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Saturday, June 20, 2009

बोये पेड़ काजू के खाने को मिलेंगे आम!है ना चमत्कार?

बचपने से सुनते आ रहे हैं जैसा बोओगे वैसा काटोगे।मगर इस कहावत को झुटला दिया है छत्तीसगढ के महान जादूगरों ने।उन्होने लगभग पौन करोड़ रूपये के काजू के पेड़ लगवाये थे जिनसे हमारी आने वाली पीढी को आम के फ़ल मिलेंगे।मैं मज़ाक नही कर रहा हुं,सच कह रहा हूं।और इस जादू को आम जनता ने नही खुद सरकार की बनाई विधायकों की टीम ने देखा है।है ना चमत्कार।

ये चमत्कार कर दिखाया है छत्तीसगढ के उद्यानिकी विभाग के कलाकारो ने।उन्होने पिछले साल बस्तर मे लाखो रूपये के काजू के पौधे लगवाये थे।एक तो बस्तर उसपर से जंगल विभाग,शिकायत तो होनी ही थी।जांच के लिये विधायको की टीम बना दी गई और जब टीम ने उस ईलाके का दौरा किया तो कुदरत को मात देने वाला चमत्कार उन्हे दिखाई दिया।जंहा काजू के पौधे लगाये गये थे वंहा आम के पौधे मिले।कुछ जगह तो खाली गड्ढो ने कुदरत की तरफ़दारी करते हुये वंहा काजू के पौधे लगे होने का झूठा सबूत देने की कोशिश भी की,मगर विधायकों को न समझते हुये भी सब समझ मे आ गया।

बस्तर घने जंगलो का राजा और वंहा काजू का पेड़ किस लिये लगा रहे थे उद्यानिकी विभाग वाले ये तो वे ही बता पायेंगे।और जंगल विभाग वंहा अगर कुछ भी ना लगाये सिर्फ़ अवैध कटाई ही रोक ले तो भी बस्तर के साल के जंगल दुनिया के सबसे घने और खूबसुरत जंगल साबित होंगे।मगर काम नही करेंगे तो कमिशन कैसे खायेंगे?काम ही भ्रष्टाचार की जननी है।ये तो सरकारी दिग्गज़ो का मूलमंत्र है।सो किसी टकले के चिकनी हो चुकी खोपड़ी के समान मैदान मे पौधारोपण छोड़ घने जंगलो मे काम कर रहे हैं।जंहा न कोई जा सके न कोई देख सके और ना ही पौधे नही उगने पर उसका पता ही चल सके।

ऐसा ही एक चमत्कार हो सकता है आने वाले सालों मे और देखने मे।कोरिया,न न न न,वो परमाणु बम वाला नही भई,हमारे छत्तीसग़ढ का एक आदिवासी बहुल ज़िला है कोरिया।यंहा भी प्रकृति ने धरा पर खुद अपने हाथों से चित्रकारी की है।बेहद मनोरम और कंही से भी बस्तर से कम खूबसुरत नही है ये इलाका।जंगल विभाग ने अब इस ईलाके को चंदन की खूश्बू से महकाने का ठेका ले लिया है। चार लाख से ज्यादा चंदन के पौधे तैयार कर लिए गये हैं और अब कोरिया को चंदन ज़िला बनाने की तैयारी है,जैसे पहले की सरकार ने इसे हर्बल स्टेट बनाने की घोषणा की थी।सफ़ेद मूसली लगाने वाले सैकडो किसान बरबाद हो गये थे।खैर इस छोटे से राज्य मे जो ना हो वो कम है।बीड़ी पत्ते के चक्कर मे सबसे पहले नक्सलियों ने यंहा कदम रखा था और अब चंदन का पेड़ कंही किसी नये वीरप्पन को ना सामने ला दे।वैसे भी हाथियों का यंहा आना शुरू है ही,चंदन के साथ हाथी दांत भी मिल जायेंगे उसको।मगर इस्मे एक डाऊट है।कंही कोरिया मे भी बस्तर जैसा चमत्कार हो गया और काजू की जगह आम वाली स्टाईल मे चंदन की जगह बबूल निकल गये तो…………………।