छत्तीसगढ के ग़ृहमंत्री ने विधानसभा में ये कह कर सब को चौंका दिया कि थानेदारों को दस हज़ार रूपया महिना बंधा है।वे अवैध शराब की बिक्री को संरक्षण दे रहे हैं।अब बताईये भला ये बयान क्या काफ़ी है।बात तो होती जब गृह मंत्री भ्रष्ट थानेदारों की सूची या एकाध नाम सामने रखते और उनहे सज़ा देकर बाकी लोगों को सुधरने की चेतावनी देते।
अफ़सोस ऐसा नही किया मंत्री ने।वे तो बस बोले चले गये और बात-बात पे हंगामा करने वाला विपक्ष भी उनकी बात को सुनता रहा और सब मिलकर तालियां बज़ाते रहे।किसलिये कि प्रदेश में भ्रष्टाचरियों का बोलबाला है?किसलिये,कि गृहमंत्री भी भ्रष्ट थानेदारों तक़ का कुछ नही बिगाड़ सकती?
अपने क्षेत्र मे अवैध शराब की बिक्री न होने की घोषणा मंत्री ने बड़े गर्व से की।तो क्या वे सिर्फ़ अपने विधानसभा क्षेत्र के ही मंत्री हैं?क्या प्रदेश के अन्य हिस्सों से उन्हे कोई लेना-देना नही है?मेरा ये सवाल है कि अगर आप अपने क्षेत्र को सुधार सकते हो तो दूसरे क्षेत्र को भी ठीक कर सकते हैं।अगर आप ऐसा नही कर रहे हैं तो ये आपकी अक्षमता ही मानी जायेगी ना कि ईमानदारी।
मंत्री जी अगर आप ये मान रहे हैं कि थानेदारों का महिना बंधा है और अगर उनके खिलाफ़ कोई कार्रवाई नही हो रही है तो ये भी अपने आप मान लिया जायेगा कि वे भी कंही न कंही महिना दे रहे हैं।लेने वाला कोई भी हो सकता है?अगर आप कहें कि मैं नही लेता,अगर लेता तो उन्हे गालियां कैसे देता?तो मान भी लेंगे कि आप नही लेते।मगर कार्रवाई क्यों नही करते ये सवाल तो खड़ा ही है ना?आप नही लेते होंगे? तो भाई-भतीज़े लेते होंगे? नही तो दूसरे मंत्री लेते होंगे?,नही तो बड़े अफ़सर लेते होंगे?कोई ना कोई तो लेता ही होगा वर्ना मंत्री को पता होने के बाद भी कार्रवाई क्यों नही हो रही है?
खैर आप और आपके साथी तो सरकार में है उनकी खामोशी समझ मे आती है मगर विपक्ष का इतने बड़े मामले मे ख्जामोश रहना समझ से परे है?सड़ियल रिपोर्टों के आधार पर सरकार पर भ्रष्टाचार का आये दिन आरोप लगाने वाले विपक्ष यानी कांग्रेस का खामोश रहना इस बात का संकेत तो देता है कि मंत्री के अनुसार महिना लेने वाले थानेदार कुर्सी पर बने रहने के लिये न केवल सत्तापक्ष और अफ़सरों को बल्कि विपक्ष को भी सेट करके रखे हैं।
वैसे थानेदारों के अलावा आपको कोई और भ्रष्ट क्यों नज़र नही आया ये भी समझ मे नही आया मुझ नासमझ के?आप तो सहकारिता और जेल मंत्री भी हैं।सहकारिता मे तो इंस्पेक्टर राज ही चलता है।फ़िर एक सहकारिता निरीक्षक को रंगे हाथों रिश्वत लेते पकड़ाने के बाद भी क्यों फ़िल्ड़ मे पोस्टिंग दी गई?चलिये व्यक्तिगत सवाल नही।क्या जेल मे सब ठीक चल रहा है।आपको वंहा जैमर तक़ लगवाने पड़े।वंहा से आज भी अपराधी अपना कारोबार मोबाईल पर चला रहे हैं।वंहा औरत छोड़ कर सारी सुविधायें बिकती है।बैरकों की नीलामी होती है?अस्पताल के बहाने बाहर की हवा खाने की कीमत अलग तय है।सब तो जान्ते हैं आप्।फ़िर उन मामलों मे वही बेबाकी क्यों नही?वही स्वीकारोक्ति क्यों नही?
खैर जाने दीजिये कहने को बहुत कुछ है वो फ़िर किसी दिन मगर मेरा ये मानना ह कि अगर आप विपक्ष मे होते और आपकी पार्टी भी तो क्या दूसरी पार्टी के मंत्री के ऐसे बयान पर खामोश रहते?क्या आप उससे नैतिकता की दुहाई देकर इस्तीफ़ा नही मांगलेते?वैसे नैतिकता की बात अगर राजनीति सिर्फ़ बयानबाज़ी के अलावा सच मे ज़िंदा है तो इसका थोड़ा बहुत असर तो होना चाहियें।इस्तीफ़ा ना सही कम से कम भ्रष्ट अफ़सरों को ठीक करने का एलान तो हो जाना चाहिये।फ़िर ये तो छत्तीसगढ है जंहा नकसल प्रभावित बस्तर का नाम ही अच्छे-अच्छे सुधर जाते हैं।आप मंत्री है चाहे तो सुधार सकते है और अगर नही तो किसी को भ्रष्ट कहने से पहले सोचियेगा कि कार्रवाई नही करने के सवाल पर आपकी ईमानदार बनने की कोशिश औंधे मुंह गिरेगी।