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Monday, August 17, 2015

बस्तर में नकस्लियों ने स्वतंत्रता दिवस नही काला दिवस मनाया

बस्तर में नकस्लियों ने स्वतंत्रता दिवस नही काला दिवस मनाया।उनका खौफ़ इतना कि स्कूलों में घुस कए वे तिरंगा फ़हराते रहे पर मजाल कि कोई विरोध करता।एक नही स्कूलों में नक्सलियों ने काला झण्डा फ़हराया और क्रांतिगीत गाये।हैरानी की बात तो ये कि ये शर्मनाक घटना ब्लाक मुख्यालय से महज कुछ दूर स्थित स्कूल मे भी हुई।सरकार चाहे लाख दावा करे कि बस्तर में नक्सलियो का कोई प्रभाव नही पर वस्तुस्थिति स्पष्ट हो गई है।वंहा इस बात से कोई इंकार नही कर सकता कि सुदूर इलाकों में उन्होने समानांंतर व्यवस्था कायम करने में सफ़लता हासिल कर ली है।ये किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्य के लिये शर्म की बात है कि उनके राज्य में सरकारी शिक्षण संस्थानों में राष्ट्रध्वज न फ़हराया जाये बल्कि काला झण्डा फ़हरा जाये,सच में ये न केवल बस्तर बल्कि छत्तीसगढ,बल्कि भारत के लिये भी शर्मनाक घटना है।ये नक्स्लियों की चेतावनी नही बल्कि खतरनाक इरादों के सकेत है और अगर सरकारें अब भी नही जागी तो फ़िर सिवाय हाथ मलने के कोई कुछ नही कर पायेगा।

Thursday, December 8, 2011

जितना आतंकियों ने उत्पात नहीं मचाया होगा, उससे कही ज्यादा कोहराम नक्सलियों ने मचा रखा है

रायपुर।देश में जहां एक ओर आतंकी हमले की आशंका हमेशा बनी रहती है, वहीं नक्सलियों के हमले के बारे में अक्सर सुनने व पढ़ने को मिलते हैं। इस साल नक्सली हमले जितने हुए उससे एक बात तो कही जा सकती है कि जितना आतंकियों ने उत्पात नहीं मचाया होगा, उससे कही ज्यादा कोहराम नक्सलियों ने मचा रखा है। इस साल नवम्बर तक नक्सलियों ने देश के 6 मुख्य नक्सल प्रभावित राज्य़ों में कुल 1,476 हमले किए, जिसमें 500 से अधिक लोग मारे गए।
 उल्लेखनीय है कि 2010 में भी माओवादियों ने लगभग 626 आम नागरिकों की हत्या की थी। जिसमें संघर्ष के दौरान 277 सुरक्षा जवान मारे गए। इस साल नक्सलियों द्वारा किए गए हमलों से संबंधित आंकड़ों पर एक नजर:
 2011 में नक्सली हमले में अब तक मारे गए- 513 ( मारे गए)
 छत्तीसगढ़ से 182 ( सर्वाधिक) ( मारे गए)
 झारखंड से 137 ( मारे गए)
 महाराष्ट्र से 50 ( मारे गए)
 बिहार और उड़ीसा से 49 ( मारे गए)
 पश्चिम बंगाल से 40 ( मारे गए)
 अन्य- 5( मारे गए)
 नक्सली हमले से प्रभावित वर्ग
 आम नागरिक 389 ( मारे गए)
सुरक्षाकर्मी 124 ( मारे गए)
 वहीं इंडस्ट्रीज, रेल्वे, टेलीफोन एक्सचेंज टावर, पावर प्लांट, माइनिंग, पंचायत भवन और स्कूल बिल्डिंग को नुकसान पहुंचाने के मकसद से नक्सलियों ने 219 बार हमला किया।
 इन आंकड़ों पर गौर फरमाने के बाद एक बात ये भी सामने आती है कि सुरक्षाकर्मियों ने भी इन नक्सलियों से टक्कर लेने में कोई कोताही नहीं बरती है। सुरक्षाकर्मियों ने इस साल अब तक 1,728 नक्सलियों की गिरफ्तारी की है, जबकि 546 हथियार इन नक्सलियों के पास से जब्त हुए हैं। साथ ही बीते 11 माह में 344 नक्सलियों ने सरेंडर किया है। साभार दैनिक भास्कर्।

Tuesday, April 20, 2010

हिंसा से दुःखी बापू की पोती मिलना चाहती है नक्सलियों से!

बापू की पोती तारा देवी भट्टाचार्य छत्तीसगढ आई।वे यंहा बा के जीवन पर कस्तुरबा आश्रम मे लगी प्रदर्शनी का उद्घाटन करने आई थी।वे प्रेस क्लब भी आई और उन्होने समाज मे हो रहे बदलाव पर बेबाक राय व्यक्त की।उन्होने नक्सली हिंसा पर दुःख जताया और कहा कि वे उनसे मिलना चाहती है।नक्सली हिंसा के लिये उन्होने सरकार के साथ-साथ व्यवस्था और समाज को बराबर का ज़िम्मेदार ठहराया।उन्होने साफ़ कहा कि इस समस्या के लिये समाज मे व्याप्त विसंगतियां भी उतनी ही ज़िम्मेदार है जितनी सरकार।
बापू की पोती ने नक्स्ली हिंसा मे बेघर-बार हो रहे बच्चों को भी सहारा देने के लिये बा का घर,कस्तुरबा ट्रस्ट की ओर से पहल करने की बात कही।बापू पर भी खुल कर बोली तारा देवी।बापू की प्रासंगिकता पर पूछे गये सवाल पर उन्होने कहा कि बापू प्रासंगिक थे,हैं और रहेंगे।बापू के नाम पर राजनिती और कांग्रेस के उसपर एकाधिकार जताने पर उनका कहना था बापू सबके हैं और उनके नाम पर जितनी राजनिती हुई उसका अंशमात्र भी अगर समाज उनके विचारों पर अमल करता तो आज तस्वीर दूसरी होती।आज की युवा पीढी के सामने आदर्श का अभाव होने के सवाल पर उन्होने उलट सवाल किया कि तब बापू के सामने कौन आदर्श था।ये सब भटकाव को सही ठहराने के बहाने है।
उन्होने कहा कि हमने बापू को समझा लेकि जीवन मे उतारा ही नही।उन्होने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र मे हमसे चूक हुई विनोबा और जयप्रकाश के विचारों से हम अपने बच्चों को अवगत नही करा पाये।बापू को किताबो से बाहर लाकर विचारों मे शामिल करने की उन्होने ज़रूरत बताई।लगे रहो मुन्नाभाई फ़िल्म पर उन्होने कहा कि अच्छी फ़िल्म है और जिस भी माध्यम से लोग बापू को जाने-पहचाने,समझे तो बुरा क्या है।उन्होने फ़िल्मों को अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बताया।उन्होने कहा कि हम अपने-अपने डर से सुरक्षा के लिये बंदूकधारी गार्ड रख रहें है जबकि आज ज़रूरत बंदूक की नही बंधु की है।

Tuesday, January 12, 2010

डीजीपी गोली लगने से मरेंगे या जेल जायेंगे ,ये आपको कैसे पता वकील साब?कंही दाल मे कुछ काला तो नही है?

छत्तीसगढ के डीजीपी विश्वरंजन के बारे मे प्रसिद्ध?जनहित?वकील प्रशांत भूषण ने यंहा कहा कि उन्हे गोली मार दी जायेगी या वे जेल जायेंगे।अब सवाल ये उठता है कि उन्हे कैसे पता कि डीजीपी की मौत गोली लगने से होगी और अगर नही होगी तो वे जेल जायेंगे।एक कथित जिम्मेदार जनहित वकील का ये कहना इस बात के संकेत तो दे ही रहा है कि दाल में कुछ काला है।या तो उन्हे अपने क्लाईंट कथित मानवाधिकारवादियों या वे जिनके समर्थन मे छत्तीसगढ आ रहे हैं,उन नक्स्लियों से उन्हे हिंट मिल चुका है गोली मारने के बारे मे या फ़िर एडवांस मिल चुका है डीजीपी के खिलाफ़ अदालती मुक़दमेबाज़ी शुरू करने के लिये।अगर ऐसा नही है तो कोई भी इतना दावे से कैसे कह सकता है कि फ़लाने को गोली मार दी जायेगी और वे मर जायेंगे,ऐसा तो सड़क छाप मिट्ठूबाज़ ज्योतिषी भी दावा नही करते हैं तो फ़िर एक ज़िम्मेदार वकील ये सब भविष्यवाणी कैसे कर सकता है?

खैर ये तो सनसनीखेज बयान है ही उसके साथ ही उनकी एक बात और गौर करने वाली है।उन्होने यंहा के मीडिया को गैर जिम्मेदार कहा और उन्होने बाक़ायदा मीडिया का वर्गीकरण करते हुये कथित राष्ट्रीय मीडिया को सही ठहराया।अब बताईये भला प्रशांत भूषण जी को कौन समझाये कि जिसे वे राष्ट्रीय मीडिया कहते हैं उसे फ़ीडबैक कंहा से मिलता है।क्या दिल्ली मे बैठे लोगों को बस्तर के रिमोट एरिया मे होने वाली बात जादू के आईने पर नज़र आती है?या फ़िर जो उनके क्लाईंट के स्पांसरड टूर पर उनके क्लाईंट द्वारा दिखाई गई चीज़ों के अलावा क्या नज़र आता है?उनके क्लाईंट क्यों अपने साथ कथित ज़िम्मेदार मीडिया को अपने दौरे मे साथ लेकर चलते हैं?क्यों वे उन जगहों पर अलग से दौरा नही करते?बस्तर का गरीब आदिवासी उन्हे एअर टिकिट कंहा से दे सकता है?मंहगी शराब,महंगी एसी ठहरने की व्यवस्था,घूमने के लिये महंगी एसी कार कौन देता है सब जानते हैं?

जिस मीडिया को वे जिम्मेदार कह रहे हैं उसकी हालत आज किसी से छीपी नही है।महंगाई के बहाने थोक मे छंटनी की गई?छत्तीसगढ जैसे नक्सल प्रभावित राज्य मे राष्ट्रीय इलेक्ट्रानिक मीडिया का एक भी स्टाफ़ नही है?शायद इसीलिये वे जिम्मेदार हैं?क्योंकि न उनका यंहा स्टाफ़ है और न नक्सलियों के उत्पात की खबर वे दिखाते हैं?मुम्बई बम धमाकों के समय उनकी भूमिका पर सारे देश मे बहस हो चुकी है?वकील साब जिस मीडिया को एक रात मे कैंप मे सोये आदिवासियों पर हमला और दर्ज़नों निर्दोष और निरिह आदिवासियों का क़त्ल नज़र तक़ नही आता?डेढ साल की बच्ची की गला रेत कर हत्या मानवाधिकारवादियों को नज़र नही आती?नाव मे गश्त कर मल्कानगिरी के पहाडों मे 40 से ज्यादा जवानो को रात के अंधेरे मे घेर कर डुबो देने जैसी कायराना हरक़त विजियुल के अभाव मे नेशनल न्यूज़ नही बनती नज़र आती,वे तो आप के लिये ज़िम्मेदार होंगे ही वकील साब क्योंकि जाने-अंजाने वे आपके क्लाईंट का फ़ायदा जो कर रहे हैं।

आप क्या हर किसी को अपने फ़ायदे के लोग जिम्मेदार नज़र आते हैं वकील साब।अब भला आपको वो मीडिया क्यों जिम्मेदार लगने लगा जो सारी दुनिया को ये बता देता है कि नक्स्लियों ने पूरे बस्तर को अंधेरे मे डुबो दिया है।जो ये बताता है कि बिजली के अभाव मे पानी की किल्लत है,लोग परेशान हैं,अस्पताल बंद हो गये हैं,लोगों का जीना हराम हो गया है।अरे हां याद आया आप तो शायद जनहित वकील है ना?तो क्या बिजली,पानी,सड़क बस्तर के जन के हित का मामला नही है?नही है?अच्छा समझा मामला मोटी फ़ीस का है?हां तो फ़िर विदेशी फ़ंडिंग से चलने वाले एनजीओ और कथित समाजसेवी संगठनो जीतनी फ़ीस तो बस्तर का गरीब आदिवासी दे ही नही सकता तो फ़िर वंहा जनहित का मामला आयेगा ही कंहा से?आपके जनहित का तो मतलब बड़े-बड़े औद्योगिक घरानो को परेशान करने मे छीपा और विकास की गति मे ब्रेक लगाने से होने वाले विदेशी फ़ायदे मे छीपा हित है शायद?

जाने दिजीये वकील साब बस्तर के शोषण की लम्बी कहानी है जिसे आपके हिसाब से गैरजिम्मेदार लोकल मीडिया ही जोरदार ढंग से उठाता है?वो नक्सलियों और पुलिस दोनो के आतंक की चक्की मे पिस कर भी अपना काम कर रहा है।वो दिल्ली से आकर स्थिती को आपके क्लाईंट के चश्मे से नही देखता और न देखेगा।आप भी जनहित के काम तक़ फ़ीस के लिये करते होंगे शायद जभी तो आपको फ़ीस लेकर रिपोर्ट लिखने वाले जिम्मेदार नज़र आ रहे हैं और अपनी नौकरी और जान का खतरा मोल लेकर काम करने वाले आप को गैर जिम्मेदार नज़र आ रहे है क्योंकि वे फ़ीस नही लेते,साफ़-साफ़ कहूं आपही के शब्दों मे वे उनकी तरह बिकाऊ नही है जिन्हे आप मज़बूरी मे बिकाऊ नही कह पा रहे हैं और जिन्हे कह बिकाऊ कह रहे हैं उन्हे भी बिकाऊ कहने की शायद आपको फ़ीस मिली होगी।

हो सकता है कि आपका डीजीपी के खिलाफ़ दिया गया बयान भी मोटी फ़ीस के बदले आया हो।वरना आपकी डीजीपी से कोई पर्सनल अदावत तो है नही?फ़िर ऐसा क्या कर डाला डीजीपी ने कि आपने उनकी मौत की घोषणा कर डाली?ऐसा तो मेरे खयाल से आपके क्लाईंट मानवाधिकारवादी के समर्थक नक्सली भी नही करते?आपके बयान को आखिर समझे तों क्या समझें?क्या ये डीजीपी को उन पर होने वाले हमले की पूर्व चेतावनी है,जैसा कि माओवादी देते हैं?या ये उन्हे इन्डायरेक्ट धमकी है?या फ़िर आपको ऐसा होने की पूर्व सूचना मिल चुकी है?आपकी दूसरी बात जो उन्हे ज़िन्दा बच जाने जेल भेजे जाने की धमकी है शायद?इस बात के संकेत तो नही है कि उनके खिलाफ़ मानवाधिकारवादी फ़र्ज़ी मुकदमेबाज़ी की तैयारी कर रहे हैं और आपको ये सब पता हो?

जाने दिजीये वकील साब बात निकलेगी तो फ़िर बहुत दूर तलक़ चली जायेगी?एक बात याद रखिये किसी को भी गैर जिम्मेदार ठहराने से पहले खुद के गिरेबां मे झांकना चाहिये।आप से हमारी कोई दुश्मनी नही है लेकिन मीडिया के प्रति आपका दुराग्रह ये साबित करता है कि आपको वही सब नज़र आ सकता है जो आपको फ़ीस देने वालों को नज़र आता है।फ़िर जिसे पीलिया हो गया उससे सफ़ेदी के बारे मे क्या बात की जाये?

Wednesday, June 3, 2009

कुएं में छिपा कर रखा कारतूसों का जखीरा आखिर किसका हो सकता है?

राजधानी रायपुर से मात्र कुछ किलोमीटर दूर एक गांव के कुएं से लगभग बाईस सौ ज़िंदा कारतूस बरामद किये गये।ये कारतूस किसके हो सकते हैं इस पर विचार जारी है लेकिन बरामद कारतूसों मे 315 और 12 बोर के कारतूसो का भारी संख्या मे होना इस मामले को संवेदनशील बना देता है।इन कारतूसों का नक्सली ज्यादातर उप्योग करते हैं इसलिये पुलिस इस दिशा मे भी तफ़्तीश कर रही है।इससे पहले सरगुजा मे झारखण्ड से आ रहे एक ट्रक मे भरा गोला बारूद भी बरामद किया जा चुका है। हथियारो के जखिरे का बरामद होना छत्तीसगढ के लिये कतई अच्छा संकेत नही है।

नज़दीक के एक गांव दादर-पथर्रा के श्मशान के कुएं से पुलिस ने भारी 2177 ज़िंदा कारतूस बरामद किये।इतनी बडी मात्रा मे कारतूसो की बरामदगी ने पुलिस विभाग को सकते मे ला दिया।बरामद कारतूसो मे 478 एस एल आर के,1136 कारतूस 315 बोर के,12 बोर के 454, एके 47 के उन्तीस एक कट्टा ।दो पिस्टल और अलग-अलग बोर के बाकी कारतूस बरामद किये गये।दुर्ग ज़िले के एस पी दिपांशु काबरा ने मामले की गंभीरता को देखते हुये खुद मौके पर मौज़ुद रह कर तलाशी अभियान पूरा कराया।

इतनी बड़ी मात्रा मे ज़िंदा कारतूस किसके हो सकते हैं,ये बेहद महत्वपूर्ण सवाल है। छत्तीसगढ मे अपराध अभी इतना संगठित नही है किसी बड़े गिरोह पर इतनी बड़ी मात्रा मे हथियार छिपा कर रखने का शक़ किया जा सके। छत्तीसगढ मे हथियारो का भरपूर इस्तेमाल सिवाय नक्सलियों के कोई और नही करता,और जब्त कारतूसो मे उनके द्वारा इस्तेमाल किये जाने वाले 315 और 12 बोर के कारतूसो का बड़ी सख्या मे होना इस मामले मे उनकी संलिप्तता का संदेह और पुख्ता करता है।

कारतूस किसके है ये पता लगाना पुलिस का काम है मगर छतीसगढ जो कभी शांति का टापू हुआ करता था,वंहा इस तरह मौत के सामान का थोक मे मिलना अशुभ ही माना जायेगा।इससे पहले भी पूरा ट्रक भर कर गोला बारूद बरामद हो चुका है।वन्य औषधियों की खुश्बू वाले जंगलो मे अब बारूद की बदबू उड रही है।महुआ कब फ़लता है ये पता ही नही चलता हां मगर लैण्ड माईन्स के फ़टने के बाद चारो ओर इंसानी खून और बारूद की बदबू अब मादकता नही सिर्फ़ और सिर्फ़ आतंक फ़ैला रही है।पता नही किसकी बुरी नज़र लग गई है इस खूबसुरत प्रदेश को।

Thursday, May 28, 2009

डा बिनायक सेन की रिहाई पर पर्चे बांट कर खुशियां मना रहे है नक्सली!इसे क्या कहेंगे मानवाधिकारवादी!

कहने को बहुत कुछ है मगर ज्यादा नही कहुंगा।बस कुछ लाईनो मे छत्तीसगढ मे जो हो रहा है उसे सामने रख रहा हूं जस का तस। नक्सलियो ने छत्तीसगढ मे अपनी गतिविधियां ज़ारी रखी है।उन्होने डोंगरगढ इलाके मे एक निजी मोबाईल कंपनी के टावर को उड़ा दिया और नारायणपुर क्षेत्र मे एक टिप्पर जला दिया।वंहा उन्होने लाल स्याही से लिखे पर्चे भी छोड़े हैं।पर्चों मे साफ़ लिखा है बिनायक सेन की रिहाई पर खुशियां मनाओ।जेल मे बंद बाकी कामरेड़ों के लिये आंदोलन तेज़ करो।साम्राज्यवाद,पूंजीवाद टाटा,एस्सार और रावघाट परियोजना का विरोध करो।अब इसे क्या कहेंगे कथित मानवाधिकारवादी और उनके समर्थक। हम तो बस इतना कहेंगे कि दाल मे कुछ न कुछ काला है नक्सलियों के पर्चे इस बात का सबूत है।