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Sunday, May 19, 2013
छोटी मछली पकड कर पुलिस ने ईमानदारी से बडे मगरमच्छो को सावधान कर दिया
आईपीएल ही आईपीएल छाया हुआ है अभी.छोटी मोटी मछली पकड कर पुलिस ने पूरी ईमानदारी से इस धंधे के बडे बडे मगरमच्छो को सावधान कर दिया.श्रीसंथ का एमएमएस बनाया जाने वाला था,बनाने के बाद पकडते तो क्या बिगड जाता.एक और बडा अपराध सामने आता.पर हल्ला मचाकर सभी को होशियार कर दिया ठीक उसी तरह जिस तरह रात को गश्त लगाते समय सीटी या सायरन बज़ाकर काम मे लगे चोरो को काम खत्म कर निकल लेने का संकेत दिया जाता है.कुछ सटोरिये भी पकडाये है,मगर बडे सट्टेबाज़ अभी भी इनकी पकड से दूर ही है,या यूं कहिये छोटे बुकी को पकड कर बडे लोगो को दूर तक़ निकल जाने का मौका दे दिया.और सबसे बडा कमाल तो देखिये एक एक सटोरिये के पास से दरज़नो मोबाईल मिल रहे है.दर्ज़नो सिम कार्ड मिल रहे है.साधारण आदमी को सिम लेने में पसीना निकल जाता है.यंहा तो सटोरिया क्या आतंकवादियो तक के पास से सिम मिल रहे है.की है आज तक किसी भी टेलिकाम कंपनी के खिलाफ कार्रवाई?करेंगे भी कंहा से,टेलिकाम कंपनी वाले तो सरकार के दामाद है,लाखो करोडो की घूस देते है.उन्हे कैसे पकडेंगे?बस पकडते रहे हो छोटी मछलियां.और हमारे खोजी भाई दुनिया भर के सवाल उठा रहे है सिवाय सटोरियों के पास मोबाईल और सिम कार्ड मिलने पर उन कम्पनियो को कटघरे में खडा करने के?सवाल मोटे मोटे विग्यापनो कोम भी तो है.
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Thursday, August 18, 2011
आखिर अन्ना को पाखण्डी और भ्रष्ट बताने वाले लोगों को उनमे गांधीवादी नज़र आ ही गया,और शायद जनता की ताकत भी।शर्म भी नही आती थूक कर चाटते हुये
एक सवाल,वही अन्ना,वही टीम,वही जनता,वही रामलीला मैदान,वही पुलिस,वही कमिश्नर,वही भीड़,वही ला एण्ड आर्डर फ़िर ऐसा क्या हो गया कि तीन की बजाये 15 दिन और वो भी बिना शर्त अनुमति दे दी।आखिर अन्ना को पाखण्डी और भ्रष्ट बताने वाले लोगों को उनमे गांधीवादी नज़र आ ही गया,और शायद जनता की ताकत भी।शर्म भी नही आती थूक कर चाटते हुये।
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Friday, March 12, 2010
थानेदारों को भ्रष्ट कहना आपकी ईमानदारी नही बेबसी का सबूत है गृहमंत्री जी!
छत्तीसगढ के ग़ृहमंत्री ने विधानसभा में ये कह कर सब को चौंका दिया कि थानेदारों को दस हज़ार रूपया महिना बंधा है।वे अवैध शराब की बिक्री को संरक्षण दे रहे हैं।अब बताईये भला ये बयान क्या काफ़ी है।बात तो होती जब गृह मंत्री भ्रष्ट थानेदारों की सूची या एकाध नाम सामने रखते और उनहे सज़ा देकर बाकी लोगों को सुधरने की चेतावनी देते।
अफ़सोस ऐसा नही किया मंत्री ने।वे तो बस बोले चले गये और बात-बात पे हंगामा करने वाला विपक्ष भी उनकी बात को सुनता रहा और सब मिलकर तालियां बज़ाते रहे।किसलिये कि प्रदेश में भ्रष्टाचरियों का बोलबाला है?किसलिये,कि गृहमंत्री भी भ्रष्ट थानेदारों तक़ का कुछ नही बिगाड़ सकती?
अपने क्षेत्र मे अवैध शराब की बिक्री न होने की घोषणा मंत्री ने बड़े गर्व से की।तो क्या वे सिर्फ़ अपने विधानसभा क्षेत्र के ही मंत्री हैं?क्या प्रदेश के अन्य हिस्सों से उन्हे कोई लेना-देना नही है?मेरा ये सवाल है कि अगर आप अपने क्षेत्र को सुधार सकते हो तो दूसरे क्षेत्र को भी ठीक कर सकते हैं।अगर आप ऐसा नही कर रहे हैं तो ये आपकी अक्षमता ही मानी जायेगी ना कि ईमानदारी।
मंत्री जी अगर आप ये मान रहे हैं कि थानेदारों का महिना बंधा है और अगर उनके खिलाफ़ कोई कार्रवाई नही हो रही है तो ये भी अपने आप मान लिया जायेगा कि वे भी कंही न कंही महिना दे रहे हैं।लेने वाला कोई भी हो सकता है?अगर आप कहें कि मैं नही लेता,अगर लेता तो उन्हे गालियां कैसे देता?तो मान भी लेंगे कि आप नही लेते।मगर कार्रवाई क्यों नही करते ये सवाल तो खड़ा ही है ना?आप नही लेते होंगे? तो भाई-भतीज़े लेते होंगे? नही तो दूसरे मंत्री लेते होंगे?,नही तो बड़े अफ़सर लेते होंगे?कोई ना कोई तो लेता ही होगा वर्ना मंत्री को पता होने के बाद भी कार्रवाई क्यों नही हो रही है?
खैर आप और आपके साथी तो सरकार में है उनकी खामोशी समझ मे आती है मगर विपक्ष का इतने बड़े मामले मे ख्जामोश रहना समझ से परे है?सड़ियल रिपोर्टों के आधार पर सरकार पर भ्रष्टाचार का आये दिन आरोप लगाने वाले विपक्ष यानी कांग्रेस का खामोश रहना इस बात का संकेत तो देता है कि मंत्री के अनुसार महिना लेने वाले थानेदार कुर्सी पर बने रहने के लिये न केवल सत्तापक्ष और अफ़सरों को बल्कि विपक्ष को भी सेट करके रखे हैं।
वैसे थानेदारों के अलावा आपको कोई और भ्रष्ट क्यों नज़र नही आया ये भी समझ मे नही आया मुझ नासमझ के?आप तो सहकारिता और जेल मंत्री भी हैं।सहकारिता मे तो इंस्पेक्टर राज ही चलता है।फ़िर एक सहकारिता निरीक्षक को रंगे हाथों रिश्वत लेते पकड़ाने के बाद भी क्यों फ़िल्ड़ मे पोस्टिंग दी गई?चलिये व्यक्तिगत सवाल नही।क्या जेल मे सब ठीक चल रहा है।आपको वंहा जैमर तक़ लगवाने पड़े।वंहा से आज भी अपराधी अपना कारोबार मोबाईल पर चला रहे हैं।वंहा औरत छोड़ कर सारी सुविधायें बिकती है।बैरकों की नीलामी होती है?अस्पताल के बहाने बाहर की हवा खाने की कीमत अलग तय है।सब तो जान्ते हैं आप्।फ़िर उन मामलों मे वही बेबाकी क्यों नही?वही स्वीकारोक्ति क्यों नही?
खैर जाने दीजिये कहने को बहुत कुछ है वो फ़िर किसी दिन मगर मेरा ये मानना ह कि अगर आप विपक्ष मे होते और आपकी पार्टी भी तो क्या दूसरी पार्टी के मंत्री के ऐसे बयान पर खामोश रहते?क्या आप उससे नैतिकता की दुहाई देकर इस्तीफ़ा नही मांगलेते?वैसे नैतिकता की बात अगर राजनीति सिर्फ़ बयानबाज़ी के अलावा सच मे ज़िंदा है तो इसका थोड़ा बहुत असर तो होना चाहियें।इस्तीफ़ा ना सही कम से कम भ्रष्ट अफ़सरों को ठीक करने का एलान तो हो जाना चाहिये।फ़िर ये तो छत्तीसगढ है जंहा नकसल प्रभावित बस्तर का नाम ही अच्छे-अच्छे सुधर जाते हैं।आप मंत्री है चाहे तो सुधार सकते है और अगर नही तो किसी को भ्रष्ट कहने से पहले सोचियेगा कि कार्रवाई नही करने के सवाल पर आपकी ईमानदार बनने की कोशिश औंधे मुंह गिरेगी।
अफ़सोस ऐसा नही किया मंत्री ने।वे तो बस बोले चले गये और बात-बात पे हंगामा करने वाला विपक्ष भी उनकी बात को सुनता रहा और सब मिलकर तालियां बज़ाते रहे।किसलिये कि प्रदेश में भ्रष्टाचरियों का बोलबाला है?किसलिये,कि गृहमंत्री भी भ्रष्ट थानेदारों तक़ का कुछ नही बिगाड़ सकती?
अपने क्षेत्र मे अवैध शराब की बिक्री न होने की घोषणा मंत्री ने बड़े गर्व से की।तो क्या वे सिर्फ़ अपने विधानसभा क्षेत्र के ही मंत्री हैं?क्या प्रदेश के अन्य हिस्सों से उन्हे कोई लेना-देना नही है?मेरा ये सवाल है कि अगर आप अपने क्षेत्र को सुधार सकते हो तो दूसरे क्षेत्र को भी ठीक कर सकते हैं।अगर आप ऐसा नही कर रहे हैं तो ये आपकी अक्षमता ही मानी जायेगी ना कि ईमानदारी।
मंत्री जी अगर आप ये मान रहे हैं कि थानेदारों का महिना बंधा है और अगर उनके खिलाफ़ कोई कार्रवाई नही हो रही है तो ये भी अपने आप मान लिया जायेगा कि वे भी कंही न कंही महिना दे रहे हैं।लेने वाला कोई भी हो सकता है?अगर आप कहें कि मैं नही लेता,अगर लेता तो उन्हे गालियां कैसे देता?तो मान भी लेंगे कि आप नही लेते।मगर कार्रवाई क्यों नही करते ये सवाल तो खड़ा ही है ना?आप नही लेते होंगे? तो भाई-भतीज़े लेते होंगे? नही तो दूसरे मंत्री लेते होंगे?,नही तो बड़े अफ़सर लेते होंगे?कोई ना कोई तो लेता ही होगा वर्ना मंत्री को पता होने के बाद भी कार्रवाई क्यों नही हो रही है?
खैर आप और आपके साथी तो सरकार में है उनकी खामोशी समझ मे आती है मगर विपक्ष का इतने बड़े मामले मे ख्जामोश रहना समझ से परे है?सड़ियल रिपोर्टों के आधार पर सरकार पर भ्रष्टाचार का आये दिन आरोप लगाने वाले विपक्ष यानी कांग्रेस का खामोश रहना इस बात का संकेत तो देता है कि मंत्री के अनुसार महिना लेने वाले थानेदार कुर्सी पर बने रहने के लिये न केवल सत्तापक्ष और अफ़सरों को बल्कि विपक्ष को भी सेट करके रखे हैं।
वैसे थानेदारों के अलावा आपको कोई और भ्रष्ट क्यों नज़र नही आया ये भी समझ मे नही आया मुझ नासमझ के?आप तो सहकारिता और जेल मंत्री भी हैं।सहकारिता मे तो इंस्पेक्टर राज ही चलता है।फ़िर एक सहकारिता निरीक्षक को रंगे हाथों रिश्वत लेते पकड़ाने के बाद भी क्यों फ़िल्ड़ मे पोस्टिंग दी गई?चलिये व्यक्तिगत सवाल नही।क्या जेल मे सब ठीक चल रहा है।आपको वंहा जैमर तक़ लगवाने पड़े।वंहा से आज भी अपराधी अपना कारोबार मोबाईल पर चला रहे हैं।वंहा औरत छोड़ कर सारी सुविधायें बिकती है।बैरकों की नीलामी होती है?अस्पताल के बहाने बाहर की हवा खाने की कीमत अलग तय है।सब तो जान्ते हैं आप्।फ़िर उन मामलों मे वही बेबाकी क्यों नही?वही स्वीकारोक्ति क्यों नही?
खैर जाने दीजिये कहने को बहुत कुछ है वो फ़िर किसी दिन मगर मेरा ये मानना ह कि अगर आप विपक्ष मे होते और आपकी पार्टी भी तो क्या दूसरी पार्टी के मंत्री के ऐसे बयान पर खामोश रहते?क्या आप उससे नैतिकता की दुहाई देकर इस्तीफ़ा नही मांगलेते?वैसे नैतिकता की बात अगर राजनीति सिर्फ़ बयानबाज़ी के अलावा सच मे ज़िंदा है तो इसका थोड़ा बहुत असर तो होना चाहियें।इस्तीफ़ा ना सही कम से कम भ्रष्ट अफ़सरों को ठीक करने का एलान तो हो जाना चाहिये।फ़िर ये तो छत्तीसगढ है जंहा नकसल प्रभावित बस्तर का नाम ही अच्छे-अच्छे सुधर जाते हैं।आप मंत्री है चाहे तो सुधार सकते है और अगर नही तो किसी को भ्रष्ट कहने से पहले सोचियेगा कि कार्रवाई नही करने के सवाल पर आपकी ईमानदार बनने की कोशिश औंधे मुंह गिरेगी।
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Friday, October 16, 2009
क्या सोच के पकड़ा था चोरों को सरकार खुश होगी,शाबासी देगी?सरकार मैने आपका नमक खाया है,ले अब धक्के खा
छत्तीसगढ आजकल स्वाईन फ़्लू से भी ज्यादा घातक आई-फ़्लू की चपेट मे हैं।इस रोग से पीड़ीत व्यक्ति न केवल खुद परेशान होता है बल्कि उसका परिवार इस बीमारी से प्रभावित हो जाता है।इसका तोड़ अभी तक़ नही मिल पाया है लेकिन इसका संक्रमण अब तेजी से फ़ैलता नज़र आ रहा है।
अभी हाल ही मे आई-फ़्लू यानी ईमानदारी से ग्रसित आई ए एस अफ़सर अमित कटारिया को नगर निगम से धक्के खाने पड़े थे।वो केस अभी ठंड़ा भी नही हुआ है कि आई-फ़्लू का दूसरा केस सामने आ गया है।इस बार मरीज़ प्रशासनिक सेवा का न होकर पुलिस सेवा का है जंहा इसके बैक्टिरिया का मिलना लगभग नामुमकिन माना जा रहा था।इससे पहले ये गंभीर बीमारी पुलिस महकमे मे फ़ैलती तत्काल आई-फ़्लू से पीड़ित ए एस पी शशिमोहन के ईलाज की तैयारियां शुरू हो गई है।शशिमोहन ने इस मामले मे डाकटरो के सरदार को भी अपनी बात बताई तो मगर सरदार ने शोले वाले गब्बर का डायलाग मार दिया, क्या सोच के पकड़ा था चोरों को सरकार खुश होगी,शाबासी देगी?सरकार मैने आपका नमक खाया है,ले अब धक्के खा!
अब शशिमोहन को भी तो सावधानी बरतनी चाहिये थी।देख रहा है कि इस लाईलाज बीमारी से पीड़ित लोगो को धक्के खाने पड़ रहे हैं तो खामोश रहता।क्या ज़रूरत थी अपनी बीमारी का ढिंढोरा पीटने की।पहले से ही लोगों को डाऊट था कि ये पुलिस वाला नार्मल नही है,फ़िर सावधान रहना चाहिये था ना।फ़िर सारे शहर मे अकेला वही था क्या चोरों को पकडने के लिये।एक बार पहले भी इसी बीमारी के कारण अपना घुटना तुड़वा चुका था शशिमोहन्।उसके बाद भी अकल नही आई। अरे फ़िर जब अमित कटारिया का विकेट गिरते देखा तब तो संभल जाना था सामने वाले अब पूरी ताक़त से निपटने मे लग गये है आई-फ़्लू से।
ये शशिमोहन जैसे लोग ना दीवाली खराब कर देंगे पूरे महकमे की।खुद तो परेशान हो रहे हैं,घर वालों को परेशान कर रहे हैं और उनका हाल देख कर आई-फ़्लू के कीड़े का शिकार हो चुके लोग और परेशान है।कुछ तो सोचते शशिमोहन दीवाली का समय है खुद को मिठाई नही खानी थी ना खाते,अरे नकली खोये की मिठाई खाकर लोग मर तो नही जाते ना,और मर भी जाते तो क्या जिस का टाईम आ गया वो तो जायेगा ही इसमे उस मिलावट खोर का क्या दोष्।वो बेचारा पूरे सिस्टम को सेट करके कंहा-कंहा से नकली खोआ मंगा रहा था।थोड़ा बहुत कमाता तभी तो मंत्री-संत्री पर खर्च करता।अब ऐसे मे वो कंहा खर्च करेगा?वो खर्च नही करेगा तो नेता-मंत्री कार्यकर्ताओं,अफ़सरों और हम जैसे पत्रकारो के यंहा ड्राई-फ़्रूट से भरी टोकरियां कंहा से भेजेंगे?ये लोग खुश नही रहेंगे तो राजनिती कैसे चलेगी?बस शशिमोहन तुमने भी वही गलती की जो आईफ़्लू का मरीज़ करता है।अब मंत्री जी तुमसे नाराज़ नही होम्गे तो क्या खुश होंगे,शाबासी देंगे।क्या कर दिया शशिमोहन अपनी दीवाली खराब की,अपने घर वालो की,अपने शुभचिंतको की,मंत्री जी की और उनके चमचों के साथ-साथ पत्रकारो की भी दीवाली खराब कर दी।लो और दिखाओ ईमानदारी और खाओ धक्के।
Monday, August 31, 2009
हिंदू न जाग जाये इसलिये पहले जागी पुलिस, गज़नी स्टाईल गणेश जी का विसर्जन करा दिया और मूर्तिकार को बुक भी कर दिया
यंहा राजधानी रायपुर मे एक सार्वजनिक गणेशोत्सव मे गणेश जी की प्रतिमा को गज़नी फ़िल्म के आमिर खान का रूप दे दिया गया था।इस बात को लेकर विरोध शुरू हुआ ही था कि पुलिस जागी और आनन-फ़ानन मे मुहल्ले वालों समेत कुछ हिंदूवादी नेताओं को बुलाया और सबसे सहमति लेकर मूर्ति का मान-सम्मान से विसर्जन करा दिया। हालांकि समिति वालों ने गणेश जी को पितांबर पहना कर और उसे केश आदि लगाकर लीपापोती करने की कोशिश जरूर की मगर पुलिस ने इसे संवेदनशील मामला मानते हुये सुधरे रूप को भी आपत्तिजनक माना।
रायपुर का हिंदू जाग न जाये और बेवजह बवाल न मच जाये इसलिये पुलिस तत्काल हरकत मे आई।हालांकि इस बार भी उसकी कारवाई काफ़ी देर से शुरू हुई मगर इस बात का संतोष किया जा सकता है कि कोई फ़साद खडा होने के पहले ही मामला निपट गया।पुलिस ने पता लगाया तो गणेशोत्सव समिति मे कक्षा नवमी और दसवी के छात्र भर बस हैं।छात्रों को नासमझ मानते हुये पुलिस ने उन्हे समझाईश देकर छोड़ दिया मगर मूर्ति बनाने वाले कलाकार विनय को पुलिस ने नही छोड़ा।उसे प्रतिबंधात्मक धारा के तहत गिरफ़्तार कर लिया ताकि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो सके।
बहरहाल पुलिस की इस कार्र्रवाई को समय पर उठाया कदम माना जा रहा है।इस मामले मे देरी का मतलब बेवजह का फ़साद फ़ड़फ़ड़ाता और शहर समेत आसपास की शांति भंग कर देता।इस कार्रवाई के बाद अब पुलिस के पास कुछ और इलाको से मूर्ति के आकार मे परिवर्तन कर उससे उपहास किये जाने की शिकायत आने लगी है।जो भी हो अब लगता नही है कि लोग भगवान की प्रतिमा का मज़ाक बनायेंगे,बाकि तो इस देश का भगवान ही मालिक है।
रायपुर का हिंदू जाग न जाये और बेवजह बवाल न मच जाये इसलिये पुलिस तत्काल हरकत मे आई।हालांकि इस बार भी उसकी कारवाई काफ़ी देर से शुरू हुई मगर इस बात का संतोष किया जा सकता है कि कोई फ़साद खडा होने के पहले ही मामला निपट गया।पुलिस ने पता लगाया तो गणेशोत्सव समिति मे कक्षा नवमी और दसवी के छात्र भर बस हैं।छात्रों को नासमझ मानते हुये पुलिस ने उन्हे समझाईश देकर छोड़ दिया मगर मूर्ति बनाने वाले कलाकार विनय को पुलिस ने नही छोड़ा।उसे प्रतिबंधात्मक धारा के तहत गिरफ़्तार कर लिया ताकि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो सके।
बहरहाल पुलिस की इस कार्र्रवाई को समय पर उठाया कदम माना जा रहा है।इस मामले मे देरी का मतलब बेवजह का फ़साद फ़ड़फ़ड़ाता और शहर समेत आसपास की शांति भंग कर देता।इस कार्रवाई के बाद अब पुलिस के पास कुछ और इलाको से मूर्ति के आकार मे परिवर्तन कर उससे उपहास किये जाने की शिकायत आने लगी है।जो भी हो अब लगता नही है कि लोग भगवान की प्रतिमा का मज़ाक बनायेंगे,बाकि तो इस देश का भगवान ही मालिक है।
Friday, July 17, 2009
हां मै मुख्यमंत्री का चमचा हूं!
अगर अच्छे काम की तारीफ़ का ये ईनाम है तो ये ही सही।मुझे इस बात का ज़रा भी डर नही लग रहा है कि कोई मुझ जैसे आक्रामक और विद्रोही के मुंह से किसी की जी भर के तारीफ़ सुन कर क्या कहेगा?मुझे आज ये कहने में ज़रा भी संकोच नही हो रहा है कि मुख्यमंत्री रमन सिंह एक नेक दिल इंसान ही नही एक अच्छे राजनेता है।उन्होने शहीद एस पी विनोद चौबे और उप निरीक्षको के परिजनो के लिये अनुकम्पा नियुकति के नियमो मे ढील देते हुये उनके परिजनो को डिप्टी कलेक्टर/डिप्टी एस पी और सहायक उप निरीक्षक के पद पर नियुक्ती का फ़ैसला किया।ये फ़ैसला वाकई महत्वपूर्ण है।इससे पहले किसी भी मुख्यंमंत्री ने ऐसा नही किया।शहीद होने वाले निरीक्षको या उप निरीक्षको के परिजनो को सिपाही के पद पर नियुकति मिला करती थी।उनके लिये इतना करने वाले रमन सिंह का यदी मुझे ज़िंदाबाद करना पड़े तो भी मुझे शरम नही आयेगी।मुझे वो भी मंज़ूर है।यंहा मै ये साफ़ कर देना चाहूंगा कि मरने वालो मे मेरा कोई सगा तो दूर,दुर-दूर का रिश्तेदार नही है।और तो और मेरा कोई भी रिश्तेदार किसी भी सरकारी नौकरी मे नही है।इसके बावज़ूद रमन सिंह की और उनके मंत्रिमंडल की तारीफ़ करनी होगी जिसने इतना बडा फ़ैसला लिया।इस माम्ले मे मै सालो से लिखता आ रहा हूं और इस पर बहस भी कर रहा हूं और इसे अमलीजामा पहनाने की कोशिश भी।आज अचान्क रमन सिंह के फ़ैस्ले ने मुझे अपनी 29 अप्रेल को लिखी एक पोस्ट की याद दिला दी।इस पोस्ट को आज मै उसी संदर्भ मे रिपोस्ट कर रहा हूं।कृपा कर इसे पढे बिना कोई भी प्रतिक्रिया न दे।
Wednesday, April 29, 2009
मैं उपनिरीक्षक की विधवा!क्या मेरा सुहाग लुटना,क्या मेरी दुनिया उजड़ना,क्या मेरे बच्चों का भविष्य बर्बाद होना महज़ इत्तेफ़ाक़ हैं?
छत्तीसगढ मे अचानक बड़े-बडे लोगो की बढती दिलचस्पी और बडे-बडे नामधारियों के दौरे देखकर मुझे लगा कि मेरे भी दिन फ़िर जायेंगे! मगर ऐसा कुछ नही हुआ! वे लोग आये तो मगर रटे-रटाये तोते की तरह सिर्फ़ और सिर्फ़ पढाई हुई बात कह कर चले गये।मुझे उम्मीद थी कि उनमे से एक तो कम से कम औरत होने के नाते ही मेरा दर्द समझेगी मगर सब सपनो की तरह टूट गया। और मज़बूर होकर मेरे दिल से सिर्फ़ आह ही निकल सकी कि मैं उपनिरीक्षक की विधवा!क्या मेरा सुहाग लुटना,क्या मेरी दुनिया उजड़ना,क्या मेरे बच्चों का भविष्य बर्बाद होना महज़ इत्तेफ़ाक़ हैं?
मेरी भी अपनी खूबसूरत दुनिया थी।मेरे पति को रिश्वत के भूत से ज्यादा देशभक्ती के ज़ूनून ने जकड़ रखा था।नई-नई नौकरी और नई-नई शादी।राजधानी के मलाईदार इलाके की पोस्टिंग के बाद उसी थाने बने रहने के लिये मोटी रकम की फ़रमाईश के बाद बस्तर की पोस्टिंग की धमकी पर हमने मिलकर चर्चा की।सब दोस्तो ने कहा कि सिद्धांत छोडो और कमाओ,कमाने दो का रास्ता पकडो,मगर उन्होने साफ़ मना किया।मैने भी खुशी-खुशी पति का हौसला बढाते हुये हर-हाल मे ईमानदारी की सूखी रोटी खाकर सुखी जीवन जीने का संकल्प दोहरा दिया,और हम राजधानी की चमक-धमक से दूर बस्तर के जंगल मे फ़ेंक दिये गये। ऐसे की चाह कर भी वापस निकल न सके।
शुरू के दिन तो बड़े मज़े से गुज़रे।वंहा जाकर एक बार और हमारी बगिया मे फ़ुल खिलाऽब हम दो और हमारे दो थे।बडी लड़की नर्सरी जाने लायक हो गई थी,और जहां हमारी पोस्टिंग थी वहां नर्सरी एक सपने के समान थी।तब पहली बार लगा था कि देशप्रेम और राष्ट्रभक्ति जैसी बाते किताबों मे ही ठीक लगती है।बच्चो के भविष्य को ध्यान मे रखते हुये मैने इनसे कहा कि वापस किसि अच्छे शहर चल्ते हैं।उन्होने भी बेहद थके हुये स्वर ने कहा था कि ट्राई करते हैं।उस दिन मुझे लगा था कि वे बस्तर के जंगलो मे मौत से रोज़ जंग लड़ते हुये हुये जवानी मे ही बूढे हो चले हैं।वो जोश वो जुनूं सब बस्तर के हने जंगलो मे गुम होता नज़र आया।
मै रोज़ उनसे पूछ्ती कि क्या हुआ?और रोज़ उनका जवाब होता सब ठीक हो जायेगा।फ़िर एक दिन गुज़र जाता,ऐसा करते-करते साल गुज़र गये। हमे ऐसा लगने लगा कि हम बस्तर के लिये ही बने है। छोटू अब चलने लगा था और तुतली भाषा मे बात करने लगा था। अब मैने ज़िद पकड़ ली थी कम से कम बच्चो को पढा लिखा तो लूं।मेरी ज़िद भी उन्हे अंदर से तोड़ रही है ये मुझे पता ही नही चला।रोज़ सुबह बच्चो की पढाई के सवाल के साथ उन्हे घर से ड्यूटी के लिये विदा करती थी और रात को घर मे घुसते समय फ़िर से उन्ही सवालो के साथ स्वागत करती थी।
रोज़-रोज़ के सवालो से लगता है वे भी त्रस्त आ गये थे,एक दिन उन्होने कहा कि मै कुछ न कुछ करता हूं,मुझे तंग मत किया करो,कुछ दिनो की मोहलत दो। और कुछ दिनो बाद उन्होने मुझ्से कहा कि तैयारी करो। हम वापस जा रहे हैम्। मै हैरान थी।मैने पूछा सच और उन्होने कहा हां!कैसे ?इसका जवाब तो जैसे रुला देने वाला था।उन्होने मेरी ज़ीद से परेशान होकर वापस शहर मे पोस्टिंग के लिये अपना पुशतैनी मकान बेच कर एडवांस दे दिया था।मै भी वापसी की तैयारियो मे जुटी हुई थी कि एक रोज़ ये गश्त से लौटे नही।सुबह काफ़ी देर होने के बाद भी जब इनकी कोई खबर नही आई और थाने के अलावा दूसरे लोग घर के आस-पास मंडराने लगे तो माथा ठनका और जो मेरा शक़ था वो सच निकला।
मेरी दुनिया उजड़ चुकी थी।उनका चेहरा होता तो शायद आखिरी बार देख भी लेती।लोथड़ो को बटोर कर लाश का शकल देने की कोशिश की गई थी और पता नही किस हवलदार का हाथ य किस सिपाही का पैर भी शामिल था उनकी लाश में।पता नहि कितनी बार मै बेहोश हुई हूंगी और जब होश मे आई तो मुझे अनुकंपा की भीख मे सिपाही की नौकरी दे दी गई। अब मै उप निरीक्षक की बीबी नही एक सिपाही हूं,जिसका जवान जिस्म साब लोगो की भूखी आंखो की आग मे झुलस कर कब बूढा हो गया पता ही नही चला। अब मुझे ज़रूरत भी नही मह्सूस होती किसी अच्छी प्राइवेट नर्सरी की।मेरे बच्चे सरकारी स्कूल मे पढ रहे हैं।उन्का भविष्य बनने से पहले ही बिगड़ गया है।मेरे सपने सज़ने से पहले ही उजड़ चुके हैं।
मेरी भी अपनी खूबसूरत दुनिया थी।मेरे पति को रिश्वत के भूत से ज्यादा देशभक्ती के ज़ूनून ने जकड़ रखा था।नई-नई नौकरी और नई-नई शादी।राजधानी के मलाईदार इलाके की पोस्टिंग के बाद उसी थाने बने रहने के लिये मोटी रकम की फ़रमाईश के बाद बस्तर की पोस्टिंग की धमकी पर हमने मिलकर चर्चा की।सब दोस्तो ने कहा कि सिद्धांत छोडो और कमाओ,कमाने दो का रास्ता पकडो,मगर उन्होने साफ़ मना किया।मैने भी खुशी-खुशी पति का हौसला बढाते हुये हर-हाल मे ईमानदारी की सूखी रोटी खाकर सुखी जीवन जीने का संकल्प दोहरा दिया,और हम राजधानी की चमक-धमक से दूर बस्तर के जंगल मे फ़ेंक दिये गये। ऐसे की चाह कर भी वापस निकल न सके।
शुरू के दिन तो बड़े मज़े से गुज़रे।वंहा जाकर एक बार और हमारी बगिया मे फ़ुल खिलाऽब हम दो और हमारे दो थे।बडी लड़की नर्सरी जाने लायक हो गई थी,और जहां हमारी पोस्टिंग थी वहां नर्सरी एक सपने के समान थी।तब पहली बार लगा था कि देशप्रेम और राष्ट्रभक्ति जैसी बाते किताबों मे ही ठीक लगती है।बच्चो के भविष्य को ध्यान मे रखते हुये मैने इनसे कहा कि वापस किसि अच्छे शहर चल्ते हैं।उन्होने भी बेहद थके हुये स्वर ने कहा था कि ट्राई करते हैं।उस दिन मुझे लगा था कि वे बस्तर के जंगलो मे मौत से रोज़ जंग लड़ते हुये हुये जवानी मे ही बूढे हो चले हैं।वो जोश वो जुनूं सब बस्तर के हने जंगलो मे गुम होता नज़र आया।
मै रोज़ उनसे पूछ्ती कि क्या हुआ?और रोज़ उनका जवाब होता सब ठीक हो जायेगा।फ़िर एक दिन गुज़र जाता,ऐसा करते-करते साल गुज़र गये। हमे ऐसा लगने लगा कि हम बस्तर के लिये ही बने है। छोटू अब चलने लगा था और तुतली भाषा मे बात करने लगा था। अब मैने ज़िद पकड़ ली थी कम से कम बच्चो को पढा लिखा तो लूं।मेरी ज़िद भी उन्हे अंदर से तोड़ रही है ये मुझे पता ही नही चला।रोज़ सुबह बच्चो की पढाई के सवाल के साथ उन्हे घर से ड्यूटी के लिये विदा करती थी और रात को घर मे घुसते समय फ़िर से उन्ही सवालो के साथ स्वागत करती थी।
रोज़-रोज़ के सवालो से लगता है वे भी त्रस्त आ गये थे,एक दिन उन्होने कहा कि मै कुछ न कुछ करता हूं,मुझे तंग मत किया करो,कुछ दिनो की मोहलत दो। और कुछ दिनो बाद उन्होने मुझ्से कहा कि तैयारी करो। हम वापस जा रहे हैम्। मै हैरान थी।मैने पूछा सच और उन्होने कहा हां!कैसे ?इसका जवाब तो जैसे रुला देने वाला था।उन्होने मेरी ज़ीद से परेशान होकर वापस शहर मे पोस्टिंग के लिये अपना पुशतैनी मकान बेच कर एडवांस दे दिया था।मै भी वापसी की तैयारियो मे जुटी हुई थी कि एक रोज़ ये गश्त से लौटे नही।सुबह काफ़ी देर होने के बाद भी जब इनकी कोई खबर नही आई और थाने के अलावा दूसरे लोग घर के आस-पास मंडराने लगे तो माथा ठनका और जो मेरा शक़ था वो सच निकला।
मेरी दुनिया उजड़ चुकी थी।उनका चेहरा होता तो शायद आखिरी बार देख भी लेती।लोथड़ो को बटोर कर लाश का शकल देने की कोशिश की गई थी और पता नही किस हवलदार का हाथ य किस सिपाही का पैर भी शामिल था उनकी लाश में।पता नहि कितनी बार मै बेहोश हुई हूंगी और जब होश मे आई तो मुझे अनुकंपा की भीख मे सिपाही की नौकरी दे दी गई। अब मै उप निरीक्षक की बीबी नही एक सिपाही हूं,जिसका जवान जिस्म साब लोगो की भूखी आंखो की आग मे झुलस कर कब बूढा हो गया पता ही नही चला। अब मुझे ज़रूरत भी नही मह्सूस होती किसी अच्छी प्राइवेट नर्सरी की।मेरे बच्चे सरकारी स्कूल मे पढ रहे हैं।उन्का भविष्य बनने से पहले ही बिगड़ गया है।मेरे सपने सज़ने से पहले ही उजड़ चुके हैं।
कभी-कभी आप लोगो की बड़ी-बड़ी बाते सुनती हूं तो ऐसा लगता है कि कभी कोई हमारे बारे मे भी बोलेगे मगर आप लोगो को तो सिर्फ़ छतीसगढ मे एक आदमी ही नज़र आता है।कभी दिल्ली की महिलाओ को छत्तीसगढ पर रोते देखती हूं तो लगता है कि अब वो हम लोगो के लिये भी बोलेंगी। हमारा क्या दोष हमे सिपाही क्यों बनाया गया?अनुकम्पा देना ही था उसी पद पर देते जिस पद पर हमारा पति था?मगर अफ़्सोस इस मामले कोई नही बोला। हवाई जहाज मे दुनिया घूमने वालि औरते भी नही बोली और ना ही कानून के बड़े-बड़े जानकार बोले और देश-विदेश के महान लोगो को तो इस बारे मे मालूम ही नही,क्योंकी उन्हे बताया गया ही नही।उन्हे तो सिर्फ़ ये मालूम है कि छत्त्तीसग़ढ मे सिर्फ़ एक आदमी के साथ अन्याय हो रहा है और जो हमारे साथ या हम जैसे और लोगो के साथ हुआ वो क्या न्याय है!
Thursday, July 9, 2009
मेरा भारत महान !
पेश है सुरेश चिपलूणकर कट अति माईक्रो पोस्ट।हम उस देश मे रहते हैं जंहा पुलिस और एम्बुलैंस से ज़ल्दी आपके घर पिज़्ज़ा पंहुच सकता है।कहने को हल्का-फ़ुल्का मज़ाक है ये मगर है कड़ुवा सच।आज मुझे ये एस एम एस मिला जिसे मै आप लोगो के सामने पेश कर रहा हूं।इसके बाद भी कहोगे मेरा देश महान?
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Wednesday, June 3, 2009
कुएं में छिपा कर रखा कारतूसों का जखीरा आखिर किसका हो सकता है?
राजधानी रायपुर से मात्र कुछ किलोमीटर दूर एक गांव के कुएं से लगभग बाईस सौ ज़िंदा कारतूस बरामद किये गये।ये कारतूस किसके हो सकते हैं इस पर विचार जारी है लेकिन बरामद कारतूसों मे 315 और 12 बोर के कारतूसो का भारी संख्या मे होना इस मामले को संवेदनशील बना देता है।इन कारतूसों का नक्सली ज्यादातर उप्योग करते हैं इसलिये पुलिस इस दिशा मे भी तफ़्तीश कर रही है।इससे पहले सरगुजा मे झारखण्ड से आ रहे एक ट्रक मे भरा गोला बारूद भी बरामद किया जा चुका है। हथियारो के जखिरे का बरामद होना छत्तीसगढ के लिये कतई अच्छा संकेत नही है।
नज़दीक के एक गांव दादर-पथर्रा के श्मशान के कुएं से पुलिस ने भारी 2177 ज़िंदा कारतूस बरामद किये।इतनी बडी मात्रा मे कारतूसो की बरामदगी ने पुलिस विभाग को सकते मे ला दिया।बरामद कारतूसो मे 478 एस एल आर के,1136 कारतूस 315 बोर के,12 बोर के 454, एके 47 के उन्तीस एक कट्टा ।दो पिस्टल और अलग-अलग बोर के बाकी कारतूस बरामद किये गये।दुर्ग ज़िले के एस पी दिपांशु काबरा ने मामले की गंभीरता को देखते हुये खुद मौके पर मौज़ुद रह कर तलाशी अभियान पूरा कराया।
इतनी बड़ी मात्रा मे ज़िंदा कारतूस किसके हो सकते हैं,ये बेहद महत्वपूर्ण सवाल है। छत्तीसगढ मे अपराध अभी इतना संगठित नही है किसी बड़े गिरोह पर इतनी बड़ी मात्रा मे हथियार छिपा कर रखने का शक़ किया जा सके। छत्तीसगढ मे हथियारो का भरपूर इस्तेमाल सिवाय नक्सलियों के कोई और नही करता,और जब्त कारतूसो मे उनके द्वारा इस्तेमाल किये जाने वाले 315 और 12 बोर के कारतूसो का बड़ी सख्या मे होना इस मामले मे उनकी संलिप्तता का संदेह और पुख्ता करता है।
कारतूस किसके है ये पता लगाना पुलिस का काम है मगर छतीसगढ जो कभी शांति का टापू हुआ करता था,वंहा इस तरह मौत के सामान का थोक मे मिलना अशुभ ही माना जायेगा।इससे पहले भी पूरा ट्रक भर कर गोला बारूद बरामद हो चुका है।वन्य औषधियों की खुश्बू वाले जंगलो मे अब बारूद की बदबू उड रही है।महुआ कब फ़लता है ये पता ही नही चलता हां मगर लैण्ड माईन्स के फ़टने के बाद चारो ओर इंसानी खून और बारूद की बदबू अब मादकता नही सिर्फ़ और सिर्फ़ आतंक फ़ैला रही है।पता नही किसकी बुरी नज़र लग गई है इस खूबसुरत प्रदेश को।
नज़दीक के एक गांव दादर-पथर्रा के श्मशान के कुएं से पुलिस ने भारी 2177 ज़िंदा कारतूस बरामद किये।इतनी बडी मात्रा मे कारतूसो की बरामदगी ने पुलिस विभाग को सकते मे ला दिया।बरामद कारतूसो मे 478 एस एल आर के,1136 कारतूस 315 बोर के,12 बोर के 454, एके 47 के उन्तीस एक कट्टा ।दो पिस्टल और अलग-अलग बोर के बाकी कारतूस बरामद किये गये।दुर्ग ज़िले के एस पी दिपांशु काबरा ने मामले की गंभीरता को देखते हुये खुद मौके पर मौज़ुद रह कर तलाशी अभियान पूरा कराया।
इतनी बड़ी मात्रा मे ज़िंदा कारतूस किसके हो सकते हैं,ये बेहद महत्वपूर्ण सवाल है। छत्तीसगढ मे अपराध अभी इतना संगठित नही है किसी बड़े गिरोह पर इतनी बड़ी मात्रा मे हथियार छिपा कर रखने का शक़ किया जा सके। छत्तीसगढ मे हथियारो का भरपूर इस्तेमाल सिवाय नक्सलियों के कोई और नही करता,और जब्त कारतूसो मे उनके द्वारा इस्तेमाल किये जाने वाले 315 और 12 बोर के कारतूसो का बड़ी सख्या मे होना इस मामले मे उनकी संलिप्तता का संदेह और पुख्ता करता है।
कारतूस किसके है ये पता लगाना पुलिस का काम है मगर छतीसगढ जो कभी शांति का टापू हुआ करता था,वंहा इस तरह मौत के सामान का थोक मे मिलना अशुभ ही माना जायेगा।इससे पहले भी पूरा ट्रक भर कर गोला बारूद बरामद हो चुका है।वन्य औषधियों की खुश्बू वाले जंगलो मे अब बारूद की बदबू उड रही है।महुआ कब फ़लता है ये पता ही नही चलता हां मगर लैण्ड माईन्स के फ़टने के बाद चारो ओर इंसानी खून और बारूद की बदबू अब मादकता नही सिर्फ़ और सिर्फ़ आतंक फ़ैला रही है।पता नही किसकी बुरी नज़र लग गई है इस खूबसुरत प्रदेश को।
Sunday, November 16, 2008
साध्वी, सैनिक,बम, धमाके, आतंकवाद,जांच, राजनीति और पुलिस
मालेगांव बम धमाकों को लेकर सारे देश में चिल्ल-पो मची हुई है। हर कोई अपने-अपने हिसाब से चीख-चिल्ला रहा है। पुलिस की जांच तो सीआईए और की जांच को मात कर रही है। पुलिस जिस स्टाइल में काम कर रही है, उसे देख एक पुराना किस्सा याद आ गया।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पुलिस की गुणवत्ता और श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए एक स्पर्धा का आयोजन अफ्रीका के घने जंगलों में हुआ। सारी दुनिया की जानी-मानी पुलिस वहां अपना सिक्का जमाने पहुंची और हमारे देश से भाग लेने के लिए एटीएस को वहां भेजा गया। प्रतियोगिता की शुरूआत के दौर में बहुत सारे देशों की पुलिस कट गई और प्रारंभिक जांच के नतीजों के आधार पर भारत का प्रतिनिधित्व कर रही एटीएस भी अंतिम दौर में पहुंच गई है।
अंतिम दौर में मुकाबला था अमेरिका,ब्रिटेन, जापान, जर्मनी, फ्रांस जैसे देशों की पुलिस से एटीएस का। अंतिम मुकाबला शुरू हुआ और अफ्रीका के घने जंगलों में कुछ भेडि़ये छोड़ दिए गए। स्पर्धा जीतने के लिए कम से कम समय में उन भेडियों में से हर एक देश की पुलिस को एक भेडिया ढूंढकर लाना था। सुबह शुरू हुई प्रतियोगिता के प्रतिभागी दोपहर तक एक-एक कर वापस भेडिये के साथ लौट आए सिवाय एटीएस के। शाम होते-होते स्पर्धा के आयोजक चिंता में डूब गए।
अब सारी दुनिया की पुलिस इकट्ठा होकर एटीएस की टीम को ढूंढने जंगल में घुसी और थोड़ी ही दूर पहुंचते ही उन्हें एटीएस की टीम मिल गई। सारे लोग उन पर फट पड़े कि क्या तमाशा है अभी तक लौटे क्यों नहीं। एटीएस की टीम के कप्तान से बड़ी मासूमियत से जवाब दिया कि बस लौटने ही वाले थे। बाकि लोगों ने पूछा भेडिया कहां है। कप्तान ने बताया कि हमारे कुछ जवान उसका टेस्ट कर रहे हैं और रिपोर्ट आते ही आपके सामने पेश कर देंगे। सारे लोग हैरान रह गए। सबने पूछा कि भेडिए का कौन सा टेस्ट हो रहा है। कप्तान बोला टेस्ट तो एक ही हो रहा है लेकिन उसकी रिपोर्ट सही नहीं आ रही है इसलिए बार-बार टेस्ट करना पड़ रहा है।
सारी दुनिया के जाने-माने पुलिसवाले हैरान थे एटीएस की जांच से। तंग आकर उन्होंने पूछा भेडिया कहां है। कप्तान उन सबको पेड़ों के पीछे ले गया। वहां सब हैरान रह गए। सबने देखा एटीएस के जवान एक लकड़बग्घे को कूट रहे थे और उसे बार-बार कह रहे थे बोल मैं भेडिया हूं। सारे पुलिसवालों ने कहा ये क्या कर रहे हैं ये तो लकड़बग्घा है, भेडिया कहां है। एटीएस के जवान बोले सर इसकी नार्को रिपोर्ट आ रही है और उसमें इसने कबूल कर लिया है कि ये भेडिया है।
यही हाल है हमारे देश की पुलिसिया जांच का। जब तक पुलिस को मनमाफिक रिपोर्ट नहीं मिलती, तब तक जांच होती रहती है और मनमाफिक रिपोर्ट मिलने के बाद तो लकड़बग्घा क्या कुत्ते तक को भेडिया या शेर बता देती है पुलिस। मामला जब अदालत में आता है तब पता चलता है कि सच क्या है और झूठ क्या है।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पुलिस की गुणवत्ता और श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए एक स्पर्धा का आयोजन अफ्रीका के घने जंगलों में हुआ। सारी दुनिया की जानी-मानी पुलिस वहां अपना सिक्का जमाने पहुंची और हमारे देश से भाग लेने के लिए एटीएस को वहां भेजा गया। प्रतियोगिता की शुरूआत के दौर में बहुत सारे देशों की पुलिस कट गई और प्रारंभिक जांच के नतीजों के आधार पर भारत का प्रतिनिधित्व कर रही एटीएस भी अंतिम दौर में पहुंच गई है।
अंतिम दौर में मुकाबला था अमेरिका,ब्रिटेन, जापान, जर्मनी, फ्रांस जैसे देशों की पुलिस से एटीएस का। अंतिम मुकाबला शुरू हुआ और अफ्रीका के घने जंगलों में कुछ भेडि़ये छोड़ दिए गए। स्पर्धा जीतने के लिए कम से कम समय में उन भेडियों में से हर एक देश की पुलिस को एक भेडिया ढूंढकर लाना था। सुबह शुरू हुई प्रतियोगिता के प्रतिभागी दोपहर तक एक-एक कर वापस भेडिये के साथ लौट आए सिवाय एटीएस के। शाम होते-होते स्पर्धा के आयोजक चिंता में डूब गए।
अब सारी दुनिया की पुलिस इकट्ठा होकर एटीएस की टीम को ढूंढने जंगल में घुसी और थोड़ी ही दूर पहुंचते ही उन्हें एटीएस की टीम मिल गई। सारे लोग उन पर फट पड़े कि क्या तमाशा है अभी तक लौटे क्यों नहीं। एटीएस की टीम के कप्तान से बड़ी मासूमियत से जवाब दिया कि बस लौटने ही वाले थे। बाकि लोगों ने पूछा भेडिया कहां है। कप्तान ने बताया कि हमारे कुछ जवान उसका टेस्ट कर रहे हैं और रिपोर्ट आते ही आपके सामने पेश कर देंगे। सारे लोग हैरान रह गए। सबने पूछा कि भेडिए का कौन सा टेस्ट हो रहा है। कप्तान बोला टेस्ट तो एक ही हो रहा है लेकिन उसकी रिपोर्ट सही नहीं आ रही है इसलिए बार-बार टेस्ट करना पड़ रहा है।
सारी दुनिया के जाने-माने पुलिसवाले हैरान थे एटीएस की जांच से। तंग आकर उन्होंने पूछा भेडिया कहां है। कप्तान उन सबको पेड़ों के पीछे ले गया। वहां सब हैरान रह गए। सबने देखा एटीएस के जवान एक लकड़बग्घे को कूट रहे थे और उसे बार-बार कह रहे थे बोल मैं भेडिया हूं। सारे पुलिसवालों ने कहा ये क्या कर रहे हैं ये तो लकड़बग्घा है, भेडिया कहां है। एटीएस के जवान बोले सर इसकी नार्को रिपोर्ट आ रही है और उसमें इसने कबूल कर लिया है कि ये भेडिया है।
यही हाल है हमारे देश की पुलिसिया जांच का। जब तक पुलिस को मनमाफिक रिपोर्ट नहीं मिलती, तब तक जांच होती रहती है और मनमाफिक रिपोर्ट मिलने के बाद तो लकड़बग्घा क्या कुत्ते तक को भेडिया या शेर बता देती है पुलिस। मामला जब अदालत में आता है तब पता चलता है कि सच क्या है और झूठ क्या है।
Saturday, August 9, 2008
दमदारी और ईमानदारी का दूसरा नाम छत्तीसगढ़ पुलिस ?
दो साल पुराने मामले में दर्जनों पुलिस वाले निकल पड़े थे सुबह से घोटालेबाजों को पकड़ने और दोपहर बाद नतीजा फिर वही, खोदा पहाड़ निकला चूहा। एक भी बड़े घोटालेबाज को पुलिस पकड़ तो नहीं पाई उल्टे उसके हाथ से पकड़ी गई एक महिला अधिवक्ता चकमा देकर दूसरी आरोपी को भी अपने साथ लेकर निकल गई।
छत्तीसगढ़ की राजधानी की पुलिस ने कल जो कमाल किया उसकी जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है। अगर उनकी तारीफ न करूं तो लोग कहेंगे चिढ़ता है पुलिस वालों से। 2 साल पहले 28 करोड़ का घोटाला हुआ था इंदिरा प्रियदर्शिनी बैंक में। 26 हज़ार से ज्यादा खातेदारों की मेहनत की गाढ़ी कमाई डूब गई, और बैंक डूब गया था। तब से लेकर आज तक 26 हज़ार खातेदार लगातार चिल्ला रहे हैं, घोटालेबाजों को गिरफ्तार करो और देखा हमारी पुलिस की सक्रियता, गई न आखिर पकड़ने के लिए। अब ऐसे में कोई भला पुलिस को बेईमान कह सकता है। सुस्त भले ही कह लीजिए पर ईमानदार तो कहना ही होगा और दमदार भी, क्योंकि घोटालेबाजों को लोग ताकतवर कहते हैं और उनके घर घुसना दमदारी की बात है या नहीं।
अब ये अलग बात है कि सारे कथित ताकतवर घोटालेबाज विपक्ष के चूके हुए नेताओं की पत्नियाँ है। एक के पति पूर्व महापौर व विधायक रह चुके हैं, ये सालों पहले की बात है। एक और नेता उपमहापौर रह चुके हैं, और विधानसभा चुनाव में रिकॉर्ड तोड़ 25 हज़ार वोटों से ज्यादा हार चुके हैं। बाकी भी करीब-करीब गुजरे जमाने की बात है। अच्छा हुआ बीजेपी की सरकार है। वरना कांग्रेस की सरकार में तो पुलिस को कई जनम लेने पड़ते घोटालेबाजों के पतियों के घर घुसने में। बीजेपी के सरकार में 2 साल लग गए पुलिस को दमदारी और ईमानदारी का सेम्पल दिखाने में।
और ये ईमानदारी और दमदारी दिखाने के पीछे भी एक दमदार ख़बर दबी हुई है। दरअसल 26 हज़ार खातेदारों ने मुख्यमंत्री का निवास घेरने की चेतावनी दे दी थी और मुख्यमंत्री के घर को घेराव से बचाने के लिए पुलिस ने घोटालेबाजों के घर का घेराव कर दिया। अब बताईए पुलिस है न ईमानदार। जिसका खाती है उसी का तो गाएगी। सरकार तनख्वाह देती है तो सरकार को बचाएगी। खातेदार कुछ देते तो खातेदारों का काम करती, जैसे घोटालेबाजों का काम करते आ रही थी। कारण चाहे जो भी हो पुलिस का 2 साल से मांद में छुपे रहने के बाद बड़े शिकार के लिए मांद से बाहर आना ही उसके शेर होने की कोशिश का सबूत है।
सुबह जब पुलिस की कई टीमें एक साथ घोटालेबाजों के घर पहुँची तो लोगों को लगा कि हाँ अब जागा है शेर, पर दोपहर होते-होते पता चला कि वो शेर नहीं बिल्ली है। नेताओं के यहाँ पहुँच तो गए मगर 4-4 घंटे गुजारने के बाद भी किसी बड़े शिकार को पकड़ नहीं पाए। चाय, लस्सी, नाश्ते का दौर चलता रहा। और इतने बड़े अभियान की किरकिरी न हो जाए इसलिए 3 छोटे कर्मचारी और 1 निरीह बैंक डॉयरेक्टर को पकड़कर लटका दिया सीने पर मैडल बनाकर।
जनता का भ्रम दोपहर होते-होते टूट गया था। लोगों को उम्मीद हो गई थी कि देर से ही सही अपनी पुलिस ने कुछ किया तो। बस पुलिस नाम के लिए ही कुछ कर पाई। बाकि तो घोटालेबाज डॉयरेक्टर पहले भी घूम रहे थे अभी भी घूम रहे हैं बेखौफ। हाँ! पुलिस कि ईमानदारी एक बार फिर साबित हो गई। बेहद गोपनीय इस अभियान की ख़बर जिनको मिलनी थी उनको मिल ही गई। वे बाहर चले गए आराम से, उसके बाद पुलिस उनके घर पहुँची। यहाँ पुलिस ने महिलाओं के साथ दर्ुव्यवहार करने वाली इमेज को भी सुधारा है। उसने धोखे से हाथ लगी बैंक डॉयरेक्टर किरण तिवारी के साथ बेहद अच्छा व्यवहार किया। हिरासत में लेने के बाद उन्हें उनकी इच्छा पर दूसरी बैंक डॉयरेक्टर के घर ले जाया गया। सीधे पुलिस स्टेशन नहीं। यहाँ उन्हें घर के भीतर जाने दिया और उसके बाद किरण तिवारी तो गई ही, साथ ही पुलिस के घेरेबंदी में फंसी दूसरी बैंक डॉयरेक्टर को भी लेकर चली गई। बताईए भला हिरासत में आए आरोपी के साथ इतना अच्छा व्यवहार और कहीं की पुलिस कर सकती है। बेमतलब लोग उस पर मानवाधिकार हनन के आरोप लगाते रहते हैं। किरण तिवारी को पुलिस ने हिरासत से फ़रार भी घोषित नहीं किया, अब क्या जान लोगे पुलिस की ?
गरीब है बेचारी पुलिस। करो तो गालियाँ बकते हैं लोग, न करो तो भी चुप नहीं रहते। कितनी मुश्किल से और कितनी सेटिंग से राजधानी में पोस्टिंग होती है। अब 4 महीने बाद चुनाव है मान लो कांग्रेस की सरकार आ गई तो। हो जायेगा न लफड़ा। आखिर वो भी तो बाल-बच्चे वाले हैं। अपना न सही बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का तो ख्याल रखना पड़ता है। सरकार बदल गई तो कांग्रेसी छोड़ेंगे भला। वो तो बदला लेने में वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर हैं। फिर भेज देंगे नक्सली क्षेत्र में तो तिरंगे में लिपटकर आने के चांसेज पूरे हैं। वहाँ बच्चे पढ़ेंगे कैसे। बहुत सारे प्रॉब्लम है! आखिर पुलिस भी तो समाज का अंग है। उनके भी अपने सामाजिक और आर्थिक के साथ-साथ राजनीतिक दायित्व हैं। बस यही सब सोचकर सरकार को खुश करने के लिए छापे मार दिए और जिन्हें बचाना था उन्हें छापे की ख़बर लीक कर बचा भी लिए। पुलिस पर कोई पक्षपात का आरोप नहीं लगा सकता। उसने भाजपा के लिए भी काम किया और कांग्रेस के लिए भी। उसने खातेदारों को संतुष्ट करने का काम किया और बैंक के घोटालेबाजों को बचने का मौका भी दिया। ऐसी निष्पक्ष, दमदार और ईमानदार पुलिस भला दूसरे प्रदेशों की तो क्या ? दूसरे देशों की भी नहीं होगी। मेरा तो ख्याल है अपनी पुलिस का मंदिर हर प्रदेश, हर देश के पुलिस मुख्यालयों में बना देना चाहिए। और यहाँ हर साल कार्यशाला लगनी चाहिए जिसमें मुख्य रूप से मनचाही पोस्टिंग कैसे करवाएँ या नक्सल क्षेत्र की पोस्टिंग कैसे रूकवाएँ ? राजनीतिक मामलों में बिना बाँस के रस्सी पर कैसे दौड़ें ? दोनों पक्षों से समान रूप से व्यवहार या उपहार कैसे लें ? आदि विषयों पर प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। बस इससे ज्यादा तारीफ मैं छत्तीसगढ़ पुलिस की नहीं कर पाऊँगा, थक गया हूँ। सोचा था आज आप लोगों को श्रीपुर के बौध्दविहारों की सैर कराऊँगा मगर पुलिस का इतना बड़ा कारनामा देखकर मुझसे रहा नहीं गया और छत्तीसगढ़ के पुरातत्व और इतिहास पर लिखने से ज्यादा वर्तमान पर लिखना ज़रूरी समझा। क्योंकि जब इतिहास लिखा जाएगा तो उसमें छत्तीसगढ़ पुलिस की बहादुरी के किस्से स्वर्ण अक्षरों में लिखे जाएँगे।
छत्तीसगढ़ की राजधानी की पुलिस ने कल जो कमाल किया उसकी जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है। अगर उनकी तारीफ न करूं तो लोग कहेंगे चिढ़ता है पुलिस वालों से। 2 साल पहले 28 करोड़ का घोटाला हुआ था इंदिरा प्रियदर्शिनी बैंक में। 26 हज़ार से ज्यादा खातेदारों की मेहनत की गाढ़ी कमाई डूब गई, और बैंक डूब गया था। तब से लेकर आज तक 26 हज़ार खातेदार लगातार चिल्ला रहे हैं, घोटालेबाजों को गिरफ्तार करो और देखा हमारी पुलिस की सक्रियता, गई न आखिर पकड़ने के लिए। अब ऐसे में कोई भला पुलिस को बेईमान कह सकता है। सुस्त भले ही कह लीजिए पर ईमानदार तो कहना ही होगा और दमदार भी, क्योंकि घोटालेबाजों को लोग ताकतवर कहते हैं और उनके घर घुसना दमदारी की बात है या नहीं।
अब ये अलग बात है कि सारे कथित ताकतवर घोटालेबाज विपक्ष के चूके हुए नेताओं की पत्नियाँ है। एक के पति पूर्व महापौर व विधायक रह चुके हैं, ये सालों पहले की बात है। एक और नेता उपमहापौर रह चुके हैं, और विधानसभा चुनाव में रिकॉर्ड तोड़ 25 हज़ार वोटों से ज्यादा हार चुके हैं। बाकी भी करीब-करीब गुजरे जमाने की बात है। अच्छा हुआ बीजेपी की सरकार है। वरना कांग्रेस की सरकार में तो पुलिस को कई जनम लेने पड़ते घोटालेबाजों के पतियों के घर घुसने में। बीजेपी के सरकार में 2 साल लग गए पुलिस को दमदारी और ईमानदारी का सेम्पल दिखाने में।
और ये ईमानदारी और दमदारी दिखाने के पीछे भी एक दमदार ख़बर दबी हुई है। दरअसल 26 हज़ार खातेदारों ने मुख्यमंत्री का निवास घेरने की चेतावनी दे दी थी और मुख्यमंत्री के घर को घेराव से बचाने के लिए पुलिस ने घोटालेबाजों के घर का घेराव कर दिया। अब बताईए पुलिस है न ईमानदार। जिसका खाती है उसी का तो गाएगी। सरकार तनख्वाह देती है तो सरकार को बचाएगी। खातेदार कुछ देते तो खातेदारों का काम करती, जैसे घोटालेबाजों का काम करते आ रही थी। कारण चाहे जो भी हो पुलिस का 2 साल से मांद में छुपे रहने के बाद बड़े शिकार के लिए मांद से बाहर आना ही उसके शेर होने की कोशिश का सबूत है।
सुबह जब पुलिस की कई टीमें एक साथ घोटालेबाजों के घर पहुँची तो लोगों को लगा कि हाँ अब जागा है शेर, पर दोपहर होते-होते पता चला कि वो शेर नहीं बिल्ली है। नेताओं के यहाँ पहुँच तो गए मगर 4-4 घंटे गुजारने के बाद भी किसी बड़े शिकार को पकड़ नहीं पाए। चाय, लस्सी, नाश्ते का दौर चलता रहा। और इतने बड़े अभियान की किरकिरी न हो जाए इसलिए 3 छोटे कर्मचारी और 1 निरीह बैंक डॉयरेक्टर को पकड़कर लटका दिया सीने पर मैडल बनाकर।
जनता का भ्रम दोपहर होते-होते टूट गया था। लोगों को उम्मीद हो गई थी कि देर से ही सही अपनी पुलिस ने कुछ किया तो। बस पुलिस नाम के लिए ही कुछ कर पाई। बाकि तो घोटालेबाज डॉयरेक्टर पहले भी घूम रहे थे अभी भी घूम रहे हैं बेखौफ। हाँ! पुलिस कि ईमानदारी एक बार फिर साबित हो गई। बेहद गोपनीय इस अभियान की ख़बर जिनको मिलनी थी उनको मिल ही गई। वे बाहर चले गए आराम से, उसके बाद पुलिस उनके घर पहुँची। यहाँ पुलिस ने महिलाओं के साथ दर्ुव्यवहार करने वाली इमेज को भी सुधारा है। उसने धोखे से हाथ लगी बैंक डॉयरेक्टर किरण तिवारी के साथ बेहद अच्छा व्यवहार किया। हिरासत में लेने के बाद उन्हें उनकी इच्छा पर दूसरी बैंक डॉयरेक्टर के घर ले जाया गया। सीधे पुलिस स्टेशन नहीं। यहाँ उन्हें घर के भीतर जाने दिया और उसके बाद किरण तिवारी तो गई ही, साथ ही पुलिस के घेरेबंदी में फंसी दूसरी बैंक डॉयरेक्टर को भी लेकर चली गई। बताईए भला हिरासत में आए आरोपी के साथ इतना अच्छा व्यवहार और कहीं की पुलिस कर सकती है। बेमतलब लोग उस पर मानवाधिकार हनन के आरोप लगाते रहते हैं। किरण तिवारी को पुलिस ने हिरासत से फ़रार भी घोषित नहीं किया, अब क्या जान लोगे पुलिस की ?
गरीब है बेचारी पुलिस। करो तो गालियाँ बकते हैं लोग, न करो तो भी चुप नहीं रहते। कितनी मुश्किल से और कितनी सेटिंग से राजधानी में पोस्टिंग होती है। अब 4 महीने बाद चुनाव है मान लो कांग्रेस की सरकार आ गई तो। हो जायेगा न लफड़ा। आखिर वो भी तो बाल-बच्चे वाले हैं। अपना न सही बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का तो ख्याल रखना पड़ता है। सरकार बदल गई तो कांग्रेसी छोड़ेंगे भला। वो तो बदला लेने में वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर हैं। फिर भेज देंगे नक्सली क्षेत्र में तो तिरंगे में लिपटकर आने के चांसेज पूरे हैं। वहाँ बच्चे पढ़ेंगे कैसे। बहुत सारे प्रॉब्लम है! आखिर पुलिस भी तो समाज का अंग है। उनके भी अपने सामाजिक और आर्थिक के साथ-साथ राजनीतिक दायित्व हैं। बस यही सब सोचकर सरकार को खुश करने के लिए छापे मार दिए और जिन्हें बचाना था उन्हें छापे की ख़बर लीक कर बचा भी लिए। पुलिस पर कोई पक्षपात का आरोप नहीं लगा सकता। उसने भाजपा के लिए भी काम किया और कांग्रेस के लिए भी। उसने खातेदारों को संतुष्ट करने का काम किया और बैंक के घोटालेबाजों को बचने का मौका भी दिया। ऐसी निष्पक्ष, दमदार और ईमानदार पुलिस भला दूसरे प्रदेशों की तो क्या ? दूसरे देशों की भी नहीं होगी। मेरा तो ख्याल है अपनी पुलिस का मंदिर हर प्रदेश, हर देश के पुलिस मुख्यालयों में बना देना चाहिए। और यहाँ हर साल कार्यशाला लगनी चाहिए जिसमें मुख्य रूप से मनचाही पोस्टिंग कैसे करवाएँ या नक्सल क्षेत्र की पोस्टिंग कैसे रूकवाएँ ? राजनीतिक मामलों में बिना बाँस के रस्सी पर कैसे दौड़ें ? दोनों पक्षों से समान रूप से व्यवहार या उपहार कैसे लें ? आदि विषयों पर प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। बस इससे ज्यादा तारीफ मैं छत्तीसगढ़ पुलिस की नहीं कर पाऊँगा, थक गया हूँ। सोचा था आज आप लोगों को श्रीपुर के बौध्दविहारों की सैर कराऊँगा मगर पुलिस का इतना बड़ा कारनामा देखकर मुझसे रहा नहीं गया और छत्तीसगढ़ के पुरातत्व और इतिहास पर लिखने से ज्यादा वर्तमान पर लिखना ज़रूरी समझा। क्योंकि जब इतिहास लिखा जाएगा तो उसमें छत्तीसगढ़ पुलिस की बहादुरी के किस्से स्वर्ण अक्षरों में लिखे जाएँगे।
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