा है उसे सामने रख रहा हूं जस का तस। नक्सलियो ने छत्तीसगढ मे अपनी गतिविधियां ज़ारी रखी है।उन्होने डोंगरगढ इलाके मे एक निजी मोबाईल कंपनी के टावर को उड़ा दिया और नारायणपुर क्षेत्र मे एक टिप्पर जला दिया।वंहा उन्होने लाल स्याही से लिखे पर्चे भी छोड़े हैं।पर्चों मे साफ़ लिखा है बिनायक सेन की रिहाई पर खुशियां मनाओ।जेल मे बंद बाकी कामरेड़ों के लिये आंदोलन तेज़ करो।साम्राज्यवाद,पूंजीवाद टाटा,एस्सार और रावघाट परियोजना का विरोध करो।अब इसे क्या कहेंगे कथित मानवाधिकारवादी और उनके समर्थक। हम तो बस इतना कहेंगे कि दाल मे कुछ न कुछ काला है नक्सलियों के पर्चे इस बात का सबूत है।
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