Showing posts with label बिकाऊ. Show all posts
Showing posts with label बिकाऊ. Show all posts

Thursday, September 16, 2010

अफसोस की बात है कि विदेशियों के हाथों बिके हुए लोग देशी पत्रकारों को बिकाऊ कह रहे है…

छत्तीसगढ़ की मीडिया पर इस बात को लेकर बहस होने लगी है कि वह विकाऊ है या ईमानदार। अब यह सर्टिफिकेट कौन देगा किकौन बिकाऊ है और कौन ईमानदार?दिल्ली में बैठे कुछ लोग अचानक सक्रिय हो जाते हैं और जमे-जमाए आंदोलन पर कब्जा करने के लिए कूद पड़ते हैं कि। उनकी यह प्रवृत्ति अपना अस्तित्व बनाए रखने तक सीमित  रहे तो  समझ में आता है लेकिन विदेशीपूंजी से देशी लोगों के जख्मों पर मरहम लगाने की कोशिश का दिखावा करने वाले कथित समाजसेवी अपनी भूमिका की सफलता को लेकर आशंकित रहते हैं और वे इसका ठीकरा स्थानीय पत्रकारिता पर फोड़नेसे बाज नहीं आते। अब कोई ये बताए कि  बस्तर में होने वाली तमाम नक्सली घटनाओं को प्रमुखता से अखबारों की सुर्खियां सबसे पहले  कौन बनाता है? जन हथेली पर लेकर काम कर रहेपत्रकारों को बिकाऊ कहने से पहले मैं समझता हूं कि समझने वाले को आईने के सामने खड़े होकर खुद का चेहरा एक बार जरुर देख लेना चाहिए।\


छत्तीसगढ़ का मीडिया बिकाऊ है या नहीं, यह बहस का मुद्दा हो सकता है लेकिन पिछले दिनों यहां प्रवास पर आए स्वामी अग्निवेश के साहित्यिक पत्रिका हंस में छपे बयान ने छत्तीसगढ़ और खासकर नक्सल क्षेत्रों में काम कर रहे तमाम पत्रकारों की ईमानदारी व निष्पक्षता पर जो सवाल खड़े किए हैं। उसकी सिर्फ भर्त्सना करने से काम नहीं चलेगा। जरुरत है सच्चाई को सामने लाने की।इस बारे में जिसे भी लगता है कि छत्तीसगढ़ का मीडिया बिकाऊ है उससे यह अनुरोध है कि एक बार खुद आकर छत्तीसगढ़ के वनांचलों में पत्रकारिता कर रहे लोगों के घरों में झांक कर देखें, उनके जीवन स्तर की तुलना छत्तीसगढ़ की मीडिया को  बिकाऊ कहने वालों के हिसाब से ईमानदार लोगों से, उनके जीवन स्तर से कर लें।


यह पहली बार नहीं है जब छत्तीसगढ़ की मीडिया को बिकाऊ कहा गया हो, इससे पहले भी नक्सलियों के समर्थन में विदेशी पैसा लेकर रोने वाले "बिकाऊ रुदालियों'  ने कई बार बिकाऊ कहा है।  अपने साथ दिल्ली के कथित पत्रकारों को साथ लेकर घूमने वाले और अपनी आंखों से दिखाया गया और अपनी जुबान से कहा गया झूठा सच छापने वाले कथित ईमानदार पत्रकारों की फौज पर कभी छत्तीसगढ़ की मीडिया ने सवाल नहीं खड़े किए कि उनकी हवाई टिकट से लेकर एयरकंडीशन्ड गाड़ियों में दौरा करने का और उन्हीं रूदालियों को दिल्ली से लेकर वनांचलों तक कवर कर्ने का स्पांसर कौन है?


सब को पता है कि लोकतंत्र को  अपने ठेंगे पर रखने वाले और बैलेट काअ जवाब बुलेट से देने वालों के हिमायतियों  की फौज अब चेहरे बदल रही है लेकिन अफसोस की बात यह है कि बस्तर में विश्वास खो चुके पुराने लोगों की तरह नए लोग भी रटे-रटाए आरोप छत्तीसगढ़ की मीडिया पर लगा रहे हैं। नक्सलियों के पुराने कथित हिमायती बस्तर के लोगों के हाथों पिटने लगे, उस गलती से भी  लगता है कि दिल्ली में बैठकर बस्तर के दर्द पर घड़ियाली आंसू बहाने वालों ने सबक नहीं लिया है।

अफसोस की बात यह है कि छत्तीसगढ़ के मीडिया को बिकाऊ साबित करने के लिए स्वामी जी ने यहीं के एक नामीगिरामी पत्रकार का सहारा लिया है। उस पत्रकार का जो रायपुर में उनकी प्रेस कान्फ्रेंस में समय से पहले पहुंच गया था और उन्होंने नए पत्रकारों से स्वामी जी की पूरी टीम का परिचय करवाया था।  स्वामी जी और उनकी टीम का उस समय मैने खुद स्वागत किया था, तब उन्हें क्यों नहीं लगा कि छत्तीसगढ़ की मीडिया बिकाऊ है।


बेवजह शुरु हुई इस बहस पर छत्तीसगढ़ के जानेमाने पत्रकार व पत्रकारिता का स्कूल कहे जाने वाले देशबंधु पत्र समूह के प्रधान संपादक ललित सुरजन को बहुत दुख हुआ और उन्होंने अपनी वेदना आज 16 सितंबर के अंक में दैनिक देशबंधु के संपादकीय पेज पर लिखे अपने लेख में जाहिर कर दी। उनके दुख से सारे पत्रकार दुखी हैं और अब उनकी नजर छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार रमेश नैयर के जवाब पर टिकी हैं जिनसे ललित सुरजन जी ने अपने लेख में सवाल किए हैं।

पढ़िए ललित सुरजन जी का लेख और अपनी राय जरुर दीजिए।

Monday, January 18, 2010

बिके हुये लोग मीडिया को बिकाऊ कह रहे हैं,हद हो गई बेशर्मी की और बर्दाश्त की भी!अब किसी ने कुछ कहा तो मुंह-तोड़ जवाब दिया जायेगा!

पिछ्ले कुछ समय से देखने मे आ रहा था कि नक्सलियों के प्रायोजित कार्यक्रम के तहत दिल्ली और अन्य महानगरों से तथाकथित समाजसेवी,मानवाधिकारवादी और पत्रकार यंहा आकर मीडिया को गैरज़िम्मेदार और बिकाऊ ठहराने पर तुले हुये हैं।वे यंहा आकर मीडिया को भी दो फ़ाड़ करने की कोशिश मे भी लगे हुये नज़र आ रहे हैं।नक्सलियों के प्रमुख हथियार प्रचार युद्ध मे भोंपू की तरह बज़ने वाले ये लोग यंहा आने-जाने की टिकट से लेकर रूकने_ठहरने की व्यवस्था तक़ उन्ही लोगों से करवाकर आते हैं तो बताईये बिकाऊ वे लोग हुये या जो लोग जान-माल और नौकरी का खतरा उठा कर बस्तर के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों मे पत्रकारिता कर रहे हैं,वे लोग बिकाऊ हैं।

बर्दाश्त की भी हद होती है।जो आता है हवाई जहाज से राजधानी मे उतरकर सीधे बस्तर चला जाता है और कमाल देखिये एक दिन मे ही उसे बस्तर नर्क जैसा नज़र आता है और इसके लिये वे ज़िम्मेदारी भी तय कर देते हैं,सरकार की।सरकार से हमको लेना देना नही है लेकिन इन लोगों के मुंह से एक लफ़्ज़ भी नक्सलियों के खिलाफ़ नही निकलता।लाखों सवाल करने पर भी उनका जवाब होता है अगर सरकार ठीक काम करे तो सब ठीक हो जायेगा।बस्तर को निर्दोष आदिवासिओं और पुलिस वालों के खून से लाल कर देने वाले नक्सलियों के मारे जाने पर तो इन्हे मानवाधिकार नज़र आता है मगर वो मानवो का अधिकार सिर्फ़ उनके मानवो के लिये ही होता है।बस्तर के निर्दोष आदिवासियों और पुलिस वालों के लिये शायद वो अधिकार नही है।

खैर ये उनका अपना विचार हो सकता है,उनकी नीति हो सकती है मगर इसका मतलब ये तो नही है जो उनके साथ है वे सही है और जो उनके साथ नही है वे सब गैरज़िम्मेदार और बिकाऊ हैं।आपको अपने धर्म का पालन करने का तो अधिकार है लेकिन इसका मतलब ये तो नही की आप दूसरे के धर्म को गालियां बकें।नक्सलियों और उनके समर्थक संस्थाओं,कथित समाजसेवी और मानवाधिकार संगठनो के साथ यंहा आकर उनके हिसाब से दौरा कर और उनके नज़रिये से बस्तर की हालत देख कर उनके हिसाब से उसका प्रचार करने वाले भाड़े के भोंपू जब यंहा चिल्लाते है कि सब बिकाऊ हैं तो उनकी बुद्धी पर तरस आता है।जो यंहा न पैदा हुआ,न पला बढा,न यंहा रहा वो बताता है कि सच क्या है?वो बताता है जिसे मोटी रकम न मिले तो कभी बस्तर की सूरत तक़ न देखे?वो बताता है जो महज़ कुछ घण्टे ही पूरा बस्तर घूम लेता है?वो बताता है जो लौट कर फ़िर कभी नही आने वाला होता है बिना फ़ीस लिये?वो बताता है जिसे छत्तीसगढ या बस्तर से ज्यादा अपनी फ़ीस और अपने रिश्तेदारों के विदेशी मदद से चलने वाले एनजीओ को यंहा काम करने के बड़े-बड़े कांट्रेक्ट मिलने की चिंता होती है।

पूरे छत्तीसगढ के बारे मे दुष्प्रचार का एक सुनियोजित षड़यंत्र रचा जा रहा है और तरक्की की असीमित संभावनाओं से भरे बस्तर और छत्तीसगढ को अशांत क्षेत्र घोषित कर यंहा आ रहे उद्योगों के राह मे अड़ंगे डाले जा रहें हैं।विकास के नाम पर खूनी संघर्ष कर रहे लोग यदी विकास के इतने ही हिमायती हैं तो वे स्कूल,अस्पताल,पंचायत भवन और सड़को को क्यों नुकसान पंहुचाते हैं?क्यों वे विकास के रास्ते खोलने वाली सड़को को बनने से रोकते हैं?क्यों उन्हे अब दिल्ली के कथित मीडिया की ज़रूरत पड़ रही है?कल तक़ तो यहीं का मीडिया उन्हे बहुत पसंद था?उनके लोग भी तो हैं यंहा के मीडिया मे?वे भी तो उनके पक्ष मे खुलकर प्रचार अभियान चलाते हैं?उन्हे तो यंहा के लोग कुछ नही कहते। हम जानते हैं कि सबको अपनी विचारधारा तय करने का हक़ है।पसंद अपनी हो सकती है लेकिन इसका मतलब ये तो नही जो नापसंद करे उसे बिकाऊ और गैरज़िम्मेदार ठहराया जाये।

बहुत दिनो से ब्लाग जगत मे भी इन लोगों ने इस तरह का दुष्प्रचार युद्ध छेड़ रखा है।एक साथी ने तो यंहा तक़ लिख मारा कि यंहा के पत्रकारों को खबर नही लिखने के पैसे मिलते हैं।ये वही सज्जन है जो कभी मोटी रकम लेकर यंहा के एक अख़बार के लिये लिखा करते थे और जब वे बेनक़ाब हुये तो उन्हे कोई यंहा पूछ्ता तक़ नही है।झूठ तो ऐसा-ऐसा लिख रहे हैं कि उन्हे माफ़ करने को कतई दिल नही करता।अरे अगर बिके हुये हो तो उनका गाना गाओ,समझ मे आता है लेकिन यंहा के किसान भूख से मर रहे जैसा न बर्दाश्त होने वाला झूठा और बेसूरा राग तो मत छेड़ो।

अब जबकी पानी सर से गुज़रने लगा तो सारे साथियों ने ऐसे लोगों का विरोध करने और उन्हे सबक सिखाने की मांग की।काफ़ी विचार विमर्श के बाद मैने कल रविवार को प्रेस क्लब मे बैठक बुलाई।इस वजह से हम ब्लागरों की मीट भी मुझे कैंसिल करनी पड़ी।बैठक मे शुरुआती उपस्थिति कुछ कम नज़र आई लेकिन लोग आते चले गये और सबने एक स्वर में ऐसे लोगों को बेनक़ाब करने के साथ ही कड़ा सबक सिखाने की बात कही।सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया कि ऐसे लोगों को और उनसे जुड़े संगठनो और संस्थाओं को प्रेस क्लब अपनी बात रखने के लिये अब अपना मंच नही देगा।ऐसे लोगों के खिलाफ़ कानूनी कार्रवाई की जायेगी और ऐसे लोगों के खिलाफ़ जमकर विरोध प्रदर्श्न किया जायेगा,उस स्तर तक़ कि वो किसी को भी गैरज़िम्मेदार कहने से पहले सौ बार सोचें।