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Thursday, May 28, 2009

डा बिनायक सेन की रिहाई पर पर्चे बांट कर खुशियां मना रहे है नक्सली!इसे क्या कहेंगे मानवाधिकारवादी!

कहने को बहुत कुछ है मगर ज्यादा नही कहुंगा।बस कुछ लाईनो मे छत्तीसगढ मे जो हो रहा है उसे सामने रख रहा हूं जस का तस। नक्सलियो ने छत्तीसगढ मे अपनी गतिविधियां ज़ारी रखी है।उन्होने डोंगरगढ इलाके मे एक निजी मोबाईल कंपनी के टावर को उड़ा दिया और नारायणपुर क्षेत्र मे एक टिप्पर जला दिया।वंहा उन्होने लाल स्याही से लिखे पर्चे भी छोड़े हैं।पर्चों मे साफ़ लिखा है बिनायक सेन की रिहाई पर खुशियां मनाओ।जेल मे बंद बाकी कामरेड़ों के लिये आंदोलन तेज़ करो।साम्राज्यवाद,पूंजीवाद टाटा,एस्सार और रावघाट परियोजना का विरोध करो।अब इसे क्या कहेंगे कथित मानवाधिकारवादी और उनके समर्थक। हम तो बस इतना कहेंगे कि दाल मे कुछ न कुछ काला है नक्सलियों के पर्चे इस बात का सबूत है।

Wednesday, May 13, 2009

नक्सली अब राजधानी से बस कुछ ही किलोमीटर दूर!

सिहावा-नगरी इलाके मे नक्सलियो ने धमाका कर तेरह जवानो को शहीद कर दिया।इस वारदात ने सरकार के होश उड़ा दिये।वही सरकारी टाईप्ड बयान की फ़ोटो कापी जारी हो गई कि शहीदो का बलिदान व्यर्थ नही जायेगा। होम मिनिस्टर से लेकर विपक्ष यानी कांग्रेस के नेता तक़ घटनास्थल का मुआयना कर आये।महामहिम राज्यपाल ने भी अफ़सरो को तलब कर जानकारी ले ली मगर इस सबसे क्या उन तेरह जवानो की जान वापस आ सकती है।अख़बारो मे छपे एक बयान पर भी नज़र पड़ी है कि नक्सलियो से संबंधो के आरोप मे छ्त्तीसगढ की जेल मे बंद डा बिनायक सेन की रिहाई की मांग के लिये देश और विदेश के कई बड़े शहरो मे प्रदर्शन होंगे।पता नही क्यों इन गिरोहबाज़ मानवाधिकारवादियों को असमय शहीद कर दिये गये पुलिस वालो और उनके परिवार वालो का अधिकार और दर्द नज़र नही आता।

हो सकता है मेरा ये लिखना किसी जनवादी भाई को मेरे बिनायक सेन का विरोधी होना लगे?मगर मै ये बात साफ़ कर देना चाहता हूं कि अकेला मैं नही छत्तीसगढ मे कोई भी उनका व्यक्तिगत रूप से विरोधी नही होगा लेकिन जिस आरोप के तहत वे बंद है और जिनसे संबंधो के आरोप मे वे बंद है उन लोगो का आये दिन छतीसगढ की शांत धरा पर धमाके करना और खून की नदिया बहाना किसी को भी पसंद नही आता सिवाय एक विचारधारा के समर्थको के। हमारा विरोध उनसे भी नही वे अपनी विचारधारा को मानने के लिये स्वतंत्र है मगर उस स्वतंत्रता का मतलब क्या किसी को भी कभी भी मौत के घाट उतार देना होता है।

मुझे ये बात भी आज तक़ समझ नही आई कि जितने भी बड़े-बड़े इंसानी हक़ के पैरोकार है क्या उन्हे छत्तीसगढ मे सिर्फ़ एक आदमी के साथ ही अन्याय होता नज़र आता है?क्या एक साथ तेरह लोगो की अकाल मौत उनके और उनके परिवार के अधिकारो का हनन नही है।घटनास्थल पर जा चुके लोगो के अनुसार वंहा पडा एक मोबाईल उस समय भी बज़ रहा था।लम्बी घण्टी इस बात का सबूत थी कि उसके परिवार वाले उससे ज़रूरी बात करना चाह रहे थे। हो सकता है फ़ोन का न ऊठना उनके मन मे अनिष्ठ की आशंका जगा रहा हो? हो सकता है कोई अबोध बच्ची अपने पापा से गर्मियो की छुट्टियां लग गई है कह कर ज़ल्दी घर आने की रोज़ाना की जाने वाली बाल-सुलभ मनुहार दोहराने वाली हो?हो सकता है ब्याह के बाद पहली बार छुट्टियो मे मायके जाने के छटपटा रही नव्ब्याहता अपने पति से काम-धाम छोड कर घर आने लिये प्यार भरी तक़रार करने वाली हो?हो सकता है बुढे मां-बाप बीमारी के इलाज या दवा के लिये रूपये ज़ल्द भेजने के लिये सुबह-सुबह उसे याद दिलाना चाह रहे हो?होने को तो बहुत कुछ हो सकता है मगर एक बात जो नही हो सकती वो ये है कि वो अब कभी भी फ़ोन उठाकर अपनी लाडली को झुठे बहाने बना बहला नही सकता।थोड़ी तक़रार के बाद ज़ल्द आने का झूटा दिलासा देकर बीबी को टाल नही सकता,रूपये भेज चुका हूं कहकर बुढे मां-बाप के ओंठों पर मुस्कान नही लौटा सकता।

मगर ये सब शायद कुछ संगठन के पदाधिकारियों को नज़र नही आता या फ़िर वे देखना ही नही चाह्ते।दूसरी वाली बात ही सही होगी क्योंकि लगता है वे नक्सली वारदातो मे मर रहे पुलिस वालो को शहीद ही नही मानते होंगे।उनके लिये तो वे ही शहीद होंगे जिन्हे नक्सली शहीद करार दे। आखिर नक्सली भी तो शहीदी सप्ताह मनाते है और उनसे संबंध के आरोपो मे जेल मे बंद आरोपी को छ्डाने मे जीतनी ताक़त ये लोग लगा रहे है उससे तो यही लगता है कि जेल मे बंद आरोपियों के साथियो की वे मदद ही करना चाह रहे हैं।

खैर छतीसगढ मे रायपुर से लगे धमतरी ज़िले मे नक्सलियो का धमाका अच्छा संकेत नही है।वैसे तो उनका राजधानी आना-जाना और यंहा रहना नई बात नही लेकिन माईन्स बिछा कर तेरह जवानो को उड़ा देना उनके बढते हौसले का सबूत है। और साथ ही नक्सलियो को समर्थन के आरोप मे जेल मे बंद पीयूसीएल के एक नेता के की रिहाई के लिये लंदन,इटली,एडिनबर्ग,समेत यूरोप और अमेरिका के बड़े शहरो मे धरना प्रदर्शन होना भी इस बात को सोचने पर मज़बूर कर देता है कि इनके चाहने वालो की जड़े कहां तक़ फ़ैली है। आखिर लंदन मे भारतीय उच्चायोग के साम्ने धरना देकर वे साबित क्या करना चाह्ते हैं?अफ़सोस की बात तो ये है अपनी मानवाधिकारवादी आंखो से ये लोग सिर्फ़ एक ही तरफ़ देख पाते है दूसरी ओर शायद नही देखना उनकी विदेशो से कंट्रोल होने वाली फ़ंडिंग की मज़बूरी है।