Showing posts with label सड़क दुर्घटना. Show all posts
Showing posts with label सड़क दुर्घटना. Show all posts

Wednesday, June 9, 2010

रक्तदान की इच्छा हो तो……………………………………

एक छोटी सी पोस्ट बहुत कुछ कहती हुई।सुबह-सुबह एक एसएमएस मिला अंजान नम्बर से।सीधे डीलिट कर रहा था कि उस छोटे से एसएमएस को पढे बिना रहा नही गया।एसएमएस भी बहुत ही छोटा सा था।
अगर आपको रक्तदान की इच्छा हो तो,
यंहा सड़क पर मत करिये,
कृपया ब्लड बैंक मे करिये।

रोज़ सड़क हादसों की खबरों से अख़बार अटे पडे रहते हैं,रोज़ हाईवे पर खून बहने की बात सामने आती है,ऐसे मे इस एसएमएस ने बहुत कुछ सोचने पर मज़बूर कर दिया।इसे मैने डीलिट करने की बजाय फ़ारवर्ड करना शुरू किया और अब इसे आप लोगो से बांट रहा हूं।सड़को पर जितना खून हादसों मे बह जाता है उससे बहुत की जान बचाई जा सकती है।बस ज़रुरत है रफ़्तार की दिवानगी पर ब्रेक लगाने की।

Tuesday, February 9, 2010

दर्द के बारे मे सवाल किया था मिथिलेश ने और जवाब मेरे सामने खड़ा था!

कल दोपहर को मिथिलेश दुबे का एसएमएस आया और उसमे उन्होने एक सवाल किया था सबसे ज्यादा दर्द किससे होता है।10 आप्शन थे और साथ ही मे ज्वाब ज़रूर देने का आग्रह भी।मिथिलेश को अक्सर पढता रहा हूं और उसके बारे मे मेरी राय अच्छे इंसान की है।उसके सवाल ने मुझे बेचैन कर दिया क्योंकि हाल ही मे सिर्फ़ मोहतरमा लिख देने से उन्हे बेवजह विवाद मे घसीट दिया गया और उस दर्द से बेचैन होकर उन्होने ब्लागिंग को ही नमस्ते करने की घोषणा कर दी थी।मुझे लगा कि कंही उसीसे जुड़ा सवाल तो नही है,मैं उस सवाल का जवाब एसएमएस से नही फ़ोन करके देना चाहता था मगर उसी समय उस सवाल का जवाब मेरे सामने आ खड़ा हुआ।मेरे लिये बात करना बहुत कठीन हो रहा था,सो मैने मिथिलेश को फ़ोन करने के बजाय एसएमएस किया और जवाब दिया "गरीबी"।

कल दोपहर मैं प्रेस क्लब मे बैठा था और उसी समय वरिष्ठ फ़ोटोग्राफ़र शारदा दत्त त्रिपाठी,महासचिव गोकुल सोनी,नरेन्द्र बंगाले दीपक पाण्डे आ गये और चर्चा शुरू हुई यंहा हर साल लगने वाले सरकारी कुम्भ मे आये नागा बाबाओं की।तभी एक मरियल, दुबली-पतली लड़की अंदर आई और डरते-डरते सामने रखी कुर्सी पर बैठ गई।डर के साथ-साथ दर्द उसके चेहरे पर फ़ैला हुआ था।उस समय मैं सरकारी कुम्भ के खिलाफ़ गुस्से से ज़हर उगल रहा था।मैने उस लड़की से पूछा किससे मिलना है?तो उसने आफ़िस असिस्टेंट पवन साहू का नाम लिया।मैने ईशारे से उसे बैठने के लिये कहा और हम लोग फ़िर से चर्चा मे जुट गये।

तब तक़ पवन लगभग दौडते हुये आया और उस लड़की को अलग ले गया और कुछ फ़ोटोग्राफ़रों से मिलवा दिया।हम लोग सरकारी रूपये का नकली कुम्भ के नाम पर दुरूपयोग का रोना रो ही रहे थे कि पवन उस लड़की को लेकर आया और बोला भैया इसकी समस्या है आप मदद कर दोगे तो भला हो जायेगा बेचारी का।मैने घूर कर पवन को देखा तो उसेए समझ आ गया कि एक तो मैं लड़कियों से बात करने से कतराता हूं और दूसरे जब किसी मुद्दे पर चर्चा होती है तो व्यवधान पसंद नही करता।पवन तत्काल खिसक लिया लेकिन वो मासूम लड़की वंही खड़ी रही।उसे भी समझ मे आ गया था कि मामला गड़बड़ है।उसके मुंह से आवाज़ चाह कर भी नही निकल पा रही थी।वो थूक निगलती खड़ी थी।आखिर मैने उससे पूछा क्या बात है?

पता नही उसे मेरी एकदम कर्कश और बेरूखी से लटपट आवाज़ मे कौन सी सहानुभूति महसूस हुई,वो रेडियो कि तरह एकदम से शुरू हो गई।और उसने जब बोलना शुरू किया तो खतम होने तक़ न मुझमे और न शारदादत्त,गोकुल या नरेन्द्र और जो भी वंहा बैठा था,उनमे से किसी की हिम्मत हुई टोका-टोकी करने की।उसकी बात पूरी होते-होते मिथिलेश का एसएमएस आ गया।उसकी बात पूरी सुनने के बाद मिथिलेश को पढा तो लगा कि जवाब पहले आ गया और सवाल उसके बाद आ रहा है।

लड़की की बातों से मेरे सोचने-समझने की ताक़त दम तोड़ने लगी थी और बची-खुची कसर मिथिलेश ने निकाल दी।मिथिलेश के सवाल सबसे ज्यादा दर्द किससे होता है के जवाब के लिये दस आप्शन इस प्रकार थे।1 ख्वाब,2 लव,3 जुदाई,4 गरीबी,5 बेबसी,6 धोखा,7 झूठ,8ज़ख्म,9 मौत,10 बेवफ़ाई।मैं उन आप्शनो पर विचार करने के पहले ही चौथे आप्शन गरीबी से आगे बढ नही पाया और फ़ुरसत मे बात करने के बहाने के साथ उसे जवाब दे दिया गरीबी।बाकी आप्शन मैंने बाद मे पढे।क्योंकि उस समय मेरे सामने खड़ी लड़की की कहानी यही जवाब बता रही थी।

उस लड़की के पिता को तीन-चार दिन पहले ही अज्ञात वाहन ने कुचल कर मौत की नींद सुला दिया था।दुर्घटना के कुछ देर बाद हम लोग भी उस ओर से गुज़रे थे।भीड़ लगी थी वंहा और पुलिस भी आ गई थी।सड़क पर एक शख्स आराम से लेटा हुआ था।शांत निश्चिंत।शायद उसे पता चल गया था कि अब वो दुनिया की भागमभाग से मुक्त हो चुका है।वो उस अभिशाप से भी मुक्त हो चुका था जिसे गरीबी,बेबसी या इस जैसी कोई चीज़ समझा जाता है।उसका शरीर सही सलामत था बस सिर नही था।वो किसी कमीने,(माफ़ करेंगे इसे अगर कोई भद्रजन गाली समझें तो)तेजरफ़्तार वाहन चालक ने सड़क पर चलने के लिये नरियल समझ कर फ़ोड़ दिया था।वो पता नही किधर से आया और किधर निकल गया।हम जैसे पत्थर दिल भी उस दृश्य को देख नही सके और तत्काल वंहा से हट लिये।

वो दृश्य मेरी आंखों के सामने फ़िर से घूम गया।वो अस्पताल मे भर्ती अपने बड़े बेटे को दवा पहुंचाने के लिये घर से निकला था।उसका बेटा अस्पताल मे उसका इंतज़ार ही करता रह गया।उसकी दोनो किड़नी खराब है।उसे बचाने के लिये उसका पिता किसी प्राईवेट कम्पनी मे कमरतोड़ मेहनत करने के बाद रात को उसे दवा देने के लिये निकला था।

मेरी आवाज़ पता नही भीगने लगी।थोड़ी देर पहले जो हालत उस लड़की की थी वैसी अब मेरी थी।मुझे थूक निगलना पड़ रहा था।मुझे आवाज़ निकालने के लिये पूरी ताक़त लगानी पड़ी और बड़ी मुश्किल से मेरे मुंह से पहला शब्द निकला "बेटा"।पता नही वो तल्खी कंहा गुम हो गई थी।वो गरज़ मिमियाने मे बदल चुकी थी वो भी एक डर और भय से दुबकी एक भीगी बिल्ली के सामने।मैने हिम्मत करके उससे पूछा कि बेटा आप पढते है क्या?वो बोली हां सर मैं एम काम प्रिवीयस कर रही हूं।मुझे लगा था कि वो स्कूल मे होगी।उसने बोलना जारी रखा था।उसने बताया कि पापा प्राईवेट कम्पनी मे नौकरी करते थे और भैया की दोनो किड़नी खराब है।उसके इलाज के लिये पैसे पुरे नही होते थे तो मै घर पर सुबह टिफ़िन बना कर देने जाती हूं और उसके बाद कालेज और लौट कर जितना समय मिलता है उतने मे घर पर ही ब्यूटी पार्लर का काम कर लेती हूं।

शायद ज़िम्मेदारी के बोझ ने उसकी बाढ के रोक दिया था।उसके चेहरे पर डर ज़रूर था मगर उसके पीछे छीपा आत्मविश्वास बदली भरा डिन ढलने के बाद शाम को छंटते बादलों के पीछे से झांकती सूर्य की किरणों की तरह फ़ैलने लगा था।उसे पता चल गया था अब भैया की दवा पापा नही लायेंगे और ये ज़िम्मेदारी भी उसे ही उठानी पड़ेगी।वो निकल पड़ी थी ज़िम्मेदारियों का पहाड़ सिर पर ढोते हुये।प्रेस क्लब आने की वजह थी अगर किसी फ़ोटोग्राफ़र को उस अज्ञात वाहन का नम्बर पता हो तो वो उसे बता दे ताकि वो उन पर हर्ज़ाना ठोक सके।

उसने कहा सर कुछ किजिये ना।मुझे कुछ समझ मे नही आ रहा था।इतना बेबस और लाचार मैंने खुद को कभी नही पाया था।मै इस निकम्मी व्यव्स्था मे कंहा से ढूंढता उस कमीने को जो पता नही कंहा किसी और कुचलने के लिये फ़िर से सड़कों का सीना रौंद रहा होगा।मुझे कुछ सूझ नही रहा था।मैं उस बेबस लड़की की भीगी आंखों से आंख मिलाने की हिम्मत नही कर पा रहा था और शायद उससे भी ज्यादा बेबस हो गया था।मैने उससे कहा बेटा मेरा नम्बर नोट कर लो और मुझ पर भरोसा करना मुझसे जो बन पड़ेगा ज़रूर करूंगा।पता नही उसे विश्वास हुआ या नही मगर उसने नम्बर नोट किया और धीरे से कहा सर देखिये ना सरकार भी कुछ नही करती।मैने कहा बेटा आप सरकार के पास गई हो?वो बोली नही।तो मैने कहा सरकार से भी बात कर लेंगे।आप जाओ।मुझसे जो बनेगा मैं करूंगा।

आप जाओ!मैने ज़ोर देकर कहा था।मैं उसकी उपस्थिति से घबरा रहा था।शायद वो समझ गई थी उसे जाना चाहिये। हो सकता है इन्हे उससे भी ज्यादा ज़रूरी काम हो।दिन भर उस लड़की की पलकों का बांध तोड़ कर बहने को बेताब आंसूओं से भरी आंखे मुझे बेचैन करती रही।रह रह कर उसकी आवाज़ मेरे कानों मे पिघला हुआ लोहा उंडेलती रही।शाम को मैने मिथिलेश को फ़ोन लगाया और उससे काफ़ी देर तक़ बात की।उसके सवाल ने भी मेरी बेचैनी बढाने मे कोई कसर नही छोड़ी थी।उसने तत्काल उस लड़की की मदद करने की बात कही जो साबित करने के लिये काफ़ी है कि वो एक अच्छा इंसान है।पता नही मैने उसके सवाल का सही जवाब दिया या नही लेकिन मुझे असली सवाल तो उस लड़की की मदद करके हल करना है।पता नही कंहा तक़ सफ़ल हो पाऊंगा?