बच्चों तक को मार रहें हैं,महिलाओं को जीन्स पहनने से मना कर रहे हैं,क्या इसे ही कहते हैं अन्याय के खिलाफ़ संघर्ष?जीं हां इस इलाके मे नक्सली यही सब कर रहे हैं और इसे वे अन्याय और व्यव्स्था के खिलाफ़ विचारधारा या सशस्त्र संघर्ष कहते हैं।अफ़सोस की बात तो ये है कि उनके इस सुर मे एक नही अनेकों बेसुरे बिना जाने-बूझे सुर मिला रहे हैं।छत्तीसगढ के नक्सल प्रभावित इलाकों से लगे महाराष्ट्र के गढचिरोली मे नक्सलियों ने चार स्कूली छात्रों को मार डाला और पडोसी राज्य उड़ीसा के मल्कानगिरी इलाके मे पोस्टर लगाकर महिलाओं को जीन्स और अन्य कथित उत्तेजक पोशाक पहने पर प्रतिबंध की घोषणा थोप दी।
अब सवाल ये उठता है कि उनके सुर मे सुर मिलाने वालों में सबसे आगे रहने वाली अरुंधती राय को महिलाओं को जीन्स पहनने से रोकने वाला ये नक्सली फ़रमान क्या महिलाओं की स्वतंत्रता का हनन नज़र नही आता?ऐसा करके नक्सली किस अन्याय के खिलाफ़ संघर्ष कर रहे हैं?ज़रा सी बात पर महिलाओं के अधिकारों का रोना रोने वाली महिला अधिकारवादी भी पता नही क्यों खामोश हैं?क्या अब नक्सलियों को कोई पिंक चड्डी पहनाने की हिम्मत दिखयेंगी?
खैर जाने दिजीये,अरूंधति को तो जीन्स पहनने से नही रोका है ना नक्सलियों ने?उन्हे तो लगता है बस खुद से मतलब है इसलिये नक्सली अब चाहे तो मल्कानगिरी की महिलाओं को जीन्स पहनने से रोके या फ़िर लोकतंत्र की शिक्षा देने वाली पढाई से रोके उन्हे कोई फ़र्क़ नही पड़ने वाला।फ़िर जो नक्सली लोकतंत्र के महाकुम्भ चुनाओं का बहिष्कार करने की बात करते हैं,उससे तक़ अरुंधति को परहेज़ नही है तो बाकी सब किस खेत की मूली है।
हैरानी की बात तो ये है ज़रा-ज़रा सी बात पर मानवाधिकारों का उल्लंघन कहकर बवाल मचाने वाले भी खामोश हैं।एक नही चार-चार स्कूली बच्चे मारे गये और वे खामोश ही हैं।पहले तो ज़रा-ज़रा सी बात पर दिल्ली में बैठे कथित अधिकारवादी लोग दौड़े चले आते थे और कमाल की बात देखिये चंद घंटों मे ही वे प्रदेश मे सरकार के नही होने की घोषणा कर देते थे।चंद घंटे इसलिये कह रहा हूं कि हवाई जहाज से उतरने और फ़्रेश-वेश होकर सड़क मार्ग से बस्तर जाकर वापस रायपुर लौटकर हवाई जहाज मे चढने के बीच बड़ी मुश्किल से कुछ घण्टे ही मिल पाते हैं।और इतने कम समय पहले से ही सब कुछ रट-रूटाकर आये मिट्ठू वो सब देख डालते हैं जिसे देखने के लिये एक नही कई दिन भी काफ़ी नही है।
अब नही आ रहे हैं वो पेड़ मिट्ठूओं के झुंड्।मिट्ठू की जगह कुछ समय तक मैनाओं को भी भेजा गया मगर वे भी अब खामोश है।पता नही क्यों ?हो सकता है कुछ लोग इसे सद्बुद्धी आना समझे या लौट के बु…… ना ना ना।गलतफ़हमी मे मत रहिये।हो सकता है रूदलियां पेमेंट बढाने के नाम पर खामोश हो।या फ़िर पहचान लिये जाने के कारण चेहरा बदले में लगी हों?चाहे जो भी हो,मेरा तो उनसे बस यही सवाल है कि क्या स्कूली बच्चों को ढाल बनाना?क्या स्कूली बच्चों की मौत? क्या महिलाओं को जीन्स पहनने से रोकना?मानवाधिकारों का हनन नही है?या ऐसा करना किस अन्याय और शोषण के खिलाफ़ संघर्ष है?मेरे हिसाब से तो अब ऐसे संघर्ष को विचारधारा कहना भी गलत होगा,ऐसा मैं मानता हूं।आपको क्या लगता है,बताईयेगा ज़रूर्।