Showing posts with label कांग्रेस. Show all posts
Showing posts with label कांग्रेस. Show all posts
Saturday, May 19, 2012
यंहा कांग्रेस को कांग्रेस के नेताछत्तीसगढ में कांग्रेस की हार का कारण राहुल गांधी की समझ में अब आ गया है.वे जान गये है कि ही हरा रहे हैं.
यंहा कांग्रेस को कांग्रेस के नेताछत्तीसगढ में कांग्रेस की हार का कारण राहुल गांधी की समझ में अब आ गया है.वे जान गये है कि ही हरा रहे हैं.बहुत सही समझा राहुल जी.वैसे तो कांग्रेस की दुर्गति का कारण सारे देश में यही है फिर भी छत्तीसगढ में गुटबाजी कुछ ज्यादा ही है.यंहा नेता ज्यादा और कार्यकर्ता कम है.उनमे भी कार्यकरने वाले कर्ता और कम और कार में घूमने वाले कर्ता कुछ ज्यादा ही है.वर्ना कभी छत्तीसगढ कांग्रेस का मज़बूत गढ माना जाता था.छत्तीसगढ की बदौलत मध्यप्रदेश में कांग्रेस सत्ता पर सवार रहती थी.और बस्तर उससे ज्यादा मज़बूत गढ तो कांग्रेस का हो ही नही सकता और आज देख लीजिये छत्तीसगढ में दो चुनावों मे हार हो चुकी है और गुटबाजी जिस कदर हावी है उससे साफ नज़र आ रहा है आने वाले चुनाव भी राहत देने वाले नही होगे.बस्तर तो हाथ से ही निकल गया है.अब समय आ गया है कारण की सर्जरी का.कुछ कडे कदम बहुत ज्यादा अच्छे परिणाम दे सकते हैं.
Labels:
Rahul Gandhi,
कांग्रेस,
गुटबाज़ी.congresse,
राहुल गांधी
Sunday, December 25, 2011
क्या आरएसएस-भाजपा से संबद्ध होना पाप है?तो फ़िर ये बात तो दिग्विजय सिंह के सगे भाई लक्ष्मण सिंह पर लागू क्यों नही होती?वे तो सांसद भी रहे हैं इसी अछूत पार्टी से!
अन्ना नानाजी देश्मुख के साथी हैं!अन्ना आरएसएस के एजेण्ट है!अन्ना क्या हैं,ये सब को पता है लेकिन आज से पचास साल पहले एक बार अन्ना ने नानाजी के साथ बैठक की थी ,ये सब अचानक याद नही आता है कांग्रेसियों को!जब अन्ना अनशन पर बैठते है बस तभी याददाश्त के पन्ने पलटने लग जाते है सबके सब।अब क्या इस देश में आरएसएस का कार्यकर्ता होना क्या राष्टद्रोह है?क्या संघ इस देश में प्रतिबंधित है?आखिर उसे इतना अछूत क्यों बताया जा रहा है?क्या एक कार्यकर्ता के कारण इतने सालो तक़ उसी आरोप की रोटी सेकी जायेगी?तो क्या कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने कभी कुछ किया ही नही?क्या एक महिला को तंदूर में भूनने वाले की पार्टी के लोग फ़िर पाक साफ़ कैसे हो सकते है?क्या आरएसएस-भाजपा से संबद्ध होना पाप है?तो फ़िर ये बात तो दिग्विजय सिंह के सगे भाई लक्ष्मण सिंह पर लागू क्यों नही होती?वे तो सांसद भी रहे हैं इसी अछूत पार्टी से?क्या आरएसएस के मुख्यालय नागपुर जाना भी उससे संबंध होने का कारण हो सकता है?मैं तो साल में चार-पांच बार जाता हूं,तो क्या मै भी आरएसएस का एजेंट हूं?इस तरह की मूर्खता पता नही क्यों ये कांग्रेस के चापलूस कर रहे हैं।उन्हे अन्ना पर आरोप लगाना भी नही आ रहा है,कोई कह रहा है कि वे भारत-पाक युद्ध के भगोडे हैं!फ़िर मांगेंगे माफ़ी जैसे एक बडबोले पहले मांग चुके है!फ़िर आखिर उन्हे अन्ना के अनशन से इतना गुस्सा क्यों आता है?जब वे कहते हैं कि उनके कहने से कोई फ़र्क़ नही पड़ता तो करने दे अन्ना को अनशन,ये ये इतना बौखला क्यों जाते हैं?
Labels:
anna,
bjp.congress,
digvijay singh.,
laxman singh,
अनशन,
अन्ना,
कांग्रेस,
दिग्विजय सिंह,
लक्ष्मण सिंह
Thursday, September 29, 2011
बचपन की कहानियों में राक्षस की जान मिट्ठू में होती थी वैसे ही कांग्रेस की जान लगता है कि चिदम्बरम में है!
बचपन में अधिकांश कहानियों मे राक्षस हुआ करते थे.और राक्षस को मारने राजकुमार भी होते थे.राक्षस और राजकुमार में जब फायनल फाइट होती थी तो सब राक्षस की ताक़त से हैरान रह जाते थे.एक से एक तीर-तलवार के वार,गदा से गदागद और फिर भी राक्षस का बाल भी बांका नही होता था.राजकुमार भी पसीने-पसीने,हैरान-परेशान.फिर कोई धीरे से राजकुमार के कान में फुसफुसाता और राजकुमार राक्षस को छोड कर बगल के पेड पर लटके पिंजरे के मिट्ठू की गरदन मरोडता और उधर राक्षस टें बोल देता.मेरे खयाल से चिदम्बरम ही वो मिट्ठू है इसिलिये उसे बचाने में कांग्रेस पूरी ताक़त लगा रही है.
Thursday, July 21, 2011
कांग्रेसियों पर हमला हुआ तो छत्तीसगढ में राष्ट्रपति शासन चाहिये और मुम्बई में आतंकवादियों का हमला हुआ तो?
छत्तीसगढ में एक बार फ़िर नकसलियों ने वारदात की है।चार लोगों की मौत हो गई है और दर्ज़न भर घायल हुये हैं।इस वारदात के बाद सवाल ये भी उठता है कि अगर नक्सली कांग्रेस नेताओं पर हमला करना चाह्ते थे तो गाड़ियों के काफ़िले के बीच चल रही सरकारी गाड़ी को उन्होने क्यों उड़ाया?क्या उन्हे पता था कि सरकारी गाड़ी भी काफ़िले में चल रही है?और अगर हां उन्हे ये पता था तो उन्हे ये भी पत होगा कि किस गाड़ी में कौन नेता बैठा है?फ़िर उन्होने नेताओं की गाड़ी छोड़ सरकारी गाड़ी को ही निशाना क्यों बनाया? खैर जाने दिजीये।ये नक्सलियों की मर्ज़ी है किसे भुने,किसे चुने,और किसे बख्शे।लेकिन इस वारदात के तत्काल बाद कांग्रेस के रविंद्र चौबे ने प्रदेश में राष्ट्रपति शासन की मांग कर डाली है।यानी कांग्रेस पर हमला हुआ तो स्थिति इतनी बिगड़ गई।चार लोगों की मौत हुई है और राष्ट्रपति शासन की मांग उठ गई।और मुम्बई में हुये हमले में तो कई गुना ज्यादा लोगों की जानें गई तो वंहा कौन सा शासन लगाना चाहिये इस बारे में शायद ही कुछ बोल पाये कोई। अफ़सोस की बात है कि नक्सल जैसी गंभीर समस्या पर भी कांग्रेस राजनीति से बाज़ नही आती।उन्ही की पार्टी के नेता महेन्द्र कर्मा आदिवासियों के नक्सल विरोधी सलवा-जुडुम के घोर समर्थक थे तो बाकी कांग्रेसी उनका विरोध करने से नही चूकते थे।ये प्रदेश सबका है और सिर्फ़ नक्सलियों के मामले एकजुट होकर लड़कर सारे देश में मिसाल कायम करने की बजाय,प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष तो बाकायदा बस्तर को अलग राज्य बनाने की मांग ऊठने पर उसका समर्थन करने की बात कहकर एक नई समस्या के बीज़ बोने से पीछे नही हटे। अब तो उनके ही काफ़िले पर हमला कर दिया है नक्सलियों ने।अब क्या कहेंगे?इस बार तो हमला रायपुर ज़िलें मे हुआ है।तो क्या रायपुर को भी अलग राज्य बनाने की मांग का समर्थन करेंगे कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार पटेल? पूर्व डीजीपी विश्वरंज़न पर हमेशा आरोप लगाते रहने के बाद उन्हे हटाये जाने के कदम का स्वागत करने वाले कांग्रेस के नेताओं अब किस पर आरोप लगायेंगे?विश्वरंजन के हटने के एक सप्ताह के भीतर ही नक्सलियों ने कांग्रेस नेताओं के काफ़िले पर हमला कर दिया।दरअसल जिस इलाके में हमला किया गया है उस इलाके में हीरे और एलेक्ज़ेंड्राईट की खदाने हैं और नक्सली उस इलाके मे किसी की भी आमद पसंद नही करते।वे उस इलाके पर अपना एकाधिकार चाहते हैं,अन्य कमाऊ और उपजाऊ इलाकों की तरह।उनका ना कोई धर्म है और ना कोई मक्सद्।उनकी ना कोई विचारधारा है और ना ही कोई उद्देश्य्।बस भटका हुआ एक गिरोह है जो अब लूट-पाट पर विश्वास करता है।
Labels:
congress,
nand kumar patel,
naxal,
ravindra chaube,
कांग्रेस,
नक्सल,
नंदकुमार पटेल,
रविंद्र चौबे
Saturday, July 2, 2011
क्या भाजपा क्या कांग्रेस!सभी पार्टियां धरना-धरना खेल रही हैं।सब एक दूसरे को चोर कह रह हैं तो फ़िर ईमानदार है कौन?
छत्तीसगढ में भाजपा सत्ता में है और कांग्रेस विपक्ष में,केन्द्र में कांग्रेस सत्ता मे है तो भाजपा विपक्ष में।वंहा भाजपा धरना दे रही है तो यंहा कांग्रेस।और अब तो यंहा भाजपा भी आये दिन धरना देने लगी है।कांग्रेसी भी गला फ़ाड़-फ़ाड़ कर चिल्ला रहे हैं तो भाजपाई भी।ऊधर दक्षिण से अम्मा जब दिल्ली जाती है तो वंहा चिल्लाती है कि पुराने सत्ताधीध चोर हैं और वंहा सत्ता से हटे लोग भी यही चिल्ला रहे हैं।यूपी में कांग्रेसी हल्ला मचाते है कि किसान की ज़मीन हडप रही है सरकार तो बीएसपी वाले चिल्लाते हैं कि दलित का राज पच नही रहा है कांग्रेस को।कोई किसानों के शोषण का रोना रो रहा है तो कोई दलित के शोषण का।गुज़रात में कांग्रेस मोदी को अल्पसंख्यकों का ह्त्यारा बताती है तो भाजपा कश्मीर में कांग्रेस को हिन्दूओं का विरोधी।कोई हिन्दूओं के लिये रो रहा है तो कोई अल्पसंख्यकों के लिये।बंगाल में ममता चुनाव से पहले तक़ चिल्लाती थी गरीबों-मज़दूरों के लिये लाल-झण्डा वोलों मे कुछ नही किया तो वे चिल्ला थे कि सिर्फ़ बंगाल ही नही सारी दुनिया में मज़दूरों के हित का टेण्डर उनका ही खुला है।कोई मज़दूरों के हित के लिये चिल्ला रहा है तो दलित के हित के लिये।यानी सारे देश में गरीबों-मज़दूरों-किसानों-बेरोज़गारों-अल्पसंख्यकों-बहुसंख्यकों और पता नही किस-किस के लिये कौन-कौन क्या-क्या चिल्ला रहा है,और नतीजा,नतीजा देखो तो वही शून्य। मैं तो हैरान हुं कि इस देश में इतनी भली और कमज़ोर तबके का खयाल रखने वाली राजनीतिक पार्टिया है तो फ़िर ये समाजसेवी अन्ना और सन्यासी रामदेव को धरने की क्या ज़रुरत पड़ गई।कमाल है नेता तो नेता साधू-सन्यासी भी धरना दे रहे हैं।औरतें धरना दे रही हैं,बच्चे धरना दे रहे हैं,छात्र धरना दे रहे हैं,बेरोज़गार धरना दे रहे हैं और यंहा तो सत्ताधारी भाजपा भी रोज़ धरना दे रही है।यानी सारा देश धरना-धरना खेल रहा है। कांग्रेसी यंहा कह रहे हैं कि भाजपा घोटालेबाज़ों की पार्टी है तो भाजपाई माईक लेकर महंगाई के लिये कांग्रेस को ज़िम्मेदार ठहरा रही है।वो भी टू जी से शुरु होकर कई कई घोटाले की लिस्ट लेकर चल रही है।कांग्रेसी एक नाम लेते है तो दो वे दो नाम।शोले के जय-वीरू और गब्बर की डायलागबाज़ी फ़ेल है।अखबार धरने से अटे-पड़े हैं।तस्वीरों को ध्यान से नही देखों तो समझ में ही नही आता कि कौन धरना दे रहा है और किसके खिलाफ़ धरना दे रहा है।रोज़ कंही न कही,किसी न किसी का धरना,कर्मचारी क्या,मज़दुर क्या,व्यापारी क्या,सभी धरने की दुकान खोल कर बैठ गये हैं। जिस देश में इतने धरनेबाज़ लोग हों,उसके बाद भी अगर नेताओं को कंट्रोल करने के लोकपाल की ज़रुरत पड रही हि तो उन धरनेबाज़ों की क्वालिटी पर सवाल तो उठने जायज ही है।अगर ऐसा नही होता तो दिल्ली जो धरने के लिये देश का सबसे इम्पोर्टेंट स्थान है उस पर समाजसेवियों,सन्यासियों का कब्ज़ा हो जाना समझ से परे है।बस अब इस देश में आतंकवादियों,अपराधियों और भ्रष्टाचरियों के फ़ेवर में ही धरना होना बाकी है।वैसे तो आतंकवादियों और नक्षलियों के फ़ेवर मे आये दिन कुछ न कुछ हो ही जाता है।अब बच गये हैं भ्रष्टाचारी और अपराधी।वैसे तो यंहा उसकी भी शुरूआत के संकेत मिलने लगे हैं।एक आरटीओ के निलंबित करने पर पूरा स्टाफ़ काम छोड़ कर बाहर आ गया था।वो सांकेतिक धरना था इसलिये उसे अभी रजिस्टर्ड धरना नही माना जा सकता लेकिन उसने संकेत तो दे ही दिये हैं आने वाले दिनों में हो सकता है सस्पेंडेड अफ़सरों या टर्मिनेटेड अफ़सरों की भी यूनियन बन जाये।लोकल लुच्चे-लफ़ंगों से लेकर राज्य स्तरीय या राष्ट्र स्तरीय संगठन तैयार हो जाये।कुछ के हक़ की बात तो अभी भी यूएन मे तक़ उठ जाती है,हो सकता है वो भी पार्टी बना कर धरना-धरना खेलने लग जायें।अच्छा है! सारे देश में धरना-धरना खेला जा रहा है उसके बाद भी पता नही चल पा रहा है कौन चोर है कौन ईमानदार है?कौन भ्रष्ट है,कौन नही?कौन गरीबों का मसीहा है,कौन गरीबो का शोषक?चिल्ला रहे है सब चोर है,चोर है,चोर है।ऐसे मे ये कन्फ़ूज़न होना तो तय ही है कि साले सब चोर हैं।और बेचारी जनता भी कन्फ़्यूज़्ड होकर चिल्लाने लगी है अब तो सब साले चोर हैं।भगवान ही बचाता रहा है और आगे भी भगवान ही बचायेगा गरीबों को,इस देश को।अब अगर जय श्रीराम लिख दूंगा तो बहुत से लोग ये भी चिल्लाने लगेंगे ये भी चोर है।हाहाहहाहा इसलिये जयश्रीम नही जय जनता कह कर निकल लेता हूं पतली गली से नही तो पता चला एक पंडाल मेरे नाम से भी लग गया है।
Sunday, October 4, 2009
अरे बापू आप?हां बेटा मैं!बहुत परेशान हो गया हूं,सोचा तू ही कुछ करे पायेगा इसलिये…………
रात्रिकालीन सत्संग थोड़ा लम्बा हो गया था।बापू को लेकर डिस्कशन मे हाट टाक से लेकर हाथापाई तक़ की नौबत आ गई थी।किसी तरह मामला सुल्झा कर घर पंहुचा और लम्बी तान कर झंझटो से मुक्ति की टेम्पररी खुराक खा ली।नींद का मीठा झोंका सपनों की दुनिया में धकेल ही रहा था कि कमरा दूधिया रौशनी से जगमगाने लगा।मुझे लगा कि कंही भ्रष्टराष्ट्र तो फ़िर से नही आ टपका।इधर उधर देखा तो कोने मे बापू को खड़ा देखा।मै चौंक गया।पहले अपने को चिमट कर देखा,फ़िर आंखे मलने लगा तो बापू हंसे और बोला अरे मै ही हूं मोहन दास करम चंद गांधी।मैने कहा बापू!तो बापू ने गहरी सांस ली और कहा कि काहे का बापू!बस मोहनदास करमचंद गांधी।
मैने देखा बापू परेशान लग रहे थे।मैने तत्काल बिस्तर छोड़ा और सीधे उनके चरणो पर लेट गया।बापू ने आशीर्वाद देना छोड़ अपने पैर पीछे खींच लिये।मैने लेटे लेटे ही गरदन उठा कर उनसे पूछा,बापू कोई गलती हो गई मुझसे?उन्होने मुझसे पूछा कंहा से घर आया है वापस?वो बापू दोस्तो के साथ……… वो पार्टी थी ना… अच्छा,रोज़ पार्टी रहती है।जी नही बापू।तो फ़िर कल कंहा था।बापू कल भी पार्टी थी।किसकी मेरे जन्म दिन की।हां बापू……वो क्या है कि…दिन-दहाड़े,बापू ने सवाल किया।अब मेरे पास खामोश होने के अलावा कोई और बहाना नही था।मेरी चुप्पी तोड़ी बापू ने।उन्होने कहा कि उस दिन जब तो मेरी जयंती पर सब कुछ सच-सच बोलने लगा तो मुझे लगा कि तू अच्छा लड़का है,इसिलिये मै यंहा आया लेकिन्……………।बापू खामोश हो गये।मैने पुछा लेकिन क्या बापू?बापू ने कहा कि तूझमे और बाकी लोगो मे बहुत ज्यादा फ़र्क़ नही है।मैने कहा ऐसा नही बापू।सच मे मै आपको बहुत प्यार करता हूं।कोई आपके खिलाफ़ एक शब्द भी कहता है तो ऐसा लगता है कि साले का खून पी जाऊं।वाह।क्या अंदाज़ है प्यार करने का?यही सिखाया था मैने कि कोई विरोध करे तो उसका खून पी जाओ?अरे बापू!आप भी ना।ये तो फ़ार्मल डायलाग है,ठीक वैसे ही जैसे आतंकवदियों के हमलो के बाद नेता बोलते हैं।तो तू कौन सा नेता से कम है?क्या बापू आप मुझे गाली दे रहे हैं।और तू,तू क्या कर रहा था ……क्या कहता है उसे पार्टी………और तू तो उसे सत्संग भी कहता है ना।सारी बापू कल से नही बोलूंगा।बोल,बोल सत्संग बोल,प्रवचन बोल जो चाहे बोल्।तो तू क्या प्रवचन दे रहा था सत्संग मे।वो बापू……… क्या?वो साला कालू आपके बारे मे अंट-शंट बक़ रहा था,मुझसे बर्दाश्त नही हुआ…तो इसका मतलब है उसे गालियां बकेगा,मारपीट पर उतर आयेगा।बहुत प्यार करता है ना मुझसे?ये भी कोई पूछने की बात है बापू।तो फ़िर अहिंसा का नाम नही सुना क्या?सुना है बापू लेकिन वो साला अहिंसा से मानने वाला नही था इस्लिये गाली बक़ना पड़ गया।
अब तू ही बता ऐसे मे तूझे मेरे चरण स्पर्श करने का हक़ है क्या?क्यों?क्या बापू अभी परसों की ही बात है।आपकी जयंती पर देश के कोने-कोने मे एक से एक कमीनो ने आपके चरण स्पर्श किये तो आपने उनको मना नही किया।वे मेरे क्या लगते हैं जो उन्हे मना करता?क्या बात करते है बापू।आधे से ज्यादा तो खादी पहनने वाले थे और आपकी ही पार्टी के लोग थे,कुछ आपको निपटाने का आरोप झेलने वाली पार्टी के लोग थे।कुछ जगह तो बड़े-बड़े जमाखोरों,सूदखोरों,सटोरियो और हत्यारों तक़ ने आपके चरण स्पर्श किये।आपको माला पहनाई तब आप क्यों खामोश रहे?ये बता उनमे से एक के भी पास गया क्या मैं?ये बात तो है बापू,मगर जब आप मेरे पास आये हो तो मुझे चरण स्पर्श करने दो और आशीर्वाद भी।ठीक है लेकिन एक शर्त है?क्या?तुझे सच बोलना पड़ेगा,हमेशा।बोल मंज़ूर?अरे मरवाओगे बापू?क्यों नही बोलना है?वो बात नही है बापू सच बोलने से नुकसान बहुत है?कितना ?क्या जान से भी ज्यादा?मै समझ गया बापू क्या कहना चाह रहे थे।मै खामोश ही रहा।तो बापू ने कहा ठीक है फ़िर मै चलता हूं।मैने कहा नही बापू ऐसा मत किजिये।बापू,बोले अरे तू तो सच बोलने मे डर रहा है।मै कैसे मान लूं कि तू मुझसे प्यार करता है।बापू कह तो रहा हूं।कोई भरोसा है तेरा?हो सकता है तू झूठ बोल रहा हो।बापू आप मेरी इंसल्ट कर रहे हैं।बापू ने खूब ज़ोर का ठहाका लगाया और कहा कि लगता है अंग्रेज़ अभी तक़ गये नही है।
मै सन्न था।सच मे बापू के चरण स्पर्श के लायक नही था मै।क्या सोच रहा है?अभी भी डर रहा है सच बोलने से तो मुझे साफ़-साफ़ बता दे मै किसी और से बात कर लूंगा।नही-नही बापू मैं सच बोलूंगा?सिर्फ़ सच बोलूंगा।ठीक है तो तू मुझे देश का हाल बता और हां एक बात याद रखना तूझे सिर्फ़ सच ही बोलना है।बापू आपको तो सब पता ही है……………नही पता है इसलिये तो तूझसे पूछ रहा हूं।क्या बात कर रहे हो बापू,आपको कैसे पता नही होगा?आप देश के बापू हैं?देख मुझे जो पता है वो आधा-अधूरा है और वो भी मेरे अनुयायियों का बताया हुआ है।पता नही उसमे कितना सच है और कितना पार्टी का एजेण्डा।बापू आपको जित्ता पता है उत्ता ही ठीक है।क्या करोगे ज्यादा जानकर?तुझे इससे क्या?तुझे बताना है या नही ये बता?बापू आपने शर्त भी तो रख दी है सच बोलने की।वो तो है।बस इसिलिये तो डर रहा हूं बापू।सच कहने मे मेरी हालत खराब हो रही तो सोचो आपको कितना दुःख होगा।मैने तो देश के लिये कुछ किया भी नही है तो इसकी हालत देख के रोना आता है,फ़िर आपने तो इसे आज़ाद कराने के लिये क्या नही किया?आप नही सुन पाओगे बापू?मै नही सुन पाऊंगा या तू सुना नही पायेगा?एक ही बात है बापू?कोई और टापिक नही है क्या आपके पास?देख मै तुझसे देश की जानकारी लेनेआया हूं।समझा।ठीक है बापू जैसी आपकी मरज़ी।दुःख होगा तो मुझे दोष मत देना।ठीक है सुना………। और फ़िर मेरे और बापू के बीच देश के बारे मे लम्बी चर्चा हुई।क्या चर्चा हुई सुनाऊंगा कल्।
मैने देखा बापू परेशान लग रहे थे।मैने तत्काल बिस्तर छोड़ा और सीधे उनके चरणो पर लेट गया।बापू ने आशीर्वाद देना छोड़ अपने पैर पीछे खींच लिये।मैने लेटे लेटे ही गरदन उठा कर उनसे पूछा,बापू कोई गलती हो गई मुझसे?उन्होने मुझसे पूछा कंहा से घर आया है वापस?वो बापू दोस्तो के साथ……… वो पार्टी थी ना… अच्छा,रोज़ पार्टी रहती है।जी नही बापू।तो फ़िर कल कंहा था।बापू कल भी पार्टी थी।किसकी मेरे जन्म दिन की।हां बापू……वो क्या है कि…दिन-दहाड़े,बापू ने सवाल किया।अब मेरे पास खामोश होने के अलावा कोई और बहाना नही था।मेरी चुप्पी तोड़ी बापू ने।उन्होने कहा कि उस दिन जब तो मेरी जयंती पर सब कुछ सच-सच बोलने लगा तो मुझे लगा कि तू अच्छा लड़का है,इसिलिये मै यंहा आया लेकिन्……………।बापू खामोश हो गये।मैने पुछा लेकिन क्या बापू?बापू ने कहा कि तूझमे और बाकी लोगो मे बहुत ज्यादा फ़र्क़ नही है।मैने कहा ऐसा नही बापू।सच मे मै आपको बहुत प्यार करता हूं।कोई आपके खिलाफ़ एक शब्द भी कहता है तो ऐसा लगता है कि साले का खून पी जाऊं।वाह।क्या अंदाज़ है प्यार करने का?यही सिखाया था मैने कि कोई विरोध करे तो उसका खून पी जाओ?अरे बापू!आप भी ना।ये तो फ़ार्मल डायलाग है,ठीक वैसे ही जैसे आतंकवदियों के हमलो के बाद नेता बोलते हैं।तो तू कौन सा नेता से कम है?क्या बापू आप मुझे गाली दे रहे हैं।और तू,तू क्या कर रहा था ……क्या कहता है उसे पार्टी………और तू तो उसे सत्संग भी कहता है ना।सारी बापू कल से नही बोलूंगा।बोल,बोल सत्संग बोल,प्रवचन बोल जो चाहे बोल्।तो तू क्या प्रवचन दे रहा था सत्संग मे।वो बापू……… क्या?वो साला कालू आपके बारे मे अंट-शंट बक़ रहा था,मुझसे बर्दाश्त नही हुआ…तो इसका मतलब है उसे गालियां बकेगा,मारपीट पर उतर आयेगा।बहुत प्यार करता है ना मुझसे?ये भी कोई पूछने की बात है बापू।तो फ़िर अहिंसा का नाम नही सुना क्या?सुना है बापू लेकिन वो साला अहिंसा से मानने वाला नही था इस्लिये गाली बक़ना पड़ गया।
अब तू ही बता ऐसे मे तूझे मेरे चरण स्पर्श करने का हक़ है क्या?क्यों?क्या बापू अभी परसों की ही बात है।आपकी जयंती पर देश के कोने-कोने मे एक से एक कमीनो ने आपके चरण स्पर्श किये तो आपने उनको मना नही किया।वे मेरे क्या लगते हैं जो उन्हे मना करता?क्या बात करते है बापू।आधे से ज्यादा तो खादी पहनने वाले थे और आपकी ही पार्टी के लोग थे,कुछ आपको निपटाने का आरोप झेलने वाली पार्टी के लोग थे।कुछ जगह तो बड़े-बड़े जमाखोरों,सूदखोरों,सटोरियो और हत्यारों तक़ ने आपके चरण स्पर्श किये।आपको माला पहनाई तब आप क्यों खामोश रहे?ये बता उनमे से एक के भी पास गया क्या मैं?ये बात तो है बापू,मगर जब आप मेरे पास आये हो तो मुझे चरण स्पर्श करने दो और आशीर्वाद भी।ठीक है लेकिन एक शर्त है?क्या?तुझे सच बोलना पड़ेगा,हमेशा।बोल मंज़ूर?अरे मरवाओगे बापू?क्यों नही बोलना है?वो बात नही है बापू सच बोलने से नुकसान बहुत है?कितना ?क्या जान से भी ज्यादा?मै समझ गया बापू क्या कहना चाह रहे थे।मै खामोश ही रहा।तो बापू ने कहा ठीक है फ़िर मै चलता हूं।मैने कहा नही बापू ऐसा मत किजिये।बापू,बोले अरे तू तो सच बोलने मे डर रहा है।मै कैसे मान लूं कि तू मुझसे प्यार करता है।बापू कह तो रहा हूं।कोई भरोसा है तेरा?हो सकता है तू झूठ बोल रहा हो।बापू आप मेरी इंसल्ट कर रहे हैं।बापू ने खूब ज़ोर का ठहाका लगाया और कहा कि लगता है अंग्रेज़ अभी तक़ गये नही है।
मै सन्न था।सच मे बापू के चरण स्पर्श के लायक नही था मै।क्या सोच रहा है?अभी भी डर रहा है सच बोलने से तो मुझे साफ़-साफ़ बता दे मै किसी और से बात कर लूंगा।नही-नही बापू मैं सच बोलूंगा?सिर्फ़ सच बोलूंगा।ठीक है तो तू मुझे देश का हाल बता और हां एक बात याद रखना तूझे सिर्फ़ सच ही बोलना है।बापू आपको तो सब पता ही है……………नही पता है इसलिये तो तूझसे पूछ रहा हूं।क्या बात कर रहे हो बापू,आपको कैसे पता नही होगा?आप देश के बापू हैं?देख मुझे जो पता है वो आधा-अधूरा है और वो भी मेरे अनुयायियों का बताया हुआ है।पता नही उसमे कितना सच है और कितना पार्टी का एजेण्डा।बापू आपको जित्ता पता है उत्ता ही ठीक है।क्या करोगे ज्यादा जानकर?तुझे इससे क्या?तुझे बताना है या नही ये बता?बापू आपने शर्त भी तो रख दी है सच बोलने की।वो तो है।बस इसिलिये तो डर रहा हूं बापू।सच कहने मे मेरी हालत खराब हो रही तो सोचो आपको कितना दुःख होगा।मैने तो देश के लिये कुछ किया भी नही है तो इसकी हालत देख के रोना आता है,फ़िर आपने तो इसे आज़ाद कराने के लिये क्या नही किया?आप नही सुन पाओगे बापू?मै नही सुन पाऊंगा या तू सुना नही पायेगा?एक ही बात है बापू?कोई और टापिक नही है क्या आपके पास?देख मै तुझसे देश की जानकारी लेनेआया हूं।समझा।ठीक है बापू जैसी आपकी मरज़ी।दुःख होगा तो मुझे दोष मत देना।ठीक है सुना………। और फ़िर मेरे और बापू के बीच देश के बारे मे लम्बी चर्चा हुई।क्या चर्चा हुई सुनाऊंगा कल्।
Monday, July 13, 2009
चिदंबरम के चश्मे का फ़र्क!लालगढ लाल दिखाई दिया मगर छतीसगढ नही?हां अगर ममता यंहा की होती तो और बात थी?
आये दिन छतीसगढ मे नक्सली हमले कर रहें है और पुलिस के जवान असमय काल के गाल मे समा कर शहीद हो रहे हैं।यही हाल उडीसा का भी है।मगर केन्द्र की यूपीए सरकार को ये सब नज़र नही आ रहा है।कल यंहा एस पी विनोद कुमार चौबे समेत 30 जवान नक्सली हमले मे शहीद हो गये तब चिदंबरम ने अपने चश्मे पर एसी कमरे से बाहर आने पर जमी नमी को थोडा साफ़ किया और उन्हे धुंदला सा कुछ नज़र आया और अब वे सीआरपीएफ़ के 600 जवान भेज रहे हैं हैं?क्या ये जवान विनोद चौबे और उनके साथ शहीद हुये तीस जवानो के परिवार का दुःख कम कर सकेंगे?क्या उनकी खुशियां लौटा सकेंगे?कया यंहा लालगढ की तरह कोई बडा आपरेशन नही चलाया जा सकता?क्या इसके लिये प्रदेश मे कांग्रेस या कांग्रेस के समर्थक दल की सरकार या उसका प्रभाव होना ज़रूरी है?
यूपीये कहिये या कांग्रेस उसकी नीयत पर तो सवाल उठना वाजिब है?जिस तरीके से लालगढ मे नक्सलियों के सफ़ाये के लिये अभियान चलाया गया,वो प्रशंसनीय है मगर जिस तरीके से भाजपा शासित छत्तीसगढ की नक्सली उत्पात के बावज़ूद उपेक्षा की गई वो भी सामने है।आम चुनावो मे ममता के साथ मिली ज़बरदस्त सफ़लता और आने वाले विधानसभा चुनाव मे सरकार बनाने की अपार संभावनाओं ने लालगढ के नक्सली गढ को ढहाने मे पूरी ताक़त झोंक दी और नतीज़ा भी शानदार सफ़लता के रूप मे सामने आया।
केन्द्र सरकार जब लालगढ का नक्सली आतंक खतम कर सकती है तो छ्त्तीसगढ का भी कर सकती है अगर वो चाहे तो?शायद इसिलिये कहा जाता है नक्सलवाद एक राजनैतिक समस्या है?जिसका हल राजनैतिक इच्छा शक्ति के बिना संभव ही नही है।यंहा भी अगर किसी चीज़ की कमी नज़र आती है तो सिर्फ़ राजनैतिक इच्छा शक्ति की।इतने बडे हमले और हादसे के बाद भी यंहा सिर्फ़ 600 जवान भेजना कोई ठोस हल नही है।इसके लिये टुकडो मे नही पूरा ईलाज़ ज़रूरी है।ईलाका बडा और दुर्गम होने के कारण एक साथ नही सही मगर एक के बाद एक लगातार अलग अलग हिस्सों मे अभियान चला कर छतीसगढ को भी लालगढ जैसे ही मुक्त कराया जा सकता है।
सवाल फ़िर उसी बात का आता है कि छत्तीसगढ किस चश्मे से कैसा नज़र आता है?भाजपा के चश्मे से और कांग्रेस या चिदंबरम के चश्मे से जिस दिन एक जैसा नज़र आयेगा उस दिन ही छतीसगढ से नक्स्ल समस्या के अंत की शुरूआत हो जायेगी ?
Saturday, December 13, 2008
हार से भी नहीं सीखा सबक कांग्रेसियों ने
छत्तीसगढ़ की सत्ता में वापसी के सुनहरे अवसर को गुटबाजी के कारण गवां चुकी कांग्रेस ने नेता प्रतिपक्ष के पद पर कब्जे़ के लिए फिर जमकर गुटबाजी हुई और विधायक दल की बैठक में हंगामा भी हुआ। 3-3 केन्द्रीय पर्यवेक्षकों की मौजूदगी के बावजूद जि़न्दाबाद-मुर्दाबाद होता रहा और बैठक बेनतीजा रही। हमेशा की तरह फैसला हाई कमान यानि सोनिया गांधी के ऊपर सौंप दिया गया। 2 घंटे तक चले हंगामें का ड्रामा देखकर ऐसा लगा कि विधानसभा चुनाव में हार के बावजूद कांग्रेसियों ने लगता है कोई सबक नहीं सीखा।
सत्ता से दूर हो चुकी कांग्रेस ने अब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी हथियाने के लिए जोर आजमाइश हो रही है। मुख्यमंत्री की कुर्सी न सही, नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी ही सही यानि भागते भूत की लंगोटी लूटने के लिए प्रदेश के सारे दिग्गज ऐसे भिड़े कि दुश्मन भी शरमा जाए। एयरपोर्ट से सर्किट हाउस पहुंचते ही केन्द्रीय पर्यवेक्षक नारायण सामी को पूर्व मुख्यमंत्री जोगी समर्थकों ने घेर ही लिया और शुरू हो गया जिन्दाबाद-मुर्दाबाद का खेल।
विधायक दल की बैठक के पहले दिन होटल सेलिब्रेशन में कांग्रेसी विधानसभा चुनाव में हुई हार से निराश नहीं दिखे, बल्कि गुटबाजी को सेलिब्रेट करते नज़र आए। यहां 28 विधायकों के हस्ताक्षर वाला एक पर्चा भी बंटा जिसमें अजीत जोगी को नेता प्रतिपक्ष बनाने की मांग की गई। इस पर्चे को केन्द्रीय पर्यवेक्षकों ने तो खारिज किया ही खुद जोगी ने भी ऐसे पर्चे की जानकारी होने से इनकार कर दिया। लेकिन जानकार जानते हैं कि पर्चा आया कहां से और बांटा किसने।
बैठक तो हुई विधायक दल का नेता चुनने के लिए लेकिन इसमें एक नाम पर सहमति होने से पहले ही हार के कारण गिनाना शुरू कर दिए गए। बैठक हार की समीक्षा बैठक में बदलने लगी थी तभी केन्द्रीय पर्यवेक्षकों ने थोड़ा कड़ा रूख अख्तियार करते हुए बैठक को जबरन खत्म करने की घोषणा की और नेता प्रतिपक्ष चुनने का फैसला हाई कमान यानि सोनिया पर छोड़ दिया था।
कई बार केन्द्र में मंत्री रहे विद्याचरण शुक्ल, मोतीलाल वोरा, प्रदेश में मंत्री रहे सत्यनारायण शर्मा, चरणदास महंत, धनेन्द्र साहू सबके गुट मिल-जुलकर एक तरफ हैं और दूसरी तरफ सत्ता और संगठन दोनों से दूर पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी का गुट है। विधानसभा चुनाव में अजीत जोगी अपने समर्थकों को ज़्यादा से ज़्यादा टिकट दिलाने में सफल हो गए थे और उनके विरोधी इस मुहिम में उनसे पिछड़ गए थे। चुनाव में भीतरघात का खेल जमकर चला और दूसरे गुट के धाकड़ नेता सत्यनारायण शर्मा, धनेन्द्र साहू, महेन्द्र कर्मा, भूपेश बघेल चुनाव में हार गए। इस बात को लेकर भी जोगी गुट पर आरोप लगाए जा रहे हैं तो जोगी गुट ने ये साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है कि प्रदेश में जीतने वाले ज़मीनी नेता सिर्फ उनके साथ हैं। गुटबाजी में उलझी कांग्रेस के हाथ से सत्ता का सिंहासन तो फिसल चुका है मगर लगता है कांग्रेस अपनी परंपरा गुटबाजी का जश्न मनाना छोड़ नहीं सकती।
सत्ता से दूर हो चुकी कांग्रेस ने अब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी हथियाने के लिए जोर आजमाइश हो रही है। मुख्यमंत्री की कुर्सी न सही, नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी ही सही यानि भागते भूत की लंगोटी लूटने के लिए प्रदेश के सारे दिग्गज ऐसे भिड़े कि दुश्मन भी शरमा जाए। एयरपोर्ट से सर्किट हाउस पहुंचते ही केन्द्रीय पर्यवेक्षक नारायण सामी को पूर्व मुख्यमंत्री जोगी समर्थकों ने घेर ही लिया और शुरू हो गया जिन्दाबाद-मुर्दाबाद का खेल।
विधायक दल की बैठक के पहले दिन होटल सेलिब्रेशन में कांग्रेसी विधानसभा चुनाव में हुई हार से निराश नहीं दिखे, बल्कि गुटबाजी को सेलिब्रेट करते नज़र आए। यहां 28 विधायकों के हस्ताक्षर वाला एक पर्चा भी बंटा जिसमें अजीत जोगी को नेता प्रतिपक्ष बनाने की मांग की गई। इस पर्चे को केन्द्रीय पर्यवेक्षकों ने तो खारिज किया ही खुद जोगी ने भी ऐसे पर्चे की जानकारी होने से इनकार कर दिया। लेकिन जानकार जानते हैं कि पर्चा आया कहां से और बांटा किसने।
बैठक तो हुई विधायक दल का नेता चुनने के लिए लेकिन इसमें एक नाम पर सहमति होने से पहले ही हार के कारण गिनाना शुरू कर दिए गए। बैठक हार की समीक्षा बैठक में बदलने लगी थी तभी केन्द्रीय पर्यवेक्षकों ने थोड़ा कड़ा रूख अख्तियार करते हुए बैठक को जबरन खत्म करने की घोषणा की और नेता प्रतिपक्ष चुनने का फैसला हाई कमान यानि सोनिया पर छोड़ दिया था।
कई बार केन्द्र में मंत्री रहे विद्याचरण शुक्ल, मोतीलाल वोरा, प्रदेश में मंत्री रहे सत्यनारायण शर्मा, चरणदास महंत, धनेन्द्र साहू सबके गुट मिल-जुलकर एक तरफ हैं और दूसरी तरफ सत्ता और संगठन दोनों से दूर पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी का गुट है। विधानसभा चुनाव में अजीत जोगी अपने समर्थकों को ज़्यादा से ज़्यादा टिकट दिलाने में सफल हो गए थे और उनके विरोधी इस मुहिम में उनसे पिछड़ गए थे। चुनाव में भीतरघात का खेल जमकर चला और दूसरे गुट के धाकड़ नेता सत्यनारायण शर्मा, धनेन्द्र साहू, महेन्द्र कर्मा, भूपेश बघेल चुनाव में हार गए। इस बात को लेकर भी जोगी गुट पर आरोप लगाए जा रहे हैं तो जोगी गुट ने ये साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है कि प्रदेश में जीतने वाले ज़मीनी नेता सिर्फ उनके साथ हैं। गुटबाजी में उलझी कांग्रेस के हाथ से सत्ता का सिंहासन तो फिसल चुका है मगर लगता है कांग्रेस अपनी परंपरा गुटबाजी का जश्न मनाना छोड़ नहीं सकती।
Subscribe to:
Posts (Atom)