मालेगांव मे एडीएम को जलाने की घटना को अभी लोग भूल भी नही पाये हैं कि छत्तीसगढ में ग्राम पाली में चोरों ने दो पुलिस वालों की पीट-पीट कर मार डाला।तीन घायल हैं जिनका इलाज चल रहा है।एक एस आई और एक हवलदार ने इस वारदात मे अपनी जान गवाई है।पुलिस पार्टी हाई-टेंशन तारों की चोरी करने वाले गिरोह को पकड़ने के लिये गई थी।आर पी एफ़ की टीम के गांव पहुंचने की भनक लगते ही चोरों ने उन्हे रास्ते मे ही घेर कर हमला कर दिया और लाठियों से पीट-पीट कर अधमरा कर दिया और उनकी गाड़ी मे फ़रार हो गये।हवलदार ने तो वंही दम तोड़ दिया और एस आई ने अस्पताल में।
इस घटना ने ये साबित कर दिया है कि अपराधियों में पुलिस का कोई डर नही रहा।चाहे वे मालेगांव के हो पाली के,महाराष्ट्र के हो या छत्तीसगढ के।सभी जगह अपराधियों के हौसले बुलंद है और इसके पीछे के कारणों को ढूंढना बहुत जरूरी हो गया है।आमतौर पर शांत समझे जाने वाले(नक्सल हिंसा को छोड़कर)छत्तीसगढ राज्य में पुलिस पार्टी पर जानलेवा हमला कभी नही हुआ।ये एक खतरनाक संकेत हैं जिस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिये और अपराधियों के खिलाफ़ कठोर कदम उठाये जाने चाहिये ताकि उनके बढते हौसले पर लगाम लग सके।
अब कारण चाहे जो भी हो, राजनैतिक सरंक्षण हो या आर्थिक, सभी प्रकार के सरंक्षको को सचेत करने और उन्हे दूर करने का समय आ गया है वर्ना आम आदमी का जीना हराम हो जायेगा।
Showing posts with label maharshtra. Show all posts
Showing posts with label maharshtra. Show all posts
Friday, February 4, 2011
Sunday, October 10, 2010
बच्चों को तक मार रहें हैं,महिलाओं को जीन्स पहनने से मना कर रहे हैं,क्या इसे ही कहते हैं अन्याय के खिलाफ़ संघर्ष?
बच्चों तक को मार रहें हैं,महिलाओं को जीन्स पहनने से मना कर रहे हैं,क्या इसे ही कहते हैं अन्याय के खिलाफ़ संघर्ष?जीं हां इस इलाके मे नक्सली यही सब कर रहे हैं और इसे वे अन्याय और व्यव्स्था के खिलाफ़ विचारधारा या सशस्त्र संघर्ष कहते हैं।अफ़सोस की बात तो ये है कि उनके इस सुर मे एक नही अनेकों बेसुरे बिना जाने-बूझे सुर मिला रहे हैं।छत्तीसगढ के नक्सल प्रभावित इलाकों से लगे महाराष्ट्र के गढचिरोली मे नक्सलियों ने चार स्कूली छात्रों को मार डाला और पडोसी राज्य उड़ीसा के मल्कानगिरी इलाके मे पोस्टर लगाकर महिलाओं को जीन्स और अन्य कथित उत्तेजक पोशाक पहने पर प्रतिबंध की घोषणा थोप दी।
अब सवाल ये उठता है कि उनके सुर मे सुर मिलाने वालों में सबसे आगे रहने वाली अरुंधती राय को महिलाओं को जीन्स पहनने से रोकने वाला ये नक्सली फ़रमान क्या महिलाओं की स्वतंत्रता का हनन नज़र नही आता?ऐसा करके नक्सली किस अन्याय के खिलाफ़ संघर्ष कर रहे हैं?ज़रा सी बात पर महिलाओं के अधिकारों का रोना रोने वाली महिला अधिकारवादी भी पता नही क्यों खामोश हैं?क्या अब नक्सलियों को कोई पिंक चड्डी पहनाने की हिम्मत दिखयेंगी?
खैर जाने दिजीये,अरूंधति को तो जीन्स पहनने से नही रोका है ना नक्सलियों ने?उन्हे तो लगता है बस खुद से मतलब है इसलिये नक्सली अब चाहे तो मल्कानगिरी की महिलाओं को जीन्स पहनने से रोके या फ़िर लोकतंत्र की शिक्षा देने वाली पढाई से रोके उन्हे कोई फ़र्क़ नही पड़ने वाला।फ़िर जो नक्सली लोकतंत्र के महाकुम्भ चुनाओं का बहिष्कार करने की बात करते हैं,उससे तक़ अरुंधति को परहेज़ नही है तो बाकी सब किस खेत की मूली है।
हैरानी की बात तो ये है ज़रा-ज़रा सी बात पर मानवाधिकारों का उल्लंघन कहकर बवाल मचाने वाले भी खामोश हैं।एक नही चार-चार स्कूली बच्चे मारे गये और वे खामोश ही हैं।पहले तो ज़रा-ज़रा सी बात पर दिल्ली में बैठे कथित अधिकारवादी लोग दौड़े चले आते थे और कमाल की बात देखिये चंद घंटों मे ही वे प्रदेश मे सरकार के नही होने की घोषणा कर देते थे।चंद घंटे इसलिये कह रहा हूं कि हवाई जहाज से उतरने और फ़्रेश-वेश होकर सड़क मार्ग से बस्तर जाकर वापस रायपुर लौटकर हवाई जहाज मे चढने के बीच बड़ी मुश्किल से कुछ घण्टे ही मिल पाते हैं।और इतने कम समय पहले से ही सब कुछ रट-रूटाकर आये मिट्ठू वो सब देख डालते हैं जिसे देखने के लिये एक नही कई दिन भी काफ़ी नही है।
अब नही आ रहे हैं वो पेड़ मिट्ठूओं के झुंड्।मिट्ठू की जगह कुछ समय तक मैनाओं को भी भेजा गया मगर वे भी अब खामोश है।पता नही क्यों ?हो सकता है कुछ लोग इसे सद्बुद्धी आना समझे या लौट के बु…… ना ना ना।गलतफ़हमी मे मत रहिये।हो सकता है रूदलियां पेमेंट बढाने के नाम पर खामोश हो।या फ़िर पहचान लिये जाने के कारण चेहरा बदले में लगी हों?चाहे जो भी हो,मेरा तो उनसे बस यही सवाल है कि क्या स्कूली बच्चों को ढाल बनाना?क्या स्कूली बच्चों की मौत? क्या महिलाओं को जीन्स पहनने से रोकना?मानवाधिकारों का हनन नही है?या ऐसा करना किस अन्याय और शोषण के खिलाफ़ संघर्ष है?मेरे हिसाब से तो अब ऐसे संघर्ष को विचारधारा कहना भी गलत होगा,ऐसा मैं मानता हूं।आपको क्या लगता है,बताईयेगा ज़रूर्।
अब सवाल ये उठता है कि उनके सुर मे सुर मिलाने वालों में सबसे आगे रहने वाली अरुंधती राय को महिलाओं को जीन्स पहनने से रोकने वाला ये नक्सली फ़रमान क्या महिलाओं की स्वतंत्रता का हनन नज़र नही आता?ऐसा करके नक्सली किस अन्याय के खिलाफ़ संघर्ष कर रहे हैं?ज़रा सी बात पर महिलाओं के अधिकारों का रोना रोने वाली महिला अधिकारवादी भी पता नही क्यों खामोश हैं?क्या अब नक्सलियों को कोई पिंक चड्डी पहनाने की हिम्मत दिखयेंगी?
खैर जाने दिजीये,अरूंधति को तो जीन्स पहनने से नही रोका है ना नक्सलियों ने?उन्हे तो लगता है बस खुद से मतलब है इसलिये नक्सली अब चाहे तो मल्कानगिरी की महिलाओं को जीन्स पहनने से रोके या फ़िर लोकतंत्र की शिक्षा देने वाली पढाई से रोके उन्हे कोई फ़र्क़ नही पड़ने वाला।फ़िर जो नक्सली लोकतंत्र के महाकुम्भ चुनाओं का बहिष्कार करने की बात करते हैं,उससे तक़ अरुंधति को परहेज़ नही है तो बाकी सब किस खेत की मूली है।
हैरानी की बात तो ये है ज़रा-ज़रा सी बात पर मानवाधिकारों का उल्लंघन कहकर बवाल मचाने वाले भी खामोश हैं।एक नही चार-चार स्कूली बच्चे मारे गये और वे खामोश ही हैं।पहले तो ज़रा-ज़रा सी बात पर दिल्ली में बैठे कथित अधिकारवादी लोग दौड़े चले आते थे और कमाल की बात देखिये चंद घंटों मे ही वे प्रदेश मे सरकार के नही होने की घोषणा कर देते थे।चंद घंटे इसलिये कह रहा हूं कि हवाई जहाज से उतरने और फ़्रेश-वेश होकर सड़क मार्ग से बस्तर जाकर वापस रायपुर लौटकर हवाई जहाज मे चढने के बीच बड़ी मुश्किल से कुछ घण्टे ही मिल पाते हैं।और इतने कम समय पहले से ही सब कुछ रट-रूटाकर आये मिट्ठू वो सब देख डालते हैं जिसे देखने के लिये एक नही कई दिन भी काफ़ी नही है।
अब नही आ रहे हैं वो पेड़ मिट्ठूओं के झुंड्।मिट्ठू की जगह कुछ समय तक मैनाओं को भी भेजा गया मगर वे भी अब खामोश है।पता नही क्यों ?हो सकता है कुछ लोग इसे सद्बुद्धी आना समझे या लौट के बु…… ना ना ना।गलतफ़हमी मे मत रहिये।हो सकता है रूदलियां पेमेंट बढाने के नाम पर खामोश हो।या फ़िर पहचान लिये जाने के कारण चेहरा बदले में लगी हों?चाहे जो भी हो,मेरा तो उनसे बस यही सवाल है कि क्या स्कूली बच्चों को ढाल बनाना?क्या स्कूली बच्चों की मौत? क्या महिलाओं को जीन्स पहनने से रोकना?मानवाधिकारों का हनन नही है?या ऐसा करना किस अन्याय और शोषण के खिलाफ़ संघर्ष है?मेरे हिसाब से तो अब ऐसे संघर्ष को विचारधारा कहना भी गलत होगा,ऐसा मैं मानता हूं।आपको क्या लगता है,बताईयेगा ज़रूर्।
Labels:
chattisgarh,
maharshtra,
naxalites,
orrisa,
जीन्स,
नक्सल,
प्रतिबंध,
मानवाधिकारवादी,
स्कूली छात्र
Sunday, August 29, 2010
गुजरात जैसे उन्न्त राज्य को पछाडने वाले छत्तीसगढ को क्या अब भी पिछड़ा कहेंगे?
नक्सलवाद से बुरी तरह ग्रस्त छत्तीसगढ विकास की दौड़ मे नये-नये रिकार्ड स्थापित कर रहा है।ये हम नही,छत्तीसगढ सरकार नही बल्कि केन्द्र सरकार का सांख्यिकी विभाग कह रहा है।विकास की दौड़ मे उसने गुजरात और महाराष्ट्र जैसे उन्न्त और विकसित कहलाने वाले राज्यों को पछाड कर जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद मे देश का अव्वल राज्य होने का खिताब भी अपने नाम कर लिया है।अब शायद राज्य के विपक्ष यानी कांग्रेस के नेताओं को समझ मे आया होगा कि दिल्ली से आने वाला हर केंद्रीय मंत्री छत्तीसगढ और मुख्यमंत्री डा रमन सिंह की तारीफ़ ही क्यों करता है।
छत्तीसगढ राज्य बनने के साथ ही समस्याओं से ग्रस्त एक अति पिछ्ड़े राज्य के रूप मे पहचाना जाता रहा।शुरू के ढाई साल कांग्रेस ने शासन किया और उसके बाद जनता ने उन्हे दोबारा मौका ही नही दिया।भाजपा ने सत्ता मे आने के बाद जिस तरह विकास के मोर्चे पे काम किया उसी तरह नक्सलवाद से जूझने मे उसने कोई कसर नही छोड़ी।मुख्यमंत्री पार्टी के अंदर के छिट्पुट असंतोष के साथ-साथ केन्द्र की यूपीये सरकार और उनकी पार्टी कांग्रेस से राज्य मे एक साथ जुझते रहे।इसी बीच उनके बेहद सरल व्यक्तित्व ने भी उनके लिये जनमानस मे अच्छी छवि बना दी और उनके नेतृत्व मे लड़े गये चुनाव मे जनता ने उन्हे दोबारा राज करने का मौका भी दिया।इस मौके को डा रमन सिंह ने बेकार नही जाने दिया और विकास के मामले मे उन्होने जमकर काम कराया जिसका नतीजा आज सकल घरेलू उत्पाद के मामले मे राज्य न केवल देश के अन्य सभी राज्यों से बल्कि देश के औसत भी बेहतर है ।
सच मे ये डा रमनसिंह के लिये अद्वितीय उपलब्धि ही है।राज्य बने हुये अभी मात्र दस साल ही हुये हैं और उन्हे सत्ता मे आए हुये सात साल।इतने कम समय मे सालों से और मीलों आगे दौड़ रहे विकसित राज्यों के न केवल बराबर पंहुचना बल्कि उन्हे पीछे छोड़ देना मामूली उपलब्धी नही है।इस उपलब्धि पर राज्य के लोग भी खुश हैं और मुख्यमंत्री को बधाई दे रहे हैं।
छत्तीसगढ की जिस तरह एक बेहद पिछड़े राज्य के रूप मे छ्द्म छवि बनाई गई थी उसे तोड़ने मे डा रमनसिंह सफ़ल रहें हैं।इसमे कोई शक़ नही राज्य का आधे से ज्यादा हिस्सा नक्सलवाद से प्रभावित है।इसमे कोई शक़ नही कि शहरी आबादी के मामले में अकेला मुम्बई छत्तीसगढ से मीलों आगे होगा,लेकिन सीमित साधनो से छत्तीसगढ सरकार्र ने जिस तरह काम किया है उससे विकसित कहलाने वाले साधन-सम्पन्न राज्यों को सीखना चाहिये।
इस उपलब्धि के बाद शायद लोग छत्तीसगढ को पिछड़ा कहने से पहले सोचेंगे।और अगर ये राज्य नक्सलवाद से मुक्त हो जाता है तो प्रचुर वन-संपदा और खनिजों के अकूत भंडारो से लबालब मेरे गरीब लोगों की अमीर धरती को कोई पिछड़ा कहने की हिम्मत नही कर सकेगा।तमाम राजनैतिक मतभेदों और आंदोलनों के बीच रमनसिंह और उनकी टीम ने बढिया काम किया है,वे बधाई के पात्र है और सभी कह रहे है शाबास रमनसिंह,जय छत्तीसगढ।आप क्या कहते हैं ये बताईयेगा ज़रूर्।
छत्तीसगढ राज्य बनने के साथ ही समस्याओं से ग्रस्त एक अति पिछ्ड़े राज्य के रूप मे पहचाना जाता रहा।शुरू के ढाई साल कांग्रेस ने शासन किया और उसके बाद जनता ने उन्हे दोबारा मौका ही नही दिया।भाजपा ने सत्ता मे आने के बाद जिस तरह विकास के मोर्चे पे काम किया उसी तरह नक्सलवाद से जूझने मे उसने कोई कसर नही छोड़ी।मुख्यमंत्री पार्टी के अंदर के छिट्पुट असंतोष के साथ-साथ केन्द्र की यूपीये सरकार और उनकी पार्टी कांग्रेस से राज्य मे एक साथ जुझते रहे।इसी बीच उनके बेहद सरल व्यक्तित्व ने भी उनके लिये जनमानस मे अच्छी छवि बना दी और उनके नेतृत्व मे लड़े गये चुनाव मे जनता ने उन्हे दोबारा राज करने का मौका भी दिया।इस मौके को डा रमन सिंह ने बेकार नही जाने दिया और विकास के मामले मे उन्होने जमकर काम कराया जिसका नतीजा आज सकल घरेलू उत्पाद के मामले मे राज्य न केवल देश के अन्य सभी राज्यों से बल्कि देश के औसत भी बेहतर है ।
सच मे ये डा रमनसिंह के लिये अद्वितीय उपलब्धि ही है।राज्य बने हुये अभी मात्र दस साल ही हुये हैं और उन्हे सत्ता मे आए हुये सात साल।इतने कम समय मे सालों से और मीलों आगे दौड़ रहे विकसित राज्यों के न केवल बराबर पंहुचना बल्कि उन्हे पीछे छोड़ देना मामूली उपलब्धी नही है।इस उपलब्धि पर राज्य के लोग भी खुश हैं और मुख्यमंत्री को बधाई दे रहे हैं।
छत्तीसगढ की जिस तरह एक बेहद पिछड़े राज्य के रूप मे छ्द्म छवि बनाई गई थी उसे तोड़ने मे डा रमनसिंह सफ़ल रहें हैं।इसमे कोई शक़ नही राज्य का आधे से ज्यादा हिस्सा नक्सलवाद से प्रभावित है।इसमे कोई शक़ नही कि शहरी आबादी के मामले में अकेला मुम्बई छत्तीसगढ से मीलों आगे होगा,लेकिन सीमित साधनो से छत्तीसगढ सरकार्र ने जिस तरह काम किया है उससे विकसित कहलाने वाले साधन-सम्पन्न राज्यों को सीखना चाहिये।
इस उपलब्धि के बाद शायद लोग छत्तीसगढ को पिछड़ा कहने से पहले सोचेंगे।और अगर ये राज्य नक्सलवाद से मुक्त हो जाता है तो प्रचुर वन-संपदा और खनिजों के अकूत भंडारो से लबालब मेरे गरीब लोगों की अमीर धरती को कोई पिछड़ा कहने की हिम्मत नही कर सकेगा।तमाम राजनैतिक मतभेदों और आंदोलनों के बीच रमनसिंह और उनकी टीम ने बढिया काम किया है,वे बधाई के पात्र है और सभी कह रहे है शाबास रमनसिंह,जय छत्तीसगढ।आप क्या कहते हैं ये बताईयेगा ज़रूर्।
Labels:
chattisgarh,
gdp,
gujrat,
maharshtra,
top,
अव्वल,
गुजरात,
छतीसगढ,
देश,
महाराष्ट्र,
सकल घरेलु उत्पाद
Subscribe to:
Posts (Atom)