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Tuesday, September 2, 2008

भैय्या ये तोगड़िया खसक गया है क्या ?


विश्व हिन्दू परिषद के डॉक्टर प्रवीण तोगड़िया और विवाद का चोली दामन का साथ है। बोलते हैं तो बवाल न हो ऐसा नहीं होता। लेकिन रायपुर में आज ऐसा कुछ नहीं हुआ। तोगड़िया न गरजे, न उलझे और न ही आंए-बांए-शाएं बोले। हेडलाइन मिलने की उम्मीद से आए पत्रकार लगभग निराश हुए और अधिकांश का यही सवाल था कि क्या तोगड़िया खसक गया है ?

बड़ी उम्मीदें लेकर पहुँचे थे पत्रकार आज प्रेस क्लब। प्रेस से मिलिए कार्यक्रम में डॉ. तोगड़िया ने जब बोलना शुरू किया तो सहसा मुझे भी कुछ वैसा ही लगा, जैसा बाकी पत्रकारों को लग रहा था। न अमरनाथ और न कंधमाल सीधे बिहार से शुरू किया। बिहार में बाढ़ की त्रासदी पर देश की जनता से सीधे बिहार की मदद के लिए गुहार लगाई। उन्होंने कहा कि क्या हो रहा है क्या नहीं ? क्या होना चाहिए ? क्या नहीं ? ये सब कांग्रेस और भाजपा के नेताओं का चिल्लाने का काम है। जनता को चाहिए कि बिहार के लोगों के लिए एकजुट होकर मदद करें।

तोगड़िया से ऐसी शुरूआत की उम्मीद शायद किसी ने नहीं की थी। सब सन्न रह गए और तोगड़िया बोलते चले गए। उन्होंने कहा अभी जो दिख रहा है, बिहार की बाढ़ का पहला हिस्सा है। दूसरा हिस्सा इससे भी भयावह होगा। आप उसकी कल्पना नहीं कर सकते। पानी के हटने के बाद जानवरों की लाश और मृत मानव देह की सड़न महामारी को जन्म देगी। महामारी से बचना बहुत ज़रूरी है वरना बाढ़ के क़हर से ले-देकर बचे लोग महामारी से मर जाएँगे। वहाँ बाढ़ ने सब कुछ तबाह कर दिया है। गाँव के गाँव मटियामेट हो गए हैं और नक्शे पर से उनका निशान तक मिट गया है। जहाँ गाँव बचे हैं वहाँ न तो अनाज है और न रहने के लिए मकान। जाएँगे वापस लोग तो भी रहेंगे कैसे ?

तोगड़िया बोले जा रहे थे और लोग बिना टोका-टाकी खामोश सुन रहे थे। तोगड़िया ने कहा कि उनकी इकाईयाँ बिहार जाकर मृत मानव देह और जानवरों का अंतिम संस्कार करेगी। ये पुण्य का काम मोक्ष के लिए कम और महामारी को फैलने से रोकने के लिए ज्यादा होगा। हम अपनी इकाईयों से बिहार के लिए मदद इकट्ठा करने का कार्य शुरू कर चुके हैं। हम आसपास के राज्यों से अनाज गुजरात और दूर के राज्यों से नए कपड़े और मुंबई से दवा इकट्ठा कर रहे हैं।

अचानक तोगड़िया जैसे सोते से जागे और उन्होंने सवाल दाग दिया। छोटी-छोटी बात के लिए सारे देश में हड़ताल हो जाती है, सारा देश इकट्ठा हो जाता है, फिर क्या वजह है जो अपने ही देश के लोग बिहार में मर रहे हैं और बाकी देश एक साथ खड़ा नहीं है। उन्होंने तत्काल सारे देश को एकजुट होकर बिहार की मदद करने की अपील की। उनका कहना था कि इस मामले में राजनीति से ऊपर उठकर सोचना चाहिए। वे भी हमारे ही भाई हैं। असम और मुंबई में ज़रूर बिहारियों के खिलाफ अभियान चल रहे थे। लेकिन ये समय बिहार की मदद का है। और मुंबई और असम के लोग भी बिहार की मदद के लिए आगे आ रहे हैं।

तोगड़िया का ये नया रूप ही देखने को मिल रहा था पत्रकारों को। बिहार पर खुलकर बोलने के बाद तोगड़िया बोले दूसरा मुद्दा अमरनाथ का है। लेकिन अमरनाथ मुद्दे पर भी तोगड़िया के तेवर तोगड़िया जैसे न थे। तीसरा मुद्दा कंधमाल का था। इस पर भी ढके छिपे शब्दों में अपनी बात संक्षेप में कही तोगड़िया ने। और पत्रकारों को न्यौता दे दिया सवालों के लिए।
पता नहीं क्या हुआ पत्रकारों को। इक्का-दुक्का सवालों के बाद ही सब खामोश हो गए।शायद तोगड़िया के बदले हुए रूप को सम्मान दे रहे थे। बहुत ज्वलंत मुद्दे अमरनाथ और कंधमाल को तोगड़िया ने बिहार की बाढ़ में बहा दिया था। आड़े-तिरछे सवालों के ज़रिए विवादास्पद हेडलाइन की तलाश में भटकने वाले पत्रकार आज खुद उलझन में नज़र आए। सबको खामोश देखकर खुद डॉ. प्रवीण तोगड़िया ने कहा आप सभी का धन्यवाद। और सब उठकर निकल लिए। उनके जाने के बाद सारे के सारे पत्रकार मुझसे पूछने लगे भैय्या क्या तोगड़िया खसक गया है ? ये सवाल मैं आप लोगों के लिए छोड़ रहा हूँ। हमेशा आग उगलने वाले तोगड़िया के मुँह से क्या बिहार का दर्द बयान होना उसके खसक जाने की निशानी है ?

Thursday, August 21, 2008

हत्यारों का गिरोह है बस्तर के नक्सली : डॉ. रमन सिंह


सीधे-सादे, शाँत और राजनीतिक तिकड़म बाजी से दूर रहने वाले डॉ. रमन सिंह ने बस्तर के नक्सलियों को सीधे हत्यारों का गिरोह ठहरा दिया। उनके भीतर उबल रहा आक्रोश का ज्वालामुखी जैसे फट पड़ा था। उन्होंने नक्सलवाद के पक्ष में देश और विदेश के बुध्दिजीवियों पर कटाक्ष किया और उल्टे सवाल किया कि क्या उन्हें बस्तर की हज़ारों विधवाओं और अनाथ बच्चों के ऑंसू दिखाई नहीं पड़ते।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का नया रूप देख रहे थे राजधानी के पत्रकार। अमुमन रोज उनसे मुलाकात होती रही है पत्रकारों की लेकिन उन्हें इस तरह से बोलते कभी किसी ने नहीं सुना था। मुख्यमंत्री , कहीं से मुख्यमंत्री नहीं लगे। ऐसा लगा कि बस्तर के नक्सलवाद का कोई भुक्तभोगी अपनी व्यथा सुना रहा है। उन्होंने सलवा जुडूम को समर्थन देने के सवाल उठाने वालों को आड़े हाथों लिया और कहा कि उनकी बुध्दि पर उन्हें तरस आता है। कथित बुध्दिजीवियों को भी उन्होंने नहीं छोड़ा। जेल में बंद नक्सलियों से संबंधित होने के आरोपी डॉ. विनायक सेन का नाम न लेते हुए भी उनके पक्ष में चलाई जा रही मुहिम की धज्जियाँ उड़ा दी। रमन सिंह ने कहा कि बड़ी दाढ़ी वाले के लिए विदेशों से चिंता जाहिर हो रही है। उन्होंने सवाल किया कि एक आदमी की चिंता करने वालों ने कभी सोचा भी है कि बस्तर में असमय हज़ारों माँ-बहन विधवा हो गई, हज़ारों बच्चे असमय अनाथ हो गए। उनके लिए कौन रोएगा ? उनके ऑंसू कौन पोछेगा ? कैसे रह रहे हैं वे लोग ? कैसे पढ़ रहे हैं वे बच्चे ? ये नहीं पूछेंगे ? 21 देशों से और दूतावासों से फोन आ रहे हैं कथित बुध्दिजीवियों के लिए।

प्रेस क्लब में भाजपा, कांग्रेस और माक्र्सवादी पार्टी के विचारों का अद्भुत त्रिवेणी संगम नज़र आ रहा था। तीन-तीन विचारधाराओं के मंथन से जो निकल कर आ रहा था वो था सिर्फ और सिर्फ नक्सलवाद का विरोध। व्याख्यानमाला की शुरूआत कोई माकपा नेता सुरेन्द्र महापात्र के जोश से जिससे तैश में आ गए कांग्रेस के नेता महेन्द्र कर्मा मगर जोश और तैश का रत्ती भर भी असर नज़र नहीं आया रमन सिंह पर। हाँ उनकी जुबान से जो शब्द निकल रहे थे वे आग और बर्फ का बेमिसाल संगम थे। चीरपरिचित अंदाज में शाँत स्वरों में रमन सिंह सब कुछ कहते चले गए। उन्होंने माकपा नेता और वामपंथी विचारधारा को आड़े हाथ लिया। उन्होंने कहा बंगाल और चीन की बात करने वाले ज़रा अपने प्रदेश को ठीक से देख ले। दूसरे देश की किताब पढ़ने के बजाय अपने यहाँ की किताबों के पन्ने भी पलट लें। उन्होंने बताया कि वे 10 दिन के लिए चीन गए थे। वहाँ उन्होंने कम्यून देखने की इच्छा जाहिर की थी। कम्यून यानि सर्व सुविधायुक्त आत्मनिर्भर गाँव। चीन के लोगों से वो लगातार कहते रहे कि एक कम्यून दिखा दो, जिसे देखकर छत्तीसगढ़ में भी वैसा कम्यून बनाया जा सके। अफसोस की बात है कि आखिर तक उन्हें कम्यून नहीं दिखाया गया। एक बार ज़रूर एक कॉलोनी के बाहर दो-चार चक्कर लगाए गए और वहाँ से वापस आने के बाद बताया गया कि वो कम्यून था। उन्हाेंने कहा कि दुनिया में सबसे ज्यादा खराब हालत चीन के किसानों की है। उन्होंने वामपंथ की बखिया उधेड़ दी । उन्होंने पूछा की रशिया का क्या हुआ ? कभी महाशक्ति हुआ करता था वहा भी क्रांति की बात हुई थी । टुकड़े-टुकड़े हो गए है उसके । वहा की करेंसी जला कर चाय बना रहे है लोग। बंगाल की तारीफ करने वालों को बंगाल जाकर देखना चाहिए सारा सिस्टम ही बैठ गया है। विकास के आकड़ों में बंगाल कहीं गुम हो चुका है। क्या बात करते हैं ये लोग विकास की और शोषण की ?

डॉ. रमन सिंह ने कहा कि सिर्फ छत्तीसगढ़ ही इस समस्या से नहीं जूझ रहा है। दुनिया के बहुत से देश भी आतंकवाद के अलग-अलग चेहरों से लड़ रहे हैं। आतंकवाद का एक स्थानीय चेहरा है नक्सलवाद। उससे निपटने के लिए दुनिया में आज जितना खर्च हो रहा है वो शायद विकास पर खर्च होता तो दुनिया चमन हो जाती। माओवाद के नाम पर जो हो रहा है उसका माओवाद से कोई लेना देना नहीं है। नक्सलवाद के जरिए हिंसा हो रही है। बुलेट से बैलेट को प्रभावित किया जा रहा है। हिंसा से प्रजातंत्र को धमकाया जा रहा है। भारत जैसे देश में हिंसा की तो कहीं कोई जगह है ही नहीं। नेपाल के प्रधानमंत्री प्रचंड ने भी अपने पहले सार्वजनिक वक्तव्य में कहा है कि नक्सली बुलेट का रास्ता छोड़कर बैलेट का रास्ता अपना लें।

उन्होंने कहा कि नक्सली बुलेट से नहीं डरते। बैलेट से डरते हैं, इसीलिए वे प्रजातांत्रिक प्रणाली से भागते हैं। बुलेट हमारे पास भी है लेकिन बुलेट से कोई समस्या का हल नहीं निकल सकता। नक्सली संगठित गिरोह है जो वसूली करने में जुटा है। वो प्राकृतिक संसाधनों, खनिज खदानों से भरपूर इलाकों पर कब्ज़ा करना चाहता है, चाहे वो बस्तर हो, उड़ीसा हो, झारखंड हो या आंध्रप्रदेश। डॉ. रमन सिंह ने कहा कि नक्सलियों से पुलिस नहीं निपट सकती, क्योंकि उनको जंगल वारफेयर की ट्रेनिंग नहीं है। नक्सली जंगल में लड़ने की ट्रेनिंग लेकर आता है और उसके पास कोई नियम नहीं है, कानून नहीं है, सिध्दांत नहीं है इसलिए गोलियां चला देता है। पुलिस ऐसा नहीं कर सकती वरना कब से इस समस्या का हल निकल आता।

सलवा जुडूम को तो मुख्यमंत्री ने जैसे अपनी प्रतिष्ठा का ही सवाल बना लिया है। उन्होंने कहा कि सलवा जुडूम शाँतिपूर्ण ऑंदोलन है। वहां के आदिवासियों ने नक्सलियों की एके-47 की गोलियों का सामना करने की फौलादी हिम्मत है। उनमें हिम्मत है नक्सलियों की बारूदी सुरंगों को मौत का डर लिए बिना पार करने की। उनकी हिम्मत और हौसले का ऑंदोलन सलवा जुडूम कभी हार नहीं सकता। उसे हमारी सरकार की, दिल्ली की सरकार की मदद मिले या न मिले। देश-विदेश से उसे समर्थन मिले या न मिले वो चलता रहेगा। उसे लोगों की कैद बताने वाले की बुध्दि पर तरस आता है। हमने वहाँ कोई घेरेबंदी नहीं की, ताले नहीं लगाए हैं, किसी को बेड़ियों में जकड़कर नहीं रखा है। सब स्वतंत्र है जिसको जाना है जा सकता है लेकिन कोई जाता नहीं है। इसी से पता चलता है कि वो उनका खुद का फैसला है। कोई जबरदस्ती इतना बड़ा जन ऑंदोलन खड़ा नहीं कर सकता।
बिजली की सप्लाई ठप करना ये कहाँ की बहादुरी है। 8 दिन बस्तर अंधेरे में रहा। ये कौन सा सिध्दांत है लोगों को परेषान करना। सड़क काट देते हैं, पंचायत भवन, स्कूल और अस्पताल उड़ा रहे हैं। क्या मिल रहा है इन सबसे ? राहत शिविरों में रात के अंधेरे में गोलियां चलाते हैं। ये कौन सी बहादुरी है ? 2 साल की बच्ची और 60 साल की वृध्दा की हत्या कर देते हैं ? ये कौन सी बहादुरी है ? ये कायरता की पराकाष्ठा है। हत्यारों का गिरोह बंदूक की नोक पर प्रजातंत्र पर कब्ज़ा करना चाह रहा है। उनका विरोध करना, हिंसा का विरोध करना सलवा जुडूम है। सारे देश को सलाम करना चाहिए बस्तर के सीधे-सादे आदिवासियों का, जो खुल्ला सीना लिए निकल पड़े हैं नक्सलियों की गोलियों का सामना करने। मैं सलाम करता हूँ आदिवासियों की हिम्मत को, उनके हौसले को, उनकी सोच को और उनके जोश को। पता ही नहीं चला कब रमन सिंह नक्सलवाद को खत्म करने के लिए सभी से मिल-जुलकर काम करने की अपील कर अपनी बात खत्म कर गए। जितनी तालियाँ पत्रकारों ने उनके लिए बजाई वो राजनीति से हटकर एक ईमानदार अभिव्यक्ति को शानदार सलामी थी। कैसी लगी आपको प्रेस क्लब में नक्सलवाद पर हुई व्याख्यान माला। प्रतिक्रिया ज़रूर दीजिएगा चाहे अच्छी हो या बुरी। लगभग 20 मिनट बोले रमन सिंह। पूरा भाषण यहाँ देना संभव नहीं है। वैसे तीनों नेताओं के भाषण की सीडी जो चाहे उसे उपलब्ध करवाने की कोशिश ज़रूर करूँगा।

आदिवासी कह रहे हैं बहुत हो चुका हमें हमारे हाल पर छोड़ दो


नक्सलियों की हिट लिस्ट में टॉप पर हैं वरिष्ठ कांग्रेसी नेता महेन्द्र कर्मा। वे जब नक्सल समस्या पर बोलने लगे तो एक नेता के साथ-साथ एक आदिवासी का दर्द भी उनकी जुबान से निकल रहा था। उन्होंने कहा कि बस्तर का आदिवासी कह रहा है कि बहुत हो चुका है हमें हमारे हाल पर छोड़ दो।

महेन्द्र कर्मा छत्तीसगढ़ विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष है। जवानी में महेन्द्र कर्मा भी कामरेड ही थे लेकिन समय के साथ उनके विचार बदले और अब वे कांग्रेस के दिग्गज नेता हैं और सलवा जुडूम के घोर समर्थक। प्रेस क्लब में माकपा नेता धर्मराज महापात्र के जोशीले भाषण ने श्रोताओं की जितनी तालियाँ बटोरी उतना ही कर्मा को गुस्से से भर दिया। स्वभाव से तेज़तर्रार महेन्द्र कर्मा व्याख्यान शुरू करते ही तैश में आ गए। उनका गुस्सा स्वाभाविक था। उन्होंने कहा कि लोगों ने बस्तर देखा तक नहीं, वे जानते तक नहीं हैं सलवा जुडूम क्या है ? वे आदिवासी को पहचानते तक नहीं हैं और ऐसे लोग बात करते हैं बस्तर की नक्सल समस्या पर। उन्होंने कहा बस्तर का आदिवासी त्रस्त हो चुका है और वो कह रहा है नक्सलियों से कि बहुत हो चुका चले जाईए, हमें हमारे हाल पर छोड़ दीजिए।

कर्मा की आवाज़ में जितनी गर्मी थी उससे ज्यादा उसमें आदिवासियों के दर्द की नमी थी। पसीने से तर हो गए महेन्द्र कर्मा बोलते-बोलते। उन्हाेंने जमकर लताड़ा शहर में रहकर जंगल की समस्याओं पर करने वालों को। उन्होंने कहा कि सलवा जुडूम आदिवासियों की अपनी मर्जी से जीने की अपील है। छोटा-मोटा आंदोलन होता है तो सारे देश और दुनिया में हंगामा होता है लेकिन इतना बड़ा आंदोलन आदिवासियों का चल रहा है और वे अकेले हैं। देश क्यों नहीं खड़ा होता उनके साथ। आखिर क्या गलत कर रहे हैं वो। हिंसा के खिलाफ बस्तर का अनपढ़ आदिवासी तनकर खड़ा है तो वो अपने दम पर। उसे किसी की मदद मिले या न मिले वो लड़ता रहेगा नक्सलियों से। आखिर ये उनके अस्तित्व की लड़ाई है। अगर वो हार गए तो हिंसा के सामने अहिंसा हार जाएगी, सारा देश हार जाएगा।

उन्होंने कहा कि नक्सली 40 साल से बस्तर में ऑंदोलन कर रहे हैं। वे क्या कहते हैं पता नहीं लेकिन करते क्या हैं ये सब जानते हैं ? उन्होंने कहा कि इन 40 सालों में क्या किया है नक्सलियों ने बस्तर में ? एक भी कोई विकास का काम किया है ? किसी भी सरकार को कभी कोई फेहरिस्त सौंपी है ? क्या कभी कोई बात की है किसी से ? क्या बात करेंगे ये लोग आदिवासियों के हितों की ? इन्हें तो अपने हित साधने से ही फुर्सत नहीं है। कभी तेंदूपत्ता के दाम बढ़ाने के लिए धमकी-चमकी दी थी और सरकार के दाम बढ़ाते ही तत्काल बढ़े हुए दामों में से अपना हिस्सा ठेकेदारों से तय कर लिया। ये लुटेरे हैं। कहीं भी बेरियर लगा देते हैं और वसूली करने बैठ जाते हैं।

बोलते-बोलते अचानक अपनी ही पार्टी के नेता की खिंचाई कर दी महेन्द्र कर्मा ने। साफ-साफ बोलने के कारण बार-बार विवादों में घिरने वाले कर्मा इस बार भी घबराए नहीं। हालाकि उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी का नाम नहीं लिया लेकिन जो कहा उसे सारे लोग समझ गए। उन्होंने कहा कि यदि मैं सलवा जुडूम के मामले में रमन सिंह का समर्थन करता हूँ तो इसे पोलिटिकल एलाइनमेंट कहते हैं। तरस आता है ऐसे लोगों पर। अरे सरकार तो आती-जाती रहती है। सरकार के अलावा भी कोई चीज होती है सोचने के लिए। जहाँ मौत नाचती हो वहाँ राजनीति नहीं करना चाहिए। लाषों पर राजनीति करने वालों को शर्म आनी चाहिए। यहाँ उन्होंने नक्सलवाद के मामले में अपने अभियान के पार्टनर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की खिंचाई करने से भी परहेज नहीं किया। उन्होंने कहा कि डॉ. ने बीच में सलवा जुडूम की मदद करने में थोड़ी ढील दे दी और उसी का नतीजा है कि ऑंदोलन थम गया है।
उन्होंने कहा कि नक्सलवाद आतंकवाद का दूसरा चेहरा है। आप इसे सामाजिक-आर्थिक शोषण के नज़रिए से नहीं बल्कि प्रजातंत्र के खिलाफ हिंसा के नज़रिए से देखिए। इसे तत्काल राष्ट्रीय समस्या घोषित किया जाना चाहिए। ये रमन सिंह या महेन्द्र कर्मा के अकेले के बस की समस्या नहीं है। नक्सलवाद के नाम पर लूट-खसौट और हिंसा का दौर समाप्त होना चाहिए। इसके लिए सबको राजनीतिक संकीर्णता को छोड़ एक साथ खड़ा होना होगा और जिस दिन सब एक साथ खड़े हो गए नक्सलवाद घंटों में नहीं मिनटों में मिट जाएगा। जब तक महेन्द्र कर्मा बोलते रहे तब तक हवा में अजीब-सी सनसनी फैली रही। ऐसा लग रहा था कि बस्तर के आदिवासियों के दर्द के साथ-साथ एक नेता के गुस्से का ज्वालामुखी रह-रहकर फट रहा हो। सब स्तब्ध होकर सुन रहे थे, वे लोग जो शहर में बैठकर बस्तर में सरकार और प्रजातंत्र के फेल होने और नक्सलियों का साम्राज्य होने की चर्चा एसी रूम में बैठकर करते हैं। पता ही नहीं चला कि कब 20 मिनट पूरे हो गए और महेन्द्र कर्मा का भाषण खत्म हुआ। उसके बाद तो अचानक सन्न पड़ा प्रेस क्लब का हॉल जाग गया और तालियों की गड़गड़ाहट ये बताने लगी कि हमें बस्तर का सच अब पता चल रहा है। मुख्यमंत्री क्या बोले नक्सल समस्या पर ये अगली पोस्ट मे _

Wednesday, August 20, 2008

पता ही नहीं चला कब धरमू, धर्मराज हो गया


मैं उसे सालों से धरमू कहकर ही पुकारता आ रहा था और मेरे लिए वो धरमू ही था। पर आज जब उसने मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष की उपस्थिति में बोलना शुरू किया तो मुझे ऐसा लगा कि बहुत कुछ बदल चुका है। और कुछ ही क्षणों में समझा में आ गया कि मेरा धरमू अब धरमू नहीं रह गया, धर्मराज हो गया।

मौका था नक्सल समस्या पर व्याख्यान का। प्रेस क्लब के इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम के लिए दो वक्ता मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और नेता प्रतिपक्ष महेन्द्र कर्मा तय हो चुके थे, तीसरे वक्ता के लिए वामपंथी नेताओं के नामों पर विचार हो रहा था। मैंने अपने पत्रकार साथी रूचिर गर्ग से सलाह माँगी, तो दो-तीन नामों पर हमने विचार किया। फिर अचानक रूचिर बोला कि धर्मराज...... वे अपना वाक्य पूरा कर भी नहीं पाए थे कि मेरे मुँह से एकाएक निकला धरमू को ? रूचिर ने कहा कि वो अपना धरमू ज़रूर है लेकिन वो पार्टी के सचिव मंडल का सदस्य भी है। मैंने कहा ठीक है! फिर मैं अपने ही फैसले पर शक करता रहा। मैंने इससे पहले कभी धरमू को बोलते सुना ही नहीं था।

कार्यक्रम जब शुरू हुआ तब भी कुछ लोगों ने शंका जाहिर की, कि तीसरा वक्ता हल्का न पड़ जाए। खैर कार्यक्रम शुरू हुआ और मेरा धरमू यानि माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से धर्मराज महापात्र ने बोलना शुरू किया। कुछ ही क्षणों में उसने माहौल में अजीब सी गर्मी ला दी। उसने विनम्रता से कहा कि मुझे झिझक हो रही थी कि इतने बड़े लोगों के बीच मैं छोटा सा कार्यकर्ता क्या बोलूँगा और कैसे बोल पाऊँगा ? उसकी विनम्रता और उसकी वाणी में छिपा आक्रोश आग और बर्फ का अद्भुत संगम नज़र आ रहा था।

धरमू, सॉरी धर्मराज महापात्र बोलता चला गया और सारे संपादक, पत्रकार और बुध्दिजीवी शाँत बैठे उसे सुनते रहे। बड़ी बेबाकी से धर्मराज ने मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष की उपस्थिति को जैसे खारिज ही कर दिया। नक्सलवाद की पैरवी न करते हुए भी धर्मराज ने सरकार को बस्तर और सरगुजा के आदिवासी अंचलों में पसरी आर्थिक और सामाजिक असमानता, शोषण, अराजकता के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया। सलवा जुडूम की भी महापात्र ने जमकर खिलाफत की, ये जानते हुए भी कि इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष एक हैं। उन्होंने साफ-साफ कहा कि बिना समस्या का मूल कारण जाने नक्सलवाद से निपटा नहीं जा सकता। उनका कहना था कि किसी समस्या को देखने का नज़रिया महत्वपूर्ण होता है। बातों ही बातों में उन्होंने मुख्यमंत्री की ओर इशारा कर कहा कि नक्सली तो पकड़ में आते नहीं उनकी आड़ में माकपा के कार्यकर्ताओं को जेल में ठूँसा जा रहा है। ऐसे में सिर्फ और सिर्फ असंतोष ही बढ़ेगा और जब तक असंतोष रहेगा नक्सलवाद खत्म नहीं हो सकता।

धरमू ने नक्सलवाद पर वार करने में कहीं कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन साथ ही वो सरकार को भी लपेटता चला गया। उसने कहा हमारी पार्टी का नज़रिया साफ है कि माओवाद और नक्सलवाद का कहीं कोई मेल नहीं है। माओ के नाम पे अगर कोई कुछ भी करता है तो उसे जायज नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन सरकार को ये ज़रूर सोचना चाहिए कि आखिर लोग उनसे जुड़ क्यों रहे हैं। सरकार और पुलिस को उसने अपने ही अंदाज में नक्सलियों से डरने वाला करार दे दिया। उसने कहा कि 15 दिनों में एक हेलिकॉप्टर तक नहीं ढूँढ पाई पुलिस ? उसने दावा किया कि पुलिस अपनी पोस्ट के आसपास ही सर्च करती है। जंगल में घुसने की उसकी हिम्मत ही नहीं है।
सलवा जुडूम मुख्यमंत्री के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न है, इस बात की परवाह किए बिना उसने सलवा जुडूम को बंद करने की माँग कर दी। 15 मिनट के अपने संबोधन में धरमू पूरी लय में नज़र आया। जब उसने बस्तर के बारे में अपनी पार्टी का नज़रिया रखा, तो ऐसा लगा कि वो परिपक्व नेताओं को मात दे रहा है। नक्सलवाद के हम समर्थक नहीं है लेकिन जिस तरीके से सरकार काम कर रही है, उससे नक्सलवाद खत्म नहीं होगा। बल्कि उसे पुष्पित और पल्लवित होने का मौका मिलेगा। कई बार लगा कि तालियाँ बजा दूँ, लेकिन स्टेज पर बैठे होने की मजबूरी ने मुझे रोक लिया। हालाकि कुर्सी का हत्था मैंने कई बार थपथपाया। भाषण समाप्त होते ही पूरे प्रेस क्लब और मंच पर बैठे सभी अतिथियों की तालियों ने धरमू के धर्मराज होने का प्रमाण दे दिया। मैंने उसे प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित किया और कार्यक्रम की समाप्ति के बाद कहा कि धरमू अब तुम्हें धरमू नहीं धर्मराज कहना पड़ेगा। वो हंस पड़ा हमेशा की तरह और कहने लगा आपके लिए तो मैं वही धरमू ही रहूँगा। वहीं रूचिर भी मिल गया, उसने मुझसे पूछा कैसा लगा धरमू ? मेरा जवाब था पता ही नहीं चला कब धरमू धर्मराज हो गया। कांग्रेस वरिष्ठ नेता महेन्द्र कर्मा और मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह क्या बोले ? ये बताऊँगा अगली पोस्ट में।

Sunday, June 22, 2008

लोकतंत्र के चारों खंभे हिल रहें है- डॉ.नामवर सिंह


डॉ नामवर सिंह ने जब बोलना शुरू किया तो व बोलते चले गये। सब बुत बनकर सुनते रहे लोकतंत्र की दुर्दशा पर बेहद सादगी और संजीदगी से डॉ.नामवर सिंह सब कुछ साफ-साफ कह गए। उन्होने कहा कि लोकतंत्र के चारों खंभे हिल रहें है। इत्तेफाक से लोकतंत्र के तीन खंभे तो वहां मौजूद थे और खामोशी से सारी बातें सुनना उनकी मौन स्वीकृति से कम नहीं था।


मौका था 18 जून 2008 को छत्तीसगढ़ के जाने माने पत्रकार दिवाकार मुक्तिबोध की पहली किताब 'इस राह से गुजरते हुए' के विमोचन का । डॉ नामवर सिंह ने उनकी किताब का विमोचन करने के बाद कहा कि उगते पौधे को नापा नहीं जाता । उन्होंने कहा कि वे बेहद खुश है कि गजानन माधव मुक्तिबोध के एक पुत्र ने तो कम से कम पत्रकारिता को चुना। हालांकि गजानन माधव मुक्तिबोध के कनिष्ठ पुत्र गिरीश भी पत्रकार है और ये बात शायद डॉ सिंह को पता नहीं थी। खैर जब डॉ नामवर सिंह को व्यावसायिक दबाव और पक्षधर पत्रकारिता पर बोलने के लिए कहा गया तो अपने स्वभाव ओर ख्याति के अनुरूप उन्होने विषय की जमकर आलोचना की और उसे सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा दबाव जैसे भ्रामक शब्द का इस्तेमाल करने की बजाय यहां प्रलोभन शब्द का इस्तेमाल होना था। उन्होंने साफ साफ कहा कि पत्रकारिता पर दबाव का नहीं प्रलोभन का खतरा ज्यादा है ।

पत्रकारों,अफसरों, नेताओं और साहित्यकारों से खचाखच भरे रायपुर प्रेस क्लब के हाल में डॉ . सिंह, सिंह की तरह बोलते चले गये। सब खामोश सुनते रहे । सुनने वालों में प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ।रमन सिंह समेत सारे दिग्गज आईएएस अफसर, जानेमाने पत्रकार और साहित्यकार शामिल थे। डॉ नामवर सिंह ने जो लय पकड़ी तो लगभग घंटे भर तक उन्होंने मुस्कुरा-मुस्कुरा कर देश के मौजुदा हालात का पोस्टमार्टम कर दिया। हाँ उन्होंने अपने व्याख्यान के दौरान निष्पक्ष शब्द की एक नई परिभाषा रखी। उन्होंने अपने ठेठ बनारसी अंदाज में कहा कि निष्पक्ष के मायने बिकाउ होता है। उन्होंने कहा कि जो ये कहे कि वो निष्पक्ष है आप समझ लीजिये वो कह रहा है कि वो बिकाऊ है जो दाम लगाए उसे खरीद सकता है। उन्होंने उदाहारण दिया कर्नाटक का और कहा कि वहां सरकार गिराई निष्पक्ष लोगों ने और बनाई भी उन्हीं लोगों ने। लोकतंत्र के चारों खंभे को हिलने की बात कहते हुए उन्होेंने न्यायपालिका की तो सीधे आलोचना नहीं की मगर विधायिका, कार्यपालिका और प्रेस की खिंचाई करने में तो उन्होंने रत्ती भर कसर नहीं छोड़ी। बेहद चुटीले अंदाज में उन्होंने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को आश्वस्त किया कि उनको प्रेस से डरने की जरूरत नहीं है क्योंकि यहां पूरा प्रेस जगत डरा हुआ है। उन्होंने कहा कि वो जमाना गया जब सरकार प्रेस से डरती थी। अब तो विज्ञापन का जमाना है। उनकी इस बात पर मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह मुस्कुराकर रह गए और प्रेस क्लब अध्यक्ष होने के नाते मंच पर उनके साथ बैठा मैं भी उस कड़वे सच से कसमसा कर रह गया। सिर्फ प्रेस को ही नहीं कार्यपालिका और विधायिका की भी बखिया उधेड़ने में डॉ.सिह ने कोई कसर नहीं छोड़ी। इलेक्ट्रानिक मीडिया को प्रिंट मीडिया के लिये खतरा नहीं माना डॉ. नामवर सिंह ने। उन्होंने कहा कि भाषाई पत्रकारिता आज भी असरकारक है बशर्तें उसे अपनी बोलचाल की भाषा और चालू मुहावरों की कीमत पता रहें। इस अवसर पर उन्होंने बनारस के ही पराड़कर को भी याद किया और कहा कि अब हिन्दी अखबारों में पाठकों की चिट्ठी का महत्व वैसा नहीं रह गया। राष्ट्रभाषा हिन्दी पर भी बोलने से नहीं चूके डॉ नामवर सिंह। उन्होंने कहा कि राष्ट्रभाषा का उपयोग नेता ही कर रहें है। वो फाइलों पर हिन्दी लिख रहें है क्या लिखते है उन्हें ही समझा नहीं आता और पढ़ने वाले अफसर भी नहीं समझ पाते है। दिवाकर मुक्तिबोध की पहली पुस्तक 'इस राह से गुजरते हुए' पर तो उन्होंने कुछ नहीं कहा क्योंकि किताब वे पढ़ नहीं पाये। लेकिन उन्होंने यह कहकर सबको हसने पर मजबूर कर दिया कि असली मास्टर वहीं है जो बिना किताब देखे एक पीरियड ले ले। उन्होने कहा ये झांसा मै भी दे सकता हूँ और बिना लाग-लपेटे के डॉ. नामवर सिंह ने वो सब कुछ कह दिया जिसे सिर्फ सुनना नहीं उस पर अमल करना भी जरूरी है।